भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 393
* अध्याय ११४ *३८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकैकमनुरक्ताश्च चक्रवाकमिव ध्रुवम्।<br>अनामया ह्याशोकाश्च नित्यं मुदितमानसाः॥ ७६<br>दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।<br>जीवन्ति च महासत्त्वा न चान्या स्त्री प्रवर्तते॥ ७७सा होता है और वे एक साथ ही प्राण-त्याग भी करते हैं। वे चक्रवाककी तरह निश्चितरूपसे परस्पर अनुरक्त, नीरोग, शोकरहित और सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। वे महापराक्रमी मानव ग्यारह हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। वहाँ कोई पुरुष दूसरा विवाह नहीं करता॥ ६९—७७॥
सूत उवाच<br>एवमेव निसर्गो वै वर्षाणां भारते युगे।<br>दृष्टः परमधर्मज्ञाः किं भूयः कथयामि वः॥ ७८<br>आख्यातास्त्वेवमृषयः सूतपुत्रेण धीमता।<br>उत्तरश्रवणे भूयः पप्रच्छुः सूतनन्दनम्॥ ७९सूतजी कहते हैं— परम धर्मज्ञ ऋषियो! इस प्रकार मैंने भारतीय युगमें वर्षोंकी सृष्टि देखी है (जिसका वर्णन कर दिया), अब पुनः आपलोगोंको क्या बतलाऊँ। बुद्धिमान् सूतपुत्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ऋषियोंने पुनः उत्तरवर्ती वर्षोंके विषयमें सुननेके लिये सूतनन्दनसे जिज्ञासा प्रकट की॥ ७८-७९॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे द्वीपादिवर्णनं नाम त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें द्वीपादिवर्णन नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११३॥


एक सौ चौदहवाँ अध्याय

भारतवर्ष, किम्पुरुषवर्ष तथा हरिवर्षका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>यदिदं भारतं वर्षं यस्मिन् स्वायम्भुवादयः।<br>चतुर्दशैव मनवः प्रजासर्गं ससृजिरे॥ १<br>एतद् वेदितुमिच्छामः सकाशात् तव सुव्रत।<br>उत्तरश्रवणं भूयः प्रब्रूहि वदतां वर॥ २ऋषियोंने पूछा— सुव्रत! जो यह भारतवर्ष है, जिसमें स्वायम्भुव आदि चौदह मनु हुए हैं, जिन्होंने प्रजाओंकी सृष्टि की है, उनके विषयमें हमलोग आपके मुखसे सुनना चाहते हैं। साथ ही वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! पुनः इसके बाद भारत आदि अन्य वर्षोंके विषयमें भी कुछ बतलाइये॥ १-२॥
एतच्छ्रुत्वा ऋषीणां तु प्राब्रवील्लोमहर्षणः।<br>पौराणिकस्तदा सूत ऋषीणां भावितात्मनाम्॥ ३<br>बुद्ध्या विचार्य बहुधा विमृश्य च पुनः पुनः।<br>तेभ्यस्तु कथयामास उत्तरश्रवणं तदा॥ ४प्रसिद्ध पौराणिक लोमहर्षणके पुत्र सूतजीने उन पवित्रात्मा ऋषियोंका प्रश्न सुनकर अपनी बुद्धिसे बारम्बार बहुधा विचार-विमर्श करके उन ऋषियोंसे 'उत्तरश्रवण' (उत्तरवर्ती वर्षों)-के विषयमें कहना आरम्भ किया॥ ३-४॥
सूत उवाच<br>अथाहं वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः।<br>भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते॥ ५<br>निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम्।<br>यतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यमश्चापि हि स्मृतः॥ ६सूतजी कहते हैं— ऋषियो! अब मैं इस भारतवर्षमें उत्पन्न होनेवाली प्रजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। इन प्रजाओंकी सृष्टि करने तथा इनका भरण-पोषण करनेके कारण मनुको भरत कहा जाता है। निरुक्त-वचनोंके आधारपर यह वर्ष (उन्हींके नामपर) भारतवर्षके* नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ स्वर्ग, मोक्ष तथा इन दोनोंके अन्तर्वर्ती (भोग) पदकी प्राप्ति होती है।

* सभी पुराणोंमें प्रायः सर्वत्र ऋषभ-पुत्र भरतके नामपर ही देशका नाम भारत कहा गया है। नाभिसे अजनाभ तथा उनके पोते भरतसे देशका भारत नाम पड़ा। मनु इनके भी पूर्वज थे, अतः यह कथन भी ठीक है। पर पाश्चात्योंने शकुन्तला-पुत्रके नामपर देशका नाम पड़ना गलत बतलाया है और भ्रमसे आज उसीका प्रचार है (विशेष जानकारीके लिये देखिये कल्याण वर्ष ३०।८)। यह अध्याय वायुपुराण ४५। ७२-१३७ तथा ब्रह्माण्ड, मार्कण्डेय आदि पुराणोंमें भी प्राप्त है।