भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 295
* अध्याय ७४ *२८५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वानन्तफलाः प्रोक्ताः सर्वा देवर्षिपूजिताः।<br>विधानमासां वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः॥ ४ये सभी सप्तमियाँ* देवर्षियोंद्वारा पूजित हैं तथा अनन्त फल देनेवाली कही गयी हैं। मैं इनके विधानको आनुपूर्वी यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ॥२-४॥
यदा तु शुक्लसप्तम्यादादित्यस्य दिनं भवेत्।<br>सा तु कल्याणिनी नाम विजया च निगद्यते ॥ ५<br><br>प्रातर्गव्येन पयसा स्नानमस्यां समाचरेत्।<br>ततः शुक्लाम्बरः पद्ममक्षताभिः प्रकल्पयेत्॥ ६<br><br>प्राङ्मुखोऽष्टदलं मध्ये तद्वद् वृत्तां च कर्णिकाम्।<br>पुष्पाक्षतैश्च देवेशं विन्यसेत् सर्वतः क्रमात्॥ ७<br><br>पूर्वेण तपनायेति मार्तण्डायेति चानले।<br>याम्ये दिवाकरायेति विधात्र इति नैर्ऋते ॥ ८<br><br>पश्चिमे वरुणायेति भास्करायेति चानिले।<br>सौम्ये विकर्तनायेति रवये चाष्टमे दले॥ ९<br><br>आदावन्ते च मध्ये च नमोऽस्तु परमात्मने।<br>मन्त्रैरेभिः समभ्यर्च्य नमस्कारान्तदीपितैः ॥ १०<br><br>शुक्लवस्त्रैः फलैर्भक्ष्यैर्धूपमाल्यानुलेपनैः।<br>स्थण्डिले पूजयेद् भक्त्या गुडेन लवणेन च॥ ११<br><br>ततो व्याहृतिमन्त्रेण विसृजे द्विजपुङ्गवान्।<br>शक्तितः पूजयेद् भक्त्या गुडक्षीरघृतादिभिः।<br>तिलपात्रं हिरण्यं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १२<br><br>एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>कृतस्नानजपो विप्रैः सहैव घृतपायसम्॥ १३<br><br>भुक्त्वा च वेदविदुषे विडालव्रतवर्जिते।<br>घृतपात्रं सकनकं सोदकुम्भं निवेदयेत्॥ १४<br><br>प्रीयतामत्र भगवान् परमात्मा दिवाकरः।<br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि व्रतं चरेत् ॥ १५<br><br>ततस्त्रयोदशे मासि गा वै दद्यात् त्रयोदश।<br>वस्त्रालङ्कारसंयुक्ताः सुवर्णास्याः पयस्विनीः ॥ १६<br><br>एकामपि प्रदद्याद् वा वित्तहीनो विमत्सरः।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत यतो मोहात् पतत्यधः ॥ १७जब शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको रविवार पड़ जाय तो उस सप्तमीको कल्याणिनी (नामसे) कहा जाता है। उसीका दूसरा नाम विजया भी है। व्रतीको चाहिये कि वह उस दिन प्रातःकाल उठकर गोदुग्धयुक्त जलसे स्नान करनेके पश्चात् श्वेत वस्त्र धारण करे। फिर पूर्वाभिमुख हो चावलोंद्वारा अष्टदल कमल बनावे। उसके मध्यभागमें उसी आकारवाली कर्णिकाकी भी रचना करे। तत्पश्चात् पुष्प और अक्षतद्वारा क्रमशः सब ओर देवेश्वर सूर्यकी स्थापना करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'तपनाय नमः' से पूर्वदलपर, 'मार्तण्डाय नमः' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'दिवाकराय नमः' से दक्षिणदलपर, 'विधात्रे नमः' से नैर्ऋत्यकोणके दलपर, 'वरुणाय नमः' से पश्चिमदलपर, 'भास्कराय नमः' से वायव्यकोणवाले दलपर, 'विकर्तनाय नमः' से उत्तरदलपर, 'रवये नमः' से ईशानकोणस्थित आठवें दलपर और 'परमात्मने नमः' से आदि, मध्य और अन्तमें सूर्यका आवाहन करके स्थापित कर दे। फिर नमस्कारान्तसे सुशोभित इन मन्त्रोंका उच्चारण कर श्वेत वस्त्र, फल, नैवेद्य, धूप, पुष्पमाला और चन्दनसे भलीभाँति पूजन करे। वेदीपर भी व्याहृति-मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक गुड़ और नमकसे भक्तिपूर्वक पूजा करनेका विधान है। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। फिर अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक गुड़, दूध और घी आदिके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और तिलसे भरा हुआ पात्र और सुवर्ण ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार विधानको पूरा करके व्रती मानव रात्रिमें शयन करे और प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि नित्यकर्म पूरा करे। तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंके साथ ही घी और दूधसे बने हुए पदार्थोंका भोजन करे। अन्तमें विडालव्रत (छल-कपट)-से रहित वेदज्ञ ब्राह्मणको सुवर्णसहित घृतपूर्ण पात्र और जलसे भरा हुआ घट दान कर दे और उस समय इस प्रकार कहे—'मेरे इस व्रतसे परमात्मा भगवान् सूर्य प्रसन्न हों।' इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सभी व्रतोंका अनुष्ठान करना चाहिये। तदनन्तर तेरहवाँ महीना आनेपर तेरह गौ दान करनेका विधान है, जो सभी दुधारू हों, वस्त्र और अलंकार आदिसे सुसज्जित हों और जिनके मुखपर सोनेका पत्र लगा हुआ हो। यदि व्रती निर्धन हो तो वह अलंकाररहित होकर एक ही गौका दान करे, किंतु कृपणता न करे; क्योंकि मोहवश कंजूसी करनेसे अधःपतन हो जाता है॥५-१७॥

* प्रायः ये सभी सप्तमियाँ भविष्यपुराणमें अन्य कई अधिक सप्तमीव्रतोंके साथ उपदिष्ट हैं।