भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
७९४* मत्स्यपुराण *

| सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।<br>संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च॥ २०<br>नमः पुण्यजले ह्लाद्ये नमः सागरगामिनि।<br>नमस्ते पावनिर्दाहे नमो देवि वरानने॥ २१<br>नमोऽस्तु ते ऋषिगणसिद्धसेविते<br>नमोऽस्तु ते शंकरदेहनिःसृते।<br>नमोऽस्तु ते धर्मभृतां वरप्रदे<br>नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने॥ २२<br>यस्त्विदं पठते स्तोत्रं नित्यं श्रद्धासमन्वितः।<br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ २३<br>वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रश्चैव शुभां गतिम्।<br>अर्थार्थी लभते ह्यर्थं स्मरणादेव नित्यशः॥ २४<br>नर्मदां सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः।<br>तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥ २५ | यह सभी पापोंका क्षय करनेवाली और सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है। देव, गन्धर्व और अप्सराओंने इसकी भलीभाँति स्तुति की है। आदि गङ्गे! तुम्हें नमस्कार है। पुण्यसलिले! तुम्हें प्रणाम है। सागरकी ओर गमनशीले! तुम्हें अभिवादन है। पापोंको नष्ट करनेवाली एवं सुन्दर मुखवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम ऋषिसमूह एवं सिद्धोंसे सेवित हो, तुम्हें प्रणाम है। शंकरके शरीरसे निकली हुई तुम्हें अभिवादन है। तुम धर्मात्मा प्राणियोंको वर देनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है। सभीको पवित्र एवं निष्पाप करनेवाली तुम्हें प्रणाम है। जो श्रद्धासे समन्वित होकर इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह ब्राह्मण हो तो वेदज्ञ और क्षत्रिय हो तो विजयी होता है। वैश्य धनका लाभ करता है और शूद्रको शुभ गतिकी प्राप्ति होती है। अर्थको चाहनेवाला सदा स्मरणमात्रसे ही अर्थ-लाभ करता है। साक्षात् महेश्वरदेव नर्मदा नदीका नित्य सेवन करते हैं, इसीलिये इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्यारूपी पापका निवारण करनेवाली जानना चाहिये॥ १७-२५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९०॥


एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय

नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य

| मार्कण्डेय उवाच<br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्या ऋषयश्च तपोधनाः।<br>सेवन्ते नर्मदां राजन् रागक्रोधविवर्जिताः॥ १<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>कस्मिन् निपतितं शूलं देवस्य तु महीतले।<br>तत्र पुण्यं समाख्याहि यथावन्मुनिसत्तम॥ २<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br>शूलभेदमिति ख्यातं तीर्थं पुण्यतमं महत्।<br>तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br><br>त्रिरात्रं कारयेद् यस्तु तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>अर्चयित्वा महादेवं पुनर्जन्म न विद्यते॥ ४ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तभीसे ब्रह्मा आदि देवता और तपस्वी ऋषिगण क्रोध-रागसे रहित होकर नर्मदाका सेवन करते हैं॥ १॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा— मुनिश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर महादेवजीका त्रिशूल किस स्थानपर गिरा था? उस स्थानका पुण्य यथार्थरूपसे बतलाइये॥ २॥<br><br>मार्कण्डेयजी बोले— वह महान् पुण्यमय तीर्थ शूलभेद नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे, उससे एक हजार गो-दानका फल प्राप्त होता है। नराधिप! जो मनुष्य उस तीर्थस्थानमें तीन राततक महादेवजीकी पूजा करके निवास करता है, उसका पुनर्जन्म |

१९२- शुक्लतीर्थका माहात्म्य

* अध्याय १९१ *७९५

| भीमेश्वरं ततो गच्छेन्नारदेश्वरमुत्तमम्।<br>आदित्येशं महापुण्यं स्मृतं किल्बिषनाशनम्॥ ५<br>नन्दिकेशं परिष्वज्य पर्याप्तं जन्मनः फलम्।<br>वरुणेशं ततः पश्येत् स्वतन्त्रेश्वरमेव च।<br>सर्वतीर्थफलं तस्य पञ्चायतनदर्शनात्॥ ६<br>ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र युद्धं यत्र सुसाधितम्।<br>कोटितीर्थं तु विख्यातमसुरा यत्र मोहिताः॥ ७<br>यत्रैव निहता राजन् दानवा बलदर्पिताः।<br>तेषां शिरांस्यगृह्णन्त सर्वे देवाः समागताः॥ ८<br>तस्तु संस्थापितो देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः।<br>कोटिर्विनिहता तत्र तेन कोटीश्वरः स्मृतः॥ ९<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य सदेहः स्वर्गमारुहेत्।<br>यदा त्विन्द्रेण क्षुद्रत्वाद् वज्रं कीलेन यन्त्रितम्॥ १०<br>तदाप्रभृति लोकानां स्वर्गमार्गो निवारितः।<br>यः स्तुतं श्रीफलं दद्यात् कृत्वा चान्ते प्रदक्षिणाम्॥ ११<br>पार्वतं सहदीपं तु शिरसा चैव धारयेत्।<br>सर्वकामसुसम्पन्नो राजा भवति पाण्डव॥ १२<br>मृतो रुद्रत्वमाप्नोति ततोऽसौ जायते पुनः।<br>स्वर्गादेत्य भवेद् राजा राज्यं कृत्वा दिवं व्रजेत्॥ १३<br>बहुनेत्रं ततः पश्येत् त्रयोदश्यां तु मानवः।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ १४<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम्।<br>नराणां पापनाशाय ह्यगस्त्येश्वरमुत्तमम्॥ १५<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते।<br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी॥ १६<br>घृतेन स्नापयेद् देवं समाधिस्थो जितेन्द्रियः।<br>एकविंशकुलोपेतो न च्यवेद्वैश्रवात् पदात्॥ १७<br>धेनुमुपानहौ छत्रं दद्याच्च घृतकम्बलम्।<br>भोजनं चैव विप्राणां सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ १८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र बलाकेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सिंहासनपतिर्भवेत्॥ १९ | नहीं होता। इसके बाद श्रेष्ठ भीमेश्वर और नारदेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। आदित्येश तीर्थ महान् पुण्यशाली और पापका नाशक कहा गया है। नन्दिकेशका दर्शन करनेसे जन्म धारण करनेका पर्याप्त फल सुलभ हो जाता है। इसके बाद वरुणेश एवं स्वतन्त्रेश्वरका दर्शन करे। इस पञ्चायतनका दर्शन करनेसे सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। राजेन्द्र! इसके बाद कोटितीर्थ नामसे प्रसिद्ध स्थानमें जाना चाहिये। जहाँ युद्ध हुआ था और जहाँ असुरगण मोहित हुए थे, राजन्! जहाँ बलके घमंडमें चूर दानवगण मारे गये थे और आये हुए देवगणोंने उनके सिरोंको ग्रहण कर लिया था, जहाँ देवताओंद्वारा हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए भगवान् वृषध्वज महादेवकी प्रतिष्ठा की गयी थी, वहाँ करोड़ों दानवोंका संहार हुआ था, अतः वह कोटीश्वर तीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस तीर्थका दर्शन करनेसे सशरीर स्वर्गारोहण प्राप्त होता है। जबसे इन्द्रने कृपणताके कारण वज्रको कीलसे कीलित कर दिया तबसे साधारण लोगोंके लिये स्वर्गका मार्ग बंद हो गया॥३-१० १/२॥<br><br>पाण्डुनन्दन! जो स्तुति करनेके पश्चात् अन्तमें इस तीर्थकी प्रदक्षिणा कर बिल्वफल प्रदान करता है तथा दीपकसहित पर्वतप्रतिमा सिरपर धारण करता है, वह सभी कामनाओंसे सम्पन्न होकर राजा होता है और मृत्यु होनेपर रुद्रत्वको प्राप्त करता है। पुनः जब वह स्वर्गसे लौटकर जन्म लेता है, तब राजा होता है और राज्यका उपभोग करनेके बाद स्वर्गमें चला जाता है। इसके बाद त्रयोदशी तिथिको मानव बहुनेत्र तीर्थका दर्शन करे। वहाँ मनुष्य स्नानमात्र करनेसे सभी यज्ञोंके फलको प्राप्त कर लेता है। राजेन्द्र! तदनन्तर मनुष्योंके पापोंका नाश करनेके लिये विख्यात अगस्त्येश्वर नामक श्रेष्ठ एवं परम रमणीय तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो जितेन्द्रिय मानव समाहितचित्तसे कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें महादेवजीको घृतसे स्नान कराता है, उसका इक्कीस पीढ़ीत्तक महेश्वरके पदसे पतन नहीं होता। वहाँ यदि विप्रोंको धेनु, जूता, छाता, घी, कम्बल और भोजनका दान दिया जाय तो वह सभी करोड़गुना हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम बलाकेश्वरतीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव सिंहासनका |

७९६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्।<br>उपोष्य रजनीमेकां स्नानं तत्र समाचरेत्॥ २०<br>स्नानं कृत्वा यथान्यायमर्चयेच्च जनार्दनम्।<br>गोसहस्रफलं तस्य विष्णुलोकं स गच्छति॥ २१अधिपति होता है। नर्मदाके दक्षिण तटपर इन्द्रका प्रसिद्ध तीर्थ है, वहाँ एक रातका उपवास कर विधिविधानसे स्नान करे, स्नान करनेके बाद विधिपूर्वक जनार्दनकी अर्चना करे तो उसे एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है और वह विष्णुलोकमें जाता है॥ १९—२१॥
ऋषितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं नृणाम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोकं च गच्छति॥ २२<br>नारदस्य तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत्॥ २३<br>देवतीर्थं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते॥ २४<br>अमरकण्टकं गच्छेदमरैः स्थापितं पुरा।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते॥ २५<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र रावणेश्वरमुत्तमम्।<br>नित्यं चायतनं दृष्ट्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ २६<br>ऋणतीर्थं ततो गच्छेद् ऋणोभ्यो मुच्यते ध्रुवम्।<br>वटेश्वरं ततो दृष्ट्वा पर्याप्तं जन्मनः फलम्॥ २७<br>भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम्।<br>स्नातमात्रो नरो राजन् सर्वदुःखैः प्रमुच्यते॥ २८<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तुरासङ्गममुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयन् सिद्धिमवाप्नुयात्॥ २९<br>सोमतीर्थं ततो गच्छेत् पश्येच्चन्द्रमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् भक्त्या परमया युतः॥ ३०<br>तत्क्षणाद् दिव्यदेहस्थः शिववन्मोदते चिरम्।<br>षष्टिवर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ ३१तत्पश्चात् मनुष्योंके सभी पापोंके नाशक ऋषितीर्थकी यात्रा करे, वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव शिवलोकको चला जाता है। वहीं नारदजीका परम रमणीय तीर्थ है, वहाँ स्नानमात्रसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। राजन्! इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित देवतीर्थमें जाय, वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर प्राचीनकालमें देवोंद्वारा स्थापित अमरकण्टककी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ रावणेश्वर-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ मनुष्य प्रतिदिन देवमन्दिरका दर्शनकर ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। तदुपरान्त ऋणतीर्थमें जाय, वहाँ जानेसे मानव निश्चय ही ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद वटेश्वरका दर्शन करके मनुष्यजन्मका पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है। राजन्! तदनन्तर सभी व्याधियोंको नाश करनेवाले भीमेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। उस तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सभी दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठतम तुरासङ्ग तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है। इसके बाद सोमतीर्थमें जाय और वहाँ परम श्रेष्ठ चन्द्रमाका दर्शन करे। राजन्! उस तीर्थमें परम भक्तिसे युक्त हो स्नान करनेसे मानव उसी क्षण दिव्य शरीर धारणकर शिवके समान चिरकालपर्यन्त आनन्दका अनुभव करता है और साठ हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ २२—३१॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात्॥ ३२<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र कपिलां यः प्रयच्छति।<br>यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च॥ ३३<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते।<br>यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप॥ ३४राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ पिङ्गलेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे त्रिरात्रका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला गौका दान देता है, उस दाताके वंशके कुलवाले उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होते हैं। नराधिप! उस तीर्थमें जो मानव प्राणका

