महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | ११ नमस्कार (१) । तुम एकमात्र शरण्य अर्थात् आश्रय हो, तुम अद्वितीय वरणीय हो, तुम जगत् के एकमात्र कारण हो, तुम विश्व-रूप हो, एक-मात्र तुम्हीं जगत् के सृष्टि-कर्त्ता, पालन-कर्त्ता और अन्त में संहार-कर्त्ता हो, तुम्हीं एक-मात्र परम पुरुष हो, निश्चल और विविध कल्पनाओं से रहित हो (२) । तुम भय के भय हो, तुम भयानक के भयानक हो, तुम प्राणियों के एकमात्र गति हो, पावित्र्य-जनक सबके पावित्र्य-जनक हो। तुम उच्च पद पर अधिष्ठित ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि के नियामक हो, तुम सभी श्रेष्ठ पदार्थों से श्रेष्ठ हो और रक्षकों के रक्षक हो (३) । हे परेश (ब्रह्मादि देवों के स्वामी), हे प्रभो ! तुम सर्व-रूप, अविनाशी, अनिर्देश्य और सभी इन्द्रियों से अगम्य हो - किसी भी इन्द्रिय द्वारा गोचर नहीं हो । हे सत्य-स्वरूप, हे अचिन्त्य, हे अक्षर, हे व्यापक, हे अव्यक्त तत्व, हे जगद्-भासकाधीश (जगद्-भासक चन्द्र-सूर्यादि के अधीश्वर) अथवा हे जगद्-भासक, हे अधीश, तुम हम लोगों को 'अपाय' अर्थात् भक्ति-विश्लेष और ज्ञान-विश्लेष होने से बचाओ (४) । उसी एक-मात्र ब्रह्म को हम स्मरण करते हैं, उसी अद्वितीय ब्रह्म का हम जप करते हैं, उसी एक जगत्-साक्षी-स्वरूप ब्रह्म को हम प्रणाम करते हैं। वही तुम सत् हो, जगत् के एक-मात्र निधान अर्थात् आश्रय-भूत हो, स्वयं निरालम्ब अर्थात् आश्रय-रहित हो, वही तुम ईश्वर हो, भव-सागर के जहाज-स्वरूप हो, हम तुम्हारा आश्रय ग्रहण करते हैं (५) । परमात्मा ब्रह्म के 'पञ्च-रत्न' नामक इस स्तोत्र को जो संयत होकर पाठ करता है, वह ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त करता है (६) । प्रतिदिन प्रदोष-काल में इस 'पञ्च-रत्न' स्तोत्र का पाठ करे। विशेष कर सोमवार को ज्ञानी व्यक्ति अपने ब्रह्म-निष्ठ बान्धवों को इस स्तोत्र को सुनाये और समझा दे (७) । हे देवि ! महेश्वर के 'पञ्चरत्न स्तोत्र' नामक स्तोत्र को तुमसे मैंने कहा है (५६-६५) । हे चार्वङ्गि ! उनके 'जगन्मङ्गल' नामक कवच को सुनो। इस कवच का पाठ करने एवं धारण करने से निश्चय ही ब्रह्म-ज्ञानी होता है (६६) - कवचं शृणु चार्वङ्गि ! जगन्मङ्गल-नामकम् । पठनाद् धारणाद् यस्य ब्रह्मज्ञो जायते ध्रुवम् ॥१ परमात्मा शिरः पातु हृदयं परमेश्वरः । कण्ठं पातु जगत्-पाता वदनं सर्व-दृग्-विभुः ॥२ करौ मे पातु विश्वात्मा पादौ रक्षतु चिन्मयः । सर्वाङ्गं सर्वदा पातु परं ब्रह्म सनातनम् ॥३ श्रीजगन्मङ्गलस्यास्य कवचस्य सदाशिवः । ऋषिश्च्छन्दोऽनुष्टुविति परम-ब्रह्म देवता । चतुर्वर्ग-फलावाप्त्यै विनियोगः प्रकीर्त्तितः ॥४॥ यः पठेद् ब्रह्म-कवचं ऋर्षि-न्यास पुरःसरम् । स ब्रह्म-ज्ञानमासाद्य साक्षाद् ब्रह्म-मयो भवेत् ॥५ भूर्जे बिलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद् यदि । कण्ठे दक्षिणे बाहौ सर्व-सिद्धीश्वरो भवेत् ॥६ इत्येतत् परम-ब्रह्म-कवचं ते प्रकाशितम् । दद्यात् प्रियाय शिष्याय गुरु-भक्ताय धीमते ॥७ अर्थात् परमात्मा हमारे शिरोदेश की रक्षा करें, परमेश्वर हृदय की रक्षा करें, जगत्-पाता कण्ठ की रक्षा करें, सर्व-दर्शी विभु वदन को रक्षा करें (१) । विश्वात्मा हमारे दोनों हाथों की रक्षा करें, चिन्मय हमारे दोनों पैरों की रक्षा करें, सनातन परब्रह्म सदैव हमारे सर्वाङ्ग की रक्षा करें (२) । इस जगन्मङ्गल कवच के ऋषि सदा- शिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता परमब्रह्म, फल चतुर्वर्ग-प्राप्ति के निमित्त विनियोग है (३) । जो ऋषि-न्यास कर इस ब्रह्म-कवच का पाठ करता है, वह ब्रह्म-ज्ञान पाकर साक्षात् ब्रह्म-मय होता है (४) । जो इस कवच को भोज-पत्र पर लिखकर स्वर्ण-गुटिका में रखकर कण्ठ या दाईं भुजा में धारण करता है, वह सब प्रकार की सिद्धियों का स्वामी होता है (६) । तुमसे मैंने इस परम ब्रह्म का कवच प्रकट किया। इसे गुरु-भक्त, बुद्धिमान्, प्रिय शिष्य को