भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 287

* अध्याय ७१ * । २७७

श्रीभगवानुवाच<br>तपोधनः सोऽप्यभिधाय चैवं<br>तदा च तासां व्रतमङ्गनानाम्।<br>स्वस्थानमेष्यत्यनु वै समस्ताः<br>व्रतं चरिष्यन्ति च वेदद्योने ॥ ६४ ॥**श्रीभगवान्‌ने कहा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार तपस्वी दाल्भ्य उन स्त्रियोंसे वाराङ्गनाओंके व्रतका वर्णन करके अपने स्थानको चले जायँगे। उसके पश्चात् वे सभी उस व्रतका अनुष्ठान करेंगी ॥ ६४ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽनङ्गदानव्रतं नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनङ्गदानव्रत नामक सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥


इकहत्तरवाँ अध्याय

अशून्यशयन (द्वितीया)-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ब्रह्मोवाच<br>भगवन् पुरुषस्येह स्त्रियाश्च विरहादिकम्।<br>शोकव्याधिभयं दुःखं न भवेद् येन तद् वद ॥ १<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>श्रावणस्य द्वितीयायां कृष्णायां मधुसूदनः।<br>क्षीरार्णवे सपत्नीकः सदा वसति केशवः ॥ २<br><br>तस्यां सम्पूज्य गोविन्दं सर्वान् कामान् समश्रुते।<br>गोभूहिरण्यतानादि सप्तकल्पशतानुगम् ॥ ३<br><br>अशून्यशयना नाम द्वितीया सम्प्रकीर्तिता।<br>तस्यां सम्पूजयेद् विष्णुमेभिर्मन्त्रैर्विधानतः ॥ ४<br><br>श्रीवत्सधारिन् श्रीकान्त श्रीधामन् श्रीपतेऽव्यय।<br>गार्हस्थ्यं मा प्रणशं मे यातु धर्मार्थकामदम् ॥ ५<br><br>अग्नयो मा प्रणश्यन्तु देवताः पुरुषोत्तम।<br>पितरो मा प्रणश्यन्तु मास्तु दाम्पत्यभेदनम् ॥ ६**ब्रह्माजीने पूछा—**भगवन्! इस लोकमें जिसका अनुष्ठान करनेसे पुरुषको पत्नीवियोग अथवा स्त्रीको पतिवियोग न हो तथा शोक एवं रोगका भय और दुःख न हो, वह व्रत बतलाइये ॥ १ ॥<br><br>**श्रीभगवान्‌ने कहा—**ब्रह्मन्! श्रावणमासके कृष्ण-पक्षकी द्वितीया तिथिको मधुसूदनभगवान् केशव लक्ष्मीसहित सदा क्षीरसागरमें निवास करते हैं, अतः उस तिथिको जो मनुष्य भगवान् गोविन्दकी पूजा कर सात सौ कल्पोंतक फल देनेवाली गौ, पृथ्वी और सुवर्णका दान करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यह द्वितीया अशून्यशयना* नामसे प्रसिद्ध है; इस दिन विधिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन कर इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंद्वारा प्रार्थना करनी चाहिये—<br>‘लक्ष्मीकान्त! आप श्रीवत्सको धारण करनेवाले, धन-सम्पत्तिके निधि और सौन्दर्यके अधीश्वर हैं। अविनाशी भगवन्! मेरा धर्म, अर्थ और कामको सिद्ध करनेवाला गृहस्थ-आश्रम कभी विनाशको न प्राप्त हो। पुरुषोत्तम! मेरे गृहमें अग्नियों और इष्ट देवताओंका कभी अभाव न हो, मेरे पितरोंका विनाश न हो और दाम्पत्य—पति-पत्नी (रूप-व्यवहार)-में कभी भेद-भाव न उत्पन्न हो।

* इस व्रतकी विस्तृत विधि वामनपुराणके १६ वें अध्यायमें है। पर यह वहाँ तथा पद्म, भविष्यादिमें कुछ अन्तरसे प्रायः इसी प्रकार निर्दिष्ट है।

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