मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३० * मत्स्यपुराण *
छठा अध्याय
कश्यप-वंशका विस्तृत वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— (शौनकादि ऋषियो!) अब मैं कश्यपकी पत्नियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंका वर्णन करता हूँ। अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू, विश्वा और मुनि— ये तेरह कश्यपकी पत्नियाँ थीं। अब इनके पुत्रोंका वर्णन सुनिये। चाक्षुष मनुके कार्यकालमें जो तुषित नामके देवगण थे, वे ही वैवस्वत मन्वन्तरमें द्वादश आदित्यके नामसे प्रख्यात हुए। इनके नाम हैं—इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, यम, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् और विष्णु। ये सभी सहस्र किरणोंसे सम्पन्न हैं और द्वादश आदित्य कहे जाते हैं। अदितिने मरीचि-नन्दन कश्यपके संयोगसे इन श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया था। महर्षि कृशाश्वके पुत्र देवप्रहरण नामसे विख्यात हुए। द्विजवरो! ये देवगण प्रत्येक मन्वन्तर तथा प्रत्येक कल्पमें उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं। हमने सुना है कि दितिने महर्षि कश्यपके सम्पर्कसे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्रोंको प्राप्त किया था। हिरण्यकशिपुके उसीके समान पराक्रमी प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद और ह्लाद नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए। उनमेंसे प्रह्लादके चार पुत्र हुए—आयुष्मान्, शिबि, बाष्कल और चौथा विरोचन। उस विरोचनने बलिको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। विप्रवरो! बलिके सौ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें बाण ज्येष्ठ था। इसके अतिरिक्त, धृतराष्ट्र, सूर्य, चन्द्र, चन्द्रांशुतापन, निकुम्भनाभ, गुर्वक्ष, कुक्षिभीम, विभीषण तथा इसी प्रकारके और भी बहुत-से पुत्र थे, जो बाणसे छोटे, परंतु सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न थे। उनमें बाणके सहस्र भुजाएँ थीं और वह समस्त अस्त्रसमूहोंका ज्ञाता था। उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर त्रिशूलधारी भगवान् शंकर उसके नगरमें निवास करते थे। उसने (अपनी तपस्याके प्रभावसे) पिनाकधारी शंकरजीकी समतावाले महाकालपदको प्राप्त कर लिया था। (दितिके द्वितीय पुत्र) हिरण्याक्षके उलूक, शकुनि, भूतसंतापन और महानाभनामक पुत्र हुए। इनसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंकी संख्या सतहत्तर करोड़ थी। वे सभी महान् बलशाली, विशाल शरीरवाले, नाना प्रकारका रूप धारण करनेमें समर्थ और महान् ओजस्वी थे॥१-१५॥ |
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| कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकान्।<br>अदितिर्दितिर्दनुश्चैव अरिष्टा सुरसा तथा॥ १<br>सुरभिर्विनता तद्वत्ताम्रा क्रोधवशा इरा।<br>कद्रूर्विश्वा मुनिस्तद्वत्तासां पुत्रान् निबोधत॥ २<br>तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे चैते ह्यादित्या द्वादश स्मृताः॥ ३<br>इन्द्रो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणो यमः।<br>विवस्वान् सविता पूषा अंशुमान् विष्णुरेव च॥ ४<br>एते सहस्त्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः।<br>मारीचात् कश्यपादाप पुत्रानदितिरुत्तमान्॥ ५<br>कृशाश्वस्य ऋषेः पुत्रा देवप्रहरणाः स्मृताः।<br>एते देवगणा विप्राः प्रतिमन्वन्तरेषु च॥ ६<br>उत्पद्यन्ते प्रलीयन्ते कल्पे कल्पे तथैव च।<br>दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति नः श्रुतम्॥ ७<br>हिरण्यकशिपुं चैव हिरण्याक्षं तथैव च।<br>हिरण्यकशिपोस्तद्वज्जातं पुत्रचतुष्टयम्॥ ८<br>प्रह्लादश्चानुह्लादश्च संह्लादो ह्राद एव च।<br>प्रह्लादपुत्र आयुष्माञ्शिबिर्बाष्कल एव च॥ ९<br>विरोचनश्चतुर्थश्च स बलिं पुत्रमाप्तवान्।<br>बलेः पुत्रशतं त्वासीद् बाणज्येष्ठं ततो द्विजाः॥ १०<br>धृतराष्ट्रस्तथा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्रांशुतापनः।<br>निकुम्भनाभो गुर्वक्षः कुक्षिभीमो विभीषणः॥ ११<br>एवमाद्यास्तु बहवो बाणज्येष्ठा गुणाधिकाः।<br>बाणः सहस्त्रबाहुश्च सर्वास्त्रगणसंयुतः॥ १२<br>तपसा तोषितो यस्य पुरे वसति शूलभृत्।<br>महाकालत्वमगमत् साम्यं यश्च पिनाकिनः॥ १३<br>हिरण्याक्षस्य पुत्रोऽभूदुलूकः शकुनिस्तथा।<br>भूतसंतापनश्चैव महानाभस्तथैव च॥ १४<br>एतेभ्यः पुत्रपौत्राणां कोटयः सप्तसप्ततिः।<br>महाबला महाकाया नानारूपा महौजसः॥ १५ |