* अध्याय १९१ * । ७९७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ।<br>नर्मदातटमाश्रित्य तिष्ठेयुर्ये नरोत्तमाः ॥ ३५<br>ते मृताः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा।<br>सुरेश्वरं ततो गच्छेन्नाम्ना कर्कोटकेश्वरम् ॥ ३६<br>गङ्गावतरते तत्र दिने पुण्ये न संशयः।<br>नन्दितीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ ३७<br>तुष्यते तस्य नन्दीशः सोमलोके महीयते।<br>ततो दीपेश्वरं गच्छेद्व्यासतीर्थं तपोवनम् ॥ ३८<br>निवर्तिता पुरा तत्र व्यासभीता महानदी।<br>हुंकारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता ॥ ३९<br>प्रदक्षिणां तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ ४०<br>व्यासस्तस्य भवेत् प्रीतः प्राप्नुयादीप्सितं फलम्।<br>सूत्रेण वेष्टयित्वा तु दीपो देयः सवेदिकः ॥ ४१<br>क्रीडते ह्यक्षयं कालं यथा रुद्रस्तथैव च।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऐरण्डीतीर्थमुत्तमम् ॥ ४२<br>संगमे तु नरः स्नात्वा मुच्यते सर्वपातकैः।<br>ऐरण्डी त्रिषु लोकेषु विख्याता पापनाशिनी ॥ ४३<br>अथवाश्वयुजे मासि शुक्लपक्षे तु चाष्टमी।<br>शुचिर्भूत्वा नरः स्नात्वा सोपवासपरायणः ॥ ४४<br>ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिता।<br>ऐरण्डीसंगमे स्नात्वा भक्तिभावानुरञ्जितः।<br>मृत्तिकां शिरसि स्थाप्य ह्यवगाह्य च वै जलम् ॥ ४५<br>नर्मदोदकसम्मिश्रं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप ॥ ४६<br>प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा।<br>ततः सुवर्णसलिले स्नात्वा दत्त्वा तु काञ्चनम् ॥ ४७<br>काञ्चनेन विमानेन रुद्रलोके महीयते।<br>ततः स्वर्गाच्च्युतः कालाद् राजा भवति वीर्यवान् ॥ ४८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र हीक्षुनद्यास्तु संगमम्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं दिव्यं तत्र संनिहितः शिवः ॥ ४९परित्याग करता है, वह चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्दका अनुभव करता है। जो श्रेष्ठ मानव नर्मदाके तटपर निवास करते हैं, वे मरकर सन्त और पुण्यवान् व्यक्तियोंके समान स्वर्गमें जाते हैं। तदनन्तर कर्कोटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध सुरेश्वरकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ पुण्यतिथिको गङ्गाका अवतरण होता है, इसमें संदेह नहीं है। तत्पश्चात् नन्दितीर्थमें जाय और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करे। इससे उसपर नन्दीश्वर शिव प्रसन्न होते हैं और वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है। तत्पश्चात् व्यासके तपोवन दीपेश्वर-तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ प्राचीनकालमें व्याससे डरकर महानदी पीछेकी ओर लौटने लगी थी, तब व्यासके हुंकारसे वह दक्षिणकी ओर प्रवाहित हुई, नराधिप! उस तीर्थकी जो प्रदक्षिणा करता है, वह चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। उसपर व्यासदेव प्रसन्न होते हैं और उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। वहाँ वेदीपर सूतसे परिवेष्टित दीपका दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मानव रुद्रकी तरह अक्षय कालतक आनन्दपूर्वक जीवनयापन करता है॥ ३२—४१ ½॥<br><br>राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ ऐरण्डी-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। ऐरण्डी नदी पापनाशकके रूपमें तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसके सङ्गममें स्नान करनेसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अथवा यदि मनुष्य आश्विन-मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिको स्नान करके पवित्र हो उपवासपूर्वक एक ब्राह्मणको भोजन करा दे तो उसे एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त होता है। जो ऐरण्डी-संगममें भक्तिभावपूर्वक उसकी मिट्टीको सिरपर धारणकर नर्मदाके जलसे मिश्रित जलमें अवगाहनकर स्नान करता है, वह सभी पापोंसे छूट जाता है। नराधिप! जो उस तीर्थमें जाकर प्रदक्षिणा करता है, उसने मानो सात द्वीपोंवाली वसुन्धराकी परिक्रमा कर ली। तदनन्तर सुवर्णसलिल नामक तीर्थमें स्नानकर सुवर्णका दान करनेसे मनुष्य सुवर्णमय विमानसे जाकर रुद्रलोकमें पूजित होता है। फिर वह समयानुसार स्वर्गसे च्युत होनेपर पराक्रमी राजा होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् इक्षु नदीके सङ्गमपर जाना चाहिये। यह दिव्य तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ शिवजी सदा उपस्थित

१९३- नर्मदा-माहात्म्य-प्रसङ्गमें कपिलादि विविध तीर्थोंका माहात्म्य, भृगुतीर्थका माहात्म्य, भृगुमुनिकी तपस्या, शिव-पार्वतीका उनके समक्ष प्रकट होना, भृगुद्वारा उनकी स्तुति और शिवजीद्वारा भृगुको वर प्रदान

