भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 866 में से

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दासप्रथाको कितना भी निरर्थक अस्वाभाविक या मूर्खतापूर्ण क्यों न कहा जाय; परंतु किसी-न-किसीरूपमें उसका अस्तित्व सर्वत्र है और रहेगा। हाँ, नाममें भेद हो सकता है। कौन नहीं जानता कि 'सोवियतसंघ'में सरकारसे मतभेद रखने- वाले लोगोंके साथ दासोंकी अपेक्षा भी बुरा बर्ताव किया जाता है ? विरुद्ध व्यक्तियोंको शासनाारूढ व्यक्तियो या संघोंके नियन्त्रणमें दासोंसे भी निकृष्ट बनकर जीवन बिताना पड़ता है। शासन, न्याय, शिक्षा, सेना आदि सभी विभागोंमें उच्च कर्मचारियों और निम्न कर्मचारियोंमें अङ्गाङ्गिभाव-या शेष शेषिभाव अनिवार्य रहता है। 'एक व्यक्ति दूसरेका हुक्म माननेके लिये बाध्य हो, न माननेपर दण्डित हो', यही दास-प्रथाका नमूना है। इसका कब अभाव हो सकता है । धर्म- नियन्त्रित राज्यमें ही शासन एवं शासित आदिका अभाव कहा जा सकता है। वहाँ भी धर्ममूलक नियम्य-नियामक भाव, गुरु-शिष्य, अग्रज-अनुज, पिता पुत्र, पति- पत्नीके नियम्य-नियामकभाव रहता ही है। सोवियत प्रजातन्त्रकी तुलनामें पूँजीवादी, जनवादी प्रजातन्त्रको निकृष्ट कहना भी स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्त है। इस सम्बन्धमें उत्तरोत्तर ऐतिहासिक प्रगतिकी बात करना निराधार है। आजके प्रजातन्त्र, गण- तन्त्र सबकी अपेक्षा दो हजार वर्ष पहलेके अशोकके साम्राज्यकी सुख समृद्धि कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थी। उसमें सभी अपनेको सुखी और समृद्ध अनुभव करते थे। पाँच हजार वर्ष पहले युधिष्ठिरके शासनमें तो धर्मराज्य था ही। लाखों वर्ष पहले होनेवाले रामराज्यका मुकाबला करनेवाला कोई भी शासन न कभी हुआ और न भविष्यमें ही होनेकी आशा है। आजके पण्डितम्मन्य बड़े गर्वसे कहते हैं कि 'यह बीसवीं शताब्दी है, पुराना जमाना लद गया। दुनिया बहुत आगे बढ़ गयी। पुरानी धर्म-कर्मकी सड़ी-गली बातें अब नहीं चल सकतीं। उनका समय बीत गया,' परन्तु वे यह नहीं देखते कि यदि धर्म और सभ्यताका समय बीत गया तो सुख, शान्ति एव समृद्धिका भी समय बीत गया। यदि सुख-शान्तिके बीते दिनोंको लौटाना है तो धर्म, सभ्यता एवं सुव्यवस्थाओके दिनोंको भी लौटाना ही पड़ेगा। कुछ लोग अपने दृष्टिकोणके अनुसार तोड़-मरोड़कर इतिहासका भी दृष्टि- कोण बना लें, परन्तु इतने मात्रसे ऐतिहासिक घटनाओंका सर्वसिद्धरूप मिटाया नहीं जा सकता। ह्रास-विकासका चक्र ही ससार है। विकारी पुरानी चीजका क्षय, नवीनका अभ्युदय होता है सही; परन्तु आत्मा-काल आदि कुछ पुरातन ऐसी भी तो वस्तुएँ होती हैं, जो नित्य हैं, जिनका कभी क्षय नहीं होता। इसी तरह व्यक्तियों- के अनित्य होनेपर भी प्रवाह नित्य होता है। जैसे गङ्गादि प्रवाहकी अपेक्षा दीप-शिखादि प्रवाह अधिक अस्थिर है। सत्त्व, रज, तमके अनुसार संसारका प्रवाह अनुकूल-प्रतिकूल चलता है। कभी काम-क्रोधका तो कभी शम-दमका प्रवाह चलता है। अविवेकी कामादि प्रवाहमें बहते हैं। विवेकी उन्हें रोककर शान्त्यादिका

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