मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय ११४ * | ३८९ |
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| सुदर्शनो नाम महाजम्बूवृक्षः सनातनः।<br>नित्यपुष्पफलोपेतः सिद्धचारणसेवितः॥ ७५<br><br>तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्बूद्वीपो वनस्पतेः।<br>योजनानां सहस्त्रं च शतधा च महान् पुनः॥ ७६<br><br>उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवमावृत्य तिष्ठति।<br>तस्य जम्बूफलरसो नदी भूत्वा प्रसर्पति॥ ७७<br><br>मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा जम्बूमूलगता पुनः।<br>तं पिबन्ति सदा हृष्टा जम्बूरसमिलावृते॥ ७८<br><br>जम्बूफलरसं पीत्वा न जरा बाधतेऽपि तान्।<br>न क्षुधा न क्लमो वापि न दुःखं च तथाविधम्॥ ७९<br><br>तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम्।<br>इन्द्रगोपकसंकाशं जायते भासुरं च यत्॥ ८०<br><br>सर्वेषां वर्षवृक्षाणां शुभः फलरसस्तु सः।<br>स्कन्नं तु काञ्चनं शुभ्रं जायते देवभूषणम्॥ ८१<br><br>तेषां मूत्रं पुरीषं वा दिक्ष्वष्टासु च सर्वशः।<br>ईश्वरानुग्रहाद् भूमिर्मृतांश्च ग्रसते तु तान्॥ ८२<br><br>रक्षःपिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमवतास्तु ते।<br>हेमकूटे तु विज्ञेया गन्धर्वाः साप्सरोगणाः॥ ८३<br><br>सर्वे नागा निषेवन्ते शेषवासुकितक्षकाः।<br>महामेरौ त्रयस्त्रिंशत् क्रीडन्ते यज्ञियाः शुभाः॥ ८४<br><br>नीलवैदूर्ययुक्तेऽस्मिन् सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽवसन्।<br>दैत्यानां दानवानां च श्वेतः पर्वत उच्यते॥ ८५<br><br>शृङ्गवान् पर्वतश्रेष्ठः पितॄणां प्रतिसंचरः।<br>इत्येतानि मयोक्तानि नव वर्षाणि भारते॥ ८६<br><br>भूतैरपि निविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च।<br>तेषां वृद्धिर्बहुविधा दृश्यते देवमानुषैः।<br>अशक्या परिसंख्यातुं श्रद्धेया च बुभूषता॥ ८७ | सुदर्शन नामका एक विशाल प्राचीन जामुनका वृक्ष है। वह सदा पुष्प और फलोंसे लदा रहता है। सिद्ध और चारण सदा उसका सेवन करते हैं। उसी वृक्षके नामपर यह द्वीप जम्बूद्वीपके नामसे विख्यात हुआ है। उस वृक्षराजकी ऊँचाई ग्यारह सौ योजन है। वह महान् वृक्ष स्वर्गलोकतक व्यास है। उसके फलोंका रस नदीरूपमें प्रवाहित होता है। वह नदी मेरुकी प्रदक्षिणा करके पुनः उसी जम्बूवृक्षके मूलपर पहुँचती है। इलावृतवर्षमें वहाँके निवासी सदा हर्षपूर्वक उस जम्बूरसका पान करते हैं। उस जम्बूवृक्षके फलोंका रस पान करनेके कारण वहाँके निवासियोंको वृद्धावस्था बाधा नहीं पहुँचाती। न उन्हें भूख लगती है और न थकावट ही प्रतीत होती है तथा न किसी प्रकारका दुःख ही होता है। वहाँ जाम्बूनद नामक सुवर्ण पाया जाता है जो देवताओंके लिये आभूषणके काममें आता है। वह इन्द्रगोप (बीरबहूटी)-के समान लाल और अत्यन्त चमकीला होता है। उस वर्षके सभी वृक्षोंमें इस जामुन-वृक्षके फलोंका रस परम शुभकारक है। वह वृक्षसे टपकनेपर निर्मल सुवर्ण बन जाता है जिससे देवताओंके आभूषण बनते हैं। ईश्वरकी कृपासे वहाँकी भूमि आठों दिशाओंमें सब ओर इलावृत-निवासियोंके मूत्र, विष्ठा और मृत शरीरोंको आत्मसात् कर लेती है। राक्षस, पिशाच और यक्ष—ये सभी हिमालय पर्वतपर निवास करते हैं। हेमकूट पर्वतपर अप्सराओंसहित गन्धर्वोका निवास जानना चाहिये तथा शेष, वासुकि और तक्षक आदि सभी प्रधान नाग भी उसपर स्थित रहते हैं। महामेरुपर यज्ञसम्बन्धी मङ्गलमय तैंतीस देवता क्रीडा करते रहते हैं। नीलम एवं वैदूर्य मणियोंसे सम्पन्न नीलपर्वतपर सिद्धों और ब्रह्मर्षियोंका निवास है। श्वेतपर्वत दैत्यों और दानवोंका निवासस्थान बतलाया जाता है। पर्वतश्रेष्ठ शृङ्गवान् पितरोंका विहारस्थल है। इस प्रकार मैंने भारतवर्षके अन्तर्गत इन नौ वर्षोका वर्णन कर दिया। इनमें प्राणी निवास करते हैं। ये परस्पर गतिमान् और स्थिर हैं। देवताओं और मनुष्योंने अनेकों प्रकारसे इनकी वृद्धि देखी है। उनकी गणना करना असम्भव है, अतः मङ्गलार्थी मनुष्यको इनपर श्रद्धा रखनी चाहिये॥ ७४-८७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णनमें एक सौ चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११४॥
| ३९० | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय
राजा पुरूरवाके पूर्वजन्मका वृत्तान्त
| मनुरुवाच<br><br>चरितं बुधपुत्रस्य जनार्दन मया श्रुतम्।<br>श्रुतः श्राद्धविधिः पुण्यः सर्वपापप्रणाशनः॥ १<br>धेन्वाः प्रसूयमानायाः फलं दानस्य मे श्रुतम्।<br>कृष्णाजिनप्रदानं च वृषोत्सर्गस्तथैव च॥ २<br>श्रुत्वा रूपं नरेन्द्रस्य बुधपुत्रस्य केशव।<br>कौतूहलं समुत्पन्नं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः॥ ३<br>केन कर्मविपाकेन स तु राजा पुरूरवाः।<br>अवाप तादृशं रूपं सौभाग्यमपि चोत्तमम्॥ ४<br>देवांस्त्रिभुवनश्रेष्ठान् गन्धर्वांश्च मनोरमान्।<br>उर्वशी संगता त्यक्त्वा सर्वभावेन तं नृपम्॥ ५ | मनुने पूछा— जनार्दन! मैंने आपके मुखसे बुधपुत्र राजा पुरूरवाका जीवन-चरित्र तो सुना और समस्त पापोंका विनाश करनेवाली पुण्यमयी श्राद्धविधिका भी श्रवण किया तथा ब्यायी हुई गौके दानका, काले मृगचर्मके दानका एवं वृषोत्सर्गका भी फल सुन लिया, परंतु केशव! बुधपुत्र नरेश्वर पुरूरवाके रूपको सुनकर मुझे महान् कौतूहल उत्पन्न हो गया है, इसीलिये पूछ रहा हूँ। अब आप मुझे यह बतलाइये कि किस कर्मके परिणामस्वरूप राजा पुरूरवाको वैसा सुन्दर रूप और उत्तम सौभाग्य प्राप्त हुआ था? (जिसपर मोहित होकर अप्सराओंमें श्रेष्ठ) उर्वशी त्रिलोकीमें श्रेष्ठ देवताओं और सौन्दर्यशाली गन्धर्वोंका त्याग करके सब प्रकारसे राजा पुरूरवाकी सङ्गिनी बनी थी॥ १—५॥ | | मत्स्य उवाच<br><br>शृणु कर्मविपाकेन येन राजा पुरूरवाः।<br>अवाप तादृशं रूपं सौभाग्यमपि चोत्तमम्॥ ६<br>अतीते जन्मनि पुरा योऽयं राजा पुरूरवाः।<br>पुरूरवा इति ख्यातो मद्रदेशाधिपो हि सः॥ ७<br>चाक्षुषस्यान्वये राजा चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।<br>स वै नृपगुणैर्युक्तः केवलं रूपवर्जितः॥ ८ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! राजा पुरूरवाको जिस कर्मके फलस्वरूप वैसे सुन्दर रूप और उत्तम सौभाग्यकी प्राप्ति हुई थी, वह बतला रहा हूँ, सुनो। यह राजा पुरूरवा पूर्वजन्ममें भी पुरूरवा नामसे ही विख्यात था। यह चाक्षुष मन्वन्तरमें चाक्षुष मनुके वंशमें उत्पन्न होकर मद्र देश (पंजाबका पश्चिमोत्तर भाग)-का अधिपति था (जहाँका राजा शल्य तथा पाण्डुपत्नी माद्री थी)। उस समय इसमें राजाओंके सभी गुण तो विद्यमान थे, पर वह केवल रूपरहित अर्थात् कुरूप था। (मत्स्यभगवान्द्वारा आगे कहे जानेवाले प्रसङ्गको ऋषियोंके पूछनेपर सूतजीने वर्णन किया है, अतः इसके आगे पुनः वही प्रसङ्ग चलाया गया है)॥ ६—८॥ | | ऋषय ऊचुः<br><br>पुरूरवा मद्रपतिः कर्मणा केन पार्थिवः।<br>बभूव कर्मणा केन रूपवांश्चैव सूतज॥ ९ | ऋषियोंने पूछा— सूतनन्दन! राजा पुरूरवा किस कर्मके फलस्वरूप मद्र देशका स्वामी हुआ तथा किस कर्मके परिणामस्वरूप परम सौन्दर्यशाली हुआ? यह बतलाइये॥ ९॥ | | सूत उवाच<br><br>द्विजग्रामे द्विजश्रेष्ठो नाम्ना चासीत् पुरूरवाः।<br>नद्याः कूले महाराजः पूर्वजन्मनि पार्थिवः॥ १० | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! पूर्वजन्ममें यह राजा पुरूरवा किसी नदीके तटवर्ती ब्राह्मणोंके एक गाँवमें श्रेष्ठ ब्राह्मण था। उस समय भी इसका नाम पुरूरवा ही था। |
- अध्याय ११६ * । ३९१
| स तु मद्रपती राजा यस्तु नाम्ना पुरूरवाः।<br>तस्मिञ्जन्मन्यसौ विप्रो द्वादश्यां तु सदानघ॥ ११<br>उपोष्य पूजयामास राज्यकामो जनार्दनम्।<br>चकार सोपवासश्च स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम्॥ १२<br>उपवासफलात् प्राप्तं राज्यं मद्रेष्वकण्टकम्।<br>उपोषितस्तथाभ्यङ्गाद् रूपहीनो व्यजायत॥ १३<br>उपोषितैर्नरैस्तस्मात् स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम्।<br>वर्जनीयं प्रयत्नेन रूपघ्नं तत्परं नृप॥ १४<br>एतद् वः कथितं सर्वं यद् वृत्तं पूर्वजन्मनि।<br>मद्रेश्वरानुचरितं शृणु तस्य महीपतेः॥ १५<br>तस्य राजगुणैः सर्वैः समुपेतस्य भूपतेः।<br>जनानुरागो नैवासीद् रूपहीनस्य तस्य वै॥ १६<br>रूपकामः स मद्रेशस्तपसे कृतनिश्चयः।<br>राज्यं मन्त्रिगतं कृत्वा जगाम हिमपर्वतम्॥ १७<br>व्यवसायद्वितीयस्तु पद्भ्यामेव महायशाः।<br>द्रष्टुं स तीर्थसदनं विषयान्ते स्वके नदीम्।<br>ऐरावतीति विख्यातां ददर्शातिमनोरमाम्॥ १८<br>तुहिनगिरिभवां महौघवेगां<br>तुहिनगभस्तिसमानशीतलोदाम् ।<br>तुहिनसदृशहैमवर्णपुञ्जां<br>तुहिनयशाः सरितं ददर्श राजा॥ १९ | अनघ! वह मद्र देशका स्वामी जो राजा पुरूरवाके नामसे विख्यात था, उस जन्ममें ब्राह्मणरूपसे राज्यप्राप्तिकी कामनासे युक्त होकर सदा द्वादशी तिथिको उपवास कर भगवान् विष्णुका पूजन किया करता था। एक बार उसने व्रतोपवास करके शरीरमें तेल लगाकर स्नान कर लिया—जिस कारण उसे उपवासके फलस्वरूप मद्र देशका निष्कण्टक राज्य तो प्राप्त हुआ, परंतु उपवासी होकर शरीरमें तेल लगानेके कारण वह कुरूप होकर पैदा हुआ। इसलिये व्रतोपवासी मनुष्यको प्रयत्नपूर्वक शरीरमें तेल लगाकर स्नान करना छोड़ देना चाहिये; क्योंकि यह सुन्दरताका विनाशक है। इस प्रकार उसके पूर्वजन्मका जो वृत्तान्त था, वह सब मैंने आप लोगोंको बतला दिया। अब उस भूपालके मद्रेश्वर हो जानेके बादका चरित्र सुनिये। यद्यपि राजा पुरूरवा सभी राज्यगुणोंसे सम्पन्न था, किंतु रूपहीन होनेके कारण उसके प्रति प्रजाओंका अनुराग नहीं ही था। अतः मद्र-नरेशने रूपप्राप्तिकी कामनासे तपस्याका निश्चय करके राज्य-भार मन्त्रीको सौंपकर हिमालय पर्वतकी ओर प्रस्थान किया। उस समय तपरूप व्यवसाय ही उसका सहायक था। वह महायशस्वी नरेश तीर्थस्थानोंका दर्शन करनेकी लालसासे पैदल ही चल रहा था। आगे बढ़नेपर उसने अपने देशकी सीमापर ऐरावती (रावी) नामसे विख्यात अत्यन्त मनोहारिणी नदीको देखा। वह नदी हिमालय पर्वतसे निकली हुई थी, अथाह जलके कारण गम्भीर वेगसे प्रवाहित हो रही थी, उसका जल चन्द्रमाके समान शीतल था और वह बर्फकी राशि-सरीखी उज्ज्वल प्रतीत हो रही थी। बर्फसदृश निर्मल यशवाले राजा पुरूरवाने उस नदीको देखा॥ १०—१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मद्रेश्वरस्य तपोवनागमनं नाम पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तपोवनागमन नामक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ। ॥ ११५ ॥
