भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 321

* अध्याय ९२ * ३११


| शेषं तु पूर्ववत् कुर्याद्धोमजागरणादिकम्।<br>दद्यात् ततः प्रभाते तु गुरवे रौप्यपर्वतम्॥ ६<br><br>विष्कम्भशैलानृत्विग्भ्यः पूज्य वस्त्रविभूषणैः*।<br>इमं मन्त्रं पठन् दद्याद् दर्भपाणिर्विमत्सरः॥ ७<br><br>पितॄणां वल्लभो यस्माद्धरीन्द्राणां शिवस्य च।<br>पाहि रजत तस्मान्नः शोकंसंसारसागरात्॥ ८<br><br>इत्थं निवेद्य यो दद्याद् रजताचलमुत्तमम्।<br>गवामयुतदानस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९<br><br>सोमलोके स गन्धर्वैः किन्नराप्सरसां गणैः।<br>पूज्यमानो वसेद् विद्वान् यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १० | शेष हवन, जागरण आदि सारे कार्य धान्यपर्वतकी भाँति ही करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल वस्त्र और आभूषण आदिके द्वारा गुरु और ऋत्विजोंका पूजन कर रजताचल गुरुको और विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय मत्सररहित हो हाथमें कुश लेकर इस मन्त्रका पाठ करे—'रजताचल! तुम पितरोंको तथा श्रीहरि, सूर्य, इन्द्र और शिवको परम प्रिय हो, इसलिये शोकरूपी संसार-सागरसे मेरी रक्षा करो।' जो मानव इस प्रकार निवेदन कर श्रेष्ठ रजताचलका दान करता है, वह दस हजार गो-दानका फल प्राप्त करता है। वह विद्वान् चन्द्रलोकमें गन्धर्वों, किन्नरों और अप्सराओंके समूहोंसे पूजित होकर प्रलयकालतक निवास करता है॥ १—१०॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे रौप्याचलकीर्तनं नामैकनवतितमोऽध्यायः॥ ९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रौप्याचलकीर्तन नामक इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९१॥


बानबेवाँ अध्याय

शर्कराशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य तथा राजा धर्ममूर्तिके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें लवणाचलदानका महत्त्व

ईश्वर उवाचभगवान् शंकरने कहा—नारदजी! इसके पश्चात् मैं
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि शर्कराशैलमुत्तमम्।<br>यस्य प्रदानाद् विश्वार्करुद्रास्तुष्यन्ति सर्वदा॥ १<br><br>अष्टभिः शर्कराभारैरुत्तमः स्यान्महाचलः।<br>चतुर्भिर्मध्यमः प्रोक्तो भाराभ्यामवरः स्मृतः॥ २<br><br>भारेण वार्थभारेण कुर्याद् यः स्वल्पवित्तवान्।<br>विष्कम्भपर्वतान् कुर्यात् तुरीयांशेन मानवः॥ ३<br><br>धान्यपर्वतवत् सर्वमासाद्यामरसंयुक्तम्।<br>मेरोरुपरि तद्वच्च स्थाप्य हेमतरुत्रयम्॥ ४परमोत्तम शर्कराशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे भगवान् विष्णु, रुद्र और सूर्य सदा संतुष्ट रहते हैं। आठ भार शक्करसे बना हुआ शर्कराचल उत्तम, चार भारसे बना हुआ मध्यम और दो भारसे बना हुआ अधम कहा गया है। जो मानव स्वल्प सम्पत्तिवाला हो, वह एक भार अथवा आधे भारसे भी शर्कराचल बनवा सकता है। प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंका भी निर्माण करना चाहिये। पुनः धान्यपर्वतकी तरह सारी सामग्री प्रस्तुत करके मेरु पर्वतकी भाँति इसके ऊपर भी स्वर्णमयी देवमूर्तिके साथ

* हेमाद्रि, कल्पतरु, पद्मपुराणादिमें—यहाँ 'विलेपनैः' पाठ है।