७९८ * मत्स्यपुराण *

तत्र स्नात्वा नरो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात्।<br>स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५०<br>आजन्म जनितं पापं स्नानमात्राद् व्यपोहति।<br>लिङ्गसारं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ५१<br>गोसहस्रफलं तस्य रुद्रलोके महीयते।<br>भङ्कतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५२<br>तत्र गत्वा तु राजेन्द्र स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>सप्तजन्मकृतैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः॥ ५३रहते हैं। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव गणाधिपतिका स्थान प्राप्त कर लेता है। तदुपरान्त स्कन्द-तीर्थकी यात्रा करे। यह तीर्थ सभी पापोंका विनाशक है। यहाँ स्नान करनेमात्रसे मानव जन्मभरके किये हुए पापोंसे छूट जाता है। इसके बाद लिङ्गसार-तीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। इससे उसे एक हजार गौओंके दानका फल मिलता है और वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर सभी पापोंके विनाशक भङ्कतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ जाकर स्नान करनेसे मानव सात जन्मोंमें किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ४२-५३॥
वटेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वतीर्थमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५४<br>संगमेशं ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>स्नानमात्रान्नरस्तत्र चेन्द्रत्वं लभते ध्रुवम्॥ ५५<br>कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं परम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राज्यं लभते नात्र संशयः॥ ५६<br>तत्र तीर्थं समासाद्य दत्त्वा दानं तु यो नरः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ ५७<br>अथ नारी भवेत् काचित्तत्र स्नानं समाचरेत्।<br>गौरीतुल्या भवेत् सापि त्विन्द्रपत्नी न संशयः॥ ५८<br>अङ्गारेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते॥ ५९<br>अङ्गारकचतुर्थ्यां तु स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>अक्षयं मोदते कालं शुचिः प्रयतमानसः॥ ६०<br>अयोनिसम्भवे स्नात्वा न पश्येद् योनिसंकटम्।<br>पाण्डवेशं तु तत्रैव स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ६१<br>अक्षयं मोदते कालमवध्यस्त्रिदशैरपि।<br>विष्णुलोकं ततो गत्वा क्रीडते भोगसंयुतः॥ ६२<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् मर्त्यराजोऽभिजायते।<br>कठेश्वरं ततो गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्॥ ६३<br>उत्तरायणसम्प्राप्तौ यदिच्छेत् तस्य तद्भवेत्।तदनन्तर सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ वटेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। तत्पश्चात् सभी देवोंद्वारा नमस्कृत सङ्गमेश-तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान-मात्रसे मनुष्य निश्चित ही इन्द्र-पदको प्राप्त करता है। इसके बाद सभी पापोंको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठ कोटितीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर मनुष्य राज्यकी प्राप्ति करता है—इसमें संदेह नहीं है। उस तीर्थमें आकर जो मनुष्य दान देता है, उसका सब कुछ उस तीर्थके प्रभावसे करोड़गुना हो जाता है। यदि वहाँ कोई स्त्री स्नान करती है तो वह निःसंदेह गौरी अथवा इन्द्र-पत्नी शचीके समान हो जाती है। इसके बाद अङ्गारेश-तीर्थकी यात्रा करके वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो मनुष्य पवित्र एवं संयत-मन होकर अङ्गारक-चतुर्थीके दिन वहाँ स्नान करता है, वह अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। अयोनिसम्भव नामक तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको योनिसंकटका दर्शन नहीं होता। वहीं पाण्डवेश-तीर्थ है, उसमें स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह देवताओंसे भी अवध्य होकर अक्षय कालतक आनन्दका अनुभव करता है और मरणोपरान्त विष्णुलोकमें जाकर भोगसे परिपूर्ण हो क्रीड़ा करता है तथा वहाँ उत्तम भोगोंका भोग कर मृत्युलोकमें राजा होता है। इसके बाद उत्तरायण आनेपर कठेश्वर-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मानव जो इच्छा करता है, वह उसे प्राप्त हो जाता है॥ ५४-६३ ½॥
चन्द्रभागां ततो गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्॥ ६४राजन्! इसके बाद चन्द्रभागा नदीपर जाकर वहाँ
* अध्याय १९१ *७९९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्नातमात्रो नरो राजन् सोमलोके महीयते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्॥ ६५<br>पूजितं देवराजेन देवैरपि नमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दानं दत्त्वा तु काञ्चनम्॥ ६६<br>अथवा नीलवर्णाभं वृषभं यः समुत्सृजेत्।<br>वृषभस्य तु रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च॥ ६७<br>तावद्वर्षसहस्राणि नरो हरपुरे वसेत्।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति वीर्यवान्॥ ६८<br>अश्वानां श्वेतवर्णानां सहस्त्राणां नराधिप।<br>स्वामी भवति मर्त्येषु तस्य तीर्थप्रभावतः॥ ६९<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजंस्तर्पयेत् पितृदेवताः॥ ७०<br>उपोष्‍य रजनीमेकां पिण्डं दत्त्वा यथाविधि।<br>कन्यागते तथाऽऽदित्ये अक्षयं स्यान्नराधिप॥ ७१<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् कपिलां यः प्रयच्छति॥ ७२<br>सम्पूर्णपृथिवीं दत्त्वा यत्फलं तदवाप्नुयात्।<br>नर्मदेशं परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति॥ ७३<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत्।<br>नर्मदादक्षिणे कूले संगमेश्वरमुत्तमम्॥ ७४<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वयज्ञफलं लभेत्।<br>तत्र सर्वोद्यतो राजा पृथिव्यामेव जायते॥ ७५<br>सर्वलक्षणसम्पूर्णः सर्वव्याधिविवर्जितः।<br>नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम्॥ ७६<br>आदित्यायतनं दिव्यमीश्वरेण तु भाषितम्।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र दानं दत्त्वा तु शक्तितः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण दत्तं भवति चाक्षयम्॥ ७७<br>दरिद्रा व्याधिनो ये तु ये तु दुष्कृतकर्मिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं तु यान्ति ते॥ ७८<br>माघमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षस्य सप्तमी।<br>वसेदायतने तत्र निराहारो जितेन्द्रियः॥ ७९स्नान करे। वहाँ स्नानमात्रसे मनुष्य चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। राजेन्द्र! इसके बाद इन्द्रके प्रसिद्ध तीर्थमें जाय। वह तीर्थ साक्षात् देवराजद्वारा पूजित तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा वन्दित है। राजन्! वहाँ स्नानकर जो मनुष्य सुवर्णका दान देता है अथवा नीलवर्णवाले वृषभका उत्सर्ग करता है तो वह वृषभके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक अपने कुलमें उत्पन्न संततिके साथ शिवपुरमें निवास करता है। इसके बाद स्वर्गसे गिरनेपर वह पराक्रमी राजा होता है। नराधिप! उस तीर्थके प्रभावसे मृत्युलोकमें आकर वह श्वेतवर्णवाले हजारों अश्वोंका स्वामी होता है। राजन्! तदनन्तर ब्रह्मावर्त नामक श्रेष्ठ तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर देवताओं और पितरोंका विधिवत् तर्पण करना चाहिये। नरेश्वर! सूर्यके कन्याराशिमें स्थित होनेपर जो वहाँ एक रात उपवास करके विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसका वह कर्म अक्षय हो जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ कपिलातीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर जो मनुष्य कपिला गौका दान करता है, उसे सम्पूर्ण पृथ्वीका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह मिल जाता है। नर्मदेश उत्तम तीर्थस्थान है। इसके समान तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर मानव अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके दक्षिण तटपर श्रेष्ठ सङ्गमेश्वर-तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नान करनेपर मनुष्य सभी यज्ञोंके फलको प्राप्त करता है और वह पृथ्वीपर सभी प्रकारके उद्यमोंसे सम्पन्न, सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा सभी प्रकारकी व्याधियोंसे रहित राजा होता है॥ ६४—७५ १/२॥<br><br>नर्मदाके उत्तर तटपर अत्यन्त मनोहर आदित्यायतन नामक दिव्य तीर्थ है, ऐसा महादेवजीने कहा है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नान करके जो यथाशक्ति दान देता है, उसका वह दान उस तीर्थके प्रभावसे अक्षय हो जाता है। जो दरिद्र, रोगग्रस्त और दुष्कर्मी हैं, वे भी (यहाँ स्नान करनेसे) सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको चले जाते हैं। जो मनुष्य माघमासके शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथि आनेपर इन्द्रियोंका संयम कर और निराहार रहकर इस आदित्यायतन तीर्थमें निवास करता है, वह
८००* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न जराव्यथितो मूको न चान्धो बधिरोऽथवा।<br>सुभगो रूपसम्पन्नः स्त्रीणां भवति वल्लभः॥ ८०<br>एवं तीर्थं महापुण्यं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>ये न जानन्ति राजेन्द्र वञ्चितास्ते न संशयः॥ ८१<br>गर्गेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात्॥ ८२<br>मोदते स्वर्गलोकस्थो यावदिन्द्राश्चतुर्दश।<br>समीपतः स्थितं तस्य नागेश्वरतपोवनम्॥ ८३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नागलोकमवाप्नुयात्।<br>बह्वीभिर्नागकन्याभिः क्रीडते कालमक्षयम्॥ ८४<br>कुबेरभवनं गच्छेत् कुबेरो यत्र संस्थितः।<br>कालेश्वरं परं तीर्थं कुबेरो यत्र तोषितः॥ ८५<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वसम्पदमाप्नुयात्।न तो वृद्धावस्था और रोगसे ही ग्रस्त होता है, न गूँगा, अंधा अथवा बहरा ही होता है, अपितु भाग्यशाली, रूपवान् और स्त्रियोंका प्रिय होता है। राजेन्द्र! इस प्रकार मार्कण्डेयजीने इस महान् पुण्यदायक तीर्थका वर्णन किया था। जो उस तीर्थको नहीं जानते, वे निःसंदेह वञ्चित ही हैं। इसके बाद गर्गेश्वर-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे ही मानव स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है और चौदह इन्द्रोंके कार्यकालतक वह स्वर्गमें आनन्दपूर्वक निवास करता है। राजेन्द्र! उसीके समीपमें नागेश्वर नामक तपोवन है। वहाँ स्नानकर मनुष्य नागलोकको प्राप्त करता है और अनेकों नागकन्याओंके साथ अक्षय कालतक क्रीडा करता है। तदनन्तर कुबेरभवनमें जाय, जहाँ कुबेर विराजमान रहते हैं। जहाँ कुबेर सन्तुष्ट हुए थे। वह कालेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है। राजेन्द्र! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको सभी सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं॥ ७६-८५ १/२॥
ततः पश्चिमतो गच्छेन्मारुतालयमुत्तमम्॥ ८६<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र शुचिर्भूत्वा समाहितः।<br>काञ्चनं तु ततो दद्याद् यथाशक्ति सुबुद्धिमान्॥ ८७<br>पुष्पकेण विमानेन वायुलोकं स गच्छति।तत्पश्चात् उससे पश्चिममें स्थित श्रेष्ठ मारुतालय-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजेन्द्र! जो बुद्धिमान् वहाँ स्नान करके पवित्र हो सावधानीपूर्वक यथाशक्ति सुवर्णका दान करता है, वह पुष्पकविमानद्वारा वायुलोकको चला जाता है।
यवतीर्थं ततो गच्छेन्माघमासे युधिष्ठिर॥ ८८<br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>नक्तं भोज्यं ततः कुर्यान्न पश्येद् योनिसंकटम्॥ ८९युधिष्ठिर! तदुपरान्त माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको यवतीर्थमें जाकर स्नान करे और रातमें ही भोजन करे। ऐसा करनेवाले पुरुषको पुनः योनिसंकटका दर्शन नहीं करना पड़ता।
अहल्यातीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र ह्यप्सरोभिः प्रमोबते/प्रमोदते॥ ९०<br>अहल्या च तपस्तप्त्वा तत्र मुक्तिमुपागता।इसके बाद अहल्यातीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव अप्सराओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। उस तीर्थमें अहल्याने तपस्या कर मुक्ति पायी थी।
चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे चतुर्दशी॥ ९१<br>कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत्।<br>यत्र यत्र नरोत्पन्नो नरस्तत्र प्रियो भवेत्॥ ९२<br>स्त्रीवल्लभो भवेच्छ्रीमान् कामदेव इवापरः।चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथि एवं सोमवारको जो मनुष्य वहाँ अहल्याकी पूजा करता है, वह जहाँ-जहाँ जन्म लेता है, वहाँ-वहाँ सभीका प्रिय होता है। वह दूसरे कामदेवके समान स्त्रियोंका प्रियपात्र एवं श्रीसम्पन्न होता है।
अयोध्यां तु समासाद्य तीर्थं रामस्य विश्रुतम्॥ ९३<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते।श्रीरामके प्रसिद्ध तीर्थ अयोध्यामें आकर स्नानमात्र करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
सोमतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ९४<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>सोमग्रहे तु राजेन्द्र पापक्षयकरं नृणाम्॥ ९५इसके बाद सोमतीर्थकी यात्रा करे और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! चन्द्रग्रहणके अवसरपर स्नान करनेसे यही तीर्थ मनुष्यके सभी पापोंको नष्ट कर देता है। राजन्!
* अध्याय १९१ *८०१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थं महाफलम्।<br>यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ ९६<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति।<br>अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवापि ह्यनाशके॥ ९७<br>सोमतीर्थे मृतो यस्तु नासौ मर्त्येऽभिजायते।महान् फल देनेवाला यह सोमतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। नराधिप! उस तीर्थमें जो चान्द्रायण-व्रत करता है, वह सभी पापोंसे विशुद्ध होकर सोमलोकको चला जाता है। जो अग्निमें प्रवेश कर, जलमें डूबकर या भोजनका परित्याग कर इस सोमतीर्थमें प्राणका त्याग करता है, वह पुनः मृत्युलोकमें जन्म नहीं ग्रहण करता॥ ९६–९७ १/२॥
शुभतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ९८<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोलोके तु महीयते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम्॥ ९९<br>योधनीपुरमाख्यातं विष्णुस्थानमनुत्तमम्।<br>असुरा योधितास्तत्र वासुदेवेन कोटिशः॥ १००<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं विष्णुः प्रीतो भवेदिह।<br>अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०१<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तापसेश्वरमुत्तमम्।<br>हरिणी व्याधसंत्रस्ता पतिता यत्र सा मृगी॥ १०२<br>जले प्रक्षिप्तगात्रा तु अन्तरिक्षं गता च सा।<br>व्याधो विस्मितचित्तस्तु परं विस्मयमागतः॥ १०३<br>तेन तापेश्वरं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्॥ १०४<br>अमोहकमिति ख्यातं पितॄंश्चैवात्र तर्पयेत्।<br>पौर्णमास्याममायां तु श्राद्धं कुर्याद् यथाविधि॥ १०५<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पितृपिण्डं तु दापयेत्।<br>गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये प्रतिष्ठिता॥ १०६<br>तस्यां तु दापयेत् पिण्डं वैशाख्यां तु विशेषतः।<br>तृप्यन्ति पितरस्तत्र यावत् तिष्ठति मेदिनी॥ १०७<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र सिद्धेश्वरमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गणपत्यन्तिकं व्रजेत्॥ १०८तदनन्तर शुभतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य गोलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सर्वोत्तम विष्णूतीर्थकी यात्रा करे। विष्णुका यह सर्वश्रेष्ठ स्थान योधनीपुरके नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान् वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था, इसी कारण यह तीर्थस्थान बन गया। यहाँ जानेसे विष्णु प्रसन्न होते हैं। यहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे यह ब्रह्महत्याके पापको नष्ट कर देता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ तापसेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ व्याधके भयसे डरी हुई मृगी गिर पड़ी थी और जलमें शरीरका परित्याग कर अन्तरिक्षमें चली गयी थी। यह देखकर आश्चर्यचकित हुए व्याधको महान् विस्मय हुआ। इसी कारण इसका नाम तापेश्वरतीर्थ हुआ। इसके समान दूसरा तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ब्रह्मतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। यह तीर्थ अमोहक नामसे भी प्रसिद्ध है। यहाँ पितरोंका तर्पण तथा पूर्णिमा और अमावास्याको यथाविधि श्राद्ध करना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान कर मनुष्यको पितरोंको पिण्ड देना चाहिये। वहाँ जलमें गजके आकारकी एक शिला प्रतिष्ठित है। उसी शिलापर विशेषतया वैशाखकी पूर्णिमाको पिण्ड देना चाहिये। ऐसा करनेसे जबतक पृथ्वी स्थित रहती है, तबतक पितृगण तृप्त बने रहते हैं। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ सिद्धेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य गणपति के समीप पहुँच जाता है॥ ९८–१०८॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र लिङ्गो यत्र जनार्दनः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते॥ १०९राजेन्द्र! तत्पश्चात् जनार्दन-लिङ्गकी यात्रा करे। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें पूजित होता है।
नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम्।<br>कामदेवः स्वयं तत्र तपोऽतप्यत वै महत्॥ ११०नर्मदाके दक्षिण तटपर परम रमणीय कुसुमेश्वर तीर्थ है। वहाँ स्वयं कामदेवने कठोर तपस्या की थी। उसने एक

