मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ११४ * | ३८९ |
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| सुदर्शनो नाम महाजम्बूवृक्षः सनातनः।<br>नित्यपुष्पफलोपेतः सिद्धचारणसेवितः॥ ७५<br><br>तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्बूद्वीपो वनस्पतेः।<br>योजनानां सहस्त्रं च शतधा च महान् पुनः॥ ७६<br><br>उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवमावृत्य तिष्ठति।<br>तस्य जम्बूफलरसो नदी भूत्वा प्रसर्पति॥ ७७<br><br>मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा जम्बूमूलगता पुनः।<br>तं पिबन्ति सदा हृष्टा जम्बूरसमिलावृते॥ ७८<br><br>जम्बूफलरसं पीत्वा न जरा बाधतेऽपि तान्।<br>न क्षुधा न क्लमो वापि न दुःखं च तथाविधम्॥ ७९<br><br>तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम्।<br>इन्द्रगोपकसंकाशं जायते भासुरं च यत्॥ ८०<br><br>सर्वेषां वर्षवृक्षाणां शुभः फलरसस्तु सः।<br>स्कन्नं तु काञ्चनं शुभ्रं जायते देवभूषणम्॥ ८१<br><br>तेषां मूत्रं पुरीषं वा दिक्ष्वष्टासु च सर्वशः।<br>ईश्वरानुग्रहाद् भूमिर्मृतांश्च ग्रसते तु तान्॥ ८२<br><br>रक्षःपिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमवतास्तु ते।<br>हेमकूटे तु विज्ञेया गन्धर्वाः साप्सरोगणाः॥ ८३<br><br>सर्वे नागा निषेवन्ते शेषवासुकितक्षकाः।<br>महामेरौ त्रयस्त्रिंशत् क्रीडन्ते यज्ञियाः शुभाः॥ ८४<br><br>नीलवैदूर्ययुक्तेऽस्मिन् सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽवसन्।<br>दैत्यानां दानवानां च श्वेतः पर्वत उच्यते॥ ८५<br><br>शृङ्गवान् पर्वतश्रेष्ठः पितॄणां प्रतिसंचरः।<br>इत्येतानि मयोक्तानि नव वर्षाणि भारते॥ ८६<br><br>भूतैरपि निविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च।<br>तेषां वृद्धिर्बहुविधा दृश्यते देवमानुषैः।<br>अशक्या परिसंख्यातुं श्रद्धेया च बुभूषता॥ ८७ | सुदर्शन नामका एक विशाल प्राचीन जामुनका वृक्ष है। वह सदा पुष्प और फलोंसे लदा रहता है। सिद्ध और चारण सदा उसका सेवन करते हैं। उसी वृक्षके नामपर यह द्वीप जम्बूद्वीपके नामसे विख्यात हुआ है। उस वृक्षराजकी ऊँचाई ग्यारह सौ योजन है। वह महान् वृक्ष स्वर्गलोकतक व्यास है। उसके फलोंका रस नदीरूपमें प्रवाहित होता है। वह नदी मेरुकी प्रदक्षिणा करके पुनः उसी जम्बूवृक्षके मूलपर पहुँचती है। इलावृतवर्षमें वहाँके निवासी सदा हर्षपूर्वक उस जम्बूरसका पान करते हैं। उस जम्बूवृक्षके फलोंका रस पान करनेके कारण वहाँके निवासियोंको वृद्धावस्था बाधा नहीं पहुँचाती। न उन्हें भूख लगती है और न थकावट ही प्रतीत होती है तथा न किसी प्रकारका दुःख ही होता है। वहाँ जाम्बूनद नामक सुवर्ण पाया जाता है जो देवताओंके लिये आभूषणके काममें आता है। वह इन्द्रगोप (बीरबहूटी)-के समान लाल और अत्यन्त चमकीला होता है। उस वर्षके सभी वृक्षोंमें इस जामुन-वृक्षके फलोंका रस परम शुभकारक है। वह वृक्षसे टपकनेपर निर्मल सुवर्ण बन जाता है जिससे देवताओंके आभूषण बनते हैं। ईश्वरकी कृपासे वहाँकी भूमि आठों दिशाओंमें सब ओर इलावृत-निवासियोंके मूत्र, विष्ठा और मृत शरीरोंको आत्मसात् कर लेती है। राक्षस, पिशाच और यक्ष—ये सभी हिमालय पर्वतपर निवास करते हैं। हेमकूट पर्वतपर अप्सराओंसहित गन्धर्वोका निवास जानना चाहिये तथा शेष, वासुकि और तक्षक आदि सभी प्रधान नाग भी उसपर स्थित रहते हैं। महामेरुपर यज्ञसम्बन्धी मङ्गलमय तैंतीस देवता क्रीडा करते रहते हैं। नीलम एवं वैदूर्य मणियोंसे सम्पन्न नीलपर्वतपर सिद्धों और ब्रह्मर्षियोंका निवास है। श्वेतपर्वत दैत्यों और दानवोंका निवासस्थान बतलाया जाता है। पर्वतश्रेष्ठ शृङ्गवान् पितरोंका विहारस्थल है। इस प्रकार मैंने भारतवर्षके अन्तर्गत इन नौ वर्षोका वर्णन कर दिया। इनमें प्राणी निवास करते हैं। ये परस्पर गतिमान् और स्थिर हैं। देवताओं और मनुष्योंने अनेकों प्रकारसे इनकी वृद्धि देखी है। उनकी गणना करना असम्भव है, अतः मङ्गलार्थी मनुष्यको इनपर श्रद्धा रखनी चाहिये॥ ७४-८७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णनमें एक सौ चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११४॥