भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 289
* अध्याय ७२ *२७९

| न पुत्रपशुरत्नानि क्षयं यान्ति पितामह।<br><br>समकल्पसहस्राणि समकल्पशतानि च।<br>कुर्वन्नशून्यशयनं विष्णुलोके महीयते॥ १९॥ | उनके पुत्र, पशु और धन आदिका विनाश नहीं होता। पितामह! अशून्यशयनव्रतका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सात हजार सात सौ कल्पोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १७-१९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽशून्यशयनव्रतं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अशून्यशयनव्रत नामक इकहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७१॥


बहत्तरवाँ अध्याय

अङ्गारक-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—
शृणु चान्यद् भविष्यं यद् रूपसम्पत्प्रदायकम्।<br>भविष्यति युगे तस्मिन् द्वापरान्ते पितामह।<br>पिप्पलादस्य संवादो युधिष्ठिरपुरःसरैः॥ १॥<br>वसन्तं नैमिषारण्ये पिप्पलादं महामुनिम्।<br>अभिगम्य तदा चैनं प्रश्नमेकं करिष्यति।<br>युधिष्ठिरो धर्मपुत्रो धर्मयुक्तस्तपोधनम्॥ २॥पितामह! अब भविष्यमें घटित होनेवाले एक अन्य व्रतके वृत्तान्तको सुनो, जो सुन्दरता और सम्पत्ति प्रदान करनेवाला है। उसी द्वापरयुगके अन्तमें युधिष्ठिर आदिके साथ महर्षि पिप्पलादका संवाद होगा। उस समय तपस्वी महामुनि पिप्पलादके नैमिषारण्यमें निवास करते समय धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर उनके निकट जाकर एक प्रश्न करेंगे॥ १-२॥
युधिष्ठिर उवाचयुधिष्ठिर पूछेंगे—
कथमारोग्यमैश्वर्यं मतिर्धर्मे गतिस्तथा।<br>अव्यङ्गता शिवे भक्तिर्वैष्णवो वा भवेत् कथम्॥ ३॥नीरोगता, ऐश्वर्य, धर्ममें बुद्धि तथा गति, अव्यङ्गता (शरीरके सभी अङ्गोंकी पूर्णता) तथा शिव एवं विष्णुमें अनुपम भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?॥ ३॥
ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—
तस्योत्तरमिदं ब्रह्मन् पिप्पलादस्य धीमतः।<br>शृणुष्व यद् वक्ष्यति वै धर्मपुत्राय धार्मिकः॥ ४॥ब्रह्मन्! (इस विषयमें) उन बुद्धिमान् पिप्पलादका वह उत्तर सुनो, जो वे धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिरसे कहेंगे॥ ४॥
पिप्पलाद उवाचपिप्पलाद कहेंगे—
साधु पृष्टं त्वया भद्र इदानीं कथयामि ते।<br>अङ्गारव्रतमित्येतत् स वक्ष्यति महीपतेः॥ ५॥<br>अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।<br>विरोचनस्य संवादं भार्गवस्य च धीमतः॥ ६॥<br>प्रह्लादस्य सुतं दृष्ट्वा द्विरष्टपरिवत्सरम्।<br>रूपेणाप्रतिमं कान्त्या सोऽहसद् भृगुनन्दनः॥ ७॥<br>साधु साधु महाबाहो विरोचन शिवं तव।<br>तत् तथा हसितं तस्य पप्रच्छ सुरसूदनः॥ ८॥भद्र! आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है, अब मैं आपको इस अङ्गारक-व्रतको बतला रहा हूँ। यों कहकर वे मुनि राजा युधिष्ठिरसे इस व्रतका (इस प्रकार) वर्णन करेंगे। महाराज युधिष्ठिर! इस विषयमें एक पुरातन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जो विरोचन और बुद्धिमान् शुक्राचार्यके संवाद (रूप)-में है। एक बार प्रह्लादके षोडशवर्षीय पुत्र विरोचनको देखकर, जो अनुपम सौन्दर्यशाली और कान्तिमान् था, भृगुनन्दन शुक्राचार्य हँस पड़े और उससे बोले—'महाबाहु विरोचन! तुम धन्य हो, तुम्हारा कल्याण हो।' उन्हें उस प्रकार हँसते देखकर देवशत्रु विरोचनने