८०२ * मत्स्यपुराण *


दिव्यं वर्षसहस्रं तु शंकरं पर्युपासत।<br>समाधिभङ्गदग्धस्तु शंकरेण महात्मना॥ १११<br>श्वेतपर्वा यमश्चैव हुताशः शुक्रपर्वणि।<br>एते दग्धास्तु ते सर्वे कुसुमेश्वरसंस्थिताः॥ ११२<br>दिव्यवर्षसहस्रेण तुष्टस्तेषां महेश्वरः।<br>उमया सहितो रुद्रस्तुष्टस्तेषां वरप्रदः॥ ११३<br>मोक्षयित्वा तु तान् सर्वान् नर्मदातटमास्थितः।<br>ततस्तीर्थप्रभावेण पुनर्दैवत्वमागताः॥ ११४<br>ऊचुश्च परया भक्त्या देवदेवं वृषध्वजम्।<br>त्वत्प्रसादान्महादेव तीर्थं भवतु चोत्तमम्।<br>अर्धयोजनविस्तीर्णं क्षेत्रं दिक्षु समंततः॥ ११५<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा चोपवासपरायणः।<br>कुसुमायुधरूपेण रुद्रलोके महीयते॥ ११६<br>वैश्वानरो यमश्चैव कामदेवस्तथा मरुत्।<br>तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र परां सिद्धिमवाप्नुयुः॥ ११७<br>अङ्कोलस्य समीपे तु नातिदूरे तु तस्य वै।<br>स्नानं दानं च तत्रैव भोजनं पिण्डपातनम्॥ ११८<br>अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवा तु ह्यनाशके।<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य मृतस्यामुत्र जायते॥ ११९<br>त्र्यम्बकेण तु तोयेन यश्चरुं श्रपयेन्नरः।<br>अङ्कोलमूले दत्त्वा तु पिण्डं चैव यथाविधि॥ १२०<br>तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावच्चन्द्रदिवाकरौ।<br>उत्तरे त्वयने प्राप्ते घृतस्नानं करोति यः॥ १२१<br>पुरुषो वाथ स्त्री वापि वसेदायतने शुचिः।<br>सिद्धेश्वरस्य देवस्य प्रातः पूजां प्रकल्पयेत्॥ १२२<br>स यां गतिमवाप्नोति न तां सर्वैर्महामखैः।<br>यदावतीर्णः कालेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ १२३<br>मर्त्ये भवति राजा च त्वासमुद्रान्तगोचरे।<br>क्षेत्रपालं न पश्येत् तु दण्डपाणिं महाबलम्॥ १२४<br>वृथा तस्य भवेद् यात्रा ह्यदृष्ट्वा कर्णकुण्डलम्।<br>एवं तीर्थफलं ज्ञात्वा सर्वे देवाः समागताः।<br>मुञ्चन्ति कुसुमौघैंस्तु तेन तत् कुसुमेश्वरम्॥ १२५हजार दिव्य वर्षोंतक शंकरकी सर्वभावसे उपासना की थी, किंतु महात्मा शंकरकी समाधिके भङ्ग होनेसे वह भस्म हो गया। इसी प्रकार कुसुमेश्वरमें स्थित श्वेतपर्वा, यम, हुताश और शुक्रपर्वा—ये सभी भी किसी समय जल गये थे। एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या करनेपर महेश्वर इनपर प्रसन्न हुए। इस प्रकार प्रसन्न हुए उमासहित रुद्रने इन्हें वर प्रदान किया। तब इन लोगोंको मोक्ष प्रदानकर वे नर्मदाके तटपर प्रतिष्ठित हो गये। तदनन्तर उस तीर्थके प्रभावसे उन लोगोंको पुनः देवत्व प्राप्त हो गया, तब उन्होंने अतिशय भक्तिके साथ देवाधिदेव वृषभध्वजसे कहा—'महादेव! आपकी कृपासे दिशाओंमें चारों ओर आधा योजन विस्तृत यह क्षेत्र उत्तम तीर्थ हो जाय।' उस तीर्थमें उपवासपूर्वक स्नानकर मनुष्य कामदेवके रूपमें रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ १०९—११६॥<br><br>राजेन्द्र! यहाँ वैश्वानर, यम, कामदेव और मरुत्ने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की थी। उस तीर्थसे थोड़ी दूरपर अंकोलके समीप स्नान, दान, भोजन तथा पिण्डदान करना चाहिये। यहाँ अग्निमें जलकर, जलमें डूबकर या अनशन करके प्राण-त्याग करनेवालेको परलोकमें अपुनर्भवकी गति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति त्र्यम्बकतीर्थके जलसे चरु पकाकर अङ्कोलके मूलमें विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसके पितृगण चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त तृप्त रहते हैं। उत्तरायण आनेपर चाहे पुरुष हो या स्त्री—जो कोई भी घृतसे स्नान करता है और पवित्र होकर उस आयतनमें निवास करता है तथा प्रातःकाल सिद्धेश्वरदेवकी पूजा करता है, वह जिस गतिको प्राप्त करता है, वह सभी यज्ञोंके करनेसे भी नहीं प्राप्त हो सकती। कालगतिसे पुनः जब वह मृत्युलोकमें जन्म ग्रहण करता है, तब सौभाग्यशाली एवं रूपसे सम्पन्न होकर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राजा होता है। जो यहाँ आकर महाबली दण्डपाणि क्षेत्रपालका दर्शन नहीं करता और कर्णकुण्डलको नहीं देखता, उसकी यात्रा व्यर्थ हो जाती है। इस प्रकार तीर्थके फलको जानकर सभी देवगण वहाँ उपस्थित होकर कुसुमोंकी वृष्टि करने लगे, इसीसे यह कुसुमेश्वर नामसे विख्यात हुआ॥ ११७—१२५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९१॥

* अध्याय १९२ *८०३

एक सौ बानबेवाँ अध्याय

शुक्लतीर्थका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मार्कण्डेय उवाच<br><br>भार्गवेशं ततो गच्छेद् भग्नो यत्र जनार्दनः।<br>असुरैस्तु महायुद्धे महाबलपराक्रमैः॥ १<br>हुंकारितास्तु देवेन दानवाः प्रलयं गताः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २<br>शुक्लतीर्थस्य चोत्पत्तिं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये नानाधातुविचित्रिते॥ ३<br>तरुणादित्यसंकाशे तप्तकाञ्चनप्रभे।<br>वज्रस्फटिकसोपाने चित्रपट्टशिलातले॥ ४<br>जाम्बूनदमये दिव्ये नानापुष्पोपशोभिते।<br>तत्रासीनं महादेवं सर्वज्ञं प्रभुमव्ययम्॥ ५<br>लोकानुग्रहकर्तारं गणवृन्दैः समावृतम्।<br>स्कन्दनन्दिमहाकालैर्वीरभद्रगणादिभिः ।<br>उमया सहितं देवं मार्कण्डिः पर्यपृच्छत॥ ६<br>देवदेव महादेव ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसंस्तुत।<br>संसारभयभीतोऽहं सुखोपायं ब्रवीहि मे॥ ७<br>भगवन् भूतभव्येश सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तीर्थानां परमं तीर्थं तद् वदस्व महेश्वर॥ ८मार्कण्डेयजीने पूछा— राजेन्द्र! तदनन्तर भार्गवेशतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ एक बार भगवान् जनार्दन महायुद्धमें महाबली असुरोंके साथ युद्ध करते-करते थक गये, फिर उन प्रभुके हुंकारसे ही दानवगण नष्ट हो गये थे। वहाँ स्नान करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पाण्डुनन्दन! अब आप शुक्लतीर्थकी उत्पत्ति सुनिये। किसी समय विविध धातुओंसे रंग-बिरंगे हिमवान् पर्वतके मनोरम शिखरपर, जो मध्याह्नकालिक सूर्यके समान देदीप्यमान, तपाये हुए सोनेकी प्रभासे युक्त, हीरक और स्फटिककी सीढ़ियोंसे सुशोभित था, एक दिव्य सुवर्णमय तथा अनेक पुष्पोंसे विभूषित शिलातलपर सर्वज्ञ, सामर्थ्यशाली, अविनाशी, लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले महादेव स्कन्द, नन्दी, महाकाल, वीरभद्र आदि गणों तथा अन्यान्य गणसमूहोंसे घिरे हुए उमाके साथ बैठे हुए थे। उसी समय मार्कण्डेयजीने उनसे पूछा—'ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रसे वन्दित, देवाधिदेव महादेव! मैं संसार-भयसे भीत हूँ, मुझे सुखका साधन बतलाइये। ऐश्वर्यशाली महेश्वर! आप भूत और भविष्यके स्वामी हैं, अतः जो सभी पापोंका विनाशक एवं तीर्थोंमें श्रेष्ठ हो, वह तीर्थ मुझे बतलाइये॥ १—८॥
ईश्वर उवाच<br><br>शृणु विप्र महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।<br>स्नानाय गच्छ सुभगं ऋषिसङ्घैः समावृतः॥ ९<br>मन्वत्रिकश्यपाश्चैव याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः।<br>यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥ १०<br>नारदो गौतमश्चैव सेवन्ते धर्मकाङ्क्षिणः।<br>गङ्गा कनखले पुण्या प्रयागं पुष्करं गयाम्॥ ११<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>दिवा वा यदि वा रात्रौ शुक्लतीर्थं महाफलम्॥ १२भगवान् शंकरने कहा— महाबुद्धिमान् विप्र! तुम तो सकलशास्त्रविशारद और सौभाग्यशाली हो, तुम मेरी बात सुनो और ऋषियोंके साथ स्नान करनेके लिये शुक्लतीर्थमें जाओ। मनु, अत्रि, कश्यप, याज्ञवल्क्य, उशना, अङ्गिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, नारद और गौतम—ये ऋषिगण धर्मकी अभिलाषासे युक्त हो उसी तीर्थका सेवन करते हैं। गङ्गा कनखलमें पुण्यको देनेवाली है, सूर्यग्रहणके समय प्रयाग, पुष्कर, गया और कुरुक्षेत्र विशिष्ट पुण्यदायक हो जाते हैं, किंतु शुक्लतीर्थ दिन या रात—सभी समय महान् पुण्यफल देनेवाला है।