एक सौ सोलहवाँ अध्याय
ऐरावती नदीका वर्णन
| सूत उवाच<br>स ददर्श नदीं पुण्यां दिव्यां हैमवतीं शुभाम्।<br>गन्धर्वैश्च समाकीर्णां नित्यं शक्रेण सेविताम्॥ १<br>सुरेभमदसं सिक्तां समंतात् तु विराजिताम्।<br>मध्येन शक्रचापाभां तस्मिन्नहनि सर्वदा॥ २ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वह मङ्गलकारिणी एवं पुण्यमयी दिव्य नदी ऐरावती हिमालयपर्वतसे निकली हुई थी। वह (जलक्रीडार्थ आये हुए) गन्धर्वोंसे भरी हुई, इन्द्रद्वारा सदा सेवित, चारों ओरसे ऐरावतके मद-जलसे अभिषिक्त होनेके कारण सुशोभित और मध्यमें |
| ३१२ | * मत्स्यपुराण * |
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| तपस्विशरणोपेतां महाब्राह्मणसेविताम्।<br>ददर्श तपनीयाभां महाराजः पुरूरवाः॥ ३<br>सितहंसावलिच्छन्नां काशचामरराजिताम्।<br>साभिषिक्तामिव सतां पश्यन् प्रीतिं परां ययौ॥ ४<br>पुण्यां सुशीतलां हृद्यां मनसः प्रीतिवर्धिनीम्।<br>क्षयवृद्धियुतां रम्यां सोममूर्तिमिवापराम्॥ ५<br>सुशीतशीघ्रपानीयां द्विजसंघनिषेविताम्।<br>सुतां हिमवतः श्रेष्ठां चञ्चद्वीचिविराजिताम्॥ ६<br>अमृतस्वादुसलिलां तापसैरुपशोभिताम्।<br>स्वर्गारोहणनिःश्रेणीं सर्वकल्मषनाशिनीम्॥ ७<br>अग्र्यां समुद्रमहिषीं महर्षिगणसेविताम्।<br>सर्वलोकस्य चौत्सुक्यकारिणीं सुमनोहराम्॥ ८<br>हितां सर्वस्य लोकस्य नाकमार्गप्रदायिकाम्।<br>गोकुलाकुलतीरान्तां रम्यां शैवालवर्जिताम्॥ ९<br>हंससारससंघुष्टां जलजैरुपशोभिताम्।<br>आवर्तनाभिगम्भीरां द्वीपोरुजघनस्थलीम्॥ १०<br>नीलनीरजनेत्राभामुत्फुल्लकमलाननाम् ।<br>हिमाभफेनवसनां चक्रवाकाधरां शुभाम्।<br>बलाकापङ्क्तिदशनां चलन्मत्स्यावलिभ्रुवम्॥ ११<br>स्वजलोद्भूतमत्ताङ्गरम्यकुम्भपयोधराम् ।<br>हंसनूपुरसंघुष्टां मृणालवलयावलीम्॥ १२ | इन्द्र-धनुषके समान चमक रही थी। उसके तटपर तपस्वियोंके आश्रम बने हुए थे। वह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सुसेवित तथा तपाये हुए सुवर्णके समान चमक रही थी। ऐसी नदीको उस दिन महाराज पुरूरवाने देखा। वह श्वेत वर्णवाले हंसोंकी पङ्क्तियोंसे आच्छन्न, काश-पुष्परूपी चँवरसे सुशोभित और सत्पुरुषोंद्वारा नहलायी गयी-सी दीख रही थी। उसे देखकर राजाको परम प्रसन्नता प्राप्त हुई। वह पुण्यमयी नदी शीतल जलसे परिपूर्ण, मनोहारिणी, मनकी प्रसन्नता बढ़ानेवाली, ह्रास और वृद्धिसे संयुक्त, रमणीय, दूसरी चन्द्र-मूर्तिके समान उज्ज्वल, अत्यन्त शीतल और वेगसे बहनेवाले जलसे संयुक्त, ब्राह्मणों तथा पक्षिसमूहोंद्वारा सुसेवित, हिमालयकी श्रेष्ठ पुत्रीभूत, लोल लहरोंसे सुशोभित, अमृतके समान सुस्वादु जलसे परिपूर्ण, तपस्वियोंद्वारा सुशोभित, स्वर्गपर चढ़नेके लिये सोपान-सदृश, समस्त पापोंकी विनाशिनी, सर्वश्रेष्ठ, समुद्रकी पटरानी, महर्षिगणोंद्वारा सेवित, सभी लोगोंके मनमें उत्सुकता प्रकट करनेवाली, परम मनोहर, सभी लोगोंकी हितकारिणी, स्वर्गका मार्ग प्रदान करनेवाली, गोसमूहोंसे व्याप्त तट-प्रान्तवाली, परम सुन्दर, सेवाररहित, हंस तथा सारस पक्षियोंके शब्दसे गूँजित, कमलोंसे सुशोभित, भँवररूपी गहरी नाभिसे युक्त, द्वीपरूपी ऊरु एवं जघन-भागवाली, नीले कमलरूपी नेत्रकी शोभासे युक्त, खिले हुए कमल-पुष्परूपी मुखवाली, हिम (बर्फ)-तुल्य उज्ज्वल फेनरूपी वस्त्रसे युक्त, चक्रवाकरूपी होंठोंवाली, कल्याणमयी, बगुलोंकी पङ्क्तिरूपी दाँतोंसे युक्त, चञ्चल मछलियोंकी कतारकी-सी भौंहोंवाली, अपने जलके घुमावसे बने हुए हाथीके रमणीय गण्डस्थलरूपी स्तनोंसे युक्त, हंसरूपी नूपुरके झंकारसे संयुक्त तथा कमलनालरूपी कंकणोंसे सुशोभित थी॥ १-१२॥ | | तस्यां रूपमदोन्मत्ता गन्धर्वानुगताः सदा।<br>मध्याह्नसमये राजन् क्रीडन्त्यप्सरसां गणाः॥ १३<br>तामप्सरोविनिर्मुक्तं वहन्तीं कुङ्कुमं शुभम्।<br>स्वतीरद्रुमसम्भूतनानावर्णसुगन्धिनीम् ॥ १४<br>तरङ्गव्रातसंक्रान्तसूर्यमण्डलदुर्द्दशम् ।<br>सुरेभजनिताघातविकूलद्वयभूषिताम् ॥ १५<br>शक्रेभगण्डसलिलैर्देवस्त्रीकुचचन्दनैः ।<br>संयुक्तं सलिलं तस्याः षट्पदैरुपसेव्यते॥ १६ | राजन्! उस नदीमें दोपहरके समय अपनी सुन्दरताके मदसे उन्मत्त हुई यूथ-की-यूथ अप्सराएँ गन्धर्वोंके साथ सदा क्रीडा करती थीं। उन अप्सराओंके शरीरसे गिरे हुए सुन्दर कुङ्कुमको बहानेवाली वह नदी अपने तटपर उगे हुए वृक्षोंसे गिरे हुए पुष्पोंके कारण रंग-बिरंगवाली तथा सुगन्धसे व्याप्त थी, उसके तरंगसमूहसे आच्छादित होनेके कारण सूर्यमण्डलका दीखना कठिन हो गया था। वह ऐरावतद्वारा किये गये आघातसे चिह्नित तटोंसे विभूषित थी। उसका जल ऐरावतके गण्डस्थलसे बहते हुए मद-जल तथा देवाङ्गनाओंके स्तनोंपर लगे हुए |
११९- आश्रमस्थ विवरमें पुरूरवाका प्रवेश, आश्रमकी शोभाका वर्णन तथा पुरूरवाकी तपस्या
| * अध्याय ११६ * | ३९३ |
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| तस्यास्तीरभवा वृक्षाः सुगन्धकुसुमाचिताः।<br>तथापकृष्टसम्भ्रान्तभ्रमरस्तनिताकुलाः ॥ १७<br>यस्यास्तीरे रतिं यान्ति सदा कामवशा मृगाः।<br>तपोवनाश्च ऋषयस्तथा देवाः सहाप्सराः॥ १८<br>लभन्ते यत्र पूताङ्गा देवेभ्यः प्रतिमानिताः।<br>स्त्रियश्च नाकबहुलाः पद्मेन्दुप्रतिमाननाः॥ १९<br>या बिभर्त्ति सदा तोयं देवसङ्गैरपीडितम्।<br>पुलिन्दैर्नृपसङ्घैश्च व्याघ्रवृन्दैरपीडितम्॥ २०<br>सतामरसपानीयां सतारगगनामलाम्।<br>स तां पश्यन् ययौ राजा सतामीप्सितकामदाम्॥ २१<br>यस्यास्तीररुहैः काशैः पूर्णैश्चन्द्रांशुसंनिभैः।<br>राजते विविधाकारै रम्यं तीरं महाद्रुमैः।<br>या सदा विविधैर्विप्रैर्देवैश्चापि निषेव्यते॥ २२<br>या च सदा सकलौघविनाशं<br>भक्तजनस्य करोत्यचिरेण।<br>यानुगता सरितां हि कदम्बै-<br>र्ह्यनुगता सततं हि मुनीन्द्रैः॥ २३<br>या हि सुतानिव पाति मनुष्यान्<br>या च युता सततं हिमसङ्घैः।<br>या च युता सततं सुरवृन्दै-<br>र्या च जनैः स्वहिताय श्रिता वै॥ २४<br>युक्ता च केसरिगणैः करिवृन्दजुष्टा<br>संतानयुक्तसलिलापि सुवर्णयुक्ता।<br>सूर्यांशुतापपरिवृद्धकदम्बवृक्षा<br>शीतांशुतुल्ययशसा ददृशे नृपेण॥ २५ | चन्दनोंने युक्त था, जिसपर भौरे मँडरा रहे थे। उसके तटपर उगे हुए वृक्ष सुगन्धित पुष्पोंसे लदे हुए तथा सुगन्धके लोभसे आकृष्ट हुए चञ्चल भौरोंकी गुंजारसे व्याप्त थे। जिसके तटपर कामके वशीभूत हुए मृग हिरनियोंके साथ विहार करते थे तथा वहाँ तपोवन, ऋषिगण, अप्सराओंसमेत देवगण, देवताओंके समान सुन्दर एवं पवित्र अङ्गोंवाले अन्य पुरुष एवं कमल और चन्द्रमाकी-सी मुखवाली स्वर्गवासिनी स्त्रियाँ भी पायी जाती थीं, जो देवगणों, पुलिन्दों (जंगली जातियों), नृपसमूहों और व्याघ्रदलोंसे अपीडित अर्थात् परम पवित्र जल धारण करती थी, जो कमलयुक्त जल धारण करनेके कारण तारिकाओंसहित निर्मल आकाशके समान सुशोभित तथा सत्पुरुषोंकी अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण करनेवाली थी, उसे देखते हुए राजा पुरूरवा आगे बढ़े। जिस नदीके रमणीय तट तीरभूमिमें उगे हुए पूर्णिमाके चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल काश-पुष्पों तथा अनेकों प्रकारके विशाल वृक्षोंसे सुशोभित थे, जो सदा विविध मतावलम्बी ब्राह्मणों और देवताओंसे सुसेवित थी, जो सदा भक्तजनोंके सम्पूर्ण पापोंका शीघ्र ही विनाश कर देती थी, जिसमें बहुत-सी छोटी-छोटी नदियाँ आकर मिली थीं, जो निरन्तर मुनीश्वरोंद्वारा सेवित थी, जो पुत्रकी तरह मनुष्योंका पालन करती थी, जो सदा हिम (बर्फ) राशिसे आच्छादित रहती थी, जो निरन्तर देवगणोंसे संयुक्त रहती थी, अपना कल्याण करनेके लिये मनुष्य जिसका आश्रय लेते थे, जिसके किनारे झुंड-के-झुंड सिंह घूमते रहते थे, जो हाथी-समूहोंसे सेवित थी, जिसका जल कल्पवृक्षके पुष्पोंसे युक्त और सुवर्णके समान चमकीला था तथा जिसके तटवर्ती कदम्ब-वृक्ष सूर्यकी किरणोंके तापसे बढ़े हुए थे—ऐसी ऐरावती नदीको चन्द्रमा-सरीखे निर्मल यशवाले राजा पुरूरवाने देखा॥ १३-२५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोषे सुरनदीवर्णनं नाम षोडशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोष-वर्णनप्रसंगमें सुरनदी-वर्णन नामक एक सौ सोलहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११६॥
