भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 804
७९४* मत्स्यपुराण *

| सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।<br>संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च॥ २०<br>नमः पुण्यजले ह्लाद्ये नमः सागरगामिनि।<br>नमस्ते पावनिर्दाहे नमो देवि वरानने॥ २१<br>नमोऽस्तु ते ऋषिगणसिद्धसेविते<br>नमोऽस्तु ते शंकरदेहनिःसृते।<br>नमोऽस्तु ते धर्मभृतां वरप्रदे<br>नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने॥ २२<br>यस्त्विदं पठते स्तोत्रं नित्यं श्रद्धासमन्वितः।<br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ २३<br>वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रश्चैव शुभां गतिम्।<br>अर्थार्थी लभते ह्यर्थं स्मरणादेव नित्यशः॥ २४<br>नर्मदां सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः।<br>तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥ २५ | यह सभी पापोंका क्षय करनेवाली और सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है। देव, गन्धर्व और अप्सराओंने इसकी भलीभाँति स्तुति की है। आदि गङ्गे! तुम्हें नमस्कार है। पुण्यसलिले! तुम्हें प्रणाम है। सागरकी ओर गमनशीले! तुम्हें अभिवादन है। पापोंको नष्ट करनेवाली एवं सुन्दर मुखवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम ऋषिसमूह एवं सिद्धोंसे सेवित हो, तुम्हें प्रणाम है। शंकरके शरीरसे निकली हुई तुम्हें अभिवादन है। तुम धर्मात्मा प्राणियोंको वर देनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है। सभीको पवित्र एवं निष्पाप करनेवाली तुम्हें प्रणाम है। जो श्रद्धासे समन्वित होकर इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह ब्राह्मण हो तो वेदज्ञ और क्षत्रिय हो तो विजयी होता है। वैश्य धनका लाभ करता है और शूद्रको शुभ गतिकी प्राप्ति होती है। अर्थको चाहनेवाला सदा स्मरणमात्रसे ही अर्थ-लाभ करता है। साक्षात् महेश्वरदेव नर्मदा नदीका नित्य सेवन करते हैं, इसीलिये इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्यारूपी पापका निवारण करनेवाली जानना चाहिये॥ १७-२५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९०॥


एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय

नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य

| मार्कण्डेय उवाच<br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्या ऋषयश्च तपोधनाः।<br>सेवन्ते नर्मदां राजन् रागक्रोधविवर्जिताः॥ १<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>कस्मिन् निपतितं शूलं देवस्य तु महीतले।<br>तत्र पुण्यं समाख्याहि यथावन्मुनिसत्तम॥ २<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br>शूलभेदमिति ख्यातं तीर्थं पुण्यतमं महत्।<br>तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br><br>त्रिरात्रं कारयेद् यस्तु तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>अर्चयित्वा महादेवं पुनर्जन्म न विद्यते॥ ४ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तभीसे ब्रह्मा आदि देवता और तपस्वी ऋषिगण क्रोध-रागसे रहित होकर नर्मदाका सेवन करते हैं॥ १॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा— मुनिश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर महादेवजीका त्रिशूल किस स्थानपर गिरा था? उस स्थानका पुण्य यथार्थरूपसे बतलाइये॥ २॥<br><br>मार्कण्डेयजी बोले— वह महान् पुण्यमय तीर्थ शूलभेद नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे, उससे एक हजार गो-दानका फल प्राप्त होता है। नराधिप! जो मनुष्य उस तीर्थस्थानमें तीन राततक महादेवजीकी पूजा करके निवास करता है, उसका पुनर्जन्म |