भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 293
* अध्याय ७३ *२८३
त्वं चापि राजन् कुरु सर्वमेतद्<br>यतोऽक्षयं वेदविदो वदन्ति ॥ ४४इसलिये आप भी इन सारे विधानोंके साथ इस व्रतका अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि वेदवेत्तालोग इसका फल अक्षय बतलाते हैं ॥ ४४ ॥
ईश्वर उवाचईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! तब अद्भुत पराक्रमपूर्ण कर्मोंको करनेवाले युधिष्ठिरने 'तथेति—ऐसा ही करूँगा'—कहकर महर्षि पिप्पलादकी विधिवत् पूजा की और उनके वचनोंका पालन किया। जो मनुष्य अनन्यचित्तसे इस व्रत-विधानका श्रवण करता है, भगवान् उसकी सिद्धिका भी विधान करते हैं ॥ ४५ ॥
तथेति सम्पूज्य स पिप्पलादं<br>वाक्यं चकाराद्भुतवीर्यकर्मा।<br>शृणोति यश्चैनमनन्यचेता-<br>स्तस्यापि सिद्धिं भगवान् विधत्ते ॥ ४५

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽङ्गारकव्रतं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अङ्गारकव्रत नामक बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥


तिहत्तरवाँ अध्याय

शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि

पिप्पलाद उवाचपिप्पलादने कहा—
अथातः शृणु भूपाल प्रतिशुक्रं प्रशान्तये।<br>यात्रारम्भेऽवसाने च तथा शुक्रोदये त्विह ॥ १भूपाल! अब मैं विपरीत शुक्रकी* शान्तिके लिये विधान बतला रहा हूँ, सुनिये। इस लोकमें शुक्रके उदयकालमें यात्राके आरम्भ अथवा समाप्तिके अवसरपर शुक्रकी एक चाँदीकी मूर्ति बनवाये, उसे श्वेत मुक्ताफल (मोती)-के साथ श्वेत चावलसे परिपूर्ण सुवर्ण, चाँदी अथवा काँसेके पात्रके ऊपर स्थापित करके श्वेत पुष्प और श्वेत वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर इस वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण कर वह सारा सामान सामवेदके ज्ञाता (सस्वर गान करनेवाले) ब्राह्मणको निवेदित कर दे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—) 'सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर! आपको नमस्कार है। भृगुनन्दन! आपको प्रणाम है। कवे! मैं आपको अभिवादन करता हूँ। आप मेरी समस्त कामनाओंकी पूर्तिके लिये यह अर्घ्य ग्रहण करें।' भारत! जो मनुष्य शुक्रके विपरीत रहनेपर यात्रा आदि कार्योंमें इस प्रकार विधान करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें
राजते वाथ सौवर्णे कांस्यपात्रेऽथवा पुनः।<br>शुक्लपुष्पाम्बरयुते सिततण्डुलपूरिते ॥ २
विधाय रजतं शुक्रं शुचिमुक्ताफलान्वितम्।<br>मन्त्रेणानेन तत् सर्वं सामगाय निवेदयेत् ॥ ३
नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते भृगुनन्दन।<br>कवे सर्वार्थसिद्धयर्थं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥ ४
एवमस्योदये कुर्वन् यात्रादिषु च भारत।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते ॥ ५

* ज्योतिषप्रकाश, रत्नमाला, गर्गसंहिता आदिमें शुक्रके सामने यात्रा अत्यन्त हानिकर कही गयी है। ज्योतिर्निबन्ध आदिमें प्रतिकूल शुक्र-शान्तिके लिये कई श्रेष्ठ स्तोत्र तथा 'रेवतीसे कृतिका'-तकमें उन्हें अन्धा बतलाकर यात्रा-विधान निर्दिष्ट है। वहाँ 'मत्स्यपुराण' के ही नामसे—'चतुःशालं चतुर्द्वारम्' आदि श्लोकको उद्धृत कर चार दरवाजेके मकानोंमें शुक्रदोष नहीं माना गया है। सम्भवतः वे श्लोक पहले मत्स्यपुराणमें यहाँ प्राप्त थे। ज्योतिर्निबन्धकी विषयवस्तु इससे बहुधा मिलती है। वहाँ १०वें श्लोकमें इसी प्रकार अर्घ्यदानकी बात आयी है।