३९४ * मत्स्यपुराण *
एक सौ सत्रहवाँ अध्याय
हिमालयकी अद्भुत छटाका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
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| आलोकयन् नदीं पुण्यां तत्समीरहृतश्रमः ।<br>स गच्छन्नेव ददृशे हिमवन्तं महागिरिम् ॥ १<br><br>खमुल्लिखद्भिर्बहुभिर्वृतं शृङ्गैस्तु पाण्डुरैः ।<br>पक्षिणामपि सञ्चारैर्विना सिद्धगतिं शुभाम् ॥ २<br><br>नदीप्रवाहसञ्जातमहाशब्दैः समन्ततः ।<br>असंश्रुतान्यशब्दं तं शीततोयं मनोरमम् ॥ ३<br><br>देवदारुवने नीलैः कृताधोवसनं शुभम् ।<br>मेघोत्तरीयकं शैलं ददृशे स नराधिपः ॥ ४<br><br>श्वेतमेघकृतोष्णीषं चन्द्रार्कमुकुटं क्वचित् ।<br>हिमानुलिप्तसर्वाङ्गं क्वचिद् धातुविमिश्रितम् ॥ ५<br><br>चन्दनेनानुलिप्ताङ्गं दत्तपञ्चाङ्गुलं यथा ।<br>शीतप्रदं निदाघेऽपि शिलाविकटसङ्कटम् ।<br>सालक्तकैरप्सरसां मुद्रितं चरणैः क्वचित् ॥ ६<br><br>क्वचित् संस्पृष्टसूर्यांशुं क्वचिच्च तमसावृतम् ।<br>दरीमुखैः क्वचिद् भीमैः पिबन्तं सलिलं महत् ॥ ७<br><br>क्वचिद् विद्याधरगणैः क्रीडद्भिरुपशोभितम् ।<br>उपगीतं तथा मुख्यैः किन्नराणां गणैः क्वचित् ॥ ८<br><br>आपानभूमौ गलितैर्गन्धर्वाप्सरसां क्वचित् ।<br>पुष्पैः संतानकादीनां दिव्यैस्तमुपशोभितम् ॥ ९<br><br>सुमोत्थिताभिः शय्याभिः कुसुमानां तथा क्वचित् ।<br>मृदिताभिः समाकीर्णं गन्धर्वाणां मनोरमम् ॥ १०<br><br>निरुद्धपवनैर्देशैर्नीलशाद्वलमण्डितैः ।<br>क्वचिच्च कुसुमैर्युक्तमत्यन्तरुचिरं शुभम् ॥ ११ | ऋषियो! ऐरावती नदीके जलका स्पर्श करके बहती हुई वायुके स्पर्शसे राजा पुरूरवाकी थकावट दूर हो गयी थी। वे उस पुण्यमयी नदीको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। इतनेमें उन्हें महान् पर्वत हिमवान् दृष्टिगोचर हुआ। वह बहुत-से पीलापन लिये हुए उज्ज्वल वर्णवाले गगनचुम्बी शिखरोंसे युक्त था। वहाँ मङ्गलमयी सिद्ध-गतिके बिना पक्षियोंका भी संचार कठिन था अर्थात् वहाँ केवल सिद्धलोग ही जा सकते थे। वहाँ नदियोंके प्रवाहसे उत्पन्न हुआ महान् घर्घर शब्द चारों ओर गूँज रहा था, जिसके कारण दूसरा कोई शब्द सुनायी ही नहीं पड़ता था। वह शीतल जलसे परिपूर्ण एवं अत्यन्त मनोरम था। उसने देवदारुके नीले वनोंको अधोवस्त्रके स्थानपर और मेघोंको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा था। ऐसे हिमालय पर्वतको राजा पुरूरवाने देखा। उसने कहीं तो श्वेत बादलोंकी पगड़ी बाँध रखी थी और कहीं सूर्य एवं चन्द्रमा उसके मुकुट-सरीखे दीख रहे थे। उसका सारा अङ्ग तो बर्फसे आच्छादित था, किंतु उसमें कहीं-कहीं गेरू आदि धातुएँ भी मिली हुई थीं, जिससे वह ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो श्वेत चन्दनसे लिपटे हुए शरीरपर पाँचों अङ्गुलियोंकी छाप लगा दी गयी हो। वह ग्रीष्म-ऋतुमें भी शीतलता प्रदान कर रहा था तथा बड़ी-बड़ी शिलाओंसे युक्त होनेके कारण अगम्य था। कहीं-कहीं अप्सराओंके महावरयुक्त चरणोंसे चिह्नित था, कहीं तो सूर्यकी किरणोंका स्पर्श हो रहा था, किंतु कहीं घोर अन्धकारसे आच्छादित था, कहीं भयानक गुफाओंके मुखोंमें जल गिर रहा था, जो ऐसा लगता था मानो वह अधिक-से-अधिक जल पी रहा हो। कहीं क्रीडा करते हुए यूथ-के-यूथ विद्याधरोंसे सुशोभित था, कहीं किंनरोंके प्रधान गणोंद्वारा गान हो रहा था, कहीं गन्धर्वों एवं अप्सराओंकी आपानभूमि (मधुशाला)-में गिरे हुए कल्पवृक्ष आदि वृक्षोंके दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित था और कहीं गन्धर्वोंकी शयन करके उठ जानेके पश्चात् मर्दित हुई शय्याओंके बिखरे हुए पुष्पोंसे आच्छादित होनेके कारण अत्यन्त मनोरम लग रहा था। कहीं ऐसे प्रदेश थे, जहाँ वायुकी पहुँच नहीं थी, किंतु वे हरी घासोंसे सुशोभित थे तथा उनपर फूल बिखरे हुए थे, जिससे वह अत्यन्त रुचिर एवं सुन्दर लग रहा था॥ १—११॥ |
| * अध्याय ११७ * | ३९५ |
|---|
| तपस्विशरणं शैलं कामिनामतिदुर्लभम्।<br>मृगैर्यथानुचरितं दन्तिभिन्नमहाद्रुमम्॥ १२<br>यत्र सिंहनिनादेन त्रस्तानां भैरवं रवम्।<br>दृश्यते न च संश्रान्तं गजानामाकुलं कुलम्॥ १३<br>तटाश्च तापसैर्यत्र कुञ्जदेशैरलङ्कृताः।<br>रत्नैर्यस्य समुत्पन्नैस्त्रैलोक्यं समलङ्कृतम्॥ १४<br>अहीनशरणं नित्यमहीनजनसेवितम्।<br>अहीनः पश्यति गिरिमहीनं रत्नसम्पदा॥ १५<br>अल्पेन तपसा यत्र सिद्धिं प्राप्स्यन्ति तापसाः।<br>यस्य दर्शनमात्रेण सर्वकल्मषनाशनम्॥ १६<br>महाप्रपातसम्पातप्रपातादिगताम्बुभिः ।<br>वायुनीतैः सदा तृप्तिकृतदेशं क्वचित् क्वचित्॥ १७<br>समालब्धजलैः शृङ्गैः क्वचिच्चापि समुच्छ्रितैः।<br>नित्यार्कतापविषमैरगम्यैर्मनसा युतम्॥ १८<br>देवदारुमहावृक्षव्रजशाखानिरन्तरैः ।<br>वंशस्तम्बवनाकारैः प्रदेशैरुपशोभितम्॥ १९<br>हिमच्छत्रमहाशृङ्गं प्रपातशतनिर्झरम्।<br>शब्दलभ्याम्बुविषमं हिमसंरुद्धकन्दरम्॥ २०<br>दृष्ट्वैव तं चारुनितम्बभूमिं<br>महानुभावः स तु मद्रनाथः।<br>बभ्राम तत्रैव मुदा समेतः<br>स्थानं तदा किंचिदथाससाद॥ २१ | वह पर्वत तपस्वियोंका आश्रयस्थान तथा कामीजनोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ था, उसपर मृग आदि वन्य पशु स्वच्छन्द विचरण करते थे, उसके विशाल वृक्षोंको हाथियोंने भिन्न-भिन्न कर दिया था, जहाँ सिंहकी गर्जनासे भयभीत हुए हाथियोंके दल व्याकुल होकर भयंकर चिग्घाड़ कर रहे थे, जिससे उनमें शान्ति नहीं दीख रही थी, जिसके तटवर्ती प्रदेश निकुञ्जों और तपस्वियोंसे अलंकृत थे, जिससे उत्पन्न हुए रत्नोंसे त्रिलोकी अलंकृत होती है, वासुकि आदि बड़े-बड़े नागोंके आश्रयस्थान, सत्पुरुषोंद्वारा सेवित तथा रत्नसम्पत्तियोंसे परिपूर्ण उस पर्वतको कोई सत्पुरुष ही देख सकता है। जहाँ तपस्वीलोग थोड़े ही तपसे सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, जिसके दर्शनमात्रसे सारा पाप नष्ट हो जाता है, जिसके किन्हीं-किन्हीं स्थलोंपर वायुद्वारा लाये गये बड़े-बड़े झरनोंके गिरनेसे उत्पन्न हुए छोटे-छोटे झरनोंके जलसे पर्वतीय प्रदेश तृप्त होते हैं। कहीं उसके ऊँचे-ऊँचे शिखर जलसे आप्लावित थे तथा कहीं सूर्यके तापसे संतप्त होनेके कारण अगम्य थे। वहाँ केवल मनसे ही जाया जा सकता था; जो कहीं-कहीं देवदारुके विशाल वृक्षोंकी शाखा-प्रशाखाओंसे घनीभूत हुए तथा कहीं बाँसोंकी झुरमुटरूपी वनोंके आकारसे युक्त प्रदेशोंसे सुशोभित था। कहीं छत्तेके समान बड़े-बड़े शिखर बर्फसे आच्छादित थे, कहीं सैकड़ों झरने झर रहे थे, कहीं जलके गिरनेसे उत्पन्न हुए शब्दोंसे ही जलकी प्रतीति होती थी, कहीं गुफाएँ बर्फसे ढकी हुई थीं। इस प्रकार सुन्दर नितम्बरूपी भूमिसे युक्त उस हिमालय पर्वतको देखकर महानुभाव मद्रेश्वर पुरूरवा हर्षपूर्वक वहीं (अपने मनोऽनुकूल स्थानकी खोज करते हुए) घूमने लगे। तब उन्हें एक स्थान प्राप्त हुआ॥ १२–२१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोषे हिमवद्वर्णनं नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोष-वर्णनमें हिमवद् वर्णन नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११७ ॥
| ३९६ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ अठारहवाँ अध्याय
हिमालयकी अनोखी शोभा तथा अत्रि-आश्रमका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! दैवयोगसे महाराज पुरूरवा उसी पर्वतराजके परम सुरम्य प्रदेशमें पहुँच गये, जो अन्य मनुष्योंके लिये अगम्य था। जहाँसे नदियोंमें श्रेष्ठ ऐरावती निकली हुई थी, वह देश मेघके समान श्यामल था तथा अनेकों प्रकारके वृक्षसमूहोंसे घिरा हुआ था। वहाँ शाल (साखू), ताल (ताड़), तमाल, कर्णिकार (कनेर), शामल (सेमल), न्यग्रोध (बरगद), अश्वत्थ (पीपल), शिरीष (सिरसा), शिंशपा (सीसम), श्लेष्मातक (लहसोढ़ा), आमलक (आमला), हरीतकी (हर्रे), बिभीतक (बहेड़ा), भूर्ज (भोजपत्र), मुञ्जक (मूँज), बाणवृक्ष (साखूका एक भेद), सप्तच्छद (छितवन), महानिम्ब (बकाइन), नीम, निर्गुण्डी (सिंदुवार या शेफाली), हरिद्रुम (दारु हल्दी), विशाल वृक्ष देवदारु, कालेयक (अगर), पद्मक (पद्माख), चन्दन, बेल, कैथ, लाल चन्दन, आम्रात (एकलता), अरिष्टक (रीठा), अक्षोट (पीलू या अखरोट), अब्दक (नागरमोथा), अर्जुन, सुन्दर पुष्पोंवाले हस्तिकर्ण (पलाश), खिले हुए फूलोंसे युक्त कोविदार (कचनार), प्राचीनामलक (पुराने आमलकके वृक्ष) धनक (धनेश), मराटक (बाजरा), खजूर, नारियल, प्रियाल (पियार, इसके फलोंकी गिरी चिरौंजी होती है), आम्रातक (आमड़ा), इङ्गुद (हिंगोट), तन्तुमाल (पटुआ), सुन्दर धवके वृक्ष, काश्मीरी, शालपर्णी, जातीफल (जायफल), पूगफल (सुपारी), कटुफल (कायफर), इलायचीकी लताओंके फल, मन्दार, कोविदार (कचनार), किंशुक (पलाश), कुसुमांशुक (एक प्रकारका अशोक), यवास (जवासा), शमी, तुलसी, बेंत, जलमें उगनेवाले बेंत, हल्के तथा गाढ़े लाल रंगवाले नारंगीके वृक्ष, हिंगु और प्रियङ्गु (बड़ी पीपर)-के वृक्ष भरे पड़े थे॥ १–१०॥ <br><br> साथ ही लाल अशोक, अशोक, आकल्ल (अकरकरा), अविचारक, मुचुकुन्द, कुन्द, आटरूष (अडूसा), परूषक (फालसा), किरात (चिरायता), किंकिरात (बबूल), केतकी, सफेद केतकी, शोभाञ्जन (सहिजन), अञ्जन, कलिंग (सिरसा), निकोटक (अंकोल), सुवर्णके-से चमकीले सुन्दर वल्कलसे युक्त विजयसालके वृक्ष, असना, कामदेवके बाणोंके-से आकारवाले सुन्दर आमके वृक्ष, | | तस्यैव पर्वतेन्द्रस्य प्रदेशं सुमनोरमम्। <br> अगम्यं मानुषैरन्यैर्दैवयोगादुपागतः॥ १ | | | ऐरावती सरिच्छ्रेष्ठा यस्माद् देशाद् विनिर्गता। <br> मेघश्यामं च तं देशं द्रुमषण्डैरनेकशः॥ २ | | | शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैः सशामलैः। <br> न्यग्रोधैश्च तथाश्वत्थैः शिरीषैः शिंशपाद्रुमैः॥ ३ | | | श्लेष्मातकैरामलकैर्हरीतकविभीतकैः । <br> भूर्जैः समुञ्जकैर्बाणैर्वृक्षैः सप्तच्छद्रुमैः॥ ४ | | | महानिम्बैस्तथा निम्बैर्निर्गुण्डीभिर्हरिद्रुमैः। <br> देवदारुमहावृक्षैस्तथा कालेयकद्रुमैः॥ ५ | | | पद्मकैश्चन्दनैर्बिल्वैः कपित्थै रक्तचन्दनैः। <br> आम्रातारिष्टकाक्षोटैरब्दकैश्च तथार्जुनैः॥ ६ | | | हस्तिकर्णैः सुमनसैः कोविदारैः सुपुष्पितैः। <br> प्राचीनामलकैश्चापि धनकैः समराटकैः॥ ७ | | | खर्जूरैर्नारिकेलैश्च प्रियालाम्रातकेङ्गुदैः। <br> तन्तुमालैर्धवैर्भव्यैः काश्मीरीपर्णिभिस्तथा॥ ८ | | | जातीफलैः पूगफलैः कटुफलैर्लाविलीफलैः। <br> मन्दारैः कोविदारैश्च किंशुकैः कुसुमांशुकैः॥ ९ | | | यवासैः शमिपर्णासैर्वेतसैरम्बुवेतसैः। <br> रक्तातिरङ्गनारङ्गैर्हिङ्गुभिः सप्रियङ्गुभिः॥ १० | | | रक्ताशोकैस्तथाशोकैराकल्लैर्विचारकैः । <br> मुचुकुन्दैस्तथा कुन्दैराटरूषपरूषकैः॥ ११ | | | किरातैः किंकिरातैश्च केतकैः श्वेतकेतकैः। <br> शोभाञ्जनैरञ्जनैश्च सुकलिङ्गनिकोटकैः॥ १२ | | | सुवर्णचारुवसनैर्द्रुमश्रेष्ठैस्तथासनैः । <br> मन्मथस्य शराकारैः सहकारैर्मनोरमैः॥ १३ | |
१२०- राजा पुरूरवाकी तपस्या, गन्धर्वों और अप्सराओंकी क्रीड़ा, महर्षि अत्रिका आगमन तथा राजाको वरप्राप्ति
| * अध्याय ११८ * | ३१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पीतयूथिकया चैव श्वेतयूथिकया तथा।<br>जात्या चम्पकजात्या च तुम्बरैश्चाप्यतुम्बरैः॥ १४<br>मोचैर्लोचैस्तु लकुचैस्तिलपुष्पकुशेशयैः।<br>तथा सुपुष्पावरणैश्चव्यकैः कामिवल्लभैः॥ १५<br>पुष्पाङ्कुरैश्च बकुलैः पारिभद्रहरिद्रकैः।<br>धाराकदम्बैः कुटजैः कदम्बैर्गिरिकूटजैः॥ १६<br>आदित्यमुस्तकैः कुम्भैः कुङ्कुमैः कामवल्लभैः।<br>कटुफलैर्बदरैर्नीपैर्दीपरिव महोज्ज्वलैः॥ १७<br>रक्तैः पालीवनैः श्वेतैर्दाडिमैश्चम्पकद्रुमैः।<br>बन्धूकैश्च सुबन्धूकैः कुञ्जकानां तु जातिभिः॥ १८<br>कुसुमैः पाटलाभिश्च मल्लिकाकारवीरकैः।<br>कुरबकैर्हिमवरैर्जम्बूभिर्नृपजम्बुभिः ॥ १९<br>बीजपूरैः सकर्पूरैर्गुरुभिश्चागुरुद्रुमैः।<br>बिम्बैश्च प्रतिबिम्बैश्च संतानकवितानकैः॥ २० | पीली जूही, सफेद जूही, मालती, चम्पाके समूह, तुम्बर (एक प्रकारकी धनिया), अतुम्बर, मोच (केला या सेमल), लोच (गोरखमुण्डी), लकुच (बड़हर), तिल तथा कमलके फूल, कामियोंको प्रिय लगनेवाले पुष्पाङ्कुरों (कुद्मलों) तथा प्रफुल्ल पुष्पोंसे युक्त चव्य (चाब नामक वृक्ष), वकुल (मौलसिरी), पारिभद्र (फरहद), हरिद्रक, धाराकदम्ब (कदम्बका एक भेद), कुटज (कुरैया), पर्वतशिखरोंपर उगनेवाले कदम्ब, आदित्यमुस्तक (मदार), कुम्भ (गुग्गुलका वृक्ष), कामदेवका प्रिय कुङ्कुम (केसर), कटुफल (कायफर), बेर, दीपककी भाँति अत्यन्त चमकीले कदम्ब, लाल रंगके पाली (पालीवत)-के वन, श्वेत अनार, चम्पाके वृक्ष, बन्धूक (दुपहरिया), सबन्धूक (तिलका पौधा), कुञ्जोंके समूह, लाल गुलाबके कुसुम, मल्लिका, करवीरक (कनेर), कुरबक (लाल कटसरैया), हिमवर, जम्बू (छोटी जामुन या कठजामुन), नृपजम्बू (बड़ी जामुन), बिजौरा, कपूर, गुरु, अगुरु, बिम्ब (एक फल), प्रतिबिम्ब और संतानक वृक्ष (कल्पवृक्ष) वितानकी तरह फैले हुए थे॥ ११—२०॥ |
| तथा गुग्गुलवृक्षैश्च हिन्तालधवलेक्षुभिः।<br>तृणशून्यैः करवीरैरशोकैश्चक्रमर्दनैः॥ २१<br>पीलुभिर्धातकीभिश्च चिरिबिल्वैः समाकुलैः।<br>तिन्तिडीकैस्तथा लोध्रैर्विडङ्गैः क्षीरिकाद्रुमैः॥ २२<br>अश्मन्तकैस्तथा कालैर्जम्बीरैः श्वेतकद्रुमैः।<br>भल्लातकैरिन्द्रयवैर्वल्गुजैः सिन्दुवारकैः॥ २३<br>करमर्दैः कासमर्दरविष्टकवरिष्टकैः।<br>रुद्राक्षैर्द्राक्षसम्भूतैः सप्ताहैः पुत्रजीवकैः॥ २४<br>कङ्कोलकैर्लवङ्गैश्च त्वग्द्रुमैः पारिजातकैः।<br>प्रतानैः पिप्पलीनां च नागवल्ल्यश्च भागशः॥ २५<br>मरीचस्य तथा गुल्मैर्नवमल्लिकया तथा।<br>मृद्वीकामण्डपैर्मुख्यैरतिमुक्तकमण्डपैः ॥ २६<br>त्रपुषैर्नीर्तिकानां च प्रतानैः सफलैः शुभैः।<br>कूष्माण्डानां प्रतापैश्च अलाबूनां तथा क्वचित्॥ २७<br>चिर्भिटस्य प्रतानैश्च पटोलीकारवेल्लकैः।<br>कर्कोटकीवितानैश्च वर्ताकैर्बृहतीफलैः॥ २८ | गुग्गुलवृक्ष, हिंताल, श्वेत ईंख, केतकी, कनेर, अशोक, चक्रमर्दन (चकवड़), पीलु, धातकी (धव), घने चिलबिल, तिन्तिडीक (इमली), लोध्र, विडंग, क्षीरिकाद्रुम (खिरनी), अश्मन्तक (लहसोड़ा), काल (रक्तचित्र नामका एक वृक्ष), जम्बीर, श्वेतक (वरुण या वरना नामक एक वृक्षविशेष), भल्लातक (भिलावा), इन्द्रयव, वल्गुज (सोमराजी नामसे प्रसिद्ध), सिन्दुवार, करमर्द (करौंदा), कासमर्द (कसौंदी), अविष्टक (मिर्च), वरिष्ठक (हुरहुर), रुद्राक्षके वृक्ष, अंगूरकी लता, सप्तपर्ण, पुत्रजीवक (पतजुग), कंकोलक (शीतलचीनी), लौंग, त्वग्द्रुम (दालचीनी) और पारिजातके वृक्ष लहलहा रहे थे। कहीं पिप्पली (पीपर) तथा कहीं नागवल्लीकी लताएँ फैली हुई थीं। कहीं काली मिर्च और नवमल्लिकाकी लताओंके कुञ्ज बने हुए थे। कहीं अंगूर और माधवीकी लताओंके मण्डप शोभा पा रहे थे। कहीं फलोंसे लदी हुई नीले रंगके फूलोंवाली लताएँ, कहीं कुम्हड़े तथा कद्दूकी लताएँ और कहीं घुँघुची, परवल, कैरेला एवं कर्कोटकी (पीतघोषा)-की लताएँ शोभा दे रही थीं। कहीं बैगन और भटकटैयाके |
३१८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कण्टकैर्मूलकैर्मूलशाकैस्तु विविधैस्तथा।<br>कह्लारैश्च विदार्या च रूरूटैः स्वादुकण्टकैः॥ २९<br><br>सभाण्डीरविदूसारराजजम्बूकवालुकैः ।<br>सुवर्चलाभिः सर्वाभिः सर्षपाभिस्तथैव च॥ ३०<br><br>काकोलीक्षीरकाकोली छत्रया चातिच्छत्रया।<br>कासमर्दीसहासद्भिः सकन्दलसकाण्डकैः॥ ३१<br><br>तथा क्षीरकशाकेन कालशाकेन चाप्यथ।<br>शिम्बीधान्यैस्तथा धान्यैः सर्वैर्निरवशेषतः॥ ३२ | फल, मूली, जड़वाले शाक तथा अनेकों प्रकारके काँटेदार वृक्ष शोभा पा रहे थे। कहीं श्वेत कमल, कंदविदारी, रूरूट (एक फलदार वृक्ष), स्वादुकण्टक, (सफेद पिडालू), भाण्डीर (एक प्रकारका वट), बिदूसार (बिदारकन्द), राजजम्बूक (बड़ी जामुन), वालुक (एक प्रकारका आँवला), सुवर्चला (सूर्यमुखी) तथा सभी प्रकारके सरसोंके पौधे भी विद्यमान थे। काकोली (कंकोल), क्षीरकाकोली (कंकोलका एक भेद), छत्रा (छत्ता), अतिच्छत्रा (तालमखाना), कासमर्दी (अडूसा), कन्दल (केलेका एक भेद), काण्डक (करैला), क्षीरशाक (दूधी), कालशाक (करेमू) नामक शाकों, सेमकी लताओं तथा सभी प्रकारके अन्नोंके पौधोंसे वह सारा प्रदेश सुशोभित हो रहा था॥ २९—३२॥ |
| औषधीभिर्विचित्राभिर्दीप्यमानाभिरेव च।<br>आयुष्याभिर्यशस्याभिर्बल्याभिश्च नराधिप॥ ३३<br><br>जरामृत्युभयघ्नीभिः क्षुद्भयघ्नीभिरेव च।<br>सौभाग्यजननीभिश्च कृत्स्नाभिश्चाप्यनेकशः॥ ३४<br><br>तत्र वेणुलताभिश्च तथा कीचकवेणुभिः।<br>काशैः शशाङ्ककाशैश्च शरगुल्मैस्तथैव च॥ ३५<br><br>कुशगुल्मैस्तथा रम्यैर्गुल्मैश्चैक्षोर्मनोरमैः।<br>कार्पासजातिवर्गेण दुर्लभेन शुभेन च॥ ३६<br><br>तथा च कदलीखण्डैर्मनोहारिभिरुत्तमैः।<br>तथा मरकतप्रख्यैः प्रदेशैः शाद्वलान्वितैः॥ ३७<br><br>इरापुष्पसमायुक्तैः कुङ्कुमस्य च भागशः।<br>तगरातिविषामांसीग्रन्थिकैस्तु सुरागदैः॥ ३८<br><br>सुवर्णपुष्पैश्च तथा भूमिपुष्पैस्तथापरैः।<br>जम्बीरकैर्भूस्तृणकैः सरसैः सशुकैस्तथा॥ ३९<br><br>शृङ्गवेराजमोदाभिः कुबेरकप्रियालकैः।<br>जलजैश्च तथावर्णैर्नानावर्णैः सुगन्धिभिः॥ ४०<br><br>उदयादित्यसङ्काशैः सूर्यचन्द्रनिभैस्तथा।<br>तपनीयसवर्णैश्च अतसीपुष्पसन्निभैः॥ ४१<br><br>शुकपत्रनिभैश्चान्यैः स्थलपत्रैश्च भागशः।<br>पञ्चवर्णैः समाकीर्णैर्बहुवर्णैस्तथैव च॥ ४२ | नरेश्वर! वहाँ आयु, यश और बल प्रदान करनेवाली, वृद्धावस्था और मृत्युके भयको दूर करनेवाली, भूख-प्यासके कष्टकी विनाशिका एवं सौभाग्यप्रदायिनी सारी ओषधियाँ चित्र-विचित्ररूपमें देदीप्यमान हो रही थीं। वहाँ बाँसकी लताएँ फैली थीं तथा पोले बाँस हवाके संघर्षसे शब्द कर रहे थे। चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कास-पुष्पों, सरपत, कुश और ईंखके परम मनोहर रमणीय झाड़ियों तथा मनोरम एवं दुर्लभ कपास और मालतीके वृक्षों अथवा लताओंसे वह वन्य प्रदेश सुशोभित हो रहा था। वहाँ मनको चुरा लेनेवाले उत्तम जातिके केलेके वृक्ष भी लहलहा रहे थे। कोई-कोई प्रदेश मरकतमणिके तुल्य हरी-हरी घासोंसे हरे-भरे थे। कहीं कुङ्कुम और इरा (एक प्रकारकी नशीली मीठी लता)-के पुष्प बिखरे हुए थे। कहीं तगर, अतिविषा (अतीस नामकी जहरीली ओषधि), जटामासी और गुग्गुलकी भीनी सुगन्ध फैल रही थी। कहीं कनेरके पुष्पों, भूमिपर फैली हुई लताओंके फूलों, जम्बीर-वृक्षों और घासोंसे भूमि सुहावनी लग रही थी, जिसपर तोते विचर रहे थे। कहीं शृङ्गबेर (अदरख), अजमोदा, कुबेरक (तुनि) और प्रियालक (छोटी पियार)-के वृक्ष शोभा पा रहे थे तो कहीं अनेकों रंगोंके सुगन्धित कमलोंके पुष्प खिले हुए थे। उनमें कुछ पुष्प उगते हुए सूर्यके समान लाल, कुछ सूर्य-सरीखे चमकीले एवं चन्द्रमाके-से उज्ज्वल थे, कुछ सुवर्ण-सदृश पीतोज्ज्वल, कुछ अलसीके पुष्पके समान नीले तथा कुछ तोतेके पंखके सदृश हरे थे। इस प्रकार वहाँकी भूमि इन पाँचों रंगोंवाले तथा अन्यान्य रंग-बिरंगे स्थलपुष्पोंसे आच्छादित थी। |
