मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* अध्याय २२७ * ८९१
| धनुःशतपरीणाहो ग्रामस्य तु समंततः।<br>द्विगुणं त्रिगुणं वापि नगरस्य तु कल्पयेत्॥ २४<br><br>वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो नावलोकयेत्।<br>छिद्रं वा वारयेत् सर्वं श्वशूकरमुखानुगम्॥ २५<br><br>यत्रापरिवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि।<br>न तत्र कारयेद् दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणे॥ २६<br><br>अनिर्दशाहं गां सूतां वृषं देवपशुं तथा।<br>छिद्रं वा वारयेत् सर्वं न दण्ड्यो मनुरब्रवीत्॥ २७<br><br>अथोऽन्यथा विनष्टस्य दशांशं दण्डमर्हति।<br>पाल्यस्य पालकस्वामी विनाशे क्षत्रियस्य तु॥ २८<br><br>भक्षयित्वोपविष्टस्तु द्विगुणं दण्डमर्हति।<br>विशं दण्ड्याद् दशगुणं विनाशे क्षत्रियस्य तु॥ २९<br><br>गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वापि समाहरन्।<br>शतानि पञ्च दण्डः स्यादज्ञानाद् द्विशतो दमः॥ ३०<br><br>सीमाबन्धनकाले तु सीमान्तं यो हि कारयेत्।<br>तेषां संज्ञां ददानस्तु जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्॥ ३१<br><br>अथैनामपि यो दद्यात् संविदं वाधिगच्छति।<br>उत्तमं साहसं दण्ड्य इति स्वायम्भुवोऽब्रवीत्॥ ३२ | ग्रामके बाहर चारों ओरसे सौ धनुषके विस्तारकी और नगरके लिये उससे दुगुने या तिगुने विस्तारकी ऐसी प्राचीर बनाये जिसके भीतरकी वस्तुको ऊँट भी न देख सके। उसमें कुत्ते तथा सूअरके मुख घुसने योग्य सभी छिद्रोंको बंद करा देना चाहिये। यदि पशु बिना घेरेके खेतके अन्नको हानि पहुँचाते हैं तो राजाको पशुके चरवाहेको दण्ड नहीं देना चाहिये। दस दिनके भीतरकी ब्यायी गायद्वारा तथा देवताके उद्देश्यसे छोड़े गये वृषद्वारा घेरा रहनेपर भी यदि खेतके अन्नकी हानि होती है तो उसके लिये पशुपालक दण्डनीय नहीं है—ऐसा मनुने कहा है। इन उपर्युक्त कारणोंके अतिरिक्त अन्य प्रकारसे नष्ट हुए द्रव्यके दशांशका दण्ड लगाना चाहिये। कोई पशु फसलको खाकर यदि वहीं बैठा हुआ मिलता है तो उसके स्वामीके ऊपर उक्त दण्डसे दुगुना दण्ड लगाना चाहिये। यदि खेतका स्वामी क्षत्रिय है और वैश्यका पशु हानि पहुँचाता है तो उसे हानिका दस गुना दण्ड देना चाहिये। यदि किसीके घर, तालाब, बगीचे या खेतको कोई दूसरा छीन लेता है तो उसे पाँच सौ मुद्राका तथा बिना जाने यदि इनको हानि पहुँचाता है तो दो सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये। किसी खेत आदिकी सीमा बाँधनेके समय यदि कोई सीमाका उल्लङ्घन करता है या सम्मति देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये। जो सीमाका उल्लङ्घन करनेवाले व्यक्तिकी बातोंका शपथपूर्वक समर्थन करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये—ऐसा स्वायम्भुव मनुने कहा है॥ २४-३२॥ |
| वर्णानामानुपूर्व्येण त्रयाणामविशेषतः।<br>अकार्यकारिणः सर्वान् प्रायश्चित्तानि कारयेत्॥ ३३ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णोंके लोग समाजमें अपनी स्थितिके बिना किसी विशेषताके क्रमसे यदि निषिद्ध कार्य करते हैं तो उन सबसे प्रायश्चित्त करवाना चाहिये। |
| अमत्या च प्रमाप्य स्त्रीं शूद्रहत्याव्रतं चरेत्।<br>दानेन च धनेनैकं सर्पादीनामशक्नुवन्॥ ३४<br><br>एकैकं स चरेत् कृच्छ्रं द्विजः पापापनुत्तये।<br>फलदानां च वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्॥ ३५<br><br>गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम्।<br>अस्थिमतां च सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे।<br>पूर्णे वानस्यवस्थातुं शूद्रहत्याव्रतं चरेत्॥ ३६ | यदि कोई अनजानमें स्त्रीका वध कर देता है तो उसे शूद्र-हत्या-व्रतका पालन करना चाहिये। सर्पादिकी हत्या कर धन-दान करनेमें असमर्थ द्विजको पाप-शान्तिके लिये एक-एक कृच्छ्रव्रतका आचरण करना चाहिये। फल देनेवाले वृक्षों, फूली हुई लताओं, गुल्मों, वल्लियों तथा फूले हुए वृक्षोंको काटनेपर सौ ऋचाओंका जप करना चाहिये। एक सहस्र अथवा एक गाड़ीमें भर जानेके योग्य हड्डीवाले जीवोंकी हत्या करनेवालेको शूद्रहत्याका प्रायश्चित्त करना चाहिये। |
८९२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| किंचिद् देयं च विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।<br>अनस्थां चैव हिंसायां प्राणायामैर्विशुद्ध्यति॥ ३७<br><br>अन्नादिजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः।<br>फलपुष्पोद्गतानां च घृतप्राशो विशोधनम्॥ ३८<br><br>कृष्टानामोषधीनां च जातानां च स्वयं वने।<br>वृथाच्छेदेन गच्छेत दिनमेकं पयोव्रती॥ ३९<br><br>एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम्।<br>स्तेयदोषापहर्तॄणां श्रूयतां व्रतमुत्तमम्॥ ४० | हड्डीवाले जानवरोंकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको कुछ दान देना चाहिये और जो बिना हड्डीके हैं उनकी हिंसा करनेपर प्राणायामसे शुद्धि हो जाती है। अन्नादिसे एवं रससे उत्पन्न होनेवाले तथा फलों और पुष्पोंमें पैदा होनेवाले जन्तुओंकी हिंसा करनेपर घृत-पान ही प्रायश्चित्त है। जुताईसे उत्पन्न हुई तथा वनमें स्वतः उगी हुई ओषधियोंको बिना आवश्यकताके काटनेपर एक दिनका दुग्धव्रत करना चाहिये। हिंसासे उत्पन्न हुआ पातक इन व्रतोंसे दूर किया जा सकता है। अब चोर-कर्मसे उत्पन्न हुए पापको दूर करनेके लिये उत्तम व्रत सुनिये॥ ३३—४०॥ |
| धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः।<br>सजातीयगृहादेव कृच्छ्रार्धेन विशुद्ध्यति॥ ४१<br><br>मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य तु।<br>कूपवापीजलानां तु शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम्॥ ४२<br><br>द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः।<br>चरेत् सान्तपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यविशुद्धये॥ ४३<br><br>भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य तु।<br>पुष्पमूलफलानां तु पञ्चगव्यं विशोधनम्॥ ४४<br><br>तृणकाष्ठद्रुमाणां तु शुष्कान्नस्य गुडस्य च।<br>चैलचर्मामिषाणां तु त्रिरात्रं स्यादभोजनम्॥ ४५<br><br>मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।<br>अयस्कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नभुक्॥ ४६<br><br>कार्पासकीटजोर्णानां द्विशफैकशफस्य च।<br>पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः॥ ४७<br><br>एतैर्व्रतैर्व्यपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।<br>अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत्॥ ४८<br><br>गुरुतल्पव्रतं कुर्याद् रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु।<br>सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च॥ ४९<br><br>पैतृष्वस्त्रीयभगिनीं स्वस्त्रीयां मातुरेव च।<br>भ्रातुर्दुहितरं चैव गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ५० | यदि ब्राह्मण अपनी जातिवालोंके घरसे इच्छापूर्वक धान्य, अन्न और धनकी चोरी करता है तो वह अर्धकृच्छ्रव्रतसे शुद्ध होता है। मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कूप और बावलीके जलका हरण करनेपर शुद्धिके लिये चान्द्रायणव्रतका विधान है। दूसरेके घरसे थोड़ी मूल्यवाली वस्तुओंकी चोरी करनेपर उससे शुद्ध होनेके लिये कृच्छ्रसांतपन-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य, वाहन, शय्या, आसन, पुष्प, मूल और फलकी चोरी करनेपर उसका प्रायश्चित्त पञ्चगव्य-पान है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड, वस्त्र, चमड़ा तथा मांसकी चोरी करनेपर तीन राततक उपवास करना चाहिये। मणि, मोती, प्रवाल, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा तथा पत्थरकी चोरी करनेपर बारह दिनोंतक अन्नके कणोंका भोजन करना चाहिये। सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्र, दो तथा एक खुरवाले पशु, पक्षी, सुगन्धित द्रव्य, ओषधि तथा रस्सीकी चोरी करनेपर तीन दिनतक केवल जल पीकर रहना चाहिये। ब्राह्मणको इन व्रतोंद्वारा चोरीसे उत्पन्न हुए पापका निवारण करना चाहिये। अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेसे उत्पन्न हुए पापको इन व्रतोंद्वारा नष्ट करना चाहिये। अपनी जातिकी परायी स्त्रीके साथ समागम करके गुरुतल्प-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये अर्थात् गुरुकी स्त्रीके साथ समागम करनेपर जो प्रायश्चित्त कहा गया है, उसका अनुष्ठान करना चाहिये। मित्र तथा पुत्रकी स्त्री, कुमारी कन्या, नीच जातिकी स्त्री (चाण्डाली), फुफेरी तथा मौसेरी बहन और भाईकी कन्याके साथ समागम करनेपर चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये॥ ४१—५०॥ |
