मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १६ * | ६३ |
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| मसूरशणनिष्पावराजमाषकुसुम्भिकाः ।<br>पद्मबिल्वार्कधत्तूरपारिभद्रारटरूषकाः ॥ ३७<br><br>न देयाः पितृकार्येषु पयश्चाजाविकं तथा।<br>कोद्रवोदारचणकाः कपित्थं मधुकातसी ॥ ३८<br><br>एतान्यपि न देयानि पितृभ्यः प्रियमिच्छता।<br>पितॄन् प्रीणाति यो भक्त्या ते पुनः प्रीणयन्ति तम्॥ ३९<br><br>यच्छन्ति पितरः पुष्टिं स्वर्गारोग्यं प्रजाफलम्।<br>देवकार्यादपि पुनः पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ४०<br><br>देवतानां च पितरः पूर्वमाप्यायनं स्मृतम्।<br>शीघ्रप्रसादास्त्वक्रोधा निःशस्त्राः स्थिरसौहृदाः ॥ ४१<br><br>शान्तात्मानः शौचपराः सततं प्रियवादिनः।<br>भक्तानुरक्ताः सुखदाः पितरः पूर्वदेवताः ॥ ४२<br><br>हविष्मतामाधिपत्ये श्राद्धदेवः स्मृतो रविः।<br>एतद् वः सर्वमाख्यातं पितृवंशानुकीर्तनम्।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं कीर्तनीयं सदा नृभिः ॥ ४३ | मसूर, शण (पेटुआका बीज), सेम, काला उड़द, कुसुमका पुष्प, कमल, बेल या बिल्वपत्र, मदार, धतूरा, पारिभद्र (नीम, देवदारुका पुष्प या पत्ता), अडूसेका फूल तथा भेड़ और बकरीका दूध। इन्हें पितृ-कार्योंमें नहीं देना चाहिये। पितरोंसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छावाले पुरुषको श्राद्धकार्यमें कोदो, उदार (गुलूके वृक्षका पुष्प अथवा पत्ता), चना, कैथ, महुआ और अलसी (तीसी)—इन पदार्थोंका भी उपयोग नहीं करना चाहिये। जो भक्तिपूर्वक (श्राद्धादिद्वारा) पितरोंको प्रसन्न करता है, उसे पितर भी बदलेमें हर्षित कर देते हैं। वे पितृगण प्रसन्न होकर समृद्धि, स्वर्ग, आरोग्य और संतानरूपी फल प्रदान करते हैं। इसलिये देवकार्यसे भी बढ़कर पितृकार्यकी विशेषता मानी जाती है तथा देवताओंसे पूर्व ही पितरोंके तर्पणकी विधि बतलायी गयी है। ये पितर शीघ्र ही कृपा करनेवाले, क्रोधरहित, शस्त्रविहीन, दृढ़ मैत्रीयुक्त, शान्तात्मा पवित्रतापरायण, सदा प्रियवादी, भक्तोंके प्रति अनुरक्त और सुखदायक (गृहस्थोंके) प्रथम देवता हैं। हविष्यान्नका भक्षण करनेवाले इन पितरोंके अधिनायक-पदपर श्राद्धके देवतारूपमें सूर्य अधिष्ठित माने गये हैं। इस प्रकार यह पितृ-वंशका वर्णन मैंने तुम लोगोंको पूर्णरूपसे बतला दिया। यह पुण्य-प्रदाता, परम पवित्र और आयुकी वृद्धि करनेवाला है, मनुष्योंको सदा इसका पठन-पाठन करना चाहिये ॥ ३१—४३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृवंशानुकीर्तन नामक पंद्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
श्राद्धोंके विविध भेद, उनके करनेका समय तथा श्राद्धमें निमन्त्रित करनेयोग्य ब्राह्मणके लक्षण
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
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| श्रुत्वैतत् सर्वमखिलं मनुः पप्रच्छ केशवम्।<br>श्राद्धे कालं च विविधं श्राद्धभेदं तथैव च ॥ १<br><br>श्राद्धेषु भोजनीया ये ये च वर्ज्या द्विजातयः।<br>कस्मिन् वासरभागे वा पितृभ्यः श्राद्धमाचरेत् ॥ २ | ऋषियो! यह सारा वृत्तान्त पूर्णरूपसे सुनकर मनुने मत्स्यभगवान्से पूछा—'मधुसूदन! श्राद्धके लिये कौन-सा काल उत्तम है? श्राद्धके विभिन्न भेद कौन-से हैं? श्राद्धोंमें कैसे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये? तथा कैसे ब्राह्मण वर्जित हैं? दिनके किस भागमें पितरोंके लिये श्राद्ध करना उचित है? |