| * अध्याय ११८ * | ३९९ |
|---|---|
| द्रष्टुर्दृष्ट्या हितमुदैः कुमुदैश्चन्द्रसन्निभैः।<br>तथा वह्निशिखाकारैर्गजवक्त्रोत्पलैः शुभैः॥ ४३<br><br>नीलोत्पलैः सकह्लारैर्गुञ्जातककसेरुकैः।<br>शृङ्गाटकमृणालैश्च करटै राजतोत्पलैः॥ ४४<br><br>जलजैः स्थलजैर्मूलैः फलैः पुष्पैर्विशेषतः।<br>विविधैश्चैव नीवारैर्मुनिभोज्यैर्नराधिप॥ ४५ | वह वनस्थली देखनेवालेकी दृष्टिको आनन्ददायक एवं चन्द्रमा-सरीखे उज्ज्वल कुमुद-पुष्पों तथा अग्निकी शिखाके सदृश एवं हाथीके मुखमें संलग्न उज्ज्वल उत्पल, नीले उत्पल, कह्लार, गुंजातक (घुँघुची), कसेरुक (कसेरा), शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), कमलनाल, करट (कुसुम्भ) तथा चाँदीके समान उज्ज्वल उत्पलोंसे सुशोभित थी। इस प्रकार वह प्रदेश जल-कमल एवं स्थलकमल तथा मूल, फल और पुष्पोंसे विशेष शोभायमान था। नरेश्वर! वहाँ मुनियोंके खानेयोग्य अनेकों प्रकारके नीवार (तिन्नी) भी उगे हुए थे॥ ३३—४५॥ |
| न तद्धान्यं न तत्सस्यं न तच्छाकं न तत् फलम्।<br>न तन्मूलं न तत् कन्दं न तत् पुष्पं नराधिप॥ ४६<br><br>नागलोकोद्भवं दिव्यं नरलोकभवं च यत्।<br>अनूपोत्थं वनोत्थं च तत्र यन्नास्ति पार्थिवः॥ ४७<br><br>सदा पुष्पफलं सर्वमजर्यमृतुयोगतः।<br>मद्रेश्वरः स ददृशे तपसा ह्यतियोगतः॥ ४८<br><br>ददृशे च तथा तत्र नानारूपान् पतत्रिणः।<br>मयूराञ् शतपत्रांश्च कलविङ्कांश्च कोकिलान्॥ ४९<br><br>तदा कादम्बकान् हंसान् कोयष्टीन् खञ्जरीटकान्।<br>कुररान् कालकूटांश्च खट्वाङ्गाँल्लुब्धकांस्तथा॥ ५०<br><br>गोश्वेदकांस्तथा कुम्भान्धार्तराष्ट्राञ्छुकांन्बकान्।<br>घातुकांश्चक्रवाकांश्च कटाकूण्टिट्टिभान् भटान्॥ ५१<br><br>पुत्रप्रियाँल्लोहपृष्ठान् गोचर्मगिरिवर्तकान्।<br>पारावतांश्च कमलान् सारिकाञ्जीवजी वकान्॥ ५२<br><br>लाववर्तकवार्ताकान् रक्तवर्त्मप्रभद्रकान्।<br>ताम्रचूदान् स्वर्णचूडाङ्कुकुटान् काष्ठकुक्कुटान्॥ ५३<br><br>कपिञ्जलान् कलविङ्कांस्तथा कुङ्कुमचूडकान्।<br>भृङ्गराजान् सीरपादान् भूलिङ्गाण्डिण्डिमान् नवान्॥ ५४<br><br>मञ्जुलीतकदात्यूहान् भारद्वाजांस्तथा चषान्।<br>एतांश्चान्यांश्च सुबहून् पक्षिसङ्घान् मनोहरान्॥ ५५ | नरेन्द्र! (यहाँतक कि) नागलोक, स्वर्गलोक, मृत्युलोक, जलप्राय स्थान तथा वनमें उत्पन्न होनेवाला ऐसा कोई भी अनाज, धान्य, शाक, फल, मूल, कन्द और फूल नहीं था, जो वहाँ विद्यमान न हो अर्थात् सभी प्राप्य थे। वहाँके वृक्ष ऋतुओंके अनुकूल सदा फूलों और फलोंसे लदे रहते थे। मद्रेश्वर पुरूरवाने अपनी तपस्याके प्रभावसे उस वनप्रान्तको देखा। राजाको वहाँ अनेकों प्रकारके रूप-रंगवाले पक्षी भी दीख पड़े। जैसे मोर, शतपत्र (कठफोरवा), कलविंक (गौरैया), कोयल, कादम्बक (कलहंस), हंस, कोयष्टि (जलकुकुट), खंजरीट (खिड़रिच), कुरर (कराँकुल), कालकूट (जलकौआ), लोभी खट्वाङ्ग (पक्षिविशेष), गोश्वेदक (हारिल), कुम्भ (डोम कौआ), धार्तराष्ट्र (काली चोंच और काले पैरोंवाले हंस), तोते, बगुले, निष्ठुर चक्रवाक, कटाकू (कर्कश ध्वनि करनेवाले विशेष पक्षी), टिटिहरी, भट (तीतर), पुत्रप्रिय (शरभ), लोहपृष्ठ (श्वेत चील्ह), गोचर्म (चरसा), गिरिवर्तक (बतख), कबूतर, कमल (सारस), मैना, जीवजीवक (चकोर), लवा, वर्तक (बटेर), वार्तीक (बटेरोंकी एक जाति), रक्तवर्त्म (मुर्गा), प्रभद्रक (हंसका एक भेद), ताम्रचूड (लाल शिखावाले मुर्गे), स्वर्णचूड (स्वर्ण-सदृश शिखावाले मुर्गे), सामान्य मुर्गे, काष्ठकुक्कुट (मुर्गेका एक भेद), कपिञ्जल (पपीहा), कलविंक (गौरैया), कुङ्कुमचूड (केसर-सरीखी शिखावाले पक्षी), भृङ्गराज (पक्षिविशेष), सीरपाद (बड़ा सारस), भूलिंग (भूमिमें रहनेवाले पक्षी), डिण्डिम (हारिल पक्षीकी एक जाति), नव (काक), मञ्जुलीतक (चील्हकी जातिविशेष), दात्यूह (जलकाक), भारद्वाज (भरदूल) तथा चाष (नीलकण्ठ)—इन्हें तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य बहुत-से मनोहर पक्षिसमूहोंको राजाने देखा॥ ४६—५५॥ |
| ४०० | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
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| श्वापदान् विविधाकारान् मृगांश्चैव महामृगान्।<br>व्याघ्रान् केसरिणः सिंहान्द्वीपिनः शरभान्वृकान्॥ ५६<br>ऋक्षांस्तरक्षूंश्च बहून् गोलाङ्गूलान् सवानरान्।<br>शशलोमान् सकादम्बान् मार्जारान् वायुवेगिनः॥ ५७<br>तथा मत्तांश्च मातङ्गान्महिषान् गवयान् वृषान्।<br>चमरान् सुमरांश्चैव तथा गौरखरानपि॥ ५८<br>उरभ्रांश्च तथा मेषान् सारङ्गानथ कूकुरान्।<br>नीलांश्चैव महानीलान् करालाञ् मृगमातृकान्॥ ५९<br>सदंष्ट्रालोमशरभान् क्रौञ्चाकारकशम्बरान्।<br>करालान् कृतमालांश्च कालपुच्छांश्च तोरणान्॥ ६०<br>उष्ट्रान् खड्गान् वराहांश्च तुरङ्गान् खरगर्दभान्।<br>एतानद्विष्टान् मद्रेशो विरुद्धांश्च परस्परम्॥ ६१<br>अविरुद्धान् वने दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययौ।<br>तच्चाश्रमपदं पुण्यं बभूवात्रेः पुरा नृप॥ ६२<br>तत्प्रसादात् प्रभावयुक्तं स्थावरैर्जङ्गमैस्तथा।<br>हिंसन्ति हि न चान्योन्यं हिंसकास्तु परस्परम्॥ ६३ | इसी प्रकार राजाको वहाँ विभिन्न रूप-रंगवाले जंगली जीव भी देखनेको मिले। जैसे—हिरन, बारहसिंगे, बाघ, सिंह, शेर, चीता, शरभ (अष्टपदी), भेड़िया, रीछ, तरक्षु (लकड़ा), बहुत-से लाङ्गूली वानर, सामान्य वानर, वायु-सरीखे वेगशाली खरगोश, लोमड़ी, वनबिलाव, बिलाव, मतवाले हाथी, भैंसे, नीलगाय, बैल, चमर (सुरा गाय), सुमर (बालमृग), श्वेत रंगके गधे, भेड़, मेढ़, मृग, कुत्ते, नीले एवं गाढ़े नीले रंगवाले भयानक मृगमातृक (कस्तूरी मृग), बड़ी-बड़ी दाढ़ों एवं रोमोंसे युक्त शरभ (अष्टपदी), क्रौंच पक्षीके आकारवाले शम्बर (साबर मृग), भयानक कृतमाल (एक प्रकारका हिरन), काली पूँछोंवाले तोरण (सियार), ऊँट, गैंड़े, सूअर, घोड़े, खच्चर, गधे* आदि जीवोंको उस वनमें परस्पर विरुद्धस्वभाववाले होनेपर भी द्वेषरहित होकर निवास करते देखकर मद्रेश्वर पुरूरवा विस्मयविमुग्ध हो गये। राजन्! पूर्वकालमें उसी स्थानपर महर्षि अत्रिका पुण्यमय आश्रम था। उन ऋषिकी कृपासे वह प्रदेश स्थावर-जङ्गम प्राणियोंसे भरा हुआ अत्यन्त सुहावना था और वहाँ हिंसक जीव भी परस्पर एक-दूसरेकी हिंसा नहीं करते थे॥ ५६-६३॥ |
| क्रव्यादाः प्राणिनस्तत्र सर्वे क्षीरफलाशनाः।<br>निर्मितास्तत्र चात्यर्थमत्रिणा सुमहात्मना॥ ६४<br>शैलनितम्बदेशेषु न्यवसच्च स्वयं नृपः।<br>पयः क्षरन्ति ते दिव्यममृतस्वादु ह्यकण्टकम्॥ ६५<br>क्वचिद् राजन् महिष्यश्च क्वचिदाजाश्च सर्वशः।<br>शिलाः क्षीरेण सम्पूर्णा दध्ना चान्यत्र वा बहिः॥ ६६<br>सम्पश्यन् परमां प्रीतिमवाप वसुधाधिपः।<br>सरांसि तत्र दिव्यानि नद्यश्च विमलोदकाः॥ ६७<br>प्रणालिकानि चोष्णानि शीतलानि च भागशः।<br>कन्दराणि च शैलस्य सुसेव्यानि पदे पदे॥ ६८<br>हिमपातो न तत्रास्ति समन्तात् पञ्चयोजनम्।<br>उपत्यका सुशैलस्य शिखरस्य न विद्यते॥ ६९<br>तत्रास्ति राजञ्छिखरं पर्वतेन्द्रस्य पाण्डुरम्।<br>हिमपातं घना यत्र कुर्वन्ति सहिताः सदा॥ ७० | महर्षि अत्रिने उस आश्रममें ऐसा उत्तम वातावरण बना दिया था कि वहाँके सभी मांसभोजी जीव दूध और फलका ही आहार करते थे। राजन्! मद्रेश्वरने पर्वतके उसी नितम्बप्रदेश (निचले भाग)-में अपना निवास-स्थान बनाया। वहाँ सब ओर कहीं भैंसों तो कहीं बकरियोंके स्तनोंसे अमृतके समान स्वादिष्ट दिव्य दूध झरता रहता था, जिससे वहाँकी शिलाएँ भीतर-बाहर—सब ओर दूध एवं दहीसे सराबोर रहती थीं। यह देखकर भूपाल पुरूरवाको परम हर्ष प्राप्त हुआ। वहाँ दिव्य सरोवर थे तथा निर्मल जलसे भरी हुई नदियाँ बह रही थीं। नालियोंमें कहीं गरम तो कहीं शीतल जल बह रहा था। उस पर्वतकी कन्दराएँ पग-पगपर सेवन करने योग्य थीं। उस आश्रमके चारों ओर पाँच योजनके घेरेमें हिम-पात नहीं होता था। उस सुन्दर पर्वतके शिखरके नीचे उपत्यका (मैदानी भूमि) नहीं थी (जिसके कारण वह प्रदेश जनशून्य था)। राजन्! वहाँ उस पर्वतराजका एक पीले रंगका शिखर है, जिसपर बादल संगठित होकर सदा हिमकी वर्षा किया |
* नामावलिमें एक ही नाम कई बार आये हैं, अतः उनसे उस जातिके विभिन्न भेदोंको समझना चाहिये।
१२१- कैलास पर्वतका वर्णन, गङ्गाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्वीपका विवरण
| * अध्याय ११९ * | ४०१ |