| * अध्याय २२७ * | ८९३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एताः स्त्रियस्तु भार्यार्थे नोपगच्छेत्तु बुद्धिमान्।<br>ज्ञातीनां च स्त्रियो यास्तु पतितानुगताश्च याः॥ ५१<br><br>अमानुषीषु पुरुषो उदक्यायामयोनिषु।<br>रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सांतपनं चरेत्॥ ५२<br><br>मैथुनं च समालोक्य पुंसि योषिति वा द्विजः।<br>गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत्॥ ५३<br><br>चाण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च।<br>पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात् साम्यं तु गच्छति॥ ५४<br><br>विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्त्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि।<br>यत् पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद् व्रतम्॥ ५५<br><br>सा चेत् पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपमन्त्रिता।<br>कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव तत् तस्याः पावनं स्मृतम्॥ ५६<br><br>यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः।<br>तद्भक्ष्यभुग् जपेन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति॥ ५७<br><br>एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः।<br>पतितैः सम्प्रयुक्तानामिमां शृणुत निष्कृतिम्॥ ५८ | बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जो स्त्रियाँ अपनी जातिकी हों तथा जो पतितोंकी अनुगामिनी हों, उनके साथ भार्याके समान समागम न करे। मनुष्यसे भिन्न योनि, ऋतुमती स्त्री तथा योनिद्वारसे अन्यत्र अथवा जलमें वीर्यपात करके पुरुषको कृच्छ्र-सान्तपन नामक व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। बैलगाड़ीपर, जलमें तथा दिनमें स्त्री-पुरुषके मैथुनको देखकर ब्राह्मणको वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये। ब्राह्मण यदि अज्ञानसे चाण्डाल और अन्त्यज स्त्रियोंके साथ सम्भोग, उनके यहाँ भोजन और उनका दिया हुआ दान ग्रहण करता है तो वह पतित हो जाता है और जान-बूझकर करता है तो वह उन्हींके समान हो जाता है। ब्राह्मणद्वारा दूषित स्त्रीको उसका पति एक घरमें बंद कर दे। इसी प्रकार दूसरेकी स्त्रियोंसे समागम करनेवाले पुरुषको भी यही व्रत करना चाहिये। यदि वह स्त्री पुनः किसी परकीय पुरुषसे दूषित होती है तो उसे शुद्ध करनेके लिये कृच्छ्रचान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान बताया गया है। जो द्विज एक रात भी शूद्र स्त्रीके साथ समागम करता है तथा उसका दिया हुआ अन्न भोजन करता है, वह तीन वर्षांतक निरन्तर गायत्रीजप करनेसे शुद्ध होता है। चारों वर्णोंके पापियोंके लिये यह प्रायश्चित्त कहा गया है। अब पतितोंके संसर्गमें होनेवाले पापके लिये यह प्रायश्चित्त सुनिये॥ ५१—५८॥ |
| संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्।<br>याजनाध्यापनाद् यौनादन्यानाशानासनात्॥ ५९<br><br>यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः।<br>स तस्यैव व्रतं कुर्यात् तत्संसर्गविशुद्धये॥ ६०<br><br>पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैः सह।<br>निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञातिभिर्गुरुसंनिधौ॥ ६१<br><br>दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत् प्रेतवत् सदा।<br>अहोरात्रमुपासीरन् नाशौचं बान्धवैः सह॥ ६२<br><br>निवर्त्तयेरंस्तस्मात्तु सम्भाषणसहासनम्।<br>दायादस्य प्रमाणं च यात्रामेव च लौकिकीम्॥ ६३<br><br>ज्येष्ठाभावान्निवर्तेत ज्येष्ठ्यावाप्तं च यत्पुनः।<br>ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान् गुणतोऽधिकः॥ ६४ | पतितके साथ यज्ञानुष्ठान, अध्यापन, यौन-सम्बन्ध, भोजन, एक वाहनपर गमन तथा आसनपर उपवेशन करनेसे भला मनुष्य (भी) एक वर्षमें पतित हो जाता है। जो मनुष्य इन कर्मोंमें जिस पतितका संसर्ग प्राप्त करता है, उसे उस संसर्गदोषकी शुद्धिके लिये उसी पतितके व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके सपिण्ड भाई-बन्धुओंको जातिवालोंके साथ किसी निन्दित दिनको सायंकालके समय गुरुके समीप उस पतितके लिये उदक-क्रिया करनी चाहिये। दासी उक्त व्यक्तिके लिये प्रेतकी तरह जलपूर्ण घट रखे, परिवारवालोंके साथ एक दिन-रातका उपवास करे और अशौचके समान व्यवहार करे। परिवारवालोंके लिये उसके साथ वार्तालाप करना और एक आसनपर बैठना निषिद्ध है। इस पाप-कर्मकी जातिको भी उन्हें नहीं प्रकट करना चाहिये—यह लोककी मर्यादा है। जिस प्रकार ज्येष्ठ भाईके न रहनेपर उसके हिस्सेकी प्राप्ति छोटे भाईको होती है, उसी प्रकार अधिक गुणवान् होनेपर भी छोटे भाईको उसका फल भोगना पड़ता है। |
८९४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| स्थापितां चापि मर्यादां ये भिन्द्युः पापकर्मिणः।<br>सर्वे पृथग्दण्डनीया राज्ञा प्रथमसाहसम्॥ ६५<br>शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति।<br>वैश्यस्तु द्विशतं राजञ्छूद्रस्तु वधमर्हति॥ ६६<br>पञ्चाशद्ब्राह्मणो दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने।<br>वैश्यस्याप्यर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः॥ ६७<br>क्षत्रियस्याप्नुयाद्वैश्यः साहसं पुनरेव च।<br>शूद्रः क्षत्रियमाक्रुश्य जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्॥ ६८ | जो पापाचारी प्राणी निश्चित की गयी मर्यादाको तोड़ देते हैं, उन्हें राजा पृथक्-पृथक् जाति-क्रमके अनुसार उत्तम साहसका दण्ड दे। राजन्! यदि क्षत्रिय होकर ब्राह्मणको कटु वचन कहता है तो उसे सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये। यदि वैश्य है तो उसे दो सौ मुद्राका और यदि शूद्र है तो उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। यदि ब्राह्मण क्षत्रियको कटु बातें कहे तो उसे पचास पण, वैश्यको कहे तो पचीस पण तथा शूद्रको कहे तो बारह पणका दण्ड देना चाहिये। यदि वैश्य क्षत्रियको कटु वचन कहता है तो उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये और शूद्र क्षत्रियको कटूक्ति सुनाता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये॥ ५९—६८॥ |
| पञ्चाशत्क्षत्रियो दण्ड्यस्तथा वैश्याभिशंसने।<br>शूद्रे चैवार्धपञ्चाशत्तथा धर्मो न हीयते॥ ६९<br>वैश्यस्याक्रोशने दण्ड्यः शूद्रश्चोत्तमसाहसम्।<br>शूद्राक्रोशे तथा वैश्यः शतार्धं दण्डमर्हति॥ ७०<br>सवर्णाक्रोशने दण्ड्यस्तथा द्वादशकं स्मृतम्।<br>वादेष्ववचनीयेषु तदेव द्विगुणं भवेत्॥ ७१<br>एकजातिर्द्विजातिं तु वाचा दारुणया क्षिपन्।<br>जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यः प्रथमो हि सः॥ ७२<br>नामजातिगृहं तेषामभिद्रोहेण कुर्वतः।<br>निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥ ७३<br>धर्मोपदेशं शूद्रस्तु द्विजानामभिकुर्वतः।<br>तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः॥ ७४<br>श्रुतिं देशं च जातिं च कर्म शारीरमेव च।<br>वितथं च ब्रुवन् दण्ड्यो राज्ञा द्विगुणसाहसम्॥ ७५<br>यस्तु पातकसंयुक्तः क्षिपेद् वर्णान्तरं नरः।<br>उत्तमं साहसं दण्डः पात्यस्तस्मिन् यथाक्रमम्॥ ७६<br>राज्ञो निवेशनियमं वितथं यान्ति वै मिथः।<br>सर्वे द्विगुणदण्ड्यास्ते विप्रलम्भान्नृपस्य तु॥ ७७<br>प्रीत्या मयास्याभिहितं प्रमादेनाथवा वदेत्।<br>भूयो न चैवं वक्ष्यामि स तु दण्डार्धभागभवेत्॥ ७८ | क्षत्रिय यदि वैश्यको बुरा-भला कहता है तो उसे पचास और शूद्रको कहता है तो पचीस दमका दण्ड देना चाहिये। ऐसा करनेसे उसका धर्म क्षीण नहीं होता। शूद्र यदि वैश्यको कटु वचन कहे तो उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये और वैश्य होकर शूद्रको बुरा-भला कह रहा है तो वह पचास दमके दण्डका भागी होता है। यदि कोई अपने वर्णवालेको कटूक्ति सुनाता है तो उसे बारह दमका दण्ड देना चाहिये तथा अकथनीय बातें कहनेपर वह दण्ड दुगुना हो जाता है। यदि द्विजातिसे भिन्न जातिवाला किसी द्विजातिको कठोर वाणीसे बुरा-भला कहता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये और उसे परम नीच समझना चाहिये। अधिक द्रोहवश नाम, जाति तथा घरकी निन्दा करनेवालेके मुखमें लोहेकी बारह अंगुल लम्बी जलती हुई शलाका डाल देनी चाहिये। राजाको द्विजातिको धर्मोपदेश करनेवाले शूद्रके मुख और कानमें खौलता हुआ तेल डाल देना चाहिये। वेद, देश, जाति और शारीरिक कर्मको निष्फल बतलानेवाला राजाद्वारा दुगुने साहसके दण्डका भागी होता है। जो मनुष्य स्वयं पापाचारी होकर दूसरे वर्णकी निन्दा करता है, उसे राजा जातिके अनुरूप उत्तम साहसका दण्ड दे। जो राजाके बनाये हुए नियमकी अवहेलना करते हैं अथवा राजाकी निन्दा करते हैं, उन सबको दुगुने साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति 'मैंने प्रेमवश अथवा प्रमादसे ऐसा कहा है, अब पुनः ऐसा नहीं कहूँगा' ऐसा कहकर अपराध स्वीकार कर लेता है, वह आधे दण्डका पात्र है॥ ६९—७८॥ |
| * अध्याय २२७ * | ८९५ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| काणं वाप्यथवा खञ्जमन्धं चापि तथाविधम्।<br>तथ्येनापि ब्रुवन् दाप्यो दण्डं कार्षापणं धनम्॥ ७९ | कोई काना हो, लँगड़ा हो अथवा अन्धा हो, उसे सत्यतापूर्वक उसी प्रकारका कहनेपर भी उसे एक कार्षापणका* दण्ड देना चाहिये। |
| मातरं पितरं ज्येष्ठं भ्रातरं श्वशुरं गुरुम्।<br>आक्रोशयञ्शतं दण्ड्यः पन्थानं चार्दयन् गुरोः॥ ८० | माता, पिता, ज्येष्ठ भाई, श्वशुर तथा गुरु—इनकी निन्दा करनेवाले तथा गुरुजनोंके मार्गको नष्ट करनेवालेको सौ कार्षापणका दण्ड देना चाहिये। |
| गुरुवर्ज्यं तु मानार्हं यो हि मार्गं न यच्छति।<br>स दाप्यः कृष्णलं राजंस्तस्य पापस्य शान्तये॥ ८१ | जो माननीय श्रेष्ठ लोगोंको मार्ग नहीं देता, उसे उस पापकी शान्तिके लिये राजा एक कृष्णलका दण्ड दे। |
| एकजातिर्द्विजातिं तु येनाङ्गेनापराध्नुयात्।<br>तदेव च्छेदयेत्तस्य क्षिप्रमेवाविचारयन्॥ ८२ | द्विजातिसे भिन्न जातिवाला व्यक्ति किसी द्विजातिका जिस अङ्गसे अपकार करता है, उसके उसी अङ्गको शीघ्र ही बिना कुछ विचार किये कटवा देना चाहिये। |
| अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः।<br>अवमूत्रयतो मेढ्रमपशब्दयतो गुदम्॥ ८३ | राजा सामने गर्वपूर्वक थूकनेवाले, पेशाब करनेवाले तथा अपानवायु छोड़नेवाले व्यक्तिका क्रमशः दोनों होंठ, लिङ्ग और गुदाद्वार कटवा दे। |
| सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः।<br>कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाप्यस्य कर्तयेत्॥ ८४ | यदि कोई नीच जातिवाला व्यक्ति उत्कृष्ट व्यक्तिके साथ आसनपर बैठना चाहता है तो राजा उसकी कमरमें एक चिह्न बनाकर अपने राज्यसे निर्वासित कर दे या उसके गुदाभागको कटवा दे। |
| केशेषु गृह्णतो हस्तं छेदयेदविचारयन्।<br>पादयोर्नासिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च॥ ८५ | इसी प्रकार यदि कोई निम्न जातिवाला किसी उच्च जातीय व्यक्तिके केशोंको पकड़ता है तो उसके हाथको बिना विचार किये ही कटवा देना चाहिये। इसी प्रकारका दण्ड दोनों पैरों, नासिका, गला तथा अण्डकोशके पकड़नेपर भी देना चाहिये। |
| त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः।<br>मांसभेत्ता च षण्णिष्कान्निर्वास्यस्त्वस्थिभेदकः॥ ८६ | यदि कोई किसीके चमड़ेको काट देता है और उससे रक्त निकलने लगता है तो उसे शतमूद्राका दण्ड देना चाहिये। मांस काट लेनेवालेको छः निष्कोंका दण्ड तथा हड्डी तोड़नेवालेको देशनिकालाका दण्ड देना चाहिये। |
