भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५९२* मत्स्यपुराण *
ततः प्रतिहतः सोऽथ दैत्येन्द्रः प्रतिभानवान्।<br>वारुणास्त्रं मुमोचाथ शमनं पावकार्चिषाम्॥ १०२<br>ततो जलधरैर्व्योम स्फुरद्विद्युल्लताकुलैः।<br>गम्भीरमुरजध्वानैरापूरितमिवाम्बरम् ॥ १०३<br>करीन्द्रकरतुल्याभिर्जलधाराभिरम्बरात् ।<br>पतन्तीभिर्जगत् सर्वं क्षणेनापूरितं बभौ ॥ १०४<br>शान्तमाग्नेयमस्त्रं तत् प्रविलोक्य सुराधिपः।<br>वायव्यमस्त्रमकरोन्मेघसङ्घातनाशनम् ॥ १०५<br>वायव्यास्त्रबलेनाथ निर्धूते मेघमण्डले।<br>बभूव विमलं व्योम नीलोत्पलदलप्रभम् ॥ १०६<br>वायुना चातिघोरेण कम्पितास्ते तु दानवाः।<br>न शेकुस्तत्र ते स्थातुं रणेऽतिबलिनोऽपि ये ॥ १०७<br>तदा जम्भोऽभवच्छैलो दशयोजनविस्तृतः।<br>मारुतप्रतिघातार्थं दानवानां भयापहः॥ १०८<br>मुक्तनानायुधोदग्रतेजोऽभिज्वलितद्रुमः ।उस अस्त्रसे प्रतिहत हो जानेपर प्रतिभाशाली दैत्यराज जम्भने अग्निकी ज्वालाओंको शान्त करनेवाले वारुणास्त्रका प्रयोग किया। फिर तो आकाशमें चमकती हुई बिजलियोंसे व्याप्त बादल उमड़ आये। गम्भीर मृदंगकी-सी ध्वनि करनेवाले मेघोंकी गर्जनासे आकाश निनादित हो उठा। फिर क्षणमात्रमें ही आकाशसे गिरती हुई गजराजके शुण्डदण्डकी-सी मोटी जलधाराओंसे सारा जगत् आप्लावित हुआ दीख पड़ने लगा। तब देवराज इन्द्रने उस आग्नेयास्त्रको शान्त हुआ देखकर मेघसमूहको नष्ट करनेवाले वायव्यास्त्रका प्रयोग किया। उस वायव्यास्त्रके बलसे मेघमण्डलके छिन्न-भिन्न हो जानेपर आकाश नीलकमल-दलके सदृश निर्मल हो गया। पुनः अत्यन्त भीषण झंझावातके चलनेपर दानवगण कम्पित हो उठे, इस कारण उनमें जो महाबली थे, वे भी उस समय रणभूमिमें खड़ा रहनेके लिये समर्थ न हो सके। तब दानवोंके भयको दूर करनेवाले जम्भने उस वायुको रोकनेके लिये दस योजन विस्तारवाले पर्वतका रूप धारण कर लिया। उस पर्वतके वृक्ष छोड़े गये नाना प्रकारके अस्त्रोंके प्रचण्ड तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे॥ ९९—१०८ १/२ ॥
ततः प्रशमिते वायौ दैत्येन्द्रे पर्वताकृतौ ॥ १०९<br>महाशनीं वज्रमयीं मुमोचाशु शतक्रतुः।<br>तयाशन्या पतितया दैत्यस्याचलरूपिणः ॥ ११०<br>कन्दराणि व्यशीर्यन्त समन्तान्निर्झराणि तु।<br>ततः सा दानवेन्द्रस्य शैलमाया न्यवर्तत ॥ १११<br>निवृत्तशैलमायोऽथ दानवेन्द्रो मदोत्कटः।<br>बभूव कुञ्जरो भीमो महाशैलसमाकृतिः ॥ ११२<br>स ममर्द सुरानीकं दन्तैश्चाप्यहनत् सुरान्।<br>बभञ्ज पृष्ठतः कांश्चित् करेणावेष्ट्य दानवः ॥ ११३<br>ततः क्षपयतस्तस्य सुरसैन्यानि वृत्रहा।<br>अस्त्रं त्रैलोक्यदुर्धर्षं नारसिंहं मुमोच ह ॥ ११४<br>ततः सिंहसहस्राणि निश्चेरुर्मन्त्रतेजसा।<br>कृष्णदंष्ट्राट्टहासानि क्रकचाभनखानि च॥ ११५<br>तैर्विपाटितगात्रोऽसौ गजमायां व्यपोथयत्।<br>ततश्चाशीविषो घोरोऽभवत् फणशताकुलः॥ ११६<br>विषनिःश्वासनिर्र्दग्धं सुरसैन्यं महारथः।<br>ततोऽस्त्रं गारुडं चक्रे शक्रश्चारुभुजस्तदा ॥ ११७तदनन्तर वायुके शान्त हो जानेपर इन्द्रने तुरंत ही उस पर्वताकार दैत्येन्द्रपर एक वज्रमयी महान् अशनि फेंकी। उस अशनिके गिरनेसे पर्वतरूपी दैत्यकी कन्दराएँ और झरने सब ओरसे छिन्न-भिन्न हो गये। तत्पश्चात् दानवेन्द्रकी वह शैलमाया विलीन हो गयी। उस शैलमायाके निवृत्त हो जानेपर गर्वीला दानवराज जम्भ विशाल पर्वतकी-सी आकृतिवाले भयंकर गजराजके रूपमें प्रकट हुआ। फिर तो वह देव-सेनाका मर्दन करने लगा। उस दानवने कितने देवताओंको दाँतोंसे चूर्ण कर दिया और कितनोंको सूँडसे लपेटकर पृष्ठभागसे मरोड़ दिया। इस प्रकार उस दैत्यको देव-सेनाओंको नष्ट करते देखकर वृत्रासुरके हन्ता इन्द्रने त्रिलोकीके लिये दुर्धर्ष नारसिंहास्त्रका प्रयोग किया। उस मन्त्रके तेजसे हजारों ऐसे सिंह प्रकट हुए जो काले दाढ़ोंसे युक्त थे और जोर-जोरसे दहाड़ रहे थे तथा जिनके नख आरेके समान थे। उन सिंहोंद्वारा शरीरके फाड़ दिये जानेपर जम्भने अपनी गजमाया समेट ली और पुनः सैकड़ों फनोंसे युक्त भयंकर सर्पका रूप धारण कर लिया। तब उस महारथीने विषभरी निःश्वाससे देव-सैनिकोंको जलाना प्रारम्भ किया। यह देखकर सुन्दर भुजाओंवाले इन्द्रने उस समय गारुडास्त्रका प्रयोग किया।