भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 274

२६४ * मत्स्यपुराण * होतव्याः समिधश्चात्र तथैवार्कपलाशयोः । यवकृष्णातिलैर्होमः कर्तव्योऽष्टशतं पुनः ॥ १८ व्याहृतिभिस्तथाऽऽज्येन तथैवाष्टशतं पुनः। हुत्वा स्नानं च कर्तव्यं मङ्गलं येन धीमता ॥ १९ विप्रेण वेदविदुषा विधिवद् दर्भपाणिना । स्थापयित्वा तु चतुरः कुम्भान् कोणेषु शोभनान् ॥ २० पञ्चमं च पुनर्मध्ये दध्यक्षतविभूषितम् । स्थापयेदव्रणं कुम्भं समर्चेनाभिमन्त्रितम् ॥ २१ सौरेण तीर्थतोयेन पूर्णं रत्नसमन्वितम् । सर्वान् सर्वौषधैर्युक्तान् पञ्चगव्यसमन्वितान् । पञ्चरत्नफलैः पुष्पैर्वासोभिः परिवेष्टयेत् ॥ २२ गजाश्वरथ्यावल्मीकात् संगमाद्ध्रदगोकुलात् । संशुद्धां मृदानीय सर्वेष्वेव विनिक्षिपेत् ॥ २३ चतुर्ष्वपि च कुम्भेषु रत्नगर्भेषु मध्यमम् । गृहीत्वा ब्राह्मणस्तत्र सौरान् मन्त्रानुदीरयेत् ॥ २४ नारीभिः सप्तसंख्याभिर्व्यङ्गाङ्गीभिरत्र च। पूजिताभिर्यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः । सविप्राभिश्च कर्तव्यं मृतवत्साभिषेचनम् ॥ २५ दीर्घायुरस्तु बालोऽयं जीवपुत्रा च भामिनी । आदित्यश्चन्द्रमाः सार्धं ग्रहनक्षत्रमण्डलैः ॥ २६ सशक्रा लोकपाला वै ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । ते ते चान्ये च देवौघाः सदा पान्तु कुमारकम् ॥ २७ मित्रः शनिर्वा हुतभुग् ये च बालग्रहाः क्वचित् । पीडां कुर्वन्तु बालस्य मा मातुर्जनकस्य वै ॥ २८ ततः शुक्लाम्बरधरा कुमारपतिसंयुता । सप्तकं पूजयेद् भक्त्या स्त्रीणामथ गुरुं पुनः ॥ २९ काञ्चनीं च ततः कुर्यात् ताम्रपात्रोपरिस्थिताम् । प्रतिमां धर्मराजस्य गुरवे विनिवेदयेत् ॥ ३० रूद्रसूक्तकी ऋचाओंका पाठ एवं उनके द्वारा हवन करना चाहिये। इस व्रतमें हवनके लिये मन्दार और पलाशकी समिधा होनी चाहिये। पुनः जौं और काले तिलद्वारा एक सौ आठ बार हवन करनेका विधान है। उसी प्रकार व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्)- के उच्चारणपूर्वक एक सौ आठ बार घीकी आहुति देनी चाहिये। इस प्रकार हवन करके बुद्धिमान् व्रती पुनः स्नान करे; क्योंकि इससे मङ्गलकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर हाथमें कुश लिये हुए वेदज्ञ ब्राह्मणद्वारा वेदीके चारों कोणोंमें चार सुन्दर कलश स्थापित कराये। पुनः उसके बीचमें छिद्ररहित पाँचवाँ कलश स्थापित करे। उसे दही- अक्षतसे विभूषित करके सूर्यसम्बन्धिनी सात ऋचाओंसे अभिमन्त्रित कर दे। फिर उसे तीर्थ-जलसे भरकर उसमें रत्न या सुवर्ण डाल दे। इसी प्रकार सभी कलशोंमें सर्वौषधि, पञ्चगव्य, पञ्चरत्न, फल और पुष्प डालकर उन्हें वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर हाथीसार, घुड़शाल, विमवट, नदीके संगम, तालाब, गोशाला और राजद्वारसे शुद्ध मिट्टी लाकर उन सभी कलशोंमें छोड़ दे ॥ १३-२३ ॥ तदनन्तर कार्यकर्ता ब्राह्मण रत्नगर्भित चारों कलशोंके मध्यमें स्थित पाँचवें कलशको हाथमें लेकर सूर्य-मन्त्रोंका पाठ करे तथा सात ऐसी स्त्रियोंद्वारा, जो किसी अङ्गसे हीन न हों तथा जिनकी यथाशक्ति पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषणोंद्वारा पूजा की गयी हो, ब्राह्मणके साथ-साथ उस घड़ेके जलसे मृतवत्सा स्त्रीका अभिषेक कराये। (अभिषेकके समय इस प्रकार कहे-) 'यह बालक दीर्घायु और यह स्त्री जीवपुत्रा (जीवित पुत्रवाली) हो। सूर्य, ग्रहों और नक्षत्र-समूहोंसहित चन्द्रमा, इन्द्रसहित लोकपालगण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, इनके अतिरिक्त अन्यान्य जो देव-समूह हैं, वे सभी इस कुमारकी सदा रक्षा करें। सूर्य, शनि, अग्नि अथवा अन्यान्य जो कोई बालग्रह हों वे सभी इस बालकको तथा इसके माता- पिताको कहीं भी कष्ट न पहुँचायें।' अभिषेकके पश्चात् वह स्त्री श्वेत वस्त्र धारण करके अपने बच्चे और पतिके साथ उन सातों स्त्रियोंकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः गुरुकी पूजा करके धर्मराजकी स्वर्णमयी प्रतिमाको ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित करके गुरुको निवेदित कर दे।