| अङ्गभङ्गकरस्याङ्गं तदेवापहरेन्नृपः।<br>दण्डपारुष्यकृद् दण्ड्यः समुत्थानव्ययं तथा॥ ८७ | यदि कोई व्यक्ति किसीके अङ्गको तोड़-फोड़ देता है तो राजाको चाहिये कि उसके उसी अङ्गको कटवा दे तथा उसे उतने द्रव्यका भी दण्ड दे, जितना उस आहत व्यक्तिके उठने-बैठनेके व्ययके लिये अपेक्षित हो। |
| अर्धपादकरः कार्यो गोगजाश्वोष्ट्रघातकः।<br>पशुक्षुद्रमृगाणां च हिंसायां द्विगुणो दमः॥ ८८ | गाय, हाथी, अश्व और ऊँटकी हत्या करनेवालेका आधा हाथ और आधा पैर काट लेना चाहिये। राजाको पशु तथा छोटे जानवरोंकी हत्या करनेपर अपराधीको उनके मूल्यके दुगुने पणका दण्ड देना चाहिये। |
| पञ्चाशच्च भवेद् दण्ड्यस्तथैव मृगपक्षिषु।<br>कृमिकीटेषु दण्ड्यः स्याद् रजतस्य च माषकम्॥ ८९ | मृग तथा पक्षियोंकी हत्या करनेपर पचास पणका दण्ड करनेका विधान है। कृमि तथा कीटोंके मारनेपर एक मासा चाँदीका दण्ड लगाना उचित है |
| तस्यानुरूपं मूल्यं च प्रदद्यात् स्वामिने तथा।<br>स्वस्वामिकानां सकलं शेषाणां दण्डमेव तु॥ ९० | तथा उसके अनुकूल मूल्य भी उसके स्वामीको दिलाना चाहिये॥ ७९–८९ १/२ ॥<br><br>अब स्वतन्त्र पदार्थोंको नष्ट करनेपर लगनेवाले |
* १६ माशेकी स्वर्णमुद्रा या १६ पणकी रजतमुद्रा। (दे० मनु० ८। १३६, ३३६ आदि)
८९६ * मत्स्यपुराण *
| वृक्षं तु सफलं छित्त्वा सुवर्णं दण्डमर्हति।<br>द्विगुणं दण्डयेच्चैनं पथि सीम्नि जलाशये॥ ९१<br><br>छेदनादफलस्यापि मध्यमं साहसं स्मृतम्।<br>गुल्मवल्लीलतानां च सुवर्णस्य च माषकम्॥ ९२<br><br>वृथाच्छेदी तृणस्यापि दण्ड्यः कार्षापणं भवेत्।<br>त्रिभागं कृष्णला दण्ड्याः प्राणिनस्ताडने तथा॥ ९३<br><br>देशकालानुरूपेण मूल्यं राजा द्रुमादिषु।<br>तत्स्वामिनस्तथा दण्ड्या दण्डमुक्तस्तु पार्थिव ॥ ९४<br><br>यत्रातिवर्तते युग्यं वैगुण्यात् प्राजकस्य तु।<br>तत्र स्वामी भवेद् दण्ड्यो नाप्तश्चेत् प्राजको भवेत्॥ ९५<br><br>प्राजकश्च भवेदाप्तः प्राजको दण्डमर्हति।<br>नास्ति दण्डश्च तस्यापि तथा वै हेतुकल्पकः॥ ९६<br><br>द्रव्याणि यो हरेद् यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा।<br>स तस्योत्पादयेत् तुष्टिं राज्ञो दद्यात् ततो दमम्॥ ९७<br><br>यस्तु रज्जुं घटं कूपाद्धरेद् भिन्द्याच्च तां प्रपाम्।<br>स दण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्च सम्प्रतिपादयेत्॥ ९८<br><br>धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः।<br>शेषेऽप्येकादशगुणं तस्य दण्डं प्रकल्पयेत्॥ ९९<br><br>तथा भक्ष्यान्नपानानां न तथाप्यधिके वधः।<br>सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां न वाससाम्॥ १००<br><br>पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः।<br>महापशूनां हरणे शस्त्राणामौषधस्य च॥ १०१<br><br>मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति। | दण्डको बतला रहा हूँ। फलयुक्त वृक्षको काटनेपर अपराधीको सुवर्णका दण्ड देना उचित है। यदि वह वृक्ष किसी सीमा, मार्ग अथवा जलाशयके समीप है तो उसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। फलरहित वृक्षको भी काटनेपर मध्यमसाहसका दण्ड देनेका विधान है। गुल्मों, लताओं तथा वल्लियोंको काटनेपर एक मासा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। बिना किसी आवश्यकताके तृणको भी नष्ट करनेवाला व्यक्ति एक कार्षापणके दण्डका भागी होता है। किसी प्राणीको कष्ट पहुँचानेवालेको कृष्णलके तिहाई भागका दण्ड देना चाहिये। राजन्! वृक्षादिके काटे जानेपर राजा देश तथा कालके अनुसार उचित मूल्यका दण्ड दे और उस दण्डको वृक्षादिके स्वामीको दिला दे। यदि चालककी असावधानीसे रथ मार्गसे विचलित हो जाता है तो ऐसे अवसरपर यदि वह चालक निपुण नहीं है तो उसके स्वामीको दण्ड देना चाहिये और यदि चालक निपुण है तो उसीके ऊपर दण्ड लगाना चाहिये, किंतु यदि वह घटना किसी विशेष परिस्थितिवश घटित हुई हो तो चालकको भी दण्ड नहीं देना चाहिये। जो किसीके द्रव्यको जानकर या अनजानमें अपहरण कर लेता है, उसे राजाके सम्मुख दण्ड स्वीकार कर उसके स्वामीको संतुष्ट करना चाहिये। अन्यथा उसपर एक पण दण्ड लगानेका विधान है। जो व्यक्ति किसी कुएँपरसे रस्सी अथवा घड़ा चुरा लेता है या उस कुएँको तोड़ता-फोड़ता है, उसके ऊपर एक मासा सुवर्णका दण्ड लगाना उचित है और उसीसे कुएँकी क्षति-पूर्ति करानी चाहिये। दस घड़ेसे अधिक अन्न चुरानेवालेको प्राण-दण्ड देना चाहिये। यदि दस घड़ेसे कम अन्न चुराता है तो उसने जितना अन्न चुराया है, उससे ग्यारहगुना अधिक मूल्यका दण्ड उसपर लगाना चाहिये। उसी प्रकार दस घड़ेसे अधिक खाद्य-सामग्री, अन्न एवं पानादिकी चोरी करनेपर उसी प्रकारके दण्डका विधान है। उसे प्राणदण्ड नहीं देना चाहिये। सुवर्ण, चाँदी आदि धातुओं, उत्तम वस्त्रों, कुलीन पुरुषों, विशेषतया कुलीन स्त्रियों, बड़े-बड़े पशुओं, हथियारों, औषधियों तथा मुख्य-मुख्य रत्नोंकी चोरी करनेपर चोर प्राण-दण्डका पात्र होता है॥ ९०—१०१ १/२॥ |
| दध्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य रसस्य च॥ १०२<br><br>वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च।<br>मृन्मयानां च सर्वेषां मृदो भस्मन एव च॥ १०३ | दही, दूध, तक्र (छाँछ-मट्ठा), जल, रस, बाँस एवं वैदल आदिके पात्र, लवण, सभी प्रकारके मिट्टीके पात्र, मिट्टी और भस्मकी चोरी करनेवालेके लिये राजा |
२२८- अद्भुत शान्तिका वर्णन
- अध्याय २२७ * | ८९७ ---|---:
| कालमासाद्य कार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत्।<br>गोषु ब्राह्मणसंस्थासु महिषीषु तथैव च॥ १०४<br>अश्वापहारकश्चैव सद्यः कार्योऽर्धपादकः।<br>सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च॥ १०५<br>मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च।<br>मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यद्द्रव्यसम्भवम्॥ १०६<br>अन्येषां लवणादीनां मद्यानामोदनस्य च।<br>पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद् द्विगुणो दमः॥ १०७<br>पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्लीलतासु च।<br>अन्नेषु परिपूर्णेषु दण्डः स्यात् पञ्चमाषकम्।<br>परिपूर्णेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च॥ १०८<br>निरन्वये शतं दण्ड्यः सान्वये द्विशतं दमः।<br>येन येन यथाङ्गेन स्तेनोऽन्येषु विचेष्टते॥ १०९<br>तत्तदेव हरेत् तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः।<br>द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिर्द्वाविक्षू द्वे च मूलके॥ ११०<br>त्रपुसोर्वारुकौ द्वौ च तावन्मात्रं फलेषु च।<br>तथा च सर्वधान्यानां मुष्टिग्राहेण पार्थिव॥ १११<br>शाके शाकप्रमाणेण गृह्यमाणे न दुष्यति।<br>वानस्पत्यं फलं मूलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च॥ ११२<br>तृणं गोऽभ्यवहारार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत्।<br>अदेववाटिजं पुष्पं देवतार्थं तथैव च॥ ११३<br>आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति। | देश एवं कालके अनुसार दण्डकी व्यवस्था करे। ब्राह्मणके घरसे गाय, भैंस और घोड़ेकी चोरी करनेवालेको तुरंत ही आधे पैरवाला कर देना चाहिये। सूत, कपास, आसव, गोबर, गुड़, मछली, पक्षी, तेल, घी, मांस, मधु, नमक, मदिरा, भात एवं इनसे बनी हुई अन्यान्य वस्तुओं तथा सभी प्रकारके पकवानोंकी चोरी करनेवालेको उस वस्तुके मूल्यसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। पुष्प, कच्चा अन्न, गुल्म, लता, वल्ली तथा अधिक अन्नकी चोरी करनेवालेको पाँच मासा सुवर्णका दण्ड देना उचित है। प्रचुरमात्रामें अन्न, शाक, मूल और फलकी चोरी करनेवाले संतानहीनको सौ मुद्राका तथा संतानवालेको दो सौ पणका दण्ड देना चाहिये। चोर जिस-जिस अङ्गोंकी सहायतासे चोरी करनेकी चेष्टा करता है, राजा उसके उस अङ्गको कटवा दे। यदि कोई अकिंचन ब्राह्मण मार्गमें चलते हुए दो ईख, दो कन्द (मूली), दो खीरे, दो तरबूजे, दो अन्य फल, दो मुट्ठी सभी प्रकारके अन्न अथवा साग ले लेता है तो वह चोरीके दोषसे दूषित नहीं होता। भोजनके लिये वृक्षसे उत्पन्न हुए फल, मूल और जलौनी लकड़ीको काट लेना अथवा गौको खिलानेके लिये घास उखाड़ लेना चोरी नहीं है—ऐसा मनुजीने कहा है। देवताकी वाटिकासे भिन्न दूसरेके खेतमें उत्पन्न हुए पुष्पको देवताकी पूजाके लिये तोड़नेवाला दण्डका पात्र नहीं होता, उसे दण्ड नहीं देना चाहिये॥ १०२—११३ १/२॥ | | शृङ्गिणं नखिनं राजन् दंष्ट्रिणं च वधोद्यतम्॥ ११४<br>यो हन्यान्न स पापेन लिप्यते मनुजेश्वर। | राजन्! जो अपनेको मारनेके लिये उद्यत सींगवाले, नखवाले तथा दाढ़वाले पशुको मारता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता। | | गुरुं वा बालवृद्धं वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्॥ ११५<br>आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।<br>नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन॥ ११६ | गुरु, बालक, वृद्ध अथवा शास्त्रज्ञ ब्राह्मण ही क्यों न हो, यदि वह अपनेको मारनेके लिये आ रहा हो तो उसे बिना विचार किये ही मार डालना चाहिये;* क्योंकि आततायीका वध करनेपर वधकर्ताको कोई पाप नहीं लगता। | | प्रकाशं वाप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्यूमृच्छति। | प्रकटरूपमें अथवा गुप्तरूपमें भी पाप करनेवाला पापका भागी होता है। | | गृहक्षेत्राभिहर्तारस्तथागम्याभिगामितः ॥ ११७<br>अग्निदो गरदश्चैव तथा चाभ्युद्यतायुधः।<br>अभिचारं तु कुर्वाणो राजगामि च पैशुनम्॥ ११८ | दूसरोंके घर तथा खेतका अपहरण करनेवाले, अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले, आग लगानेवाले, विष देनेवाले, हथियार लेकर मारनेके लिये उद्यत, अभिचारपरायण, राजाके विरोधमें विद्रोह करनेवाले— |
* मिताक्षरादिके मतसे यह अर्थवाद है।