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| तत्रास्ति चापरं शृङ्गं यत्र तोयघना घनाः।<br>नित्यमेवाभिवर्षन्ति शिलाभिः शिखरं वरम्॥ ७१<br>तदाश्रमं मनोहारि यत्र कामधरा धरा।<br>सुरमुख्योपयोगित्वाच्छाखिनां सफलाः फलाः॥ ७२<br>सदोपगीतभ्रमरसुरस्त्रीसेवितं परम्।<br>सर्वपापक्षयकरं शैलस्येव प्रहारकम्॥ ७३<br>वानरैः क्रीडमानैश्च देशाद् देशान् नराधिप।<br>हिमपुञ्जाः कृतास्तत्र चन्द्रबिम्बसमप्रभाः॥ ७४<br>तदाश्रमं समंताच्च हिमसंरुद्धकन्दरैः।<br>शैलवाटैः परिवृतमगम्यं मनुजैः सदा॥ ७५<br>पूर्वाराधितभावोऽसौ महाराजः पुरूरवाः।<br>तदाश्रमपदं प्राप्तो देवदेवप्रसादतः॥ ७६<br>तदाश्रमं श्रमशमनं मनोहरं<br>मनोहरैः कुसुमशतैरलङ्कृतम् ।<br>कृतं स्वयं रुचिरमथात्रिणा शुभं<br>शुभावहं तद् ददृशे स मद्रराट्॥ ७७ | करते हैं। वहीं एक दूसरा शिखर भी है, उस सुन्दर शिखरपर जलसे बोझिल हुए बादल बड़ी-बड़ी शिलाओंके साथ नित्य बरसते रहते हैं। जहाँ वह मनको लुभानेवाला आश्रम स्थित है, वहाँकी पृथ्वी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है। प्रधान देवताओंके उपयोगमें आनेके कारण वहाँके वृक्षोंके फल भी सफलताको प्राप्त करते रहते हैं। वह श्रेष्ठ आश्रम सदा भ्रमरोंकी गुंजारसे गुंजायमान एवं देवाङ्गनाओंसे सुसेवित तथा उस पर्वतके प्रहरीकी तरह सम्पूर्ण पापोंका विनाशक था। नरेश्वर! एक स्थानसे दूसरे स्थानपर क्रीडा करते हुए बन्दरोंने वहाँकी बर्फराशिको चाँदनीके समान उज्ज्वल बना दिया था। वह आश्रम चारों ओरसे हिमाच्छादित कन्दराओं और कँकरीले-पथरीले मार्गोंसे घिरा हुआ था, इसलिये वह मनुष्योंके लिये सदा अगम्य था। पूर्वजन्मकी आराधनाके प्रभावसे युक्त महाराज पुरूरवा देवाधिदेव भगवान्की कृपासे उस आश्रमपर पहुँचे थे। वह आश्रम थकावटको दूर करनेवाला, मनोहर, मनोमोहक पुष्पोंसे अलंकृत, स्वयं महर्षिद्वारा सुन्दररूपमें निर्मित, मङ्गलमय एवं शुभकारक था, उसे मद्रराज पुरूरवाने देखा॥ ६४–७७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशेऽत्र्याश्रमवर्णनं नामाष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें अत्रि-आश्रमवर्णन नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ११८ ॥
एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय
आश्रमस्थ विवरमें पुरूरवा* का प्रवेश, आश्रमकी शोभाका वर्णन तथा पुरूरवाकी तपस्या
| सूत उवाच<br>तत्र यौ तौ महाशृङ्गौ महावर्णौ महाहिमौ।<br>तृतीयं तु तयोर्मध्ये शृङ्गमत्यन्तमुच्छ्रितम्॥ १<br>नित्यातपशिलाजालं सदाभ्रपरिवर्जितम्।<br>तस्याधस्ताद् वृक्षगणो दिशां भागे च पश्चिमे॥ २<br>जातीलतापरिक्षिप्तं विवरं चारुदर्शनम्।<br>दृष्ट्वैव कौतुकाविष्टस्तं विवेश महीपतिः॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वहाँ सदा हिमाच्छादित तथा रंग-बिरंगे जो दो महान् शिखर थे, उनके बीचमें एक तीसरा शिखर था, जो अत्यन्त ऊँचा था। वह बादलोंसे सदा शून्य रहता था, जिससे उसकी शिलाएँ नित्य सन्तप्त बनी रहती थीं। उस शिखरके नीचे पश्चिम दिशामें वृक्षोंके समूह शोभा पा रहे थे। उन्हींके बीचमें एक अत्यन्त सुन्दर विवर (छिद्र) था, जो मालतीकी लताओंसे आच्छादित था। उसे देखते ही राजा पुरूरवा आश्चर्यचकित हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने उस विवरमें |
* इस पुराणमें—यजुर्वेद ५। २, ऋग्वेद १०। ९५, शतपथब्रा० ११। ५ आदिमें संकथित पुरूरवाके कथानकका सर्वाधिक विस्तारसे उपवृंहण हुआ है और कई बार उसकी पुनरुक्ति भी हुई है। इससे विक्रमोर्वशीयमें कालिदास एवं पार्जीटर आदि आधुनिक पाश्चात्त्य विद्वान् लेखक बहुत प्रभावित हुए हैं। निघण्टु ५। ४ तथा यास्क्रीय निरुक्त १०। ४६ एवं ऋग्वेद १०। ९५। २ के अनुसार ये सूर्य या मूल प्राणतत्त्व हैं। पाणि० ६। ३। १३७ के अनुसार यहाँ 'पुरू' में दीर्घ हुआ है।
४०२ * मत्स्यपुराण *
| तमसा चातिनिबिडं नल्वमात्रं सुसंकटम्।<br>नल्वमात्रमतिक्रम्य स्वप्रभाभरणोज्ज्वलम्॥ ४<br>तमुच्छ्रितमथात्यन्तं गम्भीरं परिवर्तुलम्।<br>न तत्र सूर्यस्तपति न विराजति चन्द्रमाः॥ ५<br>तथापि दिवसाकारं प्रकाशं तदहर्निशम्।<br>क्रोशाधिकपरीमाणं सरसा च विराजितम्॥ ६<br>समंतात् सरसस्तस्य शैललग्ना तु वेदिका।<br>सौवर्णै राजतैर्वृक्षैर्विद्रुमैरुपशोभितम्॥ ७<br>नानामाणिक्यकुसुमैः सुप्रभाभरणोज्ज्वलैः।<br>तस्मिन् सरसि पद्मानि पद्मरागच्छदानि तु॥ ८<br>वज्रकेशरजालानि सुगन्धीनि तथा युतम्।<br>पत्रैर्मरकतैर्नीलैर्वैदूर्यस्य महीपते॥ ९<br>कर्णिकाश्च तथा तेषां जातरूपस्य पार्थिव।<br>तस्मिन् सरसि या भूमिः सा तु वज्रसमाकुला॥ १०<br>नानारत्नैरुपचिता जलजानां समाश्रया।<br>कपर्दिकानां शुक्तीनां शङ्खानां च महीपते॥ ११<br>मकराणां च मत्स्यानां चण्डानां कच्छपैः सह।<br>तत्र मरकतखण्डानि वज्राणां च सहस्त्रशः॥ १२<br>पद्मरागेन्द्रनीलानि महानीलानि पार्थिव।<br>पुष्परागानि सर्वाणि तथा कर्केतनानि च॥ १३<br>तुत्थकस्य तु खण्डानि तथा शेषस्य भागशः।<br>रा(ला)जावर्तस्य मुख्यस्य रुधिराक्षस्य चाप्यथ॥ १४<br>सूर्येन्दुकान्तयश्चैव नीलो वर्णान्तिकश्च यः।<br>ज्योतीरसस्य रम्यस्य स्यमन्तस्य च भागशः॥ १५<br>सुरोरगवलक्षाणां स्फटिकस्य तथैव च।<br>गोमेदपित्तकानां च धूलीमरकतस्य च॥ १६<br>वैदूर्यसौगन्धिकयोस्तथा राजमणेर्नृप।<br>वज्रस्यैव च मुख्यस्य तथा ब्रह्ममणेरपि॥ १७<br>मुक्ताफलानि मुक्तानां ताराविग्रहधारिणीम्॥ १८ | प्रवेश किया। वह मार्ग चार सौ हाथ (एक फर्लांग)-तक घने अन्धकारसे समावृत होनेके कारण अत्यन्त संकटमय था। उस चार सौ हाथकी दूरी पार कर लेनेपर राजा ऐसे स्थानपर पहुँचे, जो अपनी कान्तिसे ही उद्भासित हो रहा था। वह स्थान ऊँचा, अत्यन्त गम्भीर और गोलाकार था तथा एक कोसके विस्तारवाला था। यद्यपि वहाँ न सूर्य तपते थे न चन्द्रमा ही विराजमान थे, तथापि वह दिनकी भाँति रात-दिन प्रकाशयुक्त बना रहता था। वहाँ एक सरोवर भी था। जो सुवर्ण, चाँदी और मूँगेके समान रंग-बिरंगे वृक्षोंसे सुशोभित था। उन वृक्षोंमें नाना प्रकारके मणियोंके सदृश परमोत्कृष्ट कान्तिसे युक्त फूल खिले हुए थे। उस सरोवरके चारों ओर शिलाओंकी वेदी बनी हुई थी, भूपाल! उस सरोवरमें विभिन्न प्रकारके कमल खिले हुए थे, जिनके पुष्पदल पद्मरागमणि-सरीखे, केसर-समूह हीरेके-से और पत्ते नीले वैदूर्य मणिके समान चमक रहे थे और वे सुगन्धसे भरे हुए थे। उनकी कर्णिका (छत्ता) सुवर्णके समान चमकीली थी॥ १-९ $\frac{१}{२}$॥<br><br>उस सरोवरमें जो भूमि थी, वह हीरेसे आच्छादित थी, साथ ही वह नाना प्रकारके दूसरे रत्नोंसे भी मण्डित थी। महीपाल! वहाँ जलमें उत्पन्न होनेवाली कौड़ी, सीपी और शङ्ख भी वर्तमान थे। वह कछुओंके साथ-साथ भयानक घड़ियालों और मछलियोंका वासस्थान था। राजन्! उसमें कहीं मरकतमणि तथा हीरेके हजारों टुकड़े पड़े थे। कहीं पद्मराग (माणिक्य या लाल), इन्द्रनील (नीलम), महानील, पुष्पराग (पुखराज), कर्केतन, तुत्थक तथा शेष मणियोंके खण्ड चमक रहे थे। कहीं लाजावर्त, मुख्य, रुधिराक्ष, सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त, नीलवर्णान्तिक, ज्योतीरस, रम्य एवं स्यमन्तक मणियोंके टुकड़े यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। कहीं सुरमणि, सर्पमणि, वलक्षमणि और स्फटिकमणिकी चट्टानें चमक रही थीं, तो कहीं गोमेद, पित्तक, धूलीमणि, मरकत, वैदूर्य, सौगन्धिक, राजमणि, हीरा, मुख्य तथा ब्रह्ममणिके खण्ड दृष्टिगोचर हो रहे थे। कहीं-कहीं बिखरे हुए मोती* अपनी प्रभा फैला रहे थे, जो ताराओंके समान लग रहे थे। |
* यहाँ श्लोक ८ से लेकर १९ तकके-बारह श्लोकोंमें-३२ मुख्य मणियोंके उल्लेखपूर्वक सम्पूर्ण रत्नशास्त्रका संक्षेपमें निरूपण हुआ है। गरुडपुराण ६८-७८, विष्णुधर्मो० २। १५, युक्तिकल्पतरु, बृहत्संहिता, रत्नसारमें इनका विस्तृत परिचय है।
* अध्याय १११ *
४०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सुखोष्णं चैव तत् तोयं स्नानाच्छीतविनाशनम्।<br>वैदूर्यस्य शिला मध्ये सरसस्तस्य शोभना ॥ १९<br><br>प्रमाणेन तथा सा च द्वे च राजन् धनुःशते।<br>चतुरस्रा तथा रम्या तपसा निर्मितात्रिणा ॥ २०<br><br>बिलद्वारसमो देशो यत्र यत्र हिरण्मयः।<br>प्रदेशः स तु राजेन्द्र द्वीपे तस्मिन् मनोहरे ॥ २१ | उस सरोवरका जल कुछ गुनगुना गरम था, जो स्नान करनेसे ठण्डकको दूर कर देता था। उस सरोवरके मध्यमें वैदूर्यमणिकी एक सुन्दर शिला थी। राजन्! उस रमणीय शिलाको महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके प्रभावसे निर्मित किया था। वह आठ सौ हाथ (दो फर्लांग) विस्तृत एवं चौकोर थी। राजेन्द्र! उस मनोहर द्वीपमें सारा प्रदेश बिलद्वारके समान स्वर्णमय था॥१०—२१॥ |
