महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 924, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंलाल रंगके फूल तथा वन्य पुष्पको मस्तकपर धारण करना चाहिये। सोनेकी माला पहननेसे कभी अशुद्ध नहीं होती ॥ ८४ ॥
स्नातस्य वर्णकं नित्यमार्द्रं दद्याद् विशाम्पते ।
विपर्ययं न कुर्वीत वाससो बुद्धिमान् नरः ॥ ८५ ॥
प्रजानाथ! स्नानके पश्चात् मनुष्यको अपने ललाटपर गीला चन्दन लगाना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको कपड़ोंमें कभी उलट-फेर नहीं करना चाहिये अर्थात् उत्तरीय वस्त्रको अधोवस्त्रके स्थानमें और अधोवस्त्रको उत्तरीयके स्थानमें न पहने ॥ ८५ ॥
तथा नान्यधृतं धार्यं न चापदशमेव च ।
अन्यदेव भवेद् वासः शयनीये नरोत्तम ॥ ८६ ॥
अन्यद् रथ्यासु देवानामार्चायामन्यदेव हि ।
नरश्रेष्ठ! दूसरेके पहने हुए कपड़े नहीं पहनने चाहिये। जिसकी कोर फट गयी हो, उसको भी नहीं धारण करना चाहिये। सोनेके लिये दूसरा वस्त्र होना चाहिये। सड़कोंपर घूमनेके लिये दूसरा और देवताओंकी पूजाके लिये दूसरा ही वस्त्र रखना चाहिये ॥ ८६ १/२ ॥
प्रियंगुचन्दनाभ्यां च बिल्वेन तगरेण च ॥ ८७ ॥
पृथगेवानुलिम्पेत केसरेण च बुद्धिमान् ।
बुद्धिमान् पुरुष राई, चन्दन, बिल्व, तगर तथा केसरके द्वारा पृथक्-पृथक् अपने शरीरमें उबटन लगावे ॥
उपवासं च कुर्वीत स्नातः शुचिरलंकृतः ॥ ८८ ॥
पर्वकालेषु सर्वेषु ब्रह्मचारी सदा भवेत् ।
मनुष्य सभी पर्वोंके समय स्नान करके पवित्र हो वस्त्र एवं आभूषणोंसे विभूषित होकर उपवास करे तथा पर्वकालमें सदा ही ब्रह्मचर्यका पालन करे ॥
समानमेकपात्रे तु भुञ्जेन्नान्नं जनेश्वर ॥ ८९ ॥
नालीढया परिहतं भक्षयीत कदाचन ।
तथा नोद्धृतसाराणि प्रेक्ष्यते नाप्रदाय च ॥ ९० ॥
जनेश्वर! किसीके साथ एक पात्रमें भोजन न करे। जिसे रजस्वला स्त्रीने अपने स्पर्शसे दूषित कर दिया हो, ऐसे अन्नका भोजन न करे एवं जिसमेंसे सार निकाल लिया गया हो ऐसे पदार्थको कदापि भक्षण न करे तथा जो तरसती हुई दृष्टिसे अन्नकी ओर देख रहा हो, उसे दिये बिना भोजन न करे ॥ ८९-९० ॥
न संनिकृष्टे मेधावी नाशुचेर्न च सत्सु च ।
प्रतिषिद्धान् नधर्मेषु भक्ष्यान् भुञ्जीत पृष्ठतः ॥ ९१ ॥
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह किसी अपवित्र मनुष्यके निकट अथवा सत्पुरुषोंके सामने बैठकर भोजन न करे। धर्मशास्त्रोंमें जिनका निषेध किया गया हो, ऐसे भोजनको पीठ पीछे छिपाकर भी न खाय ॥ ९१ ॥