८९८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते हि कथिता लोके धर्मज्ञैराततायिनः ।<br>भिक्षुकोऽप्यथवा नारी योऽपि वा स्यात् कुशीलवः ॥ ११९<br>प्रविशेत् प्रतिषिद्धस्तु प्राप्नुयाद् द्विगुणं दमः ।<br>परस्त्रीणां तु सम्भाषे तीर्थेऽरण्ये गृहेऽपि वा ॥ १२०<br>नदीनां चैव सम्भेदे स संग्रहणमाप्नुयात् ।<br>न सम्भाषेत् परस्त्रीभिः प्रतिषिद्धः समाचरेत् ॥ १२१<br>प्रतिषिद्धे समाभाष्य सुवर्णं दण्डमर्हति ।<br>नैव चारणदारेषु विधिरात्मोपजीविषु ॥ १२२<br>सज्जयन्ति मनुष्यैस्ता निगूढं वा चरन्त्युत ।<br>किंचिदेव तु दाप्यः स्यात् सम्भाषेणापचारयन् ॥ १२३<br>प्रेष्यासु चैव सर्वासु गृहप्रव्रजितासु च ।<br>योऽकामां दूषयेत् कन्यां स सद्यो वधमर्हति ॥ १२४<br>सकामां दूषयाणस्तु प्राप्नुयाद् द्विशतं दमम् ।<br>यश्च संरक्षकस्तत्र पुरुषः स तथा भवेत् ॥ १२५ | इनको धर्मज्ञोंने लोकमें आततायी बतलाया है। यदि भिक्षुक, परायी स्त्री तथा चारण आदि निषेध करनेपर भी घरमें घुस जाते हैं तो उन्हें दुगुना दण्ड देना चाहिये। तीर्थ, जंगल या घरमें परायी स्त्रियोंके साथ वार्तालाप करनेवाले तथा नदीकी धाराका भेदन करनेवालेको पकड़कर बंद कर देना चाहिये। 'परायी स्त्रीके साथ सम्भाषण नहीं करना चाहिये'—ऐसी निषेधाज्ञा घोषित कर दे। निषेध होनेपर भी यदि कोई सम्भाषण करता है तो वह एक सुवर्ण-मुद्राके दण्डका भागी होता है। किंतु यह दण्ड चारणों, स्त्रियों तथा अन्तःपुरमें प्रवेश कर नृत्य-गीतादिद्वारा अपनी जीविका चलानेवालेको नहीं देना चाहिये। ऐसे लोग यदि अन्तःपुरके लोगोंके साथ सम्भाषण करते हैं या वहाँ घूमते-फिरते हैं तो उन्हें तथा घरसे निकालकर बाहर घूमती हुई सभी दासियोंको नाममात्रका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति किसी कुमारी कन्याके साथ बलात्कार करता है, वह तुरंत ही मार डालने योग्य है। यदि कोई किसी कामुकी कुमारी कन्याके साथ व्यभिचार करता है तो उसे दो सौ पणका दण्ड देना चाहिये और वहाँ जो संरक्षणकर्ता पुरुष है, उसे भी यही दण्ड देना चाहिये॥ ११९—१२५॥ |
| पारदारिकवद् दण्ड्यो योऽपि स्यादवकाशदः ।<br>बलात् संदूषयेद् यस्तु परभार्यां नरः क्वचित् ॥ १२६<br>वधो दण्डो भवेत्तस्य नापराधो भवेत् स्त्रियाः ।<br>रजस्तृतीयां या कन्या स्वगृहे प्रतिपद्यते ॥ १२७<br>अदण्ड्या सा भवेद् राज्ञा वरयन्ती पतिं स्वयम् ।<br>स्वदेशे कन्यकां दत्त्वा तामादाय तथा व्रजेत् ॥ १२८<br>परदेशे भवेद् वध्यः स्त्रीचौरः स यतो भवेत् ।<br>अद्रव्यां मृतपत्नीं तु संगृह्णन्नापराध्यति ॥ १२९<br>सद्रव्यां तां संगृहीता दण्डं तु क्षिप्रमर्हति ।<br>उत्कृष्टं या भजेत् कन्या देया तस्यैव सा भवेत् ॥ १३०<br>यच्चान्यं सेवमानां च संयतां वासयेद् गृहे ।<br>उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति ।<br>जघन्यमुत्तमा नारी सेवमाना तथैव च ॥ १३१ | जो ऐसे व्यभिचारोंको सम्भव बनानेमें अवकाश देता है, उसे परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवालेके समान ही दण्ड देना चाहिये। जो मनुष्य दूसरेकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, उसे प्राणदण्ड देना चाहिये और इसमें उस स्त्रीका कोई भी अपराध नहीं मानना चाहिये। जो कन्या पिताके घरपर तीसरी बार रजस्वला होकर स्वयं पतिका वरण कर लेती है, वह राजाद्वारा दण्डनीय नहीं होती। जो अपने देशमें कन्यादान देकर पुनः उसे लेकर परदेशमें भाग जाता है, उसे प्राणदण्ड देना चाहिये; क्योंकि वह स्त्री-चोर है। द्रव्यहीना, विधवा स्त्रीको ग्रहण करनेवाला अपराधी नहीं माना जाता, किंतु सम्पत्तिसहित विधवाको स्वीकार करनेवाला शीघ्र ही दण्डका भागी होता है। जो कन्या अपनी जाति अथवा योग्यतासे उत्कृष्ट व्यक्तिसे प्रेम करती है तो उसे उसी व्यक्तिको दे देना चाहिये, किंतु जो कन्या किसी कम योग्यतावालेसे प्रेम करती है, उसे विशेष संयमके साथ घरमें ही रखे। यदि नीच जातिवाला जघन्य पुरुष उत्तम जातिकी कन्याके साथ प्रेम करता है तो उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार यदि उत्तम जातिकी स्त्री किसी नीच जातिके पुरुषके साथ प्रेम करती है तो वह भी प्राण-दण्डके योग्य है। |
| * अध्याय २२७ * | ८९१ |
|---|
| भर्तारं लङ्घयेद् या स्त्री ज्ञातिभिर्बलदर्पिता।<br>तां च निष्कासयेद् राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥ १३२<br><br>हताधिकारां मलिनां पिण्डमात्रोपजीविनीम्।<br>वासयेत् स्वैरिणीं नित्यं सवर्णेनाभिदूषिताम् ॥ १३३<br><br>ज्यायसा दूषिता नारी मुण्डनं समवाप्नुयात्।<br>वासश्च मलिनं नित्यं शिखां सम्प्राप्नुयाद् दश ॥ १३४<br><br>ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः क्षत्रविट्शूद्रयोषितः।<br>व्रजन् दाप्यो भवेद् राज्ञा दण्डमुत्तमसाहसम् ॥ १३५<br><br>वैश्यागमे च विप्रस्य क्षत्रियस्यान्त्यजागमे।<br>मध्यमं प्रथमं वैश्यो दण्ड्यः शूद्रागमाद् भवेत् ॥ १३६<br><br>शूद्रः सवर्णागमने शतं दण्ड्यो महीक्षिता।<br>वैश्यस्तु द्विगुणं राजन् क्षत्रस्तु त्रिगुणं तथा ॥ १३७<br><br>ब्राह्मणश्च भवेद् दण्ड्यस्तथा राजंश्चतुर्गुणम्।<br>अगुप्तासु भवेद् दण्डः सुगुप्तास्वधिको भवेत् ॥ १३८ | जो स्त्री अपने जाति-भाइयोंके बलसे गर्वीली होकर अपने पतिको छोड़ देती है, उसे घरसे निकालकर अनेक व्यक्तियोंसे युक्त संस्थानमें रख दे। राजा सवर्ण पुरुषद्वारा दूषित कुलटा स्त्रीको सभी अधिकारोंसे वञ्चित कर मलिन बना दे और भोजनमात्रका प्रबन्ध कर घरमें पड़ा रहने दे। उत्तम कुल एवं जातिमें उत्पन्न हुई स्त्री यदि दूषित हुई हो तो उसकी दस चोटियाँ रखकर शेष बाल कटवा दे और नित्य मैला वस्त्र पहननेको दे। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी स्त्रीके साथ दुराचार करते हैं तो वे राजाद्वारा उत्तमसाहस नामक दण्डके भागी होते हैं। यदि ब्राह्मण वैश्य-स्त्रीके साथ और क्षत्रिय अन्त्यज-स्त्रीके साथ पापाचरण करते हैं तो उन्हें मध्यमसाहसका दण्ड देना चाहिये और यदि वैश्य शूद्रा स्त्रीके साथ व्यभिचार करता है तो उसे भी पूर्वोक्त रीतिके अनुसार उत्तमसाहसका दण्ड मिलना चाहिये। राजन्! यदि शूद्र अपनी जातिकी स्त्रीके साथ समागम करता है तो उसे राजाद्वारा सौ मुद्राओंका दण्ड मिलना चाहिये। इसी प्रकार सवर्णा स्त्रीके साथ पापाचरण करनेसे वैश्यको दो सौ, क्षत्रियको तीन सौ तथा ब्राह्मणको चार सौ मुद्राओंका दण्ड देनेका विधान है। ये दण्ड अरक्षित स्त्रीके साथ पापाचरण करनेपर बताये गये हैं, किंतु सुरक्षित स्त्रियोंके साथ दुराचार करनेपर इससे अधिक दण्ड देना चाहिये ॥ १२६-१३८ ॥ | | माता पितृष्वसा श्वश्रूर्मातुलानी पितृव्यजा।<br>पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भगिनी तत्सखी तथा।<br>भ्रातृभार्यागमे पूर्वाद् दण्डस्तु द्विगुणो भवेत् ॥ १३९<br><br>भागिनेयी तथा चैव राजपत्नी तथैव च।<br>तथा प्रव्रजिता नारी वर्णोत्कृष्टा तथैव च ॥ १४०<br><br>इत्यगम्याश्च निर्दिष्टास्तासां तु गमने नरः।<br>शिश्नस्योत्कर्तनं कृत्वा ततस्तु वधमर्हति ॥ १४१<br><br>चण्डालीं च श्वपाकीं च गच्छन् वधमवाप्नुयात् ॥ १४२<br><br>तिर्यग्योनिं च गोवर्ज्यं मैथुनं यो निषेवते।<br>वपनं प्राप्नुयाद् दण्डं तस्याश्च यवसोदकम् ॥ १४३ | माता, फूफी, सास, मामी, चचेरी बहन, चाचीकी सखी, शिष्यकी स्त्री, बहिन, उसकी सखी तथा भाईकी स्त्री—इन सबके साथ समागम करनेपर पूर्वकथित दण्डसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। भानजेकी स्त्री, राजाकी पत्नी, संन्यासिनी तथा उच्चवर्णकी स्त्री—ये सभी अगम्या मानी गयी हैं। इन सबके साथ समागम करनेवाले व्यक्तिके लिंगको कटवाकर तत्पश्चात् उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार चाण्डालकी स्त्री तथा कुत्तेको खानेवालोंकी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवालेको प्राण-दण्ड देना चाहिये। गौको छोड़कर अन्य तिर्यग् योनियोंमें सम्भोग करनेवाले व्यक्तिको मुण्डनका दण्ड देकर उस पशुके लिये घास तथा जल देनेका दण्ड देना चाहिये। |
२२९- उत्पातोंके भेद तथा कतिपय ऋतुस्वभावजन्य शुभदायक अद्भुतोंका वर्णन
९०० * मत्स्यपुराण *
| सुवर्णं च भवेद् दण्ड्यो गां व्रजन् मनुजोत्तम।<br>वेश्यागामी द्विजो दण्ड्यो वेश्याशुल्कसमं पणम्॥ १४४<br><br>गृहीत्वा वेतनं वेश्या 'लोभादन्यत्र गच्छति।<br>वेतनं द्विगुणं दद्याद् दण्डं च द्विगुणं तथा॥ १४५<br><br>अन्यमुद्दिश्य यो वेश्यां नयेदन्यस्य कारणात्।<br>तस्य दण्डो भवेद् राजन् सुवर्णस्य च माषकम्॥ १४६<br><br>नीत्वा भोगान्न यो दद्याद् दाप्यो द्विगुणवेतनम्।<br>राज्ञश्च द्विगुणं दण्डं तथा धर्मो न हीयते॥ १४७<br><br>बहूनां व्रजतामेकां सर्वे ते द्विगुणं दमम्।<br>दद्युः पृथक् पृथक् सर्वे दण्डं च द्विगुणं परम्॥ १४८<br><br>न माता न पिता न स्त्री न ऋत्विग् याज्यमानवाः।<br>अन्योन्यं पतितास्त्याज्या योगे दण्ड्याः शतानि षट्॥ १४९<br><br>पतिता गुरवस्त्याज्या न तु माता कथञ्चन।<br>गर्भधारणपोषाभ्यां तेन माता गरीयसी॥ १५०<br><br>अधीयानोऽप्यनध्याये दण्ड्यः कार्षापणत्रयम्।<br>अध्यापकश्च द्विगुणं तथाऽऽचारस्य लङ्घने॥ १५१<br><br>अनुक्तस्य भवेद् दण्डः सुवर्णस्य च कृष्णलम्।<br>भार्या पुत्रश्च दासश्च शिष्यो भ्राता च सोदरः॥ १५२<br><br>कृतापराधास्ताड्याः स्यू रज्ज्वा वेणुदलेन वा।<br>पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गं कथञ्चन॥ १५३<br><br>अतोऽन्यथा प्रहरतः प्राप्तं स्याच्चोरकिल्बिषम्।<br>दूतीं समाह्वयंश्चैव यो निषिद्धं समाचरेत्॥ १५४<br><br>प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा स दण्ड्यः पार्थिवेच्छया।<br>वासांसि फलकैः श्लक्ष्णैर्निर्णिज्याद् रजकः शनैः॥ १५५<br><br>अतोऽन्यथा हि कुर्वंस्तु दण्ड्यः स्याद् रुक्मभाषकम्।<br>रक्षास्वधिकृतैश्चैव प्रदेयं यैर्विलुप्यते॥ १५६ | मानवश्रेष्ठ! गौके साथ भोग करनेवाले व्यक्तिको सुवर्णका दण्ड लगाना चाहिये। वेश्याके साथ समागम करनेवाले ब्राह्मणको वेश्याको दिये गये शुल्कके बराबर अर्थ-दण्ड देना चाहिये। वेश्या यदि वेतन स्वीकार करनेके उपरान्त लोभवश अन्यत्र चली जाती है तो उसे दुगुना दण्ड देनेके उपरान्त लिये हुए शुल्कका दूना अर्थ-दण्ड भी देना चाहिये। राजन्! यदि कोई वेश्याको दूसरेके बहानेसे किसी दूसरेके पास लिवा जाता है तो उसे एक मासा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। जो वेश्याको लानेके बाद उसके साथ सम्भोगादि नहीं करता, उसे दूना दण्ड देकर उस वेश्याको दूना शुल्क दिलाना चाहिये। ऐसा करनेसे राजाका धर्म क्षीण नहीं होता। यदि अनेक व्यक्ति एक वेश्याके साथ समागम करनेको उपस्थित हों तो राजा उनको दूना दण्ड दे और वे सब पृथक्-पृथक् उस वेश्याको दूना द्रव्य दण्डरूपमें अधिक दें। माता, पिता, स्त्री, पुरोहित और यजमान—ये पतित होनेपर भी नहीं छोड़े जाते, पर यदि कोई मनुष्य इनमेंसे किसीको छोड़ता है तो वह छः सौ सुवर्ण-मुद्राओंका दण्डभागी होता है। पतित होनेपर गुरुजन भी त्याज्य हो सकते हैं, किंतु माता नहीं छोड़ी जा सकती। गर्भकालमें धारण-पोषण करनेके कारण माताका गौरव गुरुजनोंसे भी अधिक है॥ १३९-१५०॥<br><br>अनध्यायके दिन भी अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणको तीन कार्षापणका दण्ड देना चाहिये और अध्यापकको दुगुना दण्ड देनेका विधान है। इसी प्रकार उन्हें अपने-अपने आचारोंका उल्लङ्घन करनेपर भी दण्ड देना चाहिये। जिन-जिन अपराधोंमें केवल दण्डकी चर्चा की गयी है और कोई परिमाण नहीं निश्चित किया गया है, वहाँ सुवर्णका एक कृष्णल दण्डरूपमें समझना चाहिये। स्त्री, पुत्र, सेवक, शिष्य तथा सगा भाई—ये यदि अपराध करते हैं तो इन्हें रस्सीसे बाँधकर बाँसकी छड़ीसे शरीरके पिछले भागपर दण्ड देना चाहिये; किंतु सिरपर किसी प्रकार भी चोट न लगने दे। इन कहे गये स्थानोंके अतिरिक्त अन्य स्थानोंपर प्रहार करनेवालेको चोरी करनेके समान पाप लगता है। जो दूतीको बुलाकर प्रकटरूपमें या गूप्तरूपमें निषिद्धाचरण करता है, उसके लिये राजा स्वेच्छानुसार दण्डकी व्यवस्था करे। धोबीको चाहिये कि वह कोमल काठके पीठकोंपर वस्त्रको धीरे-धीरे साफ करे। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसे एक मासे सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। राजाकी ओरसे रक्षा आदि स्थानोंपर नियुक्त किये गये लोग यदि देय भागको हड़प |
* अध्याय २२७ * । ९०१
| कर्षकेभ्योऽर्थमादाय यः कुर्यात् करमन्यथा।<br>तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत्॥ १५७<br><br>ये नियुक्ताः स्वकार्येषु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम्।<br>निर्घृणाः क्रूरमनसः सर्वे कर्मापराधिनः॥ १५८<br><br>धनोष्मणा पच्यमानांस्तान् निःस्वान् कारयेन्नृपः।<br>कूटशासनकर्तृंश्च प्रकृतीनां च दूषकान्॥ १५९<br><br>स्त्रीबालब्राह्मणघ्नांश्च वध्यात् तत्सेविनस्तथा।<br>अमात्यः प्राड् विवाको वा यः कुर्यात् कार्यमन्यथा॥ १६०<br><br>तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत्।<br>ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च तस्करो गुरुतल्पगः॥ १६१<br><br>एतान् सर्वान् पृथग्दिश्यान्महापातकिनो नरान्।<br>महापातकिनो वध्या ब्राह्मणं तु विवासयेत्॥ १६२<br><br>कृतचिह्नं स्वदेशाच्च शृणु चिह्नाकृतिं ततः।<br>गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः॥ १६३<br><br>स्तेने तु श्वपदं तद्वद् ब्रह्महन्यशिराः पुमान्।<br>असम्भाष्या ह्यसम्भाज्या असंवाह्या विशेषतः॥ १६४<br><br>त्यक्तव्याश्च तथा राजन्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः।<br>महापातकिनो वित्तमादाय नृपतिः स्वयम्॥ १६५<br><br>अप्सु प्रवेशयेद् दण्डं वरुणायोपपादयेत्।<br>सहोढं न विना चोरं घातयेद् धार्मिको नृपः॥ १६६<br><br>सहोढं सोपकरणं घातयेदविचारयन्।<br>ग्रामेष्वपि च ये केचिच्चोराणां भक्ष्यदायकाः॥ १६७<br><br>भाण्डावकाशादाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत्।<br>राष्ट्रेषु राज्ञाधिकृताः सामन्ताश्चैव दूषकाः॥ १६८<br><br>अभ्याघातेषु मध्यस्थाः क्षिप्रं शास्यास्तु चोरवत्।<br>ग्रामघाते मठाभङ्गे पथि मोषाभिमर्दने॥ १६९<br><br>शक्तितो नाभिधावन्तो निर्वास्याः सपरिच्छदाः।<br>राज्ञः कोषापहर्तूंश्च प्रतिकूलेषु संस्थितान्॥ १७० | लेते हैं या किसानोंसे कर लेकर उसे दूसरे कार्योंमें लगा देते हैं तो राजा उनका सर्वस्व छीनकर उन्हें निर्वासनका दण्ड दे। जो लोग अपने पदपर नियुक्त होकर अन्य कर्मचारियोंके कार्योंको हानि पहुँचाते हैं, वे सभी निर्दय, क्रूरात्मा, कर्मके अपराधी और धनकी गर्मीसे उन्मत्त हो जाते हैं, राजाको चाहिये कि उन्हें निर्धन बना दे। यदि राजाके सेवकगण कूटनीतिसे शासन करनेवाले, प्रजावर्गको राजाके विरुद्ध भड़कानेवाले, स्त्री, बालक और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले हों तो राजा उन्हें प्राण-दण्ड दे। चाहे अमात्य हो या प्रधान न्यायकर्ता, यदि वह अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता तो राजा उसका सर्वस्व छीनकर उसे अपने देशसे बाहर निकाल दे। ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर तथा गुरु-स्त्रीगामी—इन महापातकी पुरुषोंको राजा पृथक्-पृथक् प्राण-दण्डकी व्यवस्था करे। ऐसे महापापियोंको राजा प्राण-दण्ड दे, किंतु ब्राह्मणको चिह्नित करके अपने देशसे निकाल दे। उक्त चिह्नका आकार बताता हूँ, सुनिये। यदि ब्राह्मण गुरुपत्नीके साथ समागम करता है तो उसके शरीरमें भगका आकार, मदिरापायी हो तो सुराध्वजका चिह्न, चोरीके अपराधमें कुत्तेके पैरोंका चिह्न तथा ब्रह्मघातीके शरीरमें बिना सिरके पुरुषका चिह्न बनाना चाहिये। राजन्! ऐसे घोर पापियोंके साथ उनकी जातिवाले, सम्बन्धी तथा भाई-बन्धुओंको विशेषतया सम्भाषण, सहभोज तथा विवाहादि-सम्बन्ध त्याग देना चाहिये॥ १५१—१६४ १/२ ॥<br><br>राजा महापापी पुरुषोंकी सम्पत्तिको अपने अधीन कर ले और उसमेंसे दण्डभागको वरुणके उद्देश्यसे जलमें छोड़ दे। धार्मिक राजाको सपत्नीक चोरको प्राण-दण्ड नहीं देना चाहिये, किंतु चुरायी हुई वस्तुके साथ ही यदि सपत्नीक चोर पकड़ा जाता है तो उसे भी राजा बिना किसी विचारके प्राण-दण्ड दे। ग्रामोंमें भी जो कोई चोरोंको भोजन, पात्र तथा रहनेका आश्रय देनेवाले हों तो इन सभीको प्राण-दण्ड देना चाहिये। राष्ट्रमें राजाके अधिकारी तथा अधीनस्थ सामन्तगण यदि दुष्ट हो गये हों या बुरे अवसरपर तटस्थ रहते हों तो वे भी चोरोंके समान दण्डके भागी होते हैं। ग्राममें किसी विनाशके उपस्थित होनेपर, किसी घर आदिके गिरनेके अवसरपर या मार्गमें किसी रमणीपर अत्याचार किये जानेपर राजाके जो अधिकारी या सामन्त अपनी शक्तिके अनुसार उसकी रक्षाके लिये नहीं दौड़ते, वे परिवार तथा साधनसहित निर्वासित कर देने योग्य हैं। राजाके कोशको अपहृत करनेवालों, |
२३०- अद्भुत उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
९०२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अरीणामुपकर्तॄंश्च घातयेद् विविधैर्वधैः।<br>संधिं कृत्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः॥ १७१<br>तेषां छित्त्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णशूले निवेशयेत्।<br>तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन तु॥ १७२<br>यस्तु पूर्वं निविष्टं स्यात् तडागस्योदकं हरेत्।<br>आगमं चाप्यपां भिन्द्यात् स दाप्यः पूर्वसाहसम्॥ १७३<br>कोष्ठागारायुधागारदेवागारविभेदकान् ।<br>पापान् पापसमाचारान् पातयेच्छीघ्रमेव च॥ १७४ | शत्रु-पक्षसे मिले रहनेवालों तथा शत्रुओंका उपकार करनेवालोंको विविध वधोपायोंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो चोर रातमें सेंध लगाकर चोरी करते हैं, राजाको उनके हाथोंको काटकर तीखे शूलपर बैठा देना चाहिये। तड़ागका भेदन करनेवालेको राजा जलमें डुबोकर मृत्युदण्ड दे। जो व्यक्ति तालाबमें भरे हुए जलकी चोरी करता है या उसमें जलके आनेके मार्गोंको रोक देता है, उसे पूर्ववत् साहस-दण्ड देना चाहिये। कोष्ठागार, आयुधागार तथा देवागारोंको तोड़नेवाले पापाचारियों एवं पापयुक्त किंवदन्तीसे लिप्त पुरुषोंको राजा शीघ्र ही प्राण-दण्ड दे ॥१६५-१७४॥ |
| समुत्सृजेद् राजमार्गं यस्त्वमेध्यमनापदि।<br>स हि कार्षापणं दण्ड्यस्तत्त्वमेध्यं च शोधयेत्॥ १७५<br>आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव च।<br>परिभाषणमर्हन्ति न च शोध्यमिति स्थितिः॥ १७६ | जो किसी आपत्तिके न होनेपर भी सड़कपर मल आदि अपवित्र वस्तुओंको फेंकता है, उसे एक कार्षापणका दण्ड देना चाहिये और उसीसे उस गंदी वस्तुको हटवाना चाहिये। यदि आपत्तिग्रस्त, वृद्ध, गर्भिणी स्त्री अथवा बालक ऐसा अपराध करते हैं तो उन्हें कहकर मना कर दे, उनसे सफाई न कराये, ऐसी मर्यादा है। |
| प्रथमं साहसं दण्ड्यो यश्च मिथ्या चिकित्सते।<br>परुषे मध्यमं दण्डमुत्तमं च तथोत्तमे॥ १७७ | जो वैद्य झूठी दवा करता है या वैद्य न होकर भी दवा देता है, उसे प्रथम साहसका दण्ड देना चाहिये। जिसकी दवा निकृष्ट है, उसे मध्यम साहसका दण्ड तथा जिसकी दवा अत्यन्त अवगुणकारी है, उसे उत्तमसाहसका दण्ड देना चाहिये। |
| छत्रस्य ध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकाः।<br>प्रतिकुर्युस्ततः सर्वे पञ्च दण्ड्याः शतानि च॥ १७८ | छत्र, ध्वजाके दण्डों तथा प्रतिमाओंको तोड़नेवालेको पाँच सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये और उन्हींसे इन सबका प्रतिशोध भी कराना चाहिये। |
| अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा।<br>मणीनामपि भेदेन दण्ड्यः प्रथमसाहसम्॥ १७९ | अदूषित वस्तुओंको दूषित करने या तोड़नेवालेको तथा मणि आदि मूल्यवान् वस्तुओंको नष्ट करनेवालेको प्रथमसाहसका दण्ड देना चाहिये। |
| समं च विषमं चैव कुरुते मूल्यतोऽपि वा।<br>समाप्नुयात् स वै पूर्वं दमं मध्यममेव च॥ १८० | किसी वस्तुके मूल्यमें जो कमी या वृद्धि करता है, उसे क्रमशः पूर्व और मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये। |
| बन्धनानि च सर्वाणि राजमार्गे निवेशयेत्।<br>कर्षन्तो यत्र दृश्यन्ते विकृताः पापकारिणः॥ १८१ | राजाको अपराधियोंके सभी प्रकारके दण्डोंकी व्यवस्था मुख्य सड़कपर करनी चाहिये जिससे उस दण्डको भुगतनेवाले पापात्माको सभी लोग देख सकें। |
| प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च भेदकम्।<br>द्वाराणां चैव भेत्तारं क्षिप्रं निर्वासयेत् पुरात्॥ १८२ | दुर्गकी चहारदीवारी, खाइयों तथा दरवाजोंको तोड़नेवालेको राजा तुरंत अपने पुरसे बाहर निकाल दे। |
| मूलकर्मार्भिचारेषु कर्तव्यो द्विशतो दमः।<br>अबीजविक्रयी यश्च बीजोत्कर्षक एव च॥ १८३ | वशीकरण, अभिचार आदि करनेवालेको राजा दो सौ पणका दण्ड दे। घटिया बीज बेचनेवाले, बोये हुए खेतको जोतनेवाले |
