मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| यत्र माहेश्वरान् धर्मानधिकृत्य च षण्मुखः।<br>कल्पे तत्पुरुषं वृत्तं चरितैरुपबृंहितम्॥ ४१<br><br>स्कान्दं नाम पुराणं च ह्येकाशीति निगद्यते।<br>सहस्राणि शतं चैकमिति मर्त्येषु गद्यते॥ ४२<br><br>परिलिख्य च यो दद्याद्धेमशूलसमन्वितम्।<br>शैवं पदमवाप्नोति मीने चोपागते रवौ॥ ४३<br><br>त्रिविक्रमस्य माहात्म्यमधिकृत्य चतुर्मुखः।<br>त्रिवर्गमभ्यधात् तच्च वामनं परिकीर्तितम्॥ ४४<br><br>पुराणं दशसाहस्रं कूर्मकल्पानुगं शिवम्।<br>यः शरद्विषुवे दद्याद् वैष्णवं यात्यसौ पदम्॥ ४५<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां मोक्षस्य च रसातले।<br>माहात्म्यं कथयामास कूर्मरूपी जनार्दनः॥ ४६<br><br>इन्द्रद्युम्नप्रसङ्गेन ऋषिभ्यः शक्रसंनिधौ।<br>अष्टादश सहस्राणि लक्ष्मीकल्पानुषङ्गिकम्॥ ४७<br><br>यो दद्यादयने कूर्मं हेमकूर्मसमन्वितम्।<br>गोसहस्रप्रदानस्य फलं सम्प्राप्नुयान्नरः॥ ४८<br><br>श्रुतीनां यत्र कल्पादौ प्रवृत्त्यर्थं जनार्दनः।<br>मत्स्यरूपेण मनवे नरसिंहोपवर्णनम्॥ ४९<br><br>अधिकृत्याब्रवीत् सप्तकल्पवृत्तं मुनीश्वराः।<br>तन्मात्स्यमिति जानीध्वं सहस्राणि चतुर्दश॥ ५० | जिसमें कल्पान्तके समय स्वामिकार्तिकने माहेश्वर धर्मोंका आश्रय लेकर शिवजीके सुशोभन चरित्रोंसे युक्त वृत्तान्तका वर्णन किया है, उस (त्रयोदश पुराण)-का नाम स्कन्दपुराण है। वह मृत्युलोकमें इक्यासी हजार एक सौ श्लोकोंका बतलाया जाता है।$^१$ जो मनुष्य उसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित त्रिशूलके साथ सूर्यके मीन राशिपर आनेपर (प्रायः चैत्रमासमें) दान करता है, वह शिव-पदको प्राप्त कर लेता है। जिसमें ब्रह्माने त्रिविक्रमके माहात्म्यका आश्रय लेकर त्रिवर्गोंका वर्णन किया है, उसे (चतुर्दश) वामनपुराण कहते हैं। इसमें दस हजार श्लोक हैं। यह कूर्मकल्पका अनुगमन करनेवाला तथा मङ्गलप्रद है। जो मानव शरत्कालीन विषुवयोग (१८ सितम्बरके लगभग दिन-रातके बराबर होनेके काल—तुलासंक्रान्ति)-में इसका दान करता है, वह विष्णु-पदको प्राप्त कर लेता है। जिसमें कूर्मरूपी भगवान् जनार्दनने रसातलमें इन्द्रद्युम्नकी कथाके प्रसङ्गवश इन्द्रके निकट धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके माहात्म्यका ऋषियोंके प्रति वर्णन किया है, उसे (पञ्चदश) कूर्मपुराण कहते हैं। यह लक्ष्मीकल्पसे सम्बन्ध रखनेवाला है। इसमें अठारह हजार श्लोक हैं। जो मनुष्य सूर्यके उत्तरायण एवं दक्षिणायनके प्रारम्भकालमें स्वर्णनिर्मित कच्छपसहित कूर्मपुराणका दान करता है, उसे एक हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है॥ ३६—४८॥<br><br>मुनिवरो! जिसमें कल्पके प्रारम्भमें भगवान् जनार्दनने मत्स्य-रूप धारण करके मनुके प्रति श्रुतियोंकी प्रवृत्तिके निमित्त नृसिंहावतारके वृत्तान्तका आश्रय लेकर सातों कल्पोंके वृत्तान्तोंका वर्णन किया है, उसे (षोडश$^२$ मात्स्य) मत्स्यपुराण जानना चाहिये। उसमें चौदह हजार श्लोक हैं। |
१. यहाँके अतिरिक्त विष्णुपुराण ३।६।२१—२४; भागवत १२।७ तथा १३; मार्कण्डेय १३४; वाराह ११२।७९-७२; कूर्म १।१३-१५; लिङ्ग १।३९।६१-४; पद्म १।६२।२-७; नारद १।९२-१०९ आदिमें पुराणक्रम एवं श्लोक-संख्यादिका वर्णन है। शोधकर्त्ताओंने इन क्रमोंको तीन भागोंमें क्रमबद्ध किया है। इनमें मत्स्य, भागवत, विष्णु आदि क्रमको मत्स्य या विष्णुपुराणक्रम कहा है। इनके अनुसार स्कन्दपुराण १३वीं संख्यापर तथा लिङ्गपुराणद्वारा निर्दिष्ट क्रममें १७ वीं संख्यापर निर्दिष्ट है। इसके सूतसंहितादि छः संहिताओंका एक रूप तथा माहेश्वरादि सात खण्डोंका दूसरा रूप—दोनों मिलकर पौने दो लाख श्लोक होते हैं। फिर शाम्भल-माहात्म्य, सत्यनारायण-व्रतकथा आदि इसके अनेक खिल ग्रंथ भी हैं।
२. यह विष्णुपुराण आदिक्रममें १६ वीं संख्यापर, पर लिङ्गादिक्रममें १५ वीं संख्यापर परिगणित है।