मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय २२७ * ८९१
| धनुःशतपरीणाहो ग्रामस्य तु समंततः।<br>द्विगुणं त्रिगुणं वापि नगरस्य तु कल्पयेत्॥ २४<br><br>वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो नावलोकयेत्।<br>छिद्रं वा वारयेत् सर्वं श्वशूकरमुखानुगम्॥ २५<br><br>यत्रापरिवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि।<br>न तत्र कारयेद् दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणे॥ २६<br><br>अनिर्दशाहं गां सूतां वृषं देवपशुं तथा।<br>छिद्रं वा वारयेत् सर्वं न दण्ड्यो मनुरब्रवीत्॥ २७<br><br>अथोऽन्यथा विनष्टस्य दशांशं दण्डमर्हति।<br>पाल्यस्य पालकस्वामी विनाशे क्षत्रियस्य तु॥ २८<br><br>भक्षयित्वोपविष्टस्तु द्विगुणं दण्डमर्हति।<br>विशं दण्ड्याद् दशगुणं विनाशे क्षत्रियस्य तु॥ २९<br><br>गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वापि समाहरन्।<br>शतानि पञ्च दण्डः स्यादज्ञानाद् द्विशतो दमः॥ ३०<br><br>सीमाबन्धनकाले तु सीमान्तं यो हि कारयेत्।<br>तेषां संज्ञां ददानस्तु जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्॥ ३१<br><br>अथैनामपि यो दद्यात् संविदं वाधिगच्छति।<br>उत्तमं साहसं दण्ड्य इति स्वायम्भुवोऽब्रवीत्॥ ३२ | ग्रामके बाहर चारों ओरसे सौ धनुषके विस्तारकी और नगरके लिये उससे दुगुने या तिगुने विस्तारकी ऐसी प्राचीर बनाये जिसके भीतरकी वस्तुको ऊँट भी न देख सके। उसमें कुत्ते तथा सूअरके मुख घुसने योग्य सभी छिद्रोंको बंद करा देना चाहिये। यदि पशु बिना घेरेके खेतके अन्नको हानि पहुँचाते हैं तो राजाको पशुके चरवाहेको दण्ड नहीं देना चाहिये। दस दिनके भीतरकी ब्यायी गायद्वारा तथा देवताके उद्देश्यसे छोड़े गये वृषद्वारा घेरा रहनेपर भी यदि खेतके अन्नकी हानि होती है तो उसके लिये पशुपालक दण्डनीय नहीं है—ऐसा मनुने कहा है। इन उपर्युक्त कारणोंके अतिरिक्त अन्य प्रकारसे नष्ट हुए द्रव्यके दशांशका दण्ड लगाना चाहिये। कोई पशु फसलको खाकर यदि वहीं बैठा हुआ मिलता है तो उसके स्वामीके ऊपर उक्त दण्डसे दुगुना दण्ड लगाना चाहिये। यदि खेतका स्वामी क्षत्रिय है और वैश्यका पशु हानि पहुँचाता है तो उसे हानिका दस गुना दण्ड देना चाहिये। यदि किसीके घर, तालाब, बगीचे या खेतको कोई दूसरा छीन लेता है तो उसे पाँच सौ मुद्राका तथा बिना जाने यदि इनको हानि पहुँचाता है तो दो सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये। किसी खेत आदिकी सीमा बाँधनेके समय यदि कोई सीमाका उल्लङ्घन करता है या सम्मति देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये। जो सीमाका उल्लङ्घन करनेवाले व्यक्तिकी बातोंका शपथपूर्वक समर्थन करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये—ऐसा स्वायम्भुव मनुने कहा है॥ २४-३२॥ |
| वर्णानामानुपूर्व्येण त्रयाणामविशेषतः।<br>अकार्यकारिणः सर्वान् प्रायश्चित्तानि कारयेत्॥ ३३ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णोंके लोग समाजमें अपनी स्थितिके बिना किसी विशेषताके क्रमसे यदि निषिद्ध कार्य करते हैं तो उन सबसे प्रायश्चित्त करवाना चाहिये। |
| अमत्या च प्रमाप्य स्त्रीं शूद्रहत्याव्रतं चरेत्।<br>दानेन च धनेनैकं सर्पादीनामशक्नुवन्॥ ३४<br><br>एकैकं स चरेत् कृच्छ्रं द्विजः पापापनुत्तये।<br>फलदानां च वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्॥ ३५<br><br>गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम्।<br>अस्थिमतां च सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे।<br>पूर्णे वानस्यवस्थातुं शूद्रहत्याव्रतं चरेत्॥ ३६ | यदि कोई अनजानमें स्त्रीका वध कर देता है तो उसे शूद्र-हत्या-व्रतका पालन करना चाहिये। सर्पादिकी हत्या कर धन-दान करनेमें असमर्थ द्विजको पाप-शान्तिके लिये एक-एक कृच्छ्रव्रतका आचरण करना चाहिये। फल देनेवाले वृक्षों, फूली हुई लताओं, गुल्मों, वल्लियों तथा फूले हुए वृक्षोंको काटनेपर सौ ऋचाओंका जप करना चाहिये। एक सहस्र अथवा एक गाड़ीमें भर जानेके योग्य हड्डीवाले जीवोंकी हत्या करनेवालेको शूद्रहत्याका प्रायश्चित्त करना चाहिये। |