१९४- नर्मदातटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य

८०४ * मत्स्यपुराण *


| दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव स्नानाद् दानात् तपो जपात् ।<br>होमाच्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थं महाफलम् ॥ १३<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यं नर्मदायां व्यवस्थितम् ।<br>चाणक्यो नाम राजर्षिः सिद्धिं तत्र समागतः ॥ १४<br>एतत् क्षेत्रं सुविपुलं योजनं वृत्तसंस्थितम् ।<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १५<br>पादपाग्रेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।<br>जगतीदर्शनाच्चैव भ्रूणहत्यां व्यपोहति ॥ १६<br>अहं तत्र ऋषिश्रेष्ठ तिष्ठामि ह्युमया सह ।<br>वैशाखे चैत्रमासे तु कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ १७<br>कैलासाच्चापि निष्क्रम्य तत्र संनिहितो ह्यहम् । | यह शुक्लतीर्थ दर्शन, स्पर्श, स्नान, दान, तप, जप, हवन और उपवास करनेसे महान् फलदायक होता है। यह महान् पुण्यदायक शुक्लतीर्थ नर्मदामें अवस्थित है। चाणक्य नामक राजर्षिने यहीं सिद्धि प्राप्त की थी। यह विशाल क्षेत्र एक योजन परिमाणका गोलाकार है। यह शुक्लतीर्थ महापुण्यको प्रदान करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका नाशक है। यह यहाँ स्थित वृक्षके अग्रभागको देखनेसे ब्रह्महत्या और यहाँकी भूमिके दर्शन करनेसे भ्रूणहत्याके पापको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ! मैं वहाँ उमाके साथ निवास करता हूँ। चैत्र तथा वैशाख-मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको मैं कैलाससे भी आकर यहाँ उपस्थित रहता हूँ॥ ९—१७ ½ ॥ | | दैत्यदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा ॥ १८<br>गणाश्चाप्सरसो नागाः सर्वे देवाः समागताः ।<br>गगनस्थास्तु तिष्ठन्ति विमानैः सार्वकामिकैः ॥ १९<br>शुक्लतीर्थं तु राजेन्द्र ह्यागता धर्मकाङ्क्षिणः ।<br>रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा ॥ २०<br>आजन्मजनितं पापं शुक्लं तीर्थं व्यपोहति ।<br>स्नानं दानं महापुण्यं मार्कण्ड ऋषिसत्तम ॥ २१<br>शुक्लतीर्थात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति ।<br>पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानवः ॥ २२<br>अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति ।<br>तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैर्दानेन वा पुनः ॥ २३<br>देवार्चनेन या पुष्टिर्न सा क्रतुशतैरपि ।<br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ २४<br>घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य परमेश्वरम् ।<br>एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेदेश्वरात् पदात् ॥ २५<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यमृषिसिद्धनिषेवितम् ।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्न पुनर्जन्मभाग् भवेत् ॥ २६<br>स्नात्वा वै शुक्लतीर्थे तु ह्यर्चयेद् वृषभध्वजम् ।<br>कपालपूरणं कृत्वा तुष्यत्यत्र महेश्वरः ॥ २७ | राजेन्द्र! दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, गण, अप्सराएँ और नाग—ये सभी देवगण आकर सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंपर आरूढ़ हो गगनमें स्थित रहते हैं। धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले ये सभी शुक्लतीर्थमें आते हैं; क्योंकि जैसे धोबी मलिन वस्त्रको जलसे धोकर उज्ज्वल कर देता है, उसी तरह शुक्लतीर्थ जन्मसे लेकर तबतकके किये गये पापोंको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! यहाँका स्नान और दान महान् पुण्यफलको देनेवाले होते हैं। शुक्लतीर्थसे श्रेष्ठ तीर्थ न हुआ है और न होगा। मानव बचपनमें किये गये पाप-कर्मोंको शुक्लतीर्थमें एक दिन-रात उपवास करके नष्ट कर देता है। यहाँ तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, दान और देवार्चनसे जो पुष्टि प्राप्त होती है, वह (अन्यत्र किये गये) सैकड़ों यज्ञोंसे भी नहीं मिलती। यहाँ कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास कर परमेश्वर महादेवको घृतसे स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेसे वह अपने इक्कीस पीढ़ियोंतकके पूर्वजोंके साथ महादेवके स्थानसे च्युत नहीं होता। राजन्! ऋषियों और सिद्धोंद्वारा सेवित यह शुक्लतीर्थ महान् पुण्यदायक है। वहाँ स्नान करनेसे मानव पुनर्जन्मका भागी नहीं होता। शुक्लतीर्थमें स्नानकर वृषभध्वजकी पूजा करे और कपालको भर दे, ऐसा करनेसे महेश्वर प्रसन्न होते हैं॥ १८—२७॥ |

* अध्याय १९२ *८०५

| अर्धनारीश्वरं देवं पटे भक्त्या लिखापयेत्।<br>शङ्खतूर्यनिनादैश्च ब्रह्मघोषैश्च सद्द्विजैः॥ २८<br>जागरं कारयेत् तत्र नृत्यगीतादिमङ्गलैः।<br>प्रभाते शुक्लतीर्थे तु स्नानं वै देवतार्चनम्॥ २९<br>आचार्यान् भोजयेत् पश्चाच्छिवव्रतपरांञ्शुचीन्।<br>दक्षिणां च यथाशक्ति वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्॥ ३०<br>प्रदक्षिणं ततः कृत्वा शनैर्देवान्तिकं व्रजेत्।<br>एवं वै कुरुते यस्तु तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ३१<br>दिव्ययानं समारूढो गीयमानोऽप्सरोगणैः।<br>शिवतुल्यबलोपेतस्तिष्ठत्याभूतसम्प्लवम्॥ ३२<br>शुक्लतीर्थे तु या नारी ददाति कनकं शुभम्।<br>घृतेन स्नापयेद् देवं कुमारं चापि पूजयेत्॥ ३३<br>एवं या कुरुते भक्त्या तस्याः पुण्यफलं शृणु।<br>मोदते शर्वलोकस्था यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥ ३४<br>पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां संक्रान्तौ विषुवे तथा।<br>स्नात्वा तु सोपवासः सन् विजितात्मा समाहितः॥ ३५<br>दानं दद्याद् यथाशक्त्या प्रीयेतां हरिशंकरौ।<br>एवं तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्॥ ३६<br>अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवन्तमथापि वा।<br>उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ३७<br>यावत्तद्रोमसंख्या च तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद्वर्षसहस्त्राणि शिवलोके महीयते॥ ३८ | वस्त्रके ऊपर भक्तिके साथ अर्धनारीश्वर महादेवका चित्र लिखवाये और शङ्ख-तुरहीके शब्दों एवं उत्तम ब्राह्मणोंके द्वारा वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणके साथ-साथ नृत्य, गीत आदि मङ्गल-कार्य करते हुए वहाँ रातमें जागरण कराये। प्रातःकाल शुक्लतीर्थमें स्नान करके देवताकी पूजा करे। तत्पश्चात् शिवव्रत-परायण पवित्र आचार्योंको भोजन कराये और कृपणता छोड़कर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दे। इसके बाद उनकी प्रदक्षिणा कर धीरेसे देवताके समीप जाय। जो ऐसा करता है, उसे प्राप्त होनेवाला पुण्यफल सुनिये। वह शिवके समान बलशाली हो अप्सराओं‌द्वारा गाया जाता हुआ दिव्य विमानपर बैठकर प्रलयपर्यन्त स्थित रहता है। जो स्त्री शुक्लतीर्थमें शुभकारक सुवर्णका दान करती है और महादेवको घृतसे स्नान कराकर कुमार (स्कन्द)-की भी पूजा करती है, भक्तिपूर्वक ऐसा करनेवाली स्त्रीको जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। वह रुद्रलोकमें स्थित रहकर चौदह इन्द्रोंके कार्यकालतक आनन्दका उपभोग करती है। जो पूर्णिमा एवं चतुर्दशी तिथि, संक्रान्तिके दिन और विषुवयोगमें वहाँ स्नान करके मनको वशमें कर समाहित चित्तसे उपवासके साथ 'विष्णु और शंकर—दोनों प्रसन्न हों' इस भावनासे यथाशक्ति दान देता है, उसका वह सब तीर्थके प्रभावसे अक्षय हो जाता है। जो मानव उस तीर्थमें अनाथ, दुर्गतिग्रस्त अथवा सनाथ विप्रका भी विवाह कराता है उसे प्राप्त होनेवाला पुण्यफल सुनिये। वह उस ब्राह्मणके तथा उसकी वंशपरम्परामें उत्पन्न हुए लोगोंके शरीरमें जितने रोओंकी संख्या है, उतने हजार वर्षोंतक शिवलोकमें पूजित होता है॥ २८—३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यमें एक सौ वानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९२॥

८०६* मत्स्यपुराण *

एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय

नर्मदा-माहात्म्य-प्रसङ्गमें कपिलादि विविध तीर्थोंका माहात्म्य, भृगुतीर्थका माहात्म्य, भृगुमुनिकी तपस्या, शिव-पार्वतीका उनके समक्ष प्रकट होना, भृगुद्वारा उनकी स्तुति और शिवजीद्वारा भृगुको वर-प्रदान

मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा—
ततस्त्वनरकं गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र नरकं च न पश्यति॥ १<br>तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन।<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र यस्यास्थीनि विनिक्षिपेत्॥ २<br>विलयं यान्ति पापानि रूपवाञ्जायते नरः।<br>गोतीर्थं तु ततो गत्वा सर्वपापात् प्रमुच्यते॥ ३<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र गत्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ४<br>ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः।<br>तत्रोपोष्या नरो भक्त्या कपिलां यः प्रयच्छति॥ ५<br>घृतेन दीपं प्रज्वाल्य घृतेन स्नापयेच्छिवम्।<br>सघृतं श्रीफलं जग्ध्वा दत्त्वा चान्ते प्रदक्षिणम्॥ ६<br>घण्टाभरणसंयुक्तां कपिलां यः प्रयच्छति।<br>शिवतुल्यबलो भूत्वा नैवासौ जायते पुनः॥ ७<br>अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां तु विशेषतः।<br>पूजयेत् तु शिवं भक्त्या ब्राह्मणेभ्यश्च भोजनम्॥ ८<br>अङ्गारकनवम्यां तु अमायां च विशेषतः।<br>स्नापयेत् तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ ९<br>घृतेन स्नापयेल्लिङ्गं पूजयेद् भक्तितो द्विजान्।<br>पुष्पकेण विमानेन सहस्रैः परिवारितः॥ १०<br>शैवं पदमवाप्नोति यत्र चाभिमतं भवेत्।<br>अक्षयं मोदते कालं यथा रुद्रस्तथैव सः॥ ११<br>यदा तु कर्मसंयोगान्मर्त्यलोकमुपागतः।<br>राजा भवति धर्मिष्ठो रूपवाञ्जायते कुले॥ १२<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऋषितीर्थमनुत्तमम्।<br>तृणबिन्दुर्नार्म ऋषिः शापदग्धो व्यवस्थितः॥ १३<br>तत्तीर्थस्य प्रभावेण शापमुक्तोऽभवद् द्विजः।राजन्! तदनन्तर अनरक नामक तीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मानवको नरकका दर्शन नहीं होता। पाण्डुनन्दन! अब आप उस तीर्थका माहात्म्य सुनिये। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जिसकी हड्डियाँ डाल दी जाती हैं, उसके पापसमूह नष्ट हो जाते हैं और वह पुनः रूपवान् होकर जन्म ग्रहण करता है। तत्पश्चात् गोतीर्थमें जाकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ कपिलातीर्थकी यात्रा करे। राजन्! जो मनुष्य ज्येष्ठ-मासमें विशेषकर चतुर्दशी तिथिको वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान और उपवासकर कपिला गौका दान करता है, उसे एक हजार गोदानका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ घीसे दीपक जलाकर घीसे शिवको स्नान कराता है और घृतके साथ बेलको स्वयं खाता है एवं दान देता है तथा अन्तमें प्रदक्षिणा करके घण्टा और अलंकारसे विभूषित कपिला गौका दान करता है, वह शिवके तुल्य बलवान् होता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। मंगलवारको विशेषकर चतुर्थी तिथिको शिवकी भक्तिपूर्वक पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। मंगलवारकी नवमी एवं विशेषतया अमावस्या तिथिको यत्नपूर्वक शिवको स्नान करानेसे मनुष्य रूपवान् और भाग्यवान् होता है। जो घृतसे शिवलिङ्गको स्नान कराकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, वह हजारों विमानोंसे घिरे हुए पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो शिवलोकको जाता है और यहाँ अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करता है तथा रुद्रके समान ही अक्षय कालतक वहाँ आनन्दका उपभोग करता है। जब कभी कर्मवश वह मृत्युलोकमें आता है तो कुलीन वंशमें जन्म ग्रहण करता है और रूपवान् धर्मात्मा राजा होता है। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ऋषितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। यहाँ तृणबिन्दु नामक ऋषि शापसे दग्ध होकर स्थित थे, किंतु इस तीर्थके प्रभावसे वे द्विज शापसे मुक्त हो गये॥ १—१३॥
* अध्याय १९३ *८०७
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र गङ्गेश्वरमनुत्तमम् ॥ १४<br>श्रावणे मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे चतुर्दशी ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते ॥ १५<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा मुच्यते च ऋणत्रयात् ।<br>गङ्गेश्वरसमीपे तु गङ्गावदनमुत्तमम् ॥ १६<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नात्वा तु मानवः ।<br>आजन्मजनितैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ १७<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा व्रजेद् वै यत्र शंकरः ।<br>सर्वदा पर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ १८<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा ह्यश्वमेधफलं लभेत् ।<br>प्रयागे यत्फलं दृष्टं शंकरेण महात्मना ॥ १९<br>तदेव निखिलं दृष्टं गङ्गावदनसंगमे ।<br>तस्यैव पश्चिमे स्थाने समीपे नातिदूरतः ॥ २०<br>दशाश्वमेधजननं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।<br>उपोष्य रजनीमेकां मासि भाद्रपदे तथा ॥ २१<br>अमायां च नरः स्नात्वा व्रजते यत्र शंकरः ।<br>सर्वदा पर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ २२<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा चाश्वमेधफलं लभेत् ।<br>दशाश्वमेधात् पश्चिमतॊ भृगुर्ब्राह्मणसत्तमः ॥ २३<br>दिव्यं वर्षं सहस्रं तु ईश्वरं पर्युपासत ।<br>वल्मीकवेष्टितश्चासौ पक्षिणां च निकेतनः ॥ २४<br>आश्चर्यं सुमहज्जातमुमायाः शंकरस्य च ।<br>गौरी पप्रच्छ देवेशं कोऽयमेवं तु संस्थितः ।<br>देवो वा दानवो वाथ कथयस्व महेश्वर ॥ २५राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ गङ्गेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ श्रवणमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको स्नानमात्र कर लेनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है तथा पितरोंका तर्पण कर देव, पितर और ऋषि—इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। गङ्गेश्वरतीर्थके समीपमें गङ्गावदन नामक श्रेष्ठ तीर्थ है। वहाँ कामनापूर्वक या निष्काम होकर स्नान कर मनुष्य अपने जन्मभरके किये हुए पापोंसे छुटकारा पा जाता है, इसमें संदेह नहीं है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्यको जहाँ शंकर हैं, वहीं जाना चाहिये और वहाँ सर्वदा पर्वदिनपर स्नान करना चाहिये। वहाँ पितरोंका तर्पण करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। प्रयागमें स्नान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह सम्पूर्ण फल गङ्गावदनसङ्गममें महात्मा शंकरके दर्शनसे प्राप्त हो जाता है। उसीके पश्चिम दिशामें संनिकट ही दशाश्वमेधजनन नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। भाद्रपदमासकी अमावास्या तिथिको वहाँ एक रात उपवासकर स्नान करनेके पश्चात् शंकरके निकट जाना चाहिये और वहाँ सर्वदा पर्वके अवसरपर स्नान करना चाहिये। वहाँ पितरोंका तर्पण करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। दशाश्वमेधसे पश्चिम दिशामें ब्राह्मणश्रेष्ठ भृगुने एक हजार दिव्य वर्षोंतक शिवजीकी उपासना की थी। उनका शरीर बिमवटसे परिवेष्टित हो गया था, जिससे वे पक्षियोंके निवासस्थान बन गये थे। यह देखकर उमा और शंकरको महान् आश्चर्य उत्पन्न हुआ। तब पार्वतीके शंकरजीसे पूछा—'महेश्वर! यह कौन इस प्रकार समाधिस्थ है? यह देव है अथवा दानव? यह मुझे बतलाइये॥ १४—२५॥
महेश्वर उवाच<br>भृगुर्नाम द्विजश्रेष्ठ ऋषीणां प्रवरो मुनिः ।<br>मां ध्यायते समाधिस्थो वरं प्रार्थयते प्रिये ॥ २६<br><br>ततः प्रहसिता देवी ईश्वरं प्रत्यभाषत ।<br><br>धूमवत्तच्छिखा जाता ततोऽद्यापि न तुष्यसे ।<br>दुराराध्योऽसि तेन त्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ २७**महेश्वर बोले—**प्रिये! ये द्विजश्रेष्ठ भृगु हैं, जो ऋषियोंमें श्रेष्ठ मुनि हैं। ये समाधिस्थ होकर मेरा ध्यान कर रहे हैं और वर प्राप्त करना चाहते हैं। यह सुनकर पार्वतीदेवी हँस पड़ीं और महेश्वरसे बोलीं—'भगवन्! इस तपस्वीकी शिखा धुएँके समान हो गयी, फिर भी आप अभी भी संतुष्ट नहीं हो रहे हैं। इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप महान् कष्टसे आराधित-प्रसन्न होते हैं, इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है॥२६-२७॥
महेश्वर उवाच<br>न जानासि महादेवि ह्ययं क्रोधेन वेष्टितः ।<br>दर्शयामि यथातथ्यं प्रत्ययं ते करोम्यहम् ॥ २८**महेश्वरने कहा—**महादेवि! तुम नहीं जानती हो, ये मुनि क्रोधसे परिपूर्ण हैं। मैं तुम्हें अभी सत्य स्थिति

१९५- गोत्रप्रवर-निरूपण-प्रसङ्गमें भृगुवंशकी परम्पराका विवरण

८०८ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः स्मृतोऽथ देवेन धर्मरूपो वृषस्तदा।<br>स्मरणात्तस्य देवस्य वृषः शीघ्रमुपस्थितः।<br>वदंस्तु मानुषीं वाचमादेशो दीयतां प्रभो॥ २९दिखाकर विश्वस्त कर रहा हूँ। तत्पश्चात् शिवजीने उस समय धर्मरूपी वृषभका स्मरण किया। उन देवके स्मरण करते ही वह वृष शीघ्र ही उपस्थित हो गया और मनुष्यकी वाणीमें बोला—'प्रभो! आदेश दीजिये'॥ २८-२९॥
महेश्वर उवाच<br>वल्मीकं त्वं खनस्वैनं विप्रं भूमौ निपातय।<br>योगस्थस्तु ततो ध्यायन् भृगुस्तेन निपातितः॥ ३०<br>तत्क्षणात् क्रोधसंतप्तो हस्तमुत्क्षिप्य सोऽशपत्।<br>एवं सम्भाषमाणस्तु कुत्र गच्छसि भो वृष।<br>अद्याहं सम्प्रकोपेण प्रलयं त्वां नये वृष॥ ३१<br>धर्षितस्तु तदा विप्रश्चान्तरिक्षं गतो वृषम्।<br>आकाशे प्रेक्षते विप्र एतदद्भुतमुत्तमम्॥ ३२<br>तत्र प्रहसितो रुद्र ऋषिरग्रे व्यवस्थितः।<br>तृतीयलोचनं दृष्ट्वा वैलक्ष्यात् पतितो भुवि।<br>प्रणम्य दण्डवद् भूमौ तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ३३महेश्वरने कहा—तुम इस विमवटको खोद डालो और विप्रको भूमिपर गिरा दो। तब वृषने ध्यान करते हुए योगस्थ भृगुको भूमिपर गिरा दिया। उसी क्षण क्रोधसे जले-भुने भृगु हाथ उठाकर शाप देते हुए इस प्रकार बोले—'भो वृष! तुम कहाँ जा रहे हो? वृष! अभी मैं क्रोधके बलसे तुम्हारा संहार कर डालता हूँ।' तब वह वृषभ उस विप्रको परास्तकर आकाशमें चला गया। उसे आकाशमें देखते हुए भृगु सोचने लगे—'यह तो महान् आश्चर्य है।' इतनेमें ही वहाँ भगवान् रुद्र हँसते हुए ऋषिके सम्मुख उपस्थित हो गये। तब तृतीय नेत्रधारी रुद्रको देखकर भृगु व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और दण्डके समान भूमिपर लेटकर प्रणाम कर भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे॥ ३०-३३॥
प्रणिपत्य भूतनाथं भवोद्भवं त्वामहं दिव्यरूपम्।<br>भवातीतो भुवनपते प्रभो तु विज्ञापये किञ्चित्॥ ३४<br><br>तद्गुणनिकरान् वक्तुं कः शक्तो भवति मानुषो नाम।<br>वासुकिरपि हि कदाचिद् वदनसहस्रं भवेद् यस्य॥ ३५<br><br>भक्त्या तथापि शंकर भुवनपते त्वत्स्तुतौ मुखरः।<br>वदतः क्षमस्व भगवन् प्रसीद मे तव चरणपतितस्य॥ ३६<br><br>सत्त्वं रजस्तमस्त्वं स्थित्युत्पत्त्योर्विनाशने देव।<br>त्वां मुक्त्वा भुवनपते भुवनेश्वर नैव दैवतं किञ्चित्॥ ३७<br><br>यमनियमयज्ञदानवेदाभ्यासाश्च धारणा योगः।<br>त्वद्भक्तेः सर्वमिदं नार्हति हि कलासहस्त्रांशम्॥ ३८<br><br>उच्छिष्टरससायनखड्गाञ्जनपादुकाविवरसिद्धिर्वा।<br>चिह्नं भवव्रतानां दृश्यति चेह जन्मनि प्रकटम्॥ ३९त्रिभुवनके स्वामी प्रभो! आप प्राणिवर्गके स्वामी, संसारके उद्भवस्थान, दिव्य रूपधारी और जन्म-मरणसे परे हैं, मैं आपको प्रणाम करके कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। यद्यपि कदाचित् किसी मानवको वासुकि समान हजार मुख हो जाय तो भी ऐसा कोई भी मनुष्य आपके गुणसमूहोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, तथापि भुवनपते शंकर! मैं भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करनेके लिये उद्यत हूँ। भगवन्! अपने चरणोंमें पड़े हुए मुझपर प्रसन्न हो जाइये और बोलते समय घटित हुई त्रुटियोंके लिये मुझे क्षमा कीजिये। देव! विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लयमें आप ही सत्त्व, रज और तमस्वरूप हैं। भुवनपते! आपको छोड़कर अन्य कोई देवता नहीं है। भुवनेश्वर! यम, नियम, यज्ञ, दान, वेदाभ्यास, धारणा और योग—ये सभी आपकी भक्तिकी एक कलाके हजारवें अंशकी समता नहीं कर सकते। उच्छिष्ट, रस-रसायन, खड्ग, अञ्जन, पादुका और विवरसिद्धि—ये सभी महादेवकी आराधना करनेवालोंके चिह्न हैं, जो इस जन्ममें व्यक्त-रूपसे देखे जाते हैं॥ ३४-३९॥
शाठ्येन नमति यद्यपि ददासि त्वं भूतिमिच्छतो देव।<br>भक्तिर्भवभेदकरी मोक्षाय विनिर्मिता नाथ॥ ४०देव! यद्यपि भक्त शठतापूर्वक नमस्कार करता है, तथापि आप उसे इच्छानुसार ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। नाथ! आपने मोक्ष प्रदान करनेके लिये संसारको नष्ट करनेवाली
  • अध्याय १९३ * | ८०९ ---|---

