भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 929

* अध्याय २३९ * ९९९

शान्तिमङ्गलहोमेषु नास्तिक्यं यत्र जायते।<br>राजा वा म्रियते तत्र स देशो वा विनश्यति॥ ११<br>राज्ञो विनाशे सम्प्राप्ते निमित्तानि निबोध मे।<br>ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणैश्च विरुध्यते॥ १२<br>ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति।<br>न च स्मरति कृत्येषु याचितश्च प्रकुप्यति॥ १३<br>रमते निन्दया तेषां प्रशंसां नाभिनन्दति।<br>अपूर्वं तु करं लोभात् तथा पातयते जने॥ १४<br>एतेष्वभ्यर्चयेच्छक्रं सपत्नीकं द्विजोत्तम।<br>भोज्यानि चैव कार्याणि सुराणां बलयस्तथा।<br>सन्तो विप्राश्च पूज्याः स्युस्तेभ्यो दानं च दीयताम्॥ १५<br>गावश्च देया द्विजपुङ्गवेभ्यो<br>भुवस्तथा काञ्चनमम्बराणि।<br>होमश्च कार्योऽमरपूजनं च<br>एवं कृते पापमुपैति शान्तिम्॥ १६शान्तिपाठ, माङ्गलिक कार्य और हवनादिमें नास्तिकताका प्रभाव दिखायी पड़े, वहाँका राजा मर जाता है अथवा वह देश विनष्ट हो जाता है॥ ९—११॥<br>द्विजोत्तम! अब मैं राजाका विनाश उपस्थित होनेपर उत्पन्न होनेवाले निमित्तोंको बतला रहा हूँ, सुनिये। वह राजा सर्वप्रथम ब्राह्मणोंसे द्वेष करने लगता है, ब्राह्मणोंसे विरोध करता है, ब्राह्मणोंकी सम्पत्तिको हड़प लेता है, ब्राह्मणोंके मारनेका उपक्रम करता है, उसे सत्कार्योंके सम्पादनका स्मरण नहीं होता, वह माँगनेपर क्रुद्ध होता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें विशेष रुचि रखता है और प्रशंसाका अभिनन्दन नहीं करता, लोभवश लोगोंपर नया-नया कर लगाता है—ऐसे अवसरपर शचीसहित इन्द्रकी पूजा करनी चाहिये तथा ब्राह्मणोंको भोजन और अन्य देवताओंके उद्देश्यसे बलि प्रदान करना चाहिये। सत्पुरुषों एवं ब्राह्मणोंकी पूजा कर उन्हें दान देना चाहिये। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको गौएँ, पृथ्वी, सुवर्ण और वस्त्रादिका दान, देवताओंकी पूजा तथा हवन करना चाहिये। ऐसा करनेसे पाप शान्त हो जाता है॥ १२—१६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावुत्पातप्रशमनं नामाष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसङ्गमें उत्पात-प्रशमन नामक दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३८॥


दो सौ उन्तालीसवाँ अध्याय

ग्रहयागका विधान

मनुरुवाचमनुजीने पूछा—
ग्रहयज्ञः कथं कार्यो लक्षहोमः कथं नृपैः।<br>कोटिहोमोऽपि वा देव सर्वपापप्रणाशनः॥ १<br>क्रियते विधिना येन यद् दृष्टं शान्तिचिन्तकैः।<br>तत् सर्वं विस्तराद् देव कथयस्व जनार्दन॥ २देव! राजाओंको ग्रहयज्ञ किस प्रकार करना चाहिये? सभी पापोंको नष्ट करनेवाले लक्षहोम तथा कोटिहोम करनेकी क्या विधि है? जनार्दन! यह जिस विधिसे किया जाता है तथा शान्तिका चिन्तन करनेवाले जिस विधिसे सम्पन्न किये हों, वह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ १-२॥
मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
इदानीं कथयिष्यामि प्रसङ्गादेव ते नृप।<br>राज्ञा धर्मप्रसक्तेन प्रजानां च हितेप्सुना॥ ३<br>ग्रहयज्ञः सदा कार्यो लक्षहोमसमन्वितः।<br>नदीनां संगमे चैव सुराणामग्रतस्तथा॥ ४राजन्! इस समय प्रसंगवश मैं तुम्हें उसे बतला रहा हूँ। धर्मपरायण एवं प्रजाओंके हितेच्छु राजाको लक्षहोमसहित ग्रहयज्ञ सदा करना चाहिये। इस ग्रहयज्ञको नदियोंके संगम तथा देवताओंके समक्ष