मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ७२ * | २८१ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| साधु साध्विति तेनोक्तमहो माहात्म्यमुत्तमम्।<br>पश्यतोऽपि भवेद् रूपमैश्वर्यं किमु कुर्वतः॥ २२<br>यस्माच्च भक्त्या धरणीसुतस्य<br>विनिन्द्यमानेन गवादिदानम्।<br>आलोकितं तेन सुरारिगर्भै<br>सम्भूतिरेषा तव दैत्य जाता॥ २३ | सम्पत्तिको देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया। इसी कारण मैंने 'साधु-साधु' (तुम धन्य हो) ऐसा कहा है। अहो! यह कैसा उत्तम माहात्म्य है कि जब देखनेवालेको भी ऐसी सुन्दरता और ऐश्वर्यकी प्राप्ति हो जाती है, तब करनेवालेकी तो बात ही क्या है। दितिवंशज! चूँकि तुमने पृथ्वीपुत्र वीरभद्रके व्रतमें भक्तिपूर्वक दिये जाते हुए गो-दान आदि दानोंको अवहेलनापूर्वक देखा था, इसीलिये तुम्हारी उत्पत्ति राक्षस-योनिमें हुई है॥ १४—२३॥ |
| ईश्वर उवाच<br>अथ तद् वचनं श्रुत्वा भार्गवस्य महात्मनः।<br>प्रह्लादनन्दनो वीरः पुनः पप्रच्छ विस्मितः॥ २४ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! महात्मा शुक्राचार्यके उस वचनको सुनकर प्रह्लाद-नन्दन विरोचनने विस्मय-विमुग्ध हो पुनः प्रश्न किया॥ २४॥ |
| विरोचन उवाच<br>भगवंस्तद् व्रतं सम्यक् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>दीयमानं तु यद् दानं मया दृष्टं भवान्तरे॥ २५<br>माहात्म्यं च विधिं तस्य यथावद् वक्तुमर्हसि।<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा कविः प्रोवाच विस्तरात्॥ २६ | विरोचनने पूछा— भगवन्! जन्मान्तरमें मैंने जिसके दिये जाते हुए दानको देखा था, उस व्रतको भलीभाँति आनुपूर्वी सुनना चाहता हूँ। आप मुझे उसके विधान और माहात्म्यको यथार्थ रूपसे बतलाइये। इस प्रकार विरोचनकी बात सुनकर शुक्राचार्यने विस्तारपूर्वक कहना प्रारम्भ किया॥ २५-२६॥ |
| शुक्र उवाच<br>चतुर्थ्यङ्गारकदिने यदा भवति दानव।<br>मृदा स्नानं तदा कुर्यात् पद्मरागविभूषितः॥ २७<br>अग्निर्मूर्धा दिवो मन्त्रं जपंस्तिष्ठेदूदङ्मुखः।<br>शूद्रस्तूष्णीं स्मरन् भौममास्ते भोगविवर्जितः॥ २८<br>अथास्तमित आदित्ये गोमयेनानुलेपयेत्।<br>प्राङ्गणं पुष्पमालाभिरक्षताभिः समंततः॥ २९<br>अभ्यर्च्यीभिलिखेत् पद्मं कुङ्कुमेनाष्टपत्रकम्।<br>कुङ्कुमस्याप्यभावे तु रक्तचन्दनमिष्यते॥ ३०<br>चत्वारः करकाः कार्या भक्ष्यभोज्यसमन्विताः।<br>तण्डुलै रक्तशालीयैः पद्मरागैश्च संयुताः॥ ३१<br>चतुष्कोणेषु तान् कृत्वा फलानि विविधानि च।<br>गन्धमाल्यादिकं सर्वं तथैव विनिवेशयेत्॥ ३२<br>सुवर्णशृङ्गीं कपिलामथार्च्य<br>रौप्यैः खुरैः कांस्यदुहां सवत्साम्।<br>धुरंधरं रक्तखुरं च सौम्यं<br>धान्यानि समाम्बरसंयुतानि॥ ३३ | शुक्र बोले— दानव! जब मंगलवारको चतुर्थी तिथि पड़ जाय तो उस दिन शरीरमें मिट्टी लगाकर स्नान करे और पद्मरागमणिकी अँगूठी आदि धारण करके उत्तराभिमुख बैठकर 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०—' इस मन्त्रका जप करता रहे। यदि व्रती शूद्र हो तो उसे भोगसे दूर रहकर चुपचाप मंगलका स्मरण करते हुए दिन बिताना चाहिये। फिर सूर्यास्त हो जानेपर आँगनको गोबरसे लीपकर सर्वाङ्गसुन्दर पुष्पमाला आदिसे चारों ओर पूजा कर दे। आँगनके मध्यमें कुङ्कुमसे अष्टदल कमलकी रचना करे। कुङ्कुमका अभाव हो तो लाल चन्दनसे काम चलाना चाहिये। फिर आँगनके चारों कोनोंमें चार करवा स्थापित करे, जिन्हें लाल अगहनीके चावलसे भरकर उनके ऊपर पद्मरागमणि रख दे। वे भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भी संयुक्त रहें। उनके निकट नाना प्रकारके ऋतुफल, चन्दन, पुष्पमाला आदि सभी पूजन-सामग्री भी प्रस्तुत कर दे। तत्पश्चात् बछड़ेसहित एक कपिला गौका पूजन करे, जिसके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा उसके निकट काँसेकी दोहनी रखी हो। इसी प्रकार लाल खुरोंसे युक्त सौम्य स्वभाववाले हृष्ट-पुष्ट एक वृषभकी भी पूजा करे और उसके निकट |