| परदारपरस्वरतं परपरिभवदुःखशोकसंतप्तम्।<br>परवदनवीक्षणपरं परमेश्वर मां परित्राहि॥ ४१<br><br>मिथ्याभिमानदग्धं क्षणभङ्गुरदेहविलसितं क्रूरम्।<br>कुपथ्याभिमुखं पतितं त्वं मां पापात् परित्राहि॥ ४२<br><br>दीने द्विजगणसार्थे बन्धुजनेनैव दूषिता ह्याशा।<br>तृष्णा तथापि शंकर किं मूढं मां विडम्बयति॥ ४३<br><br>तृष्णां हरस्व शीघ्रं लक्ष्मीं प्रदत्स्व यावदासिनीं नित्यम्।<br>छिन्धि मदमोहपाशान्नुत्तारय मां महादेव॥ ४४<br><br>करुणाभ्युदयं नाम स्तोत्रमिदं सर्वसिद्धिदं दिव्यम्।<br>यः पठति भक्तियुक्तस्तस्य तुष्येद् भृगोर्यथा च शिवः॥ ४५ | भक्तिका निर्माण किया है। परमेश्वर! मैं परायी स्त्री और पराये धनमें रत रहनेवाला, दूसरे द्वारा किये गये अनादरसे उत्पन्न हुए दुःख और शोकसे सन्तप्त और परमुखापेक्षी हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं मिथ्या अभिमानसे सन्तप्त, क्षणभङ्गुर शरीरके विलासमें रत, निष्ठुर, कुमार्गगामी और पतित हूँ, आप इस पापसे मेरी रक्षा कीजिये। यद्यपि द्विजगणोंके साथ-साथ मैं दीन हूँ और बन्धुजनोंने ही मेरी आशाको दूषित कर दिया है, तथापि शंकर! तृष्णा मुझ मोहग्रस्तकी विडम्बना क्यों कर रही है? महादेव! आप इस तृष्णाको शीघ्र दूर कर दें, नित्य चिरस्थायिनी लक्ष्मी प्रदान करें, मद और मोहके पाशको काट दें और मेरा उद्धार करें। यह 'करुणाभ्युदय' नामक दिव्य स्तोत्र सभी सिद्धियोंको देनेवाला है, जो भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, उसपर भृगु (पर प्रसन्न होने)-के समान ही शिवजी प्रसन्न होते हैं॥ ४०—४५॥ | | अहं तुष्टोऽस्मि ते वत्स प्रार्थयस्वेप्सितं वरम्।<br>उमया सहितो देवो वरं तस्य ह्यादापयत्॥ ४६ | भगवान् शंकरने कहा—वत्स! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम अभीष्ट वर माँग लो। इस प्रकार उमासहित महादेवजी भृगुको वरदान देनेके लिये उद्यत हुए॥ ४६॥ | | भृगुरुवाच<br>यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम।<br>रुद्रवेदी भवेदेवमेतत् सम्पादयस्व मे॥ ४७ | भृगु बोले—देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये कि यह स्थान रुद्रवेदीके नामसे प्रसिद्ध हो जाय॥ ४७॥ | | ईश्वर उवाच<br>एवं भवतु विप्रेन्द्र क्रोधस्त्वां न भविष्यति।<br>न पितापुत्रयोश्चैव त्वैकमत्यं भविष्यति॥ ४८<br><br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्याः सर्वे देवाः सकिन्नराः।<br>उपासते भृगोस्तीर्थं तुष्टो यत्र महेश्वरः॥ ४९<br><br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते।<br>अवशाः स्ववशा वापि म्रियन्ते यत्र जन्तवः॥ ५०<br><br>गुह्यातिगुह्या सुगतिस्तेषां निःसंशयं भवेत्।<br>एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५१<br><br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः।<br>उपानहौ च छत्रं च व्यमन्त्रं च काञ्चनम्॥ ५२<br><br>भोजनं च यथाशक्त्या ह्यक्षयं च तथा भवेत्।<br>सूर्योपरागे यो दद्याद् दानं चैव यथेच्छया॥ ५३ | शिवजीने कहा—विप्रश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा और अब तुम्हें क्रोध नहीं होगा। साथ ही तुम पिता और पुत्रमें सहमति नहीं होगी। तभीसे किन्नरोंसहित ब्रह्मा आदि सभी देवगण, जहाँ महेश्वर संतुष्ट हुए थे, उस भृगुतीर्थकी उपासना करते हैं। उस तीर्थका दर्शन करनेसे मनुष्य तत्काल ही पापसे मुक्त हो जाता है। स्वाधीन या पराधीन होकर भी जो प्राणी यहाँ मरते हैं, उन्हें निःसंदेह गुह्यातिगुह्य उत्तम गति प्राप्त होती है। यह अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र सभी पापोंका विनाशक है। यहाँ स्नान करके मानव स्वर्गको प्राप्त होते हैं तथा जो वहाँ मरते हैं, उनका पुनः संसारमें आगमन नहीं होता। वहाँ यथाशक्ति जूता, छाता, अन्न, सोना और खाद्य पदार्थका दान देना चाहिये; क्योंकि वह अक्षय हो जाता है। जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय वहाँ इच्छानुसार जो कुछ दान |

८९० * मत्स्यपुराण *

दीयमानं तु तद् दानमक्षयं तस्य तद् भवेत्।<br>चन्द्रसूर्योपरागेषु यत्फलं त्वमरकण्टके॥ ५४<br>तदेव निखिलं पुण्यं भृगुतीर्थे न संशयः।<br>क्षरन्ति सर्वदानानि यज्ञदानतपःक्रियाः॥ ५५<br>न क्षरेत् तु तपस्तप्तं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर।<br>यस्य वै तपसोग्रेण तुष्टेनैव तु शम्भुना॥ ५६<br>सांनिध्यं तत्र कथितं भृगुतीर्थे नराधिप।<br>प्रख्यातं त्रिषु लोकेषु यत्र तुष्टो महेश्वरः॥ ५७<br>एवं तु वदतो देवीं भृगुतीर्थमनुत्तमम्।<br>न जानन्ति नरा मूढा विष्णुमायाविमोहिताः॥ ५८<br>नर्मदायां स्थितं दिव्यं भृगुतीर्थं नराधिप।<br>भृगुतीर्थस्य माहात्म्यं यः शृणोति नरः क्वचित्॥ ५९<br>विमुक्तः सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति।देता है, उसका वह दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय अमरकण्टकमें जो फल प्राप्त होता है, वही सम्पूर्ण पुण्य निःसंदेह भृगुतीर्थमें सुलभ हो जाता है। युधिष्ठिर! सभी प्रकारके दान तथा यज्ञ, तप और कर्म—ये सभी नष्ट हो जाते हैं, किंतु भृगुतीर्थमें किया गया तप नष्ट नहीं होता। नराधिप! उस भृगुकी उग्र तपस्यासे संतुष्ट हुए शम्भुने उस भृगुतीर्थमें अपनी नित्य उपस्थिति बतलायी है, इसलिये वह भृगुतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है; क्योंकि वहाँ महेश्वर संतुष्ट हुए थे। नराधिप! इस प्रकार महेश्वरने पार्वतीसे श्रेष्ठ भृगुतीर्थके विषयमें कहा है, किंतु विष्णुकी मायासे मोहित हुए मूढ़ मनुष्य नर्मदामें स्थित इस दिव्य भृगुतीर्थको नहीं जानते। जो मनुष्य कहीं भी भृगुतीर्थका माहात्म्य सुनता है, वह सभी पापोंसे विमुक्त होकर रुद्रलोकको जाता है॥ ४८—५९ १/२ ॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र गौतमेश्वरमुत्तमम्॥ ६०<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायणः।<br>काञ्चनेन विमानेन ब्रह्मलोके महीयते॥ ६१राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ गौतमेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नानकर उपवास करनेवाला मनुष्य सुवर्णमय विमानसे ब्रह्मलोकमें जाकर पूजित होता है।
धौतपापं ततो गच्छेत् क्षेत्रं यत्र वृषेण तु।<br>नर्मदायां कृतं राजन् सर्वपातकनाशनम्॥ ६२<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्महत्यां विमुञ्चति।<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः॥ ६३<br>चतुर्भुजस्त्रिनेत्रश्च शिवतुल्यबलो भवेत्।<br>वसेत् कल्पायुतं साग्रं शिवतुल्यपराक्रमः॥ ६४<br>कालेन महता प्राप्तः पृथिव्यामेकराड् भवेत्।राजन्! तदनन्तर धौतपाप नामक क्षेत्रकी यात्रा करनी चाहिये। स्वयं नन्दीने नर्मदामें इस क्षेत्रका निर्माण किया था, जो सभी पातकोंका नाशक है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्महत्यासे विमुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो प्राण-त्याग करता है, वह चार भुजा और तीन नेत्रोंसे युक्त हो शिवके समान बलशाली हो जाता है और शिवके समान पराक्रमी होकर दस सहस्र कल्पोंसे भी अधिक कालतक स्वर्गमें निवास करता है। बहुत कालके बाद पृथ्वीपर आनेपर वह एकच्छत्र राजा होता है।
ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऐरण्डीतीर्थमुत्तमम्॥ ६५<br>प्रयागे यत् फलं दृष्टं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>तत् फलं लभते राजन् स्नातमात्रो हि मानवः॥ ६६राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ ऐरण्डीतीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! मार्कण्डेयजीके द्वारा प्रयागमें जो पुण्य बतलाया गया है, वही पुण्य वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्यको सुलभ हो जाता है।
मासि भाद्रपदे चैव शुक्लपक्षे चतुर्दशी।<br>उपोष्या रजनीमेकां तस्मिन् स्नानं समाचरेत्।<br>यमदूतैर्न बाध्येत रुद्रलोकं स गच्छति॥ ६७जो भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिको एक रात उपवास कर वहाँ स्नान करता है, उसे यमदूत पीड़ित नहीं करते और वह रुद्रलोकको जाता है।
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>हिरण्यद्वीपविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ६८राजेन्द्र! तदुपरान्त सभी पापोंको नष्ट करनेवाले हिरण्यद्वीप नामसे विख्यात तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ भगवान् जनार्दनने

१९६- प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि अङ्गिराके वंशका वर्णन