| मर्यादाभेदकश्चापि विकृतं वधमाप्नुयात्।<br>सर्वसंकरपापिष्ठं हेमकारं नराधिप॥ १८४ | तथा खेतोंकी मेड़को तोड़नेवालेको विकृत मृत्युका दण्ड देना चाहिये। नराधिप! अच्छी धातुमें नकली धातु |
२३१- अग्निसम्बन्धी उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
| * अध्याय २२७ * | ९०३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अन्याये वर्तमानं च छेदयेल्लवशः क्षुरैः।<br>द्रव्यमादाय वणिजामनर्घेणावरुन्धताम् ॥ १८५<br><br>द्रव्याणां दूषको यस्तु प्रतिच्छन्नस्य विक्रयी।<br>मध्यमं प्राप्नुयाद् दण्डं कूटकर्ता तथोत्तमम् ॥ १८६<br><br>राजा पृथक् पृथक् कुर्याद् दण्डं चोत्तमसाहसम्।<br>शास्त्राणां यज्ञतपसां देशानां क्षेपको नरः ॥ १८७<br><br>देवतानां सतीनां च उत्तमं दण्डमर्हति।<br>एकस्य दण्डपारुष्ये बहूनां द्विगुणो दमः ॥ १८८ | मिलानेवाले पापात्मा एवं अन्यायी सोनारको छुरेसे खण्ड-खण्ड काट डालना चाहिये। जो बनियेसे वस्तु लेकर उसका दाम नहीं चुकाता, अच्छी वस्तुको बुरी बतलाता है और वस्तुको बाजारमें छिपाकर बेंचता है, उसे मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार कूटनीतिका प्रयोग करनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देनेका विधान है। इन सभी अपराधियोंको राजा अलग-अलगसे उत्तम साहसका दण्ड दे। शास्त्र, यज्ञ, तपस्या, देश, देवता तथा सतीकी निन्दा करनेवाला पुरुष उत्तम साहसके दण्डका पात्र है। अनेक व्यक्ति किसी एक व्यक्तिके प्रति कठोर दण्डनीय अपराध करते हैं तो उन सबको दुगुना दण्ड देना चाहिये ॥१८५–१८८॥ |
| कलहो यद्गतो दाप्यो दण्डश्च द्विगुणस्ततः।<br>मध्यमं ब्राह्मणं राजा विषयाद् विप्रवासयेत् ॥ १८९<br><br>लशुनं च पलाण्डुं न शूकरं ग्रामकुक्कुटम्।<br>तथा पञ्चनखं सर्वं भक्ष्यादन्यत्तु भक्षयेत् ॥ १९०<br><br>विवासयेत् क्षिप्रमेव ब्राह्मणं विषयात् स्वकात्।<br>अभक्ष्यभक्षणे दण्ड्यः शूद्रो भवति कृष्णलम् ॥ १९१<br><br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां चतुस्त्रिद्विगुणं स्मृतम्।<br>यः साहसं कारयति स दण्ड्यो द्विगुणं दमम् ॥ १९२<br><br>यस्त्वेवमुक्तवाहं दाता कारयेत् स चतुर्गुणम्।<br>संदिष्टस्याप्रदाता च समुद्रगृहभेदकः ॥ १९३<br><br>पञ्चाशतपणिको दण्डस्तत्र कार्यो महीक्षिता।<br>अस्पृश्यं च स्पृशन्नार्यो ह्ययोग्यो योग्यकर्मकृत् ॥ १९४<br><br>पुंस्त्वहर्ता पशूनां च दासीगर्भविनाशकृत्।<br>शूद्रप्रव्रजितानां च दैवे पित्र्ये च भोजकः ॥ १९५<br><br>अव्रजन् बाढमुक्त्वा तु तथैव च निमन्त्रणे।<br>एते कार्षापणशतं सर्वे दण्ड्या महीक्षिता ॥ १९६<br><br>दुःखोत्पादि गृहे द्रव्यं क्षिपन् दण्ड्यस्तु कृष्णलम्।<br>पितापुत्रविरोधे च साक्षिणां द्विशतो दमः।<br>स्यान्नरश्च तथार्यः स्यात् तस्याप्यष्टशतो दमः ॥ १९७ | जिस व्यक्तिपर कलहका आरोप हो, उसे दूना दण्ड देना चाहिये। जो ब्राह्मण अपने आचार-विचारसे अधम हो गया हो, उसे राजा अपने देशसे निकाल दे। भक्ष्य पदार्थोंको छोड़कर जो लहसुन, प्याज, सूअर, ग्रामीण मुरगे, पाँच नखवाले जीवों तथा अन्य अभक्ष्य पदार्थोंको खाता है, उस ब्राह्मणको शीघ्र ही अपने राष्ट्रसे निकाल देना चाहिये। अभक्ष्य पदार्थोंको खानेसे शूद्रको एक कृष्णलका दण्ड देना चाहिये तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको क्रमशः चौगुना, तिगुना तथा दुगुना दण्ड देनेका विधान है। जो अभक्ष्य-भक्षणके लिये उत्साहित करता है, उसे दूना दण्ड देना चाहिये। जो मनुष्य 'मैं देता हूँ' ऐसा कहकर अभक्ष्य वस्तुओंके भक्षणमें दूसरेको प्रवृत्त करता है, उसे भी चौगुना दण्ड मिलना चाहिये। संदेशको न देनेवाला तथा समुद्रमें बने हुए अड्डेको नष्ट करनेवाले व्यक्तियोंको राजा पचास मुद्राका दण्ड दे। जो श्रेष्ठ होकर अस्पृश्यका स्पर्श करता है, अयोग्य होकर योग्य कार्यमें हाथ लगाता है, पशुओंके पुंस्त्वका अपहरण करता है, दासीके गर्भको नष्ट करता है, शूद्र और संन्यासियोंके घर देव-कार्य और पितृकार्यमें भोजन करता है तथा निमन्त्रण स्वीकार करनेपर भोजन करने नहीं जाता—ये सभी राजाद्वारा सौ पण कार्षापण-दण्डके भागी हैं। अपने घरमें पीडोत्पादक वस्तु रखनेवालेको एक कृष्णलका दण्ड देना चाहिये। पिता और पुत्रके पारस्परिक विरोधमें साक्षी देनेवालोंको दो सौ पणका दण्ड लगाना चाहिये। यदि कोई माननीय व्यक्ति यह अपराध करता है तो उसपर एक सौ आठ पणका दण्ड लगाना चाहिये ॥१८९–१९७॥ |
२३२- वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय
९०४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुलाशासनमानानां कूटकृन्मानकस्य च।<br>एभिश्च व्यवहर्ता च स दण्ड्यो दममुत्तमम्॥ १९८<br><br>विषाग्निदां पतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम्।<br>विकर्णनासिकां व्योष्ठीं कृत्वा गोभिः प्रमापयेत्॥ १९९<br><br>ग्रामस्य दाहका ये च ये च क्षेत्रस्य वेश्मनः।<br>राजपत्यभिगामी च दग्धव्यास्ते कटाग्निना॥ २००<br><br>ऊनं वाप्यधिकं चापि लिखेद् यो राजशासनम्।<br>पारदारिकचौरं वा मुञ्चतो दण्ड उत्तमः॥ २०१<br><br>अभक्ष्येण द्विजं दूष्य दण्ड्य उत्तमसाहसम्।<br>क्षत्रियं मध्यमं वैश्यं प्रथमं शूद्रमर्धकम्॥ २०२<br><br>मृताङ्गलग्नविक्रेतुर्गुरुं ताडयतस्तथा।<br>राजयानासनारोढुर्दण्ड उत्तमसाहसः॥ २०३<br><br>यो मन्येताजितोऽस्मीति न्यायेनापि पराजितः।<br>तमायान्तं पुनर्जित्वा दण्डयेद् द्विगुणं दमम्॥ २०४<br><br>आह्वानकारी मध्यः स्यादनाह्वाने तथाह्वयन्।<br>दण्डिकस्य च यो हस्तादभियुक्तः पलायते॥ २०५<br><br>हीनः पुरुषकारेण तं दण्ड्याद् दाण्डिको धनम्।<br>प्रेष्यापराधात् प्रेष्यस्तु स दण्ड्यश्चार्धमेव च॥ २०६<br><br>दण्डार्थं नियमार्थं च नीयमानेषु बन्धनम्।<br>यदि कश्चित् पलायेत दण्डश्चाष्टगुणो भवेत्॥ २०७<br><br>अनिन्दिते विवादे तु नखरोमावतारणम्।<br>कारयेद् यः स पुरुषो मध्यमं दण्डमर्हति॥ २०८ | तराजू, शासन, मानदण्ड और धर्मकाँटेके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करनेवाले तथा ऐसे व्यक्तिके साथ व्यवहार करनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। विष देनेवाली, आग लगानेवाली, पति, गुरुजन एवं अपने बच्चोंकी हत्या करनेवाली स्त्रीको कान, ओष्ठ और नाकसे रहित करके पशुओंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो गाँव, खेत और घरमें आग लगानेवाले तथा राजपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाले हैं, उन्हें घास-फूसकी अग्निमें जला देना चाहिये। जो (राजाका अधिकारी) राजाज्ञाको घटा-बढ़ाकर लिखता है तथा दूसरेकी स्त्रीके साथ अपराध करनेवाले एवं चोरको छोड़ देता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति अभक्ष्य वस्तु खिलाकर ब्राह्मणको दूषित करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार क्षत्रियको विधर्मी करनेवालेको मध्यम, वैश्यको प्रथम तथा शूद्रको अर्धसाहसका दण्ड देना चाहिये। मृतकके शरीरपर लगे हुए आभूषण तथा वस्त्रादिको बेंचनेवाले, गुरुको पीटनेवाले, राजाके वाहन और आसनपर बैठनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति न्यायद्वारा या युद्धमें पराजित होनेपर भी अपनेको 'मैं पराजित नहीं हूँ'-ऐसा मानता है, उसे आता हुआ देखकर राजाको चाहिये कि उसे पुनः जीतकर दुगुने पणका दण्ड दे। जो व्यक्ति अपराध होनेपर सूचनाद्वारा बुलानेसे नहीं आता है और जो बिना बुलाये ही आकर सम्मुख उपस्थित होता है तथा जो अपराधी दण्ड देनेवालेके हाथसे छुड़ाकर भाग जाता है-ऐसे हीन लोगोंको पौरुषपूर्वक दण्ड देनेवाला न्यायकर्ता आर्थिक दण्ड दे। जो व्यक्ति दूत होनेपर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसे उपर्युक्त दण्डका आधा दण्ड देना चाहिये। दण्ड या नियमनके लिये बाँधकर ले जाते समय यदि कोई अपराधी भाग जाता है तो उसे आठगुना दण्ड देना चाहिये। जो पुरुष सामान्य वाद-विवादमें किसीके नख या बालको काट लेता है, वह मध्यम दण्डका भागी होता है॥ १९८-२०८॥ |
| बन्धनं चाप्यवध्यस्य बलान्मोचयते तु यः।<br>वध्यं विमोचयेद् यस्तु दण्ड्यो द्विगुणभाग् भवेत्॥ २०९<br><br>दुर्द्दृष्टव्यवहाराणां सभ्यानां द्विगुणो दमः।<br>राज्ञा त्रिंशद्गुणो दण्डः प्रक्षेप्य उदके भवेत्॥ २१० | जो व्यक्ति बलपूर्वक अवध्य अपराधीके बन्धनोंको खोल देता है तथा जो मृत्यु-दण्डके अपराधीको छोड़ देता है, वह दुगुने दण्डका भागी होता है। राजाके जो सभासद उपस्थित विषयोंमें कुशलतासे मनोयोग नहीं देते, उन्हें दूना दण्ड देना चाहिये। राजा ऐसे अपराधियोंको तीसगुना अधिक दण्ड दे और जलमें फेंकवा दे। |
| * अध्याय २२८ * | ९०५ |
|---|
| अल्पदण्डेऽधिकं कुर्याद् विपुले चाल्पमेव च।<br>ऊनाधिकं तु तं दण्डं सभ्यो दद्यात् स्वकाद् गृहात्॥ २११<br>यावानवध्यस्य वधे तावान् वध्यस्य रक्षणे।<br>अधर्मो नृपतेर्दृष्ट एतयोरुभयोरपि॥ २१२<br>ब्राह्मणं नैव हन्यात्तु सर्वपापेष्ववस्थितम्।<br>प्रवासयेत् स्वकाद् राष्ट्रात् समग्रधनसंयुतम्॥ २१३<br>न जातु ब्राह्मणं वध्यात् पातकं त्वधिकं भवेत्।<br>यस्मात् तस्मात् प्रयत्नेन ब्रह्महत्यां विवर्जयेत्॥ २१४<br>अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।<br>अयशो महदाप्नोति नरकं चाधिगच्छति॥ २१५<br>ज्ञात्वापराधं पुरुषस्य राजा<br>कालं तथा चानुमतं द्विजानाम्।<br>दण्ड्येषु दण्डं परिकल्पयेत्तु<br>यो यस्य युक्तः स समीक्ष्य कुर्यात्॥ २१६ | थोड़ेसे अपराधमें अधिक दण्ड देनेवाले तथा भीषण अपराधमें अल्प दण्ड देनेवाले नायककर्ताको जितना कम या अधिक दण्ड हो, उसे अपने घरसे पूर्ण करना या अपराधीको लौटाना चाहिये। अवध्य अपराधीका वध करनेमें जितना पाप लगता है उतना ही पाप वध्यको छोड़ देनेमें लगता है। राजाको इन दोनों दशाओंमें समानरूपसे पापभागी होना पड़ता है। सभी प्रकारके पापोंमें अपराधी पाये गये ब्राह्मणको मृत्युदण्ड नहीं देना चाहिये, उसे सम्पूर्ण सम्पत्तिके साथ अपने राष्ट्रसे निर्वासित कर देना चाहिये। कभी भूलकर भी ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये; क्योंकि इससे अधिक पाप होता है। इसलिये राजाको ब्रह्महत्यासे बचना चाहिये। अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीयको दण्ड न देनेसे राजा महान् अयशका भागी बनता है और मरनेपर नरकगामी होता है। इसलिये राजा मनुष्यके अपराधको भलीभाँति जानकर तथा यथासमय ब्राह्मणोंकी अनुमति लेकर दण्डनीयोंके प्रति दण्डकी कल्पना करे और जो जिस प्रकारके दण्डका पात्र हो, उसकी भलीभाँति समीक्षा कर उसे उसी प्रकारका समुचित दण्ड दे॥ २०९—२१६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे दण्डप्रणयनं नाम सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-कीर्तन-प्रसङ्गमें दण्डनीति नामक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२७॥
दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
अद्भुत शान्तिका *वर्णन
| मनुरुवाच<br>दिव्यान्तरिक्षभौमेषु या शान्तिरभिधीयते।<br>तामहं श्रोतुमिच्छामि महोत्पातेषु केशव॥ १ | मनुने पूछा—केशव! दिव्य, अन्तरिक्ष और पृथ्वीसम्बन्धी बड़े-बड़े अद्भुत उपद्रवोंके होनेपर जिस शान्तिका विधान किया जाता है, उसे मैं श्रवण करना चाहता हूँ॥ १॥ |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि त्रिविधामद्भुतादिषु।<br>विशेषेण तु भौमेषु शान्तिः कार्या तथा भवेत्॥ २<br>अभया चान्तरिक्षेषु सौम्या दिव्येषु पार्थिव।<br>विजिगीषुः परं राजन् भूतिकामस्तु यो भवेत्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! अब मैं उत्पातोंके समय की जानेवाली तीनों प्रकारकी शान्तियाँ बतला रहा हूँ। उनमें विशेषरूपसे पृथ्वी-सम्बन्धी महोत्पातोंके अवसरपर शान्ति करनी चाहिये। राजन्! अन्तरिक्ष-सम्बन्धी उत्पातोंके लिये अभया तथा दिव्य उत्पातोंके लिये सौम्या शान्ति करनी चाहिये। राजन्! जो विजयाभिलाषी तथा ऐश्वर्यकामी |
* इन अद्भुतोंका वर्णन तथा इनकी शान्तियोंका विस्तृत विधान पञ्चम आथर्वण शान्तिकल्प एवं अथर्वपरिशिष्टादिमें है।
२३३- वृष्टिजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय
| ९०६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विजिगीषोः परानेवमभियुक्तस्तथा परैः।<br>तथाभिचारशङ्कायां शत्रूणामभिनाHolder/शने॥ ४<br>भये महति सम्प्राप्ते अभया शान्तिरिष्यते।<br>राजयक्ष्माभिभूतस्य क्षतक्षीणस्य चाप्यथ॥ ५<br>सौम्या प्रशस्यते शान्तिर्यज्ञकामस्य चाप्यथ।<br>भूकम्पे च समुत्पन्ने प्राप्ते चान्नक्षये तथा॥ ६<br>अतिवृष्ट्यामनावृष्ट्यां शलभानां भयेषु च।<br>प्रमत्तेषु च चौरेषु वैष्णवी शान्तिरिष्यते॥ ७<br>पशूनां मारणे प्राप्ते नराणामपि दारुणे।<br>भूतेषु दृश्यमानेषु रौद्री शान्तिस्तथेष्यते॥ ८<br>वेदनाशे समुत्पन्ने जने जाते च नास्तिके।<br>अपूज्यपूजने जाते ब्राह्मी शान्तिस्तथेष्यते॥ ९<br>भविष्यत्यभिषेके च परचक्रभयेऽपि च।<br>स्वराष्ट्रभेदेऽरिवधे रौद्री शान्तिः प्रशस्यते॥ १० | हो, उस शत्रुओंपर विजय पानेके इच्छुक, शत्रुओंद्धारा आक्रान्त, आभिचारिक कर्मोंकी शङ्कासे युक्त, शत्रुओंको विनष्ट करनेके लिये उद्यत राजाके लिये महान् भय उपस्थित होनेपर अभया शान्ति कही गयी है। राजयक्ष्मा रोगसे ग्रस्त, घावसे दुर्बल तथा यज्ञकी कामनावालेके लिये सौम्या शान्तिकी प्रशंसा की गयी है। भूकम्प आनेपर, अकाल पड़नेपर, अतिवृष्टि, अनावृष्टि एवं टिड्डियोंसे भय होनेपर, पागल और चोरसे भय उपस्थित होनेपर राजाको वैष्णवी शान्ति करानी चाहिये। पशुओं और मनुष्योंका भीषण संहार उपस्थित होनेपर तथा भूत-पिशाचादिके दिखायी देनेपर रौद्री शान्ति करानी चाहिये। वेदोंका विनाश उपस्थित होनेपर, लोगोंके नास्तिक हो जानेपर तथा अपूज्य लोगोंकी पूजा होनेपर, ब्राह्मी शान्ति करानी चाहिये। भावी अभिषेक, शत्रुसेनासे उत्पन्न भय, अपने राष्ट्रमें भेद तथा शत्रु-वधका अवसर प्राप्त होनेपर रौद्री शान्तिकी प्रशंसा की गयी है॥ २-१०॥ |
| त्र्यहातिरिक्ते पवने भक्ष्ये सर्वविगर्हिते।<br>वैकृते वातजे व्याधौ वायवी शान्तिरिष्यते॥ ११ | तीन दिनोंसे अधिक प्रबल वायुके चलनेपर, सभी भक्ष्य पदार्थोंके विकृत हो जानेपर तथा वातज व्याधिके बिगड़ जानेपर वायवी शान्ति करानी चाहिये। |
| अनावृष्टिभये जाते प्राप्ते विकृतिवर्षणे।<br>जलाशयविकारेषु वारुणी शान्तिरिष्यते॥ १२ | सूखा पड़ जानेका भय हो, वृष्टिसे अधिक हानि हो तथा जलाशयोंमें कोई विकार उत्पन्न हो गया हो तो ऐसे अवसरपर वारुणी शान्ति करानी चाहिये। |
| अभिशापभये प्राप्ते भार्गवी च तथैव च।<br>जाते प्रसववैकृत्ये प्राजापत्या महाभुज॥ १३ | महाबाहो! अभिशापका भय उपस्थित होनेपर, भार्गवी तथा स्त्रीके प्रसवमें विकार उत्पन्न होनेपर प्राजापत्या नामकी शान्ति करानी चाहिये। |
| उपस्कराणां वैकृत्ये त्वाष्ट्री पार्थिवनन्दन।<br>बालानां शान्तिकामस्य कौमारी च तथा नृप॥ १४ | पार्थिवनन्दन! गृह-सामग्रियोंमें विकार उत्पन्न होनेपर त्वाष्ट्री (विश्वकर्मासम्बन्धी) शान्ति करानी चाहिये। राजन्! बालकोंकी बाधा दूर करनेके लिये कौमारी शान्ति होनी चाहिये। |
| कुर्याच्छान्तिमथाग्नेयीं सम्प्राप्ते वह्निवैकृते।<br>आज्ञाभङ्गे तु संजाते तथा भृत्यादिसंक्षये॥ १५ | अग्नि-विकार उपस्थित होनेपर, आज्ञा-भङ्ग होनेपर तथा सेवकादिके विनाश होनेपर आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। |
| अश्वानां शान्तिकामस्य तद्विकारे समुत्थिते।<br>अश्वानां कामयानस्य गान्धर्वी शान्तिरिष्यते॥ १६ | अश्वोंकी शान्ति-कामनासे उनमें रोग उत्पन्न होनेपर तथा अधिक संख्याकी अभिलाषासे गान्धर्वी शान्ति करानी चाहिये। |
| गजानां शान्तिकामस्य तद्विकारे समुत्थिते।<br>गजानां कामयानस्य शान्तिराङ्गिरसी भवेत्॥ १७ | हाथियोंकी शान्ति-कामनासे, उनमें रोग उपस्थित होनेपर तथा उनकी रक्षाकी भावनासे आङ्गिरसी शान्ति करानी चाहिये। |
| पिशाचादिभये जाते शान्तिर्वै नैर्ऋती स्मृता।<br>अपमृत्युभये जाते दुःस्वप्ने च तथा स्थिते॥ १८ | पिशाचादिका तथा अकालमृत्युका भय उपस्थित होनेपर और दुःस्वप्न देखनेपर नैर्ऋती शान्ति कही गयी है। |
२३४- जलाशयजनित विकृतियाँ और उनकी शान्तिके उपाय
| * अध्याय २२८ * | ९०७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| याम्यां तु कारयेच्छान्तिं प्राप्ते तु नरके तथा।<br>धननाशे समुत्पन्ने कौबेरी शान्तिरिष्यते॥ १९<br>वृक्षाणां च तथार्थानां वैकृते समुपस्थिते।<br>भूतिकामस्तथा शान्तिं पार्थिवीं प्रतियोजयेत्॥ २०<br><br>प्रथमे दिनयामे च रात्रौ वा मनुजोत्तम।<br>हस्ते स्वातौ च चित्रायामादित्ये चाश्विने तथा॥ २१<br>अर्यम्णि सौम्यजातेषु वायव्यां त्वद्भुतेषु च।<br>द्वितीये दिनयामे तु रात्रौ च रविनन्दन॥ २२<br>पुष्याग्नेयविशाखासु पित्र्यासु भरणीषु च।<br>उत्पातेषु तथा भाग आग्नेयीं तेषु कारयेत्॥ २३<br>तृतीये दिनयामे च रात्रौ च रविनन्दन।<br>रोहिण्यां वैष्णवे ब्राह्मे वासवे वैश्वदेवते॥ २४<br>ज्येष्ठायां च तथा मैत्रे ये भवन्त्यद्भुताः क्वचित्।<br>ऐन्द्री तेषु प्रयोक्तव्या शान्ती रविकुलोद्भव॥ २५<br>चतुर्थे दिनयामे च रात्रौ वा रविनन्दन।<br>सार्पे पौष्णे तथाऽऽर्द्रायामहिर्बुध्न्ये च दारुणे॥ २६<br>मूले वरुणदैवत्ये ये भवन्त्यद्भुतास्तथा।<br>वारुणी तेषु कर्तव्या महाशान्तिर्महीक्षिता॥ २७<br>मित्रमण्डलवेलासु ये भवन्त्यद्भुताः क्वचित्।<br>तत्र शान्तिद्वयं कार्यं निमित्तेषु च नान्यथा।<br>निर्निमित्तकृता शान्तिर्निमित्तेनोपयुज्यते॥ २८<br>बाणप्रहारा न भवन्ति यद्वद्<br>राजन् नृणां सन्नहनैर्युतानाम्।<br>दैवोपघाता न भवन्ति तद्वद्<br>धर्मात्मनां शान्तिपरायणानाम्॥ २९ | मृत्युका भय होनेपर याम्या शान्ति कराये तथा धनका नाश उत्पन्न होनेपर कौबेरी शान्ति करानी चाहिये। ऐश्वर्यकामी मनुष्यको वृक्षों तथा सम्पत्तियोंका विनाश उपस्थित होनेपर पार्थिवी शान्तिका प्रयोग करना चाहिये॥ १९—२०॥<br><br>मानवश्रेष्ठ! दिनके या रात्रिके पहले पहरमें सूर्यके हस्त, स्वाती, चित्रा, पुनर्वसु या अश्विनी नक्षत्रमें जानेपर वायव्यकोणमें यदि अद्भुत उपद्रव दिखायी पड़े तो आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिनके अथवा रात्रिके दूसरे पहरमें सूर्यके पुष्य, भरणी, कृत्तिका, मघा और विशाखा नक्षत्रमें जानेपर आग्नेयकोण या दक्षिण दिशामें यदि कोई उत्पात दिखायी दे तो आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिनके या रात्रिके तीसरे पहरमें रोहिणी, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़, अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्रमें सूर्यके जानेपर यदि ईशान, पूर्व या अग्निकोणमें कोई उत्पात दिखायी दे तो ऐन्द्री शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिन या रात्रिके चौथे पहरमें आश्लेषा, रेवती, आर्द्रा, उत्तराभाद्र, शतभिषा या मूल नक्षत्रमें सूर्यके जानेपर पश्चिम दिशामें उत्पात दिखायी देनेपर राजाको वारुणी शान्ति करानी चाहिये। यदि मध्याह्नके समय कहींपर अद्भुत उत्पात होते हैं तो उस समय दोनों प्रकारकी शान्ति करानी चाहिये। इन उपर्युक्त कारणोंके उपस्थित होनेपर ही शान्ति करानी चाहिये, अन्यथा नहीं। बिना किसी कारणके की गयी शान्ति निष्फल हो जाती है। राजन्! जिस प्रकार कवचसे सुरक्षित शरीरवाले मनुष्योंको बाणोंका प्रहार किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुँचाता, उसी प्रकार धर्मात्मा एवं शान्तिपरायण मनुष्योंको दैव-प्रहार किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुँचा सकते॥ २१—२९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तिर्नामाष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुतशान्ति नामक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२८॥
२३६- उपस्कर-विकृतिके लक्षण और उनकी शान्ति
| ९०८ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ उनतीसवाँ अध्याय
उत्पातोंके भेद तथा कतिपय ऋतुस्वभावजन्य शुभदायक अद्भुतोंका वर्णन
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनुरुवाच<br>अद्भुतानां फलं देव शमनं च तथा वद।<br>त्वं हि वेत्सि विशालाक्ष ज्ञेयं सर्वमशेषतः॥ १ | मनुने पूछा—विशाल नेत्रोंवाले देव! अब मुझे इन अद्भुतोंका फल तथा उनकी शान्तिका उपाय बतलाइये; क्योंकि आप सभी ज्ञेय विषयोंके पूर्ण ज्ञाता हैं॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>अत्र ते वर्णयिष्यामि यदुवाच महातपाः।<br>अत्रये वृद्धगर्गस्तु सर्वधर्मभृतां वरः॥ २<br>सरस्वत्याः सुखासीनं गर्गं स्रोतसि पार्थिव।<br>पप्रच्छासौ महातेजा अत्रिर्मुनिजनप्रियम्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! इस विषयमें सभी धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातपस्वी वृद्ध गर्गने अत्रिको जो कुछ कहा था, वह सब मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। एक समय मुनिजनोंके प्रिय महर्षि गर्गाचार्य सरस्वती नदीके तटपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उसी समय महातेजस्वी अत्रिने उनसे प्रश्न किया॥ २-३॥ |