| तथा पुष्करिणी रम्या तस्मिन् राजञ्शिलातले।<br>सुशीतामलपानीया जलजैश्च विराजिता ॥ २२<br><br>आकाशप्रतिमा राजंश्चतुरस्रा मनोहरा।<br>तस्यास्तदुदकं स्वादु लघु शीतं सुगन्धिकम् ॥ २३<br><br>न क्षिणोति यथा कण्ठं कुक्षिं नापूरयत्यपि।<br>तृप्तिं विधत्ते परमां शरीरे च महत् सुखम् ॥ २४<br><br>मध्ये तु तस्याः प्रासादं निर्मितं तपसात्रिणा।<br>रुक्मसेतुप्रवेशान्तं सर्वरत्नमयं शुभम् ॥ २५<br><br>शशाङ्करश्मेः संकाशं प्रासादं रजतं हितम्।<br>रम्यवैदूर्यसोपानं विद्रुमामलसारकम् ॥ २६<br><br>इन्द्रनीलमहास्तम्भं मरकतासक्तवेदिकम्।<br>वज्रांशुजालैः स्फुरितं रम्यं दृष्टिमनोंरमम् ॥ २७<br><br>प्रासादे तत्र भगवान् देवदेवो जनार्दनः।<br>भोगिभोगावलीसुप्तः सर्वालङ्कारभूषितः ॥ २८<br><br>जान्वाच्य कुञ्चितस्त्वेको देवदेवस्य चक्रिणः।<br>फणीन्द्रसंनिविष्टोऽङ्घ्रिर्द्वितीयश्च तथानघ ॥ २९<br><br>लक्ष्म्युत्सङ्गतोऽङ्घ्रिस्तु शेषभोगप्रशायिनः।<br>फणीन्द्रभोगसंन्यस्तबाहुः केयूरभूषणः ॥ ३० | राजन्! उस शिलातलपर एक रमणीय पुष्करिणी (पोखरी) थी, जो चौकोर, मनोमोहिनी तथा आकाशके समान निर्मल थी। वह अत्यन्त शीतल एवं निर्मल जलसे परिपूर्ण तथा कमलोंसे सुशोभित थी। उसका वह जल सुस्वादु, पचनेमें हलका, शीतल और सुगन्धयुक्त था। वह जैसे गलेको कष्ट नहीं पहुँचाता था, उसी प्रकार कुक्षिको भी वायुसे परिपूर्ण नहीं करता था, अर्थात् वायुविकार नहीं उत्पन्न करता था, अपितु शरीरमें पहुँचकर परम तृप्ति उत्पन्न करता तथा महान् सुख पहुँचाता था। उस पुष्करिणी (बावली)-के मध्यभागमें महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके बलसे एक महलका निर्माण किया था। वह सुन्दर प्रासाद चाँदीका बना हुआ था, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान चमक रहा था। उसमें सभी प्रकारके रत्न जड़े गये थे तथा भीतर प्रवेश करनेके लिये सोनेकी सीढ़ियाँ बनी थीं, जिनमें रमणीय वैदूर्य एवं निर्मल मूँगे लगे हुए थे। उसमें इन्द्रनील मणिके विशाल खम्भे लगे थे। उसकी वेदिका अर्थात् फर्शपर मरकतमणि जड़ी हुई थी। हीरेकी किरणोंसे चमचमाता हुआ वह रमणीय महल देखते ही मनको लुभा लेता था। उस महलमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दन (मूर्ति-रूपसे) सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषित होकर शेषनागके फणोंपर शयन कर रहे थे। अनघ! देवाधिदेव चक्रधारी भगवान्का एक चरण घुटनेसे मुड़ा हुआ था और दूसरा चरण शेषनागके ऊपरसे होता हुआ लक्ष्मीकी गोदमें स्थित था। शेषनागके फणोंपर शयन करनेवाले भगवान्का बाजूबंदसे विभूषित एक हाथ शेषनागके फणोंपर स्थापित था ॥२२—३०॥ |
| अङ्गुलीपष्ठविन्यस्तदेवशीर्षधरं भुजम्।<br>एकं वै देवदेवस्य द्वितीयं तु प्रसारितम् ॥ ३१ | उस हाथकी अङ्गुलियोंका पृष्ठभाग शेषके सिरपर रखा हुआ था। उनका दूसरा हाथ फैला हुआ था। |
| ४०४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| समाकुञ्चितजानुस्थमणिबन्धेन शोभितम्।<br>किञ्चिदाकुञ्चितं चैव नाभिदेशकरस्थितम्॥ ३२<br><br>तृतीयं तु भुजं तस्य चतुर्थं तु तथा शृणु।<br>आत्तसंतानकुसुमं घ्राणदेशानुसर्पिणम्॥ ३३<br><br>लक्ष्म्या संवाह्यमानाङ्घ्रिः पद्मपत्रनिभैः करैः।<br>संतानमालामुकुटं हारकेयूरभूषितम्॥ ३४<br><br>भूषितं च तथा देवमङ्गदैरङ्गुलीयकैः।<br>फणीन्द्रफणविन्यस्तचारुरत्नशिखोज्ज्वलम्॥ ३५<br><br>अज्ञातवस्तुचरितं प्रतिष्ठितमथात्रिणा।<br>सिद्धानुपूर्व्यं सततं संतानकुसुमार्चितम्॥ ३६<br><br>दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गं दिव्यधूपेन धूपितम्।<br>सुरसैः सुफलैर्हृद्यैः सिद्धैरुपहृतैः सदा॥ ३७<br><br>शोभितोत्तमपार्श्वं तं देवमुत्पलशीर्षकम्। | तीसरे हाथका मणिबन्ध मुड़े हुए घुटनेपर सुशोभित था तथा कुछ मुड़कर नाभिदेशपर फैले हुए पहले हाथपर अवलम्बित था। अब उनके चौथे हाथकी दशा सुनो। चौथे हाथमें भगवान् कल्पवृक्षका पुष्प धारण किये हुए थे और उसे अपनी नासिकातक ले गये थे। उस समय लक्ष्मी अपने कमल-दलके समान कोमल हाथोंसे भगवान्का चरण दबा रही थीं। भगवान्के मस्तकपर कल्पवृक्षके पुष्पोंकी मालाओंका मुकुट शोभा दे रहा था। वे हार, केयूर, बाजूबंद और अँगूठीसे विभूषित तथा शेषनागके फणोंपर रखे हुए सुन्दर रत्नोंसे प्रकाशित हो रहे थे। एवं इनकी विशेषता यह थी कि महर्षि अत्रिने उनकी स्थापना की थी। उनका चरित्र वस्तुतः जाना नहीं जा सकता। सिद्धगण सदा उनकी पूजा करते थे। कल्पवृक्षके पुष्पोंद्वारा उनकी अर्चना होती थी। उनके अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप था तथा वे दिव्य धूपसे धूपित थे। सिद्धगण उन्हें सदा सरस एवं मनोहर फलोंका उपहार देते थे। वे उत्तम पार्श्वसे सुशोभित थे तथा उनके मस्तकपर कमल शोभा पा रहा था॥ ३१-३७ १/२ ॥ |
| ततः सम्मुखमुद्वीक्ष्य ववन्दे स नराधिपः॥ ३८<br><br>जानुभ्यां शिरसा चैव गत्वा भूमिं यथाविधि।<br>नाम्नां सहस्रेण तथा तुष्टाव मधुसूदनम्॥ ३९<br><br>प्रदक्षिणमथो चक्रे स तूत्थाय पुनः पुनः।<br>रम्यमायतनं दृष्ट्वा तत्रोवासाश्रमे पुनः॥ ४०<br><br>बिलाद् बहिर्गुहां काञ्चिदाश्रित्य सुमनोहराम्।<br>तपश्चकार तत्रैव पूजयन् मधुसूदनम्॥ ४१<br><br>नानाविधैस्तथा पुष्पैः फलमूलैः सगोरसैः।<br>नित्यं त्रिषवणस्नायी वह्निपूजापरायणः॥ ४२<br><br>देववापीजलैः कुर्वन् सततं प्राणधारणम्।<br>सर्वाहारपरित्यागं कृत्वा तु मनुजेश्वरः॥ ४३<br><br>अनास्तृतगुहाशायी कालं नयति पार्थिवः।<br>त्यक्ताहारक्रियश्चैव केवलं तोयतो नृपः।<br>न तस्य ग्लानिमायाति शरीरं च तदद्भुतम्॥ ४४ | ऐसे भगवान् (-की मूर्ति)-को अपने सम्मुख देखकर राजा पुरूरवाने विधिपूर्वक घुटने टेककर और मस्तकको भूमिपर रखकर भगवान्को प्रणाम किया तथा सहस्रनामोंद्वारा उन मधुसूदनका स्तवन किया और उठकर बारम्बार उनकी प्रदक्षिणा की। पुनः उस रमणीय देवमन्दिरको देखकर उसी आश्रममें निवास करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् उस बिलसे बाहर निकलकर वे किसी अतिशय मनोहारिणी गुफाका आश्रय लेकर नाना प्रकारके पुष्पों, फलों, मूलों तथा गोरसोंद्वारा भगवान् मधुसूदनकी पूजा करते हुए वहीं तपस्यामें संलग्न हो गये। वे नित्य त्रिकाल स्नान तथा अग्निहोत्र करते थे। वे नरेश सभी प्रकारके आहारका परित्याग कर सदा उस देववापी (पोखरी)-के जलसे ही प्राणोंकी रक्षा करते थे। राजा बिना बिछौनेके ही गुफामें शयन करते हुए समय बिता रहे थे। यद्यपि राजाने भोजन करना छोड़ दिया था और केवल जलपर ही निर्भर थे, तथापि उन्हें किसी प्रकारकी ग्लानि नहीं होती थी, प्रत्युत उनका शरीर अद्भुत तेजोमय हो गया |
| * अध्याय १२० * | ४०५ |
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| एवं स राजा तपसि प्रसक्तः<br>सम्पूजयन् देववरं सदैव।<br>तत्राश्रमे कालमुवास कञ्चित्<br>स्वर्गोपमे दुःखमविन्दमानः॥ ४५॥ | था। इस प्रकार राजा पुरूरवाने तपस्यामें दत्तचित्त होकर सदा देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा करते हुए दुःखकी कुछ भी परवा न कर उस स्वर्गतुल्य आश्रममें कुछ कालतक निवास किया॥ ३८–४५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे आयतनवर्णनं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णनमें आयतनवर्णन नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११९॥
एक सौ बीसवाँ* अध्याय
राजा पुरूरवाकी तपस्या, गन्धर्वों और अप्सराओंकी क्रीडा, महर्षि अत्रिका आगमन तथा राजाको वरप्राप्ति
| सूत उवाच<br><br>स त्वाश्रमपदे रम्ये त्यक्ताहारपरिच्छदः।<br>क्रीडाविहारं गन्धर्वैः पश्यत्यप्सरसां सह॥ १<br><br>कृत्वा पुष्पोच्चयं भूरि ग्रथयित्वा तथा स्रजः।<br>अर्घ्यं निवेद्य देवाय गन्धर्वेभ्यस्तदा ददौ॥ २<br><br>पुष्पोच्चयप्रसक्तानां क्रीडन्तीनां यथासुखम्।<br>चेष्टा नानाविधाकाराः पश्यन्नपि न पश्यति॥ ३<br><br>काचित् पुष्पोच्चये सक्ता लताजालेन वेष्टिता।<br>सखीजनेन संत्यक्ता कान्तेनाभिसमुज्झिता॥ ४<br><br>काचित् कमलगन्धाभा निःश्वासपवनाहतैः।<br>मधुपैराकुलमुखी कान्तेन परिमोचिता॥ ५<br><br>मकरन्दसमाक्रान्तनयना काचिदङ्गना।<br>कान्तनिःश्वासवातेन नीरजस्ककृतेक्षणा॥ ६<br><br>काचिदुच्चीय पुष्पाणि ददौ कान्तस्य भामिनी।<br>कान्तसंग्रथितैः पुष्पै रराज कृतशेखरा॥ ७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार राजकीय सामग्रियों तथा आहारका परित्याग कर राजा पुरूरवा उस रमणीय आश्रममें निवास करने लगे। वहाँ उन्हें गन्धर्वोंके साथ अप्सराओंका क्रीडाविहार भी देखनेको मिलता था। राजा बहुत-से फूलोंको तोड़कर उसकी माला गूँथते थे और उन्हें अर्घ्यसहित पहले भगवान् विष्णुको निवेदित कर पुनः गन्धर्वोंको दे देते थे। वे वहाँ पुष्प-चयनमें लगी हुई एवं सुखपूर्वक क्रीडा करती हुई अप्सराओंकी विभिन्न प्रकारकी चेष्टाओंको देखकर भी अनदेखी कर जाते थे। वहाँ पुष्प-चयनमें निरत कोई अप्सरा लता-समूहमें उलझ गयी और सखियाँ उसे उसी दशामें छोड़कर चलती बनीं, तब उसके पतिने आकर उसे बन्धन-मुक्त किया। किसी अप्सराके शरीरसे कमलकी-सी गन्ध निकल रही थी। इस कारण उसकी निःश्वासवायुसे आकृष्ट होकर भ्रमर उसके ऊपर मँडरा रहे थे। उन भ्रमरोंसे उसका मुख ढक-सा गया था; तब उसके पतिने उसे उस कष्टसे मुक्त किया। किसी अप्सराकी आँखें पुष्प-रजसे आक्रान्त हो गयीं, तब उसके पतिने अपनी श्वासवायुसे फूँककर उन्हें धूलरहित कर दिया। किसी सुन्दरीने पुष्पोंको एकत्रकर अपने पतिको दे दिया। तत्पश्चात् वह अपने पतिद्वारा गूँथी गयी पुष्पमालाको अपने मस्तकपर रखकर सुशोभित |
* इस अध्यायके अनेक शब्दालंकारोंसे उद्दीपित अधिकांश श्लोक भागवत १०। ३३ से मिलते हैं। कोई एक-दूसरेसे अवश्य प्रभावित है। वैसे इस प्रकारका वर्णन गर्गसंहिता, ब्रह्मवैवर्तपुराणके रासप्रकरणोंमें तथा भागवतके रामनारायणकृत भावविभाविक तथा किशोरीदासकृता विशुद्धरसदीपिकामें इनकी भी पूरी व्याख्या है।
| ४०६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| उच्चीय स्वयमुद्ग्रथ्य कान्तेन कृतशेखरा।<br>कृतकृत्यमिवात्मानं मेने मन्मथवर्धिनी ॥ ८ | होने लगी। तभी किसीके पतिने पुष्प-चयन करके अपने ही हाथों माला गूँथकर उसे अपनी पत्नीके मस्तकपर रखकर उसे सुसज्जित कर दिया, इससे उसने अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥१—८॥ |
| अस्त्यस्मिन् गहने कुञ्जे विशिष्टकुसुमा लता।<br>काचिदेवं रहो नीता रमणेन रिरंसुना ॥ ९ | कोई पतिद्वारा झुकायी गयी लतासे फूल तोड़ रही |
