भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८०२ * मत्स्यपुराण *


दिव्यं वर्षसहस्रं तु शंकरं पर्युपासत।<br>समाधिभङ्गदग्धस्तु शंकरेण महात्मना॥ १११<br>श्वेतपर्वा यमश्चैव हुताशः शुक्रपर्वणि।<br>एते दग्धास्तु ते सर्वे कुसुमेश्वरसंस्थिताः॥ ११२<br>दिव्यवर्षसहस्रेण तुष्टस्तेषां महेश्वरः।<br>उमया सहितो रुद्रस्तुष्टस्तेषां वरप्रदः॥ ११३<br>मोक्षयित्वा तु तान् सर्वान् नर्मदातटमास्थितः।<br>ततस्तीर्थप्रभावेण पुनर्दैवत्वमागताः॥ ११४<br>ऊचुश्च परया भक्त्या देवदेवं वृषध्वजम्।<br>त्वत्प्रसादान्महादेव तीर्थं भवतु चोत्तमम्।<br>अर्धयोजनविस्तीर्णं क्षेत्रं दिक्षु समंततः॥ ११५<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा चोपवासपरायणः।<br>कुसुमायुधरूपेण रुद्रलोके महीयते॥ ११६<br>वैश्वानरो यमश्चैव कामदेवस्तथा मरुत्।<br>तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र परां सिद्धिमवाप्नुयुः॥ ११७<br>अङ्कोलस्य समीपे तु नातिदूरे तु तस्य वै।<br>स्नानं दानं च तत्रैव भोजनं पिण्डपातनम्॥ ११८<br>अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवा तु ह्यनाशके।<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य मृतस्यामुत्र जायते॥ ११९<br>त्र्यम्बकेण तु तोयेन यश्चरुं श्रपयेन्नरः।<br>अङ्कोलमूले दत्त्वा तु पिण्डं चैव यथाविधि॥ १२०<br>तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावच्चन्द्रदिवाकरौ।<br>उत्तरे त्वयने प्राप्ते घृतस्नानं करोति यः॥ १२१<br>पुरुषो वाथ स्त्री वापि वसेदायतने शुचिः।<br>सिद्धेश्वरस्य देवस्य प्रातः पूजां प्रकल्पयेत्॥ १२२<br>स यां गतिमवाप्नोति न तां सर्वैर्महामखैः।<br>यदावतीर्णः कालेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ १२३<br>मर्त्ये भवति राजा च त्वासमुद्रान्तगोचरे।<br>क्षेत्रपालं न पश्येत् तु दण्डपाणिं महाबलम्॥ १२४<br>वृथा तस्य भवेद् यात्रा ह्यदृष्ट्वा कर्णकुण्डलम्।<br>एवं तीर्थफलं ज्ञात्वा सर्वे देवाः समागताः।<br>मुञ्चन्ति कुसुमौघैंस्तु तेन तत् कुसुमेश्वरम्॥ १२५हजार दिव्य वर्षोंतक शंकरकी सर्वभावसे उपासना की थी, किंतु महात्मा शंकरकी समाधिके भङ्ग होनेसे वह भस्म हो गया। इसी प्रकार कुसुमेश्वरमें स्थित श्वेतपर्वा, यम, हुताश और शुक्रपर्वा—ये सभी भी किसी समय जल गये थे। एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या करनेपर महेश्वर इनपर प्रसन्न हुए। इस प्रकार प्रसन्न हुए उमासहित रुद्रने इन्हें वर प्रदान किया। तब इन लोगोंको मोक्ष प्रदानकर वे नर्मदाके तटपर प्रतिष्ठित हो गये। तदनन्तर उस तीर्थके प्रभावसे उन लोगोंको पुनः देवत्व प्राप्त हो गया, तब उन्होंने अतिशय भक्तिके साथ देवाधिदेव वृषभध्वजसे कहा—'महादेव! आपकी कृपासे दिशाओंमें चारों ओर आधा योजन विस्तृत यह क्षेत्र उत्तम तीर्थ हो जाय।' उस तीर्थमें उपवासपूर्वक स्नानकर मनुष्य कामदेवके रूपमें रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ १०९—११६॥<br><br>राजेन्द्र! यहाँ वैश्वानर, यम, कामदेव और मरुत्ने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की थी। उस तीर्थसे थोड़ी दूरपर अंकोलके समीप स्नान, दान, भोजन तथा पिण्डदान करना चाहिये। यहाँ अग्निमें जलकर, जलमें डूबकर या अनशन करके प्राण-त्याग करनेवालेको परलोकमें अपुनर्भवकी गति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति त्र्यम्बकतीर्थके जलसे चरु पकाकर अङ्कोलके मूलमें विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसके पितृगण चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त तृप्त रहते हैं। उत्तरायण आनेपर चाहे पुरुष हो या स्त्री—जो कोई भी घृतसे स्नान करता है और पवित्र होकर उस आयतनमें निवास करता है तथा प्रातःकाल सिद्धेश्वरदेवकी पूजा करता है, वह जिस गतिको प्राप्त करता है, वह सभी यज्ञोंके करनेसे भी नहीं प्राप्त हो सकती। कालगतिसे पुनः जब वह मृत्युलोकमें जन्म ग्रहण करता है, तब सौभाग्यशाली एवं रूपसे सम्पन्न होकर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राजा होता है। जो यहाँ आकर महाबली दण्डपाणि क्षेत्रपालका दर्शन नहीं करता और कर्णकुण्डलको नहीं देखता, उसकी यात्रा व्यर्थ हो जाती है। इस प्रकार तीर्थके फलको जानकर सभी देवगण वहाँ उपस्थित होकर कुसुमोंकी वृष्टि करने लगे, इसीसे यह कुसुमेश्वर नामसे विख्यात हुआ॥ ११७—१२५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९१॥