| अत्रिरुवाच<br>नश्यतां पूर्वरूपाणि जनानां कथयस्व मे।<br>नगराणां तथा राज्ञां त्वं हि सर्वं वदस्व माम्॥ ४ | अत्रि ऋषिने पूछा—महर्षे! आप मुझे विनाशोन्मुख मनुष्यों, राजाओं तथा नगरोंके सभी पूर्वलक्षण बतलाइये॥ ४॥ |
| गर्ग उवाच<br>पुरुषापचारान्नियतमपरज्यन्ति देवताः।<br>ततोऽपरागाद् देवानामुपसर्गः प्रवर्तते॥ ५<br>दिव्यान्तरिक्षभौमं च त्रिविधं सम्प्रकीर्तितम्।<br>ग्रहर्क्षवैकृतं दिव्यमान्तरिक्षं निबोध मे॥ ६<br>उल्कापातो दिशां दाहः परिवेषस्तथैव च।<br>गन्धर्वनगरं चैव वृष्टिश्च विकृता तु या॥ ७<br>एवमादीनि लोकेऽस्मिन्नान्तरिक्षं विनिर्दिशेत्।<br>चरस्थिरभवो भौमो भूकम्पश्चापि भूमिजः॥ ८<br>जलाशयानां वैकृत्यं भौमं तदपि कीर्तितम्।<br>भौमे त्वल्पफलं ज्ञेयं चिरेण च विपच्यते॥ ९<br>अभ्रजं मध्यफलदं मध्यकालफलप्रदम्।<br>अद्भुते तु समुत्पन्ने यदि वृष्टिः शिवा भवेत्॥ १०<br>सप्ताहाभ्यन्तरे ज्ञेयमद्भुतं निष्फलं भवेत्।<br>अद्भुतस्य विपाकश्च विना शान्त्या न दृश्यते॥ ११ | गर्गजी बोले—अत्रिजी! मनुष्योंके अत्याचारसे निश्चय ही देवता प्रतिकूल हो जाते हैं। तत्पश्चात् उन देवताओंके अप्रसन्न होनेसे उत्पात प्रारम्भ होता है। वह उत्पात दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम—तीन प्रकारका कहा गया है। ग्रहों और नक्षत्रोंके विकारको दिव्य उत्पात जानना चाहिये। अब मुझसे आन्तरिक्ष उत्पातका वर्णन सुनिये। उल्कापात, दिशाओंका दाह, मण्डलोंका उदय, आकाशमें गन्धर्व-नगरका दिखायी देना, खण्डवृष्टि, अनावृष्टि या अतिवृष्टि—इस प्रकारके उत्पातोंको इस लोकमें आन्तरिक्ष उत्पात कहना चाहिये। स्थावर-जंगमसे उत्पन्न हुआ उत्पात तथा भूमिजन्य भूकम्प भौम उत्पात हैं। जलाशयोंका विकार भी भौम उत्पात कहलाता है। भौम उत्पात होनेपर उसका थोड़ा फल जानना चाहिये, किंतु वह बहुत देरमें शान्त होता है। आन्तरिक्ष उत्पात मध्यम फल देनेवाला होता है और मध्यमकालमें परिणामदायी होता है। इस महोत्पातके उदय होनेपर यदि कल्याणकारिणी वृष्टि होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि एक सप्ताहके भीतर यह उत्पात निष्फल हो जायगा, किंतु इस महान् उत्पातका अवसान शान्तिके बिना नहीं होता। |
२३७- पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पात और उनकी शान्ति
| * अध्याय २२९ * | ९०९ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिभिर्वर्षैस्तथा ज्ञेयं सुमहद्भयकारकम्।<br>राज्ञः शरीरे लोके च पुरद्वारे पुरोहिते॥ १२<br>पाकमायाति पुत्रेषु तथा वै कोशवाहने।<br>ऋतुस्वभावाद् राजेन्द्र भवन्त्यद्भुतसंज्ञिताः॥ १३<br>शुभावहास्ते विज्ञेयास्तांश्च मे गदतः शृणु। | इसे तीन वर्षोंतक महान् भयदायक मानना चाहिये। इसका परिणाम राजाके शरीर, राज्य, पुरद्वार, पुरोहित, पुत्र, कोश और वाहनोंपर प्रकट होता है। राजेन्द्र! जो अद्भुतसंज्ञक उत्पात ऋतुओंके स्वभावके अनुकूल होते हैं, उन्हें शुभदायक मानना चाहिये। मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये॥ ५—१३ १/२ ॥ |
| वज्राशनिमहीकम्पसंध्यानिर्घातनिःस्वनाः॥ १४<br>परिवेषरजोधूम्ररक्ताकार्कस्तमयोदयाः ।<br>द्रुमोद्भेदकरस्नेहो बहुशः सफलद्रुमः॥ १५<br>गोपक्षिमधुवृद्धिश्च शुभानि मधुमाधवे। | वज्र एवं बिजलीका गिरना, पृथ्वीका कम्पन, संध्याके समय वज्रका शब्द, सूर्य तथा चन्द्रमामें मण्डलोंका होना, धूलि और धूएँका उद्भव, उदय एवं अस्तके समय सूर्यकी अतिलालिमा, वृक्षोंके टूट जानेपर उनसे रसका गिरना, फलवाले वृक्षोंकी अधिकता, गौ, पक्षी और मधुकी वृद्धि—ये चैत्र और वैशाखमासमें शुभप्रद हैं। |
| ऋक्षोल्कापातकलुषं कपिलार्केन्दुमण्डलम्॥ १६<br>कृष्णश्वेतं तथा पीतं धूसरध्वान्तलोहितम्।<br>रक्तपुष्पारुणं सांध्यं नभः क्षुब्धार्णवोपमम्॥ १७<br>सरितां चाम्बुसंशोषं दृष्ट्वा ग्रीष्मे शुभं वदेत्। | ग्रीष्म ऋतुमें कलुषित नक्षत्रों और ग्रहोंका पतन, सूर्य और चन्द्रके मण्डलोंका कपिल वर्ण होना, सायंकालीन नभके काले और सफेद मिश्रित, पीले, धूसरित, श्यामल, लाल, लाल पुष्पके समान अरुण और क्षुब्ध सागरकी तरह संक्षुब्ध होना तथा नदियोंका जल सूख जाना—इन उत्पातोंको देखकर इन्हें शुभ कहना चाहिये। |
| शक्रायुधपरीवेषं विद्युदुल्काधिरोहणम्॥ १८<br>कम्पोद्धर्तनवैकृत्यं हसनं दारणं क्षितेः।<br>नद्युदपानसरसां विधूनतरणप्लवाः॥ १९<br>शृङ्गिणां च वराहाणां वर्षासु शुभमिष्यते। | इन्द्रधनुषका मण्डलाकार उदय, विद्युत् और उल्काका पतन, पृथ्वीका अकस्मात् कम्पन, उलट-पलट विकृति, हास और फटना, नदियों एवं तालाबोंमें जलकी न्यूनता, नाव, जहाज और पुलका काँपना, सींगवाले जानवरों तथा शूकरोंकी वृद्धि—ये उत्पात वर्षा ऋतुमें मङ्गलकारी हैं। |
| शीतानिलतुषारत्वं नर्दनं मृगपक्षिणाम्॥ २०<br>रक्षोभूतपिशाचानां दर्शनं वागमानुषी।<br>दिशो धूमान्धकाराश्च सनभोवनपर्वताः॥ २१<br>उच्चैः सूर्योदयास्तौ च हेमन्ते शोभनाः स्मृताः। | शीतल वायु, तुषार, पशु एवं पक्षियोंका चीत्कार, राक्षस, भूत और पिशाचोंका दर्शन, दैवी वाणी, सूर्यके उदय-अस्तके समय आकाश, वन और पर्वतोंसहित दिशाओंका गाढ़रूपमें धूएँसे अन्धकारित हो जाना—ये उत्पात हेमन्त-ऋतुमें उत्तम माने जाते हैं। |
| दिव्यस्त्रीरूपगन्धर्वविमानाद्भुतदर्शनम् ॥ २२<br>ग्रहनक्षत्रताराणां दर्शनं वागमानुषी।<br>गीतवादित्रनिर्घोषो वनपर्वतसानुषु॥ २३<br>सस्यवृद्धी रसोत्पत्तिः शरत्काले शुभाः स्मृताः। | दिव्य स्त्रीका रूप, गन्धर्व-विमान, ग्रह, नक्षत्र और ताराओंका दर्शन, दैवी वाणी, वनोंमें और पर्वतोंकी चोटियोंपर गाने-बजानेका शब्द सुनायी पड़ना, अन्नोंकी वृद्धि, रसकी विशेष उत्पत्ति—ये उत्पात शरत्कालमें माङ्गलिक कहे गये हैं। |
| हिमपातानिलोत्पातविरूपादभुतदर्शनम् ॥ २४<br>कृष्णाञ्जनाभमाकाशं तारोल्कापातपिञ्जरम्।<br>चित्रगर्भोद्भवः स्त्रीषु गोऽजाश्वमृगपक्षिषु।<br>पत्राङ्कुरलतानां च विकाराः शिशिरे शुभाः॥ २५ | हिमपात, वातका बहना, विरूप एवं अद्भुत उत्पातोंका दर्शन, आकाशका काले कज्जलके समान दिखायी पड़ना तथा ताराओं एवं उल्काओंके गिरनेसे पीले रंगका दीख पड़ना, स्त्री, गाय, बकरी, घोड़ी, मृगी और पक्षियोंसे विचित्र प्रकारके बच्चोंका पैदा होना, पत्तों, अङ्कुरों और लताओंमें अनेकों प्रकारके |
२३८- राजाकी मृत्यु तथा देशके विनाश-सूचक लक्षण और उनकी शान्ति
९१० * मत्स्यपुराण *
| ऋतुस्वभावेन विनाद्भुतस्य<br>जातस्य दृष्टस्य तु शीघ्रमेव।<br>यथागमं शान्तिरनन्तरं तु<br>कार्या यथोक्ता वसुधाधिपेन॥ २६॥ | विकारोंका हो जाना—ये उत्पात शिशिर-ऋतुमें शुभदायी माने गये हैं। इन ऋतु-स्वभावके अतिरिक्त अन्य उत्पन्न हुए अद्भुत उत्पातके देखे जानेके बाद राजाको शीघ्र ही शास्त्रानुकूल कही गयी शान्तिका विधान करना चाहिये॥ १४—२६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तिकोत्पत्तिर्नामैकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुत उत्पातोंकी शान्ति नामक दो सौ उनतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२९॥
दो सौ तीसवाँ अध्याय
अद्भुत उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
| गर्ग उवाच<br>देवतार्चाः प्रनृत्यन्ति वेपन्ते प्रज्वलन्ति च।<br>वमन्त्यग्निं तथा धूमं स्नेहं रक्तं तथा वसाम्॥ १<br>आरटन्ति रुदन्त्येताः प्रस्विद्यन्ति हसन्ति च।<br>उत्तिष्ठन्ति निषीदन्ति प्रधावन्ति धमन्ति च॥ २<br>भुञ्जते विक्षिपन्ते वा कोशप्रहरणध्वजान्।<br>अवाङ्मुखा वा तिष्ठन्ति स्थानात् स्थानं भ्रमन्ति च॥ ३<br>एवमाद्या हि दृश्यन्ते विकाराः सहसोत्थिताः।<br>लिङ्गायतनविप्रेषु तत्र वासं न रोचयेत्॥ ४<br>राज्ञो वा व्यसनं तत्र स च देशो विनश्यति।<br>देवयात्रासु चोत्पातान् दृष्ट्वा देशभयं वदेत्॥ ५ | गर्गजी बोले— जब देव-मूर्तियाँ नाचने लगती हैं, काँपती हैं, जल उठती हैं, अग्नि, धुआँ, तेल, रक्त और चर्बी उगलने लगती हैं, जोर-जोरसे चिल्लाती हैं, रोती हैं, पसीना बहाने लगती हैं, हँसती हैं, उठती हैं, बैठती हैं, दौड़ने लगती हैं, मुँह बजाने लगती हैं, खाती हैं, कोश, अस्त्र और ध्वजाओंको फेंकने लगती हैं, नीचे मुख किये बैठी रहती हैं अथवा एक स्थानसे दूसरे स्थानपर भ्रमण करने लगती हैं—इस प्रकारके सहसा उत्पन्न हुए उत्पात यदि शिव-लिङ्ग, देवमन्दिर तथा ब्राह्मणोंके पुरमें दिखायी पड़ें तो उस स्थानपर निवास नहीं करना चाहिये। ऐसे उत्पातोंके होनेपर या तो राजापर कोई बड़ी आपत्ति आती है अथवा उस देशका विनाश होता है। देवताके दर्शनके लिये जाते समय यदि उपर्युक्त उत्पात दिखायी पड़ें तो उस देशको भय बतलाना चाहिये॥ १—५॥ | | पितामहस्य हर्म्येषु तत्र वासं न रोचयेत्।<br>पशूनां रुद्रजं ज्ञेयं नृपाणां लोकपालजम्॥ ६<br>ज्ञेयं सेनापतीनां तु यत् स्यात् स्कन्दविशाखजम्।<br>लोकानां विष्णुवस्विन्द्रविश्वकर्मसमुद्भवम्॥ ७<br>विनायकोद्भवं ज्ञेयं गणानां ये तु नायकाः।<br>देवप्रेष्यान् नृपप्रेष्या देवस्त्रीभिर्नृपस्त्रियः॥ ८<br>वासुदेवोद्भवं ज्ञेयं ग्रहाणामेव नान्यथा।<br>देवतानां विकारेषु श्रुतिवेत्ता पुरोहितः॥ ९ | गृहसम्बन्धी उत्पातोंको ब्रह्मासे सम्बद्ध जानना चाहिये, अतः वहाँ निवास न करे। पशुओंके उत्पातोंको रुद्रसे उत्पन्न और राजाओंके उत्पातोंको लोकपालसे उत्पन्न जानना चाहिये। सेनापतियोंके उत्पातोंको स्कन्द तथा विशाखसे उत्पन्न तथा लोकोंके उत्पातोंको विष्णु, वसु, इन्द्र और विश्वकर्मासे उद्भूत समझना चाहिये। जो गणोंके नायक हैं, उनपर घटित होनेवाला उत्पात विनायकसे उद्भूत जानना चाहिये। देवदूतोंकी अप्रसन्नतासे राजदूतोंपर तथा देवाङ्गनाओंके द्वारा राजपत्नियोंपर उत्पात घटित होते हैं। ग्रहोंके उपद्रवको भगवान् वासुदेवसे उत्पन्न हुआ समझना चाहिये। महाभाग! देवताओंमें |