| कान्तसंनामितलता कुसुमानि विचिन्वती।<br>सर्वाभ्यः काचिदात्मानं मेने सर्वगुणाधिकम् ॥ १० | थी, जिससे वह अपनेको सभी सखियोंसे सम्पूर्ण गुणोंमें बढ़-चढ़कर मान रही थी। कुछ सुन्दरी देवाङ्गनाएँ |
| काश्चित् पश्यन्ति भूपालं नलिनीषु पृथक् पृथक्।<br>क्रीडमानास्तु गन्धर्वैर्देवरामा मनोरमाः ॥ ११ | गन्धर्वोंके साथ पृथक्-पृथक् क्रीडा करती हुई कमलसमूहोंके बीचसे राजाकी ओर देख रही थीं। कोई |
| काचिदाताडयत् कान्तमुदकेन शुचिस्मिता।<br>ताड्यमानाथ कान्तेन प्रीतिं काचिदुपाययौ ॥ १२ | सुन्दरी अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी और किसीके ऊपर उसका पति जल फेंक रहा था, जिससे |
| कान्तं च ताडयामास जातखेदा वराङ्गना।<br>अदृश्यत वरारोहा श्वासनृत्यत्पयोधरा ॥ १३ | उसे बड़ी प्रसन्नता हो रही थी। कोई देवाङ्गना खिन्न मनसे अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी। पतिके |
| कान्ताम्बुताडनाकृष्टकेशपाशनिबन्धना ।<br>केशाकुलमुखी भाति मधुपैरिव पद्मिनी ॥ १४ | ऊपर जल फेंकनेसे किसीकी चोटी खुल गयी थी, जिससे उसका मुख बालोंसे ढक गया था। उस समय |
| स्वचक्षुःसदृशैः पुष्पैः संच्छन्ने नलिनीवने।<br>छन्ना काचिच्चिरात् प्राप्ता कान्तेनान्विष्य यत्नतः ॥ १५ | वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो भ्रमरोंसे घिरी हुई कमलिनी हो। कोई अपने नेत्रोंके समान कमल- |
| स्नाता शीतापदेशेन काचित् प्राहाङ्गना भृशम्।<br>रमणालिङ्गनं चक्रे मनोऽभिलषितं चिरम् ॥ १६ | पुष्पोंसे ढके हुए उस कमलिनीके वनमें छिप गयी थी, जिसे उसके पतिने बड़ी देरके बाद प्रयत्नपूर्वक खोजकर |
| जलार्द्रवसनं सूक्ष्ममङ्गलीनां शुचिस्मिता।<br>धारयन्ती जनं चक्रे काचित् तत्र समन्मथम् ॥ १७ | प्राप्त किया। किसीको उसका पति गलेमें पड़ी हुई मालाके |
| कण्ठमाल्यगुणैः काचित् कान्तेन कृष्यताम्भसि।<br>त्रुट्यत्स्त्रग्दामपतितं रमणं प्राहसच्चिरम् ॥ १८ | धागेको पकड़कर जलमें खींच रहा था, किंतु उस धागेके टूट |
| काचिद्दुग्ना सखीदत्तजानुदेशे नखक्षता।<br>सम्भ्रान्ता कान्तशरणं मग्ना काचिद् गता चिरम् ॥ १९ | |
| काचित् पृष्ठकृतादित्या केशनिस्तोयकारिणी।<br>शिलातलगता भर्त्रा दृष्टा कामार्तचक्षुषा ॥ २० | |
| कृत्तमाल्यं विलुलितं संक्रान्तकुचकुङ्कुमम्।<br>रतिक्रीडितकान्तेव रराज तत् सरोदकम् ॥ २१ | |
| सुस्रातदेवगंधर्वदेवरामागणेन च।<br>पूज्यमानं च ददृशे देवदेवं जनार्दनम् ॥ २२ |
१२२- शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन
| * अध्याय १२० * | ४०७ |
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| क्वचिच्च ददृशे राजा लतागृहगताः स्त्रियः।<br>मण्डयन्तीः स्वगात्राणि कान्तसंन्यस्तमानसाः॥ २३<br>काचिदादर्शनकरा व्यग्रा दूतीमुखोद्गतम्।<br>शृण्वती कान्तवचनमधिका तु तथा बभौ॥ २४<br>काचित् सत्वरिता दूत्या भूषणानां विपर्ययम्।<br>कुर्वाणा नैव बुबुधे मन्मथाविष्टचेतना॥ २५ | जानेपर जब वह गिर पड़ा, तब वह बड़ी देरतक हँसती रही। इस प्रकार राजाने स्नानसे निवृत्त हुई सभी देव-देवियों एवं गन्धर्व-अप्सराओंद्वारा भगवान् जनार्दनको पूजित होते हुए देखा॥ ९—२५॥ |
| वायुनुन्नातिसुरभिकुसुमोत्करमण्डिते ।<br>काचित् पिबन्ती ददृशे मैरेयं नीलशाद्वले॥ २६<br>पाययामास रमणं स्वयं काचिद् वराङ्गना।<br>काचित् पपौ वरारोहा कान्तपाणिसमर्पितम्॥ २७<br>काचित् स्वनेत्रचपलनीलोत्पलयुतं पयः।<br>पीत्वा पप्रच्छ रमणं क्व गतौ तौ ममोत्पलौ॥ २८<br>त्वयैव पीतौ तौ नूनमित्युक्ता रमणेन सा।<br>तथा विदित्वा मुग्धत्वाद् बभूव व्रीडिता भृशम्॥ २९<br>काचित् कान्तार्पितं सुभ्रूः कान्तपीतावशेषितम्।<br>सविशेषरसं पानं पपौ मन्मथवर्धनम्॥ ३०<br>आपानगोष्ठीषु तथा तासां स नरपुङ्गवः।<br>शुश्राव विविधं गीतं तन्त्रीस्वरविमिश्रितम्॥ ३१<br>प्रदोषसमये ताश्च देवदेवं जनार्दनम्।<br>राजन् सदोपनृत्यन्ति नानावाद्यपुरःसराः॥ ३२<br>याममात्रे गते रात्रौ विनिर्गत्य गुहामुखात्।<br>आवसन् संयुताः कान्तैः परर्द्धिरचितां गुहाम्॥ ३३<br>नानागन्धान्वितलतां नानागन्धसुगन्धिनीम्।<br>नानाविचित्रशयनां कुसुमोत्करमण्डिताम्॥ ३४<br>एवमप्सरसां पश्यन् क्रीडितानि स पर्वते।<br>तपस्तेपे महाराजन् केशवार्पितमानसः॥ ३५<br>तमूचुर्नृपतिं गत्वा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।<br>राजन् स्वर्गोपमं देशमिमं प्राप्तोऽस्यरिंदम॥ ३६<br>वयं हि ते प्रदास्यामो मनसः काङ्क्षितान् वरान्।<br>तानादाय गृहं गच्छ तिष्ठेह यदि वा पुनः॥ ३७ | राजन्! वे अप्सराएँ सदा प्रदोषकालमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दनके समक्ष नाना प्रकारके बाजोंके साथ नृत्य करती थीं। एक पहर रात बीत जानेपर वे गुफाके मुखद्वारसे बाहर निकलकर अपने पतियोंके साथ ऐसी सजी-सजायी गुफामें निवास करती थीं, जिसपर अनेकों प्रकारके गन्धोंवाली लताएँ फैली हुई थीं, जिसमेंसे विभिन्न प्रकारकी सुगन्ध निकल रही थी, जो पुष्पसमूहसे सुशोभित थी तथा जिसमें अनेकों विचित्र शय्याएँ बिछी थीं। महाराज! इस प्रकार उस पर्वतपर अप्सराओंकी क्रीडाका अवलोकन करते हुए राजा पुरूरवा भगवान् केशवमें मनको एकाग्र करके तपस्या करते रहे। एक दिन यूथ-के-यूथ गन्धर्व और अप्सराएँ राजाके निकट जाकर उनसे बोलीं—'शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! (बड़े सौभाग्यसे) आप इस स्वर्गतुल्य देशमें आ गये हैं, अतः हमलोग आपको मनोऽभिलषित वर प्रदान करेंगी। उन्हें ग्रहणकर यदि आपकी इच्छा हो तो घर चले जाइये अथवा यहीं रहिये'॥ २६—३७॥ |
| राजोवाच<br>अमोघदर्शनाः सर्वे भवन्तस्त्वमितौजसः।<br>वरं वितरताद्यैव प्रसादं मधुसूदनात्॥ ३८ | राजाने कहा— गन्धर्वो एवं अप्सराओ! आपलोग अमित तेजस्वी हैं, इससे आपलोगोंका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता, इसलिये आपलोग आज ही मुझे ऐसा वरदान दें, जिससे भगवान् मधुसूदनकी कृपा प्राप्त हो जाय। यह |
४०८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
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| एवमस्त्वित्यथोक्तस्तैः स तु राजा पुरूरवाः।<br>तत्रोवास सुखी मासं पूजयन्तो जनार्दनम्॥ ३९<br>प्रिय एव सदैवासीद् गन्धर्वाप्सरसां नृपः।<br>तुतोष स जनो राज्ञस्तस्यालौल्येन कर्मणा॥ ४०<br>मासस्य मध्ये स नृपः प्रविष्ट-<br> स्तदाश्रमं रत्नसहस्रचित्रम्।<br>तोयाशनस्तत्र ह्युवास मासं<br> यावत्सितान्तो नृप फाल्गुनस्य॥ ४१<br>फाल्गुनामलपक्षान्ते राजा स्वप्ने पुरूरवाः।<br>तस्यैव देवदेवस्य श्रुतवान् गदितं शुभम्॥ ४२<br>रात्र्यामस्यां व्यतीतायामत्रिणा त्वं समेष्यसि।<br>तेन राजन् समागम्य कृतकृत्यो भविष्यसि॥ ४३<br>स्वप्नमेवं स राजर्षिर्दृष्ट्वा देवेन्द्रविक्रमः।<br>प्रत्यूषकाले विधिवत् स्नातः स प्रयतेन्द्रियः॥ ४४<br>कृतकृत्यो यथाकामं पूजयित्वा जनार्दनम्।<br>ददर्शात्रिं मुनिं राजा प्रत्यक्षं तपसां निधिम्॥ ४५<br>स्वप्नं तु देवदेवस्य न्यवेदयत धार्मिकः।<br>ततः शुश्राव वचनं देवतानां समीरितम्॥ ४६<br>एवमेतन्महीपाल नात्र कार्या विचारणा।<br>एवं प्रसादं सम्प्राप्य देवदेवाज्जनार्दनात्॥ ४७<br>कृतदेवार्चनो राजा तथा हुतहुताशनः।<br>सर्वान् कामानवाप्तोऽसौ वरदानेन केशवात्॥ ४८ | सुनकर वे 'एवमस्तु—ऐसा ही होगा'—ऐसा कहकर वहाँसे चले गये। तत्पश्चात् राजा पुरूरवा वहाँ एक मासतक भगवान् जनार्दनकी पूजा करते हुए सुखपूर्वक निवास करते रहे। वे सदा गन्धर्वों एवं अप्सराओंके प्रेमपात्र बने रहे। वे लोग राजाके निर्लोभ कर्मसे परम संतुष्ट थे। राजन्! उस मासके बीचमें ही राजा पुरूरवाने हजारों रत्नोंसे चित्रित उस आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ वे एक मासतक केवल जल पीकर तबतक निवास करते रहे, जबतक फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथि नहीं आ गयी। राजा पुरूरवाने फल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिकी रातमें स्वप्नमें उन्हीं देवाधिदेव भगवान् विष्णुद्वारा कहे जाते हुए इस प्रकारके मङ्गलमय शब्दोंको सुना—'राजन्! इस रात्रिके व्यतीत हो जानेपर अत्रिसे तुम्हारी भेंट होगी और उनसे मिलकर तुम कृतकृत्य हो जाओगे। देवराजके समान पराक्रमी राजर्षि पुरूरवाको जब इस प्रकारका स्वप्न दीख पड़ा, तब उन्होंने प्रातःकाल उठकर इन्द्रियोंको संयत रखते हुए विधिपूर्वक स्नान किया और इच्छानुसार भगवान् जनार्दनकी पूजा की। तत्पश्चात् उन्हें तपोधन महर्षि अत्रिका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे वे कृतकृत्य हो गये। तब धर्मात्मा राजाने महर्षि अत्रिसे देवाधिदेव भगवान्द्वारा दिखाये गये स्वप्नके वृत्तान्तको कह सुनाया। उसी समय उन्होंने देवताओंद्धारा कहे हुए इस वचनको फिर सुना—'महीपाल! यह ऐसा ही होगा, इसमें तुम्हें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।' इस प्रकार देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी कृपा प्राप्तकर राजाने देवार्चन किया और अग्निमें आहुतियाँ डालीं। इस तरह भगवान् केशवके वरदानसे उनकी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं॥३८—४८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ऐलाश्रमवर्णनं नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें ऐलाश्रमवर्णन नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२०॥