भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

मार्क्सीय द्वन्द्ववाद २४१ सीमा है, अतएव अचेतन चेतन नहीं बन सकता । इस तरह असत्य सत्य, अनित्य नित्य नहीं बन सकते । स्टालिनका कहना है कि 'द्वन्द्ववादका सिद्धान्त है कि प्रकृतिके सभी बाह्य रूपों और पदार्थोंमें आन्तरिक असङ्गतियाँ सहजरूपसे विद्यमान हैं । इन पदार्थों और रूपोंके भाव-पक्ष और अभाव-पक्ष दोनों हैं । उनका अतीत है तो अनागत भी है । एक अंश मरणशील है तो दूसरा विकासोन्मुख । इन दो विरोधी अंशोंका संघर्ष ही विकासक्रमकी आन्तरिक प्रक्रिया है । परिमाणभेदके गुण-भेदमें परिवर्तित होनेकी यही आन्तरिक प्रक्रिया है । इसलिये द्वन्द्वात्मक प्रणालीके अनुसार निम्नसे ऊर्ध्वकी ओर विकास इस क्रममें नहीं होता कि प्रकृतिके स्तर एकके बाद एक सहज गतिसे खुलते जायें । इसके प्रतिकूल विकासक्रममें पदार्थों और प्रकृतिके बाह्यरूपोंमें सहजरूपसे विद्यमान असगतियाँ ही खुलती जाती हैं । इन असंगतियोंके आधारपर जो विरोधी प्रवृत्तियाँ क्रियाशील हैं, उनका संघर्ष ही खुलता जाता है ।' लेनिनके शब्दोंमें 'वास्तवमें पदार्थोंके सारतत्त्वोंमें ही अन्त- र्निहित असंगतियोंके अध्ययनका ही नाम द्वन्द्ववाद है ।' ( लेनिनदर्शन-सम्बन्धी नोटबुक रूसी संस्करण, पृ० २६७)। लेनिनने यह भी कहा था कि 'विरोधी तत्त्वोंका संघर्ष ही विकास है ।' ( सक्षिप्त लेनिन ग्रन्थावली, रूसी संस्करण, खण्ड १३, पृष्ठ ३०१) उपर्युक्त बातोंपर विचार करनेसे विदित होगा कि अंश-भेदसे निर्माण- निर्वाणकी परम्परा चलती है । परंतु अंशभेदसे जब दोनों बातें चलती हैं, तब उनमें संघर्ष क्या ? एक व्यक्ति मरता, दूसरा पैदा होता है, इसमें संघर्षकी कोई बात नहीं । क्रमेण वनस्पति, पश्वादि एक ओर उत्पन्न हो रहे हैं तो दूसरी ओर नष्ट हो रहे हैं । हाँ, यदि उसी क्षण उसी अंशमें उसी रूपसे भाव, अभाव, निर्वाण, निर्माण आदि हों, तभी विरोध और संघर्ष हो सकता है । पर यह असम्भव है ही, क्योंकि यदि भाव, अभाव, निर्वाण, निर्माण समान देश, समान कालमें रह जायें तो संसारमें विरोध ही मिट जायगा । फिर संघर्ष भी क्या रहेगा ? यदि रात्रि और दिन समकालमें हों तभी संघर्ष सम्भव है । दो विरोधी मल्लोका ही संघर्ष हो सकता है, अतीत-अनागत मल्लोंका संघर्ष क्या होगा ? साथ ही यदि सहभाव सम्भव हो जाय तो भी विरोध असम्भव है, क्योकि स्वानुचित देशकाल-स्थायित्व ही विरोधका कारण होता है । धरणी, अनिल, जलके संघर्षसे, बीजके विध्वंससे अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है । कुछ लोग इसी आधारपर असत्कारण- वाद सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं, परंतु अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि ऐसा हो तो कार्यमे कारणका अनुवेध रहनेसे हर कार्यमें कारणका अनुवेध रहना चाहिये, किंतु उपलब्धि इसके विपरीत रहती है । कार्यमात्रमें सत्ताका ही अनुवेध दिखायी देता है । अतः सत्कार्यवाद ही ठीक है । बीजके अंश ही अंकुरादिमें अनुस्यूत रहते हैं । सर्वथापि व्यवहारमें कार्योत्पादनानुकूल मा० रा० १६-