  • अध्याय १९३ * ८९१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र स्नात्वा नरो राजन् धनवान् रूपवान् भवेत्।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं कनखलं महत्॥ ६९<br>गरुडेन तपस्तप्तं तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>प्रख्यातं त्रिषु लोकेषु योगिनी तत्र तिष्ठति॥ ७०<br>क्रीडते योगिभिः सार्धं शिवेन सह नृत्यति।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ७१सिद्धि प्राप्त की थी। राजन्! वहाँ स्नान कर मानव धनवान् और रूपवान् हो जाता है। राजेन्द्र! इसके बाद महान् कनखलतीर्थकी यात्रा करे। नराधिप! उस तीर्थमें गरुडने तपस्या की थी। वह तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ योगिनी रहती है, जो योगियोंके साथ क्रीडा और शिवके साथ नृत्य करती है। राजन्! वहाँ स्नान कर मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ ६०–७१॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र हंसतीर्थमनुत्तमम्।<br>हंसास्तत्र विनिर्मुक्ता गता ऊर्ध्वं न संशयः॥ ७२<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>वाराहं रूपमास्थाय अर्चितः परमेश्वरः॥ ७३<br>वराहतीर्थे नरः स्नात्वा द्वादश्यां तु विशेषतः।<br>विष्णुलोकमवाप्नोति नरकं न च पश्यति॥ ७४<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र चन्द्रतीर्थमनुत्तमम्।<br>पौर्णमास्यां विशेषेण स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ७५<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र चन्द्रलोके महीयते।<br>दक्षिणेन तु द्वारेण कन्यातीर्थं तु विश्रुतम्॥ ७६<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>प्रणिपत्य तु चेशानं बलिस्तेन प्रसीदति॥ ७७<br>हरिश्चन्द्रपुरं दिव्यमन्तरिक्षे च दृश्यते।<br>शक्रध्वजे समावृत्ते सुप्ते नागरिकेजने॥ ७८<br>नर्मदा सलिलौघेन तरून् सम्प्लावयिष्यति।<br>अस्मिन् स्थाने निवासः स्याद्विष्णुः शंकरमब्रवीत्॥ ७९<br>द्वीपेश्‍वरे नरः स्नात्वा लभेद् बहु सुवर्णकम्।राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम हंसतीर्थमें जाय। वहाँ हंस-समूह पापसे विनिर्मुक्त होकर निःसंदेह स्वर्गको चले गये थे। राजेन्द्र! तत्पश्चात् वाराहतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ भगवान् जनार्दन सिद्ध हुए थे। वहाँ वाराहरूपधारी परमेश्वरकी पूजा हुई थी। उस वाराहतीर्थमें विशेषकर द्वादशी तिथिको स्नान कर मनुष्य विष्णुलोकको प्राप्त करता है और उसे नरकका दर्शन नहीं करना पड़ता। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ चन्द्रतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ विशेषकर पूर्णिमा तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य चन्द्रलोकमें पूजित होता है। उसके दक्षिण द्वारपर विख्यात कन्यातीर्थ है। वहाँ शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ शिवजीको प्रणाम करके उन्हें बलि प्रदान करनेसे वे प्रसन्न हो जाते हैं। वहाँ हरिशयनके समय इन्द्रध्वजके निकलनेपर अन्तरिक्षमें दिव्य हरिश्चन्द्रपुर दिखायी देता है। जब नर्मदा जलसमूहसे वृक्षोंको आप्लावित कर देगी, उस समय इस स्थानमें विष्णुका निवास होगा—ऐसा विष्णुने शंकरसे कहा है। द्वीपेश्वरतीर्थमें स्नान कर मनुष्य सुवर्णराशिको प्राप्त करता है॥ ७२–७९ ½॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कन्यातीर्थे सुसंगमे॥ ८०<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र देव्याः स्थानमवाप्नुयात्।<br>देवतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वतीर्थमनुत्तमम्॥ ८१<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र देवैः सह मोदते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र शिखितीर्थमनुत्तमम्॥ ८२<br>यत् तत्र दीयते दानं सर्वं कोटिगुणं भवेत्।<br>अपरपक्षे त्वमायां तु स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ८३राजेन्द्र! इसके बाद कन्यातीर्थके सुन्दर संगमस्थानकी यात्रा करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य देवीके स्थानको प्राप्त करता है। तदनन्तर सभी तीर्थोंमें उत्तम देवतीर्थमें जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान कर मनुष्य देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ शिखितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ अमावस्या तिथिके तीसरे पहरमें स्नान करनेका विधान है। वहाँ जो कुछ भी दान दिया जाता है, वह सब, करोड़गुना हो जाता है।
८१२* मत्स्यपुराण *
ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिता।<br>भृगुतीर्थे तु राजेन्द्र तीर्थकोटिर्व्यवस्थिता॥ ८४<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नानं समाचरेत् ।<br>अश्वमेधमवाप्नोति दैवतैः सह मोदते ॥ ८५<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो भृगुस्तु मुनिपुङ्गवः ।<br>अवतारः कृतस्तत्र शंकरेण महात्मना ॥ ८६वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर करोड़ ब्राह्मणोंके भोजन करानेका फल होता है। राजेन्द्र! भृगुतीर्थमें करोड़ों तीर्थोंकी स्थिति है। वहाँ निष्काम या सकाम होकर भी स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है और वह देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। वहाँ मुनिश्रेष्ठ भृगुने परम सिद्धि प्राप्त की थी और महात्मा शंकर अवतीर्ण हुए थे॥ ८०–८६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ तिरानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९३॥


एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय

नर्मदातटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य

मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा—
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ह्यङ्कुशेश्वरमुत्तमम्।<br>दर्शनात् तस्य देवस्य मुच्यते सर्वपातकैः॥ १<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र नर्मदेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोके महीयते॥ २<br>अश्वतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>सुभगो दर्शनीयश्च भोगवाञ्जायते नरः॥ ३<br>पैतामहं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।<br>तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या पितृपिण्डं तु दापयेत्॥ ४<br>तिलदर्भविमिश्रं तु ह्युदकं तत्र दापयेत्।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्॥ ५<br>सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु स्नानं समाचरेत्।<br>विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते॥ ६<br>मनोहरं ततो गच्छेत् तीर्थं परमशोभनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पितृलोके महीयते॥ ७<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र मानसं तीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कुञ्जतीर्थमनुत्तमम्।<br>विख्यातं त्रिषु लोकेषु सर्वपापप्रणाशनम्॥ ९<br>यान् यान् कामयते कामान् पशुपुत्रधनानि च।<br>प्राप्नुयात् तानि सर्वाणि तत्र स्नात्वा नराधिप॥ १०राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ अङ्कुशेश्वरतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ उन देवके दर्शन-मात्रसे मनुष्य सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ नर्मदेश्वरतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदुपारन्त अश्वतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सौभाग्यशाली, दर्शनीय और रूपवान् हो जाता है। इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित पैतामहतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर भक्तिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान करे तथा तिल और कुशसे युक्त तर्पण करे; क्योंकि उस तीर्थके प्रभावसे वहाँ किया गया यह सब अक्षय हो जाता है। जो सावित्रीतीर्थमें जाकर स्नान करता है, वह अपने सभी पापोंको धोकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। राजन्! तदनन्तर अतिशय रमणीय मनोहर-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नानकर मनुष्य पितृलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ मानसतीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तदुपारन्त श्रेष्ठ कुञ्जतीर्थकी यात्रा करे। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध यह तीर्थ सभी पापोंका नाशक है। नराधिप! मनुष्य, पशु, पुत्र, धन आदि जिन-जिन वस्तुओंकी कामना करता है, वह सब उसे वहाँ स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है॥ १–१०॥
  • अध्याय १९४ * ८१३

| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र त्रिदशज्योतिविश्रुतम्।<br>यत्र ता ऋषिकन्यास्तु तपोऽतप्यन्त सुव्रताः ॥ ११<br><br>भर्ता भवतु सर्वासामीश्वरः प्रभुरव्ययः।<br>प्रीतस्तासां महादेवो दण्डरूपधरो हरः ॥ १२<br><br>विकृताननबीभत्सुर्व्रती तीर्थमुपागतः।<br>तत्र कन्या महाराज वरयत् परमेश्वरः ॥ १३<br><br>कन्या ऋषेर्वरयतः कन्यादानं प्रदीयताम्।<br>तीर्थं तत्र महाराज ऋषिकन्येति विश्रुतम् ॥ १४<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र स्वर्णविन्दु त्विति स्मृतम् ॥ १५<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दुर्गतिं न च पश्यति।<br>अप्सरेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ १६<br><br>क्रीडते नागलोकस्थोऽप्सरोभिः सह मोदते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र नरके तीर्थमुत्तमम् ॥ १७<br><br>तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं नरकं च न पश्यति। | राजेन्द्र ! इसके बाद प्रसिद्ध त्रिदशज्योतितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ उत्तम व्रत धारण करनेवाली उन ऋषि-कन्याओंने तपस्या की थी। उनकी अभिलाषा थी कि अविनाशी एवं सामर्थ्यशाली महेश्वर हम सभीके पति हों। तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर संहारकारी महादेव, जिनका मुख विकृत और शरीर घृणास्पद था तथा जो उत्तम व्रतमें लीन थे, दण्ड धारणकर उस तीर्थमें आये। महाराज! वहाँ शंकरजीने उन कन्याओंका वरण किया। महाराज! वहाँ शंकरजीने ऋषिकन्याओंका वरण किया था, अतः वह स्थान ऋषिकन्या नामसे विख्यात तीर्थ हुआ। यहाँ कन्यादान करना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदनन्तर स्वर्णबिन्दु नामक प्रसिद्ध तीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको दुर्गति नहीं देखनी पड़ती। तत्पश्चात् अप्सरेशतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेवाला नागलोकमें अप्सराओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त नरक नामक श्रेष्ठ तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे तो नरक नहीं देखना पड़ता ॥ ११-१७ १/२ ॥ | | भारभूतिं ततो गच्छेदुपवासपरो जनः ॥ १८<br><br>एतत् तीर्थं समासाद्य चावतारं तु शाम्भवम्।<br>अर्चयित्वा विरूपाक्षं रुद्रलोके महीयते ॥ १९<br><br>अस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा भारभूतौ महात्मनः।<br>यत्र तत्र मृतस्यापि ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः ॥ २०<br><br>कार्तिकस्य तु मासस्य ह्यर्चयित्वा महेश्वरम्।<br>अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २१<br><br>दीपकानां शतं तत्र घृतपूर्णं तु दापयेत्।<br>विमानैः सूर्यसंकाशैर्व्रजते यत्र शंकरः ॥ २२<br><br>वृषभं यः प्रयच्छेत् तु शङ्खकुन्देन्दुसप्रभम्।<br>वृषयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति ॥ २३<br><br>धेनुमेकां तु यो दद्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>पायसं मधुसंयुक्तं भक्ष्याणि विविधानि च ॥ २४ | इसके बाद भारभूतितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। इस तीर्थमें आकर मनुष्य उपवासपूर्वक शम्भूके अवतार विरूपाक्षकी अर्चना करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। महात्मा शंकरके इस भारभूतितीर्थमें स्नानकर मनुष्य जहाँ-कहीं भी मरता है तो उसे निश्चय ही गणोंके अध्यक्षकी गति प्राप्त होती है। कार्तिकमासमें यहाँ महेश्वरकी पूजा करनेसे अश्वमेधयज्ञसे दसगुना फल प्राप्त होता है—ऐसा विद्वानोंने कहा है। जो वहाँ घृतपूर्ण सौ दीपक जलाता है, वह सूर्यके समान देदीप्यमान विमानोंसे शंकरजीके निकट चला जाता है। जो वहाँ शङ्ख, कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान उज्ज्वल रंगके वृषभका दान करता है, वह वृषयुक्त विमानसे रुद्रलोकको जाता है। नराधिप! उस तीर्थमें जो एक धेनुका दान देता है और यथाशक्ति मधुसंयुक्त खीर एवं विविध भोज्य पदार्थ ब्राह्मणोंको खिलाता है, |