मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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१८ - मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १.
| धीमन्तो विवेकिनः । ईदृशमक्षरं यया विद्ययाधिगम्यते सा परा विद्येति समुदायार्थः ॥ ६ ॥ | विवेकी पुरुष सब ओर देखते हैं, ऐसा अक्षर जिस विद्यासे जाना जाता है वही परा विद्या है—यह इस सम्पूर्ण मन्त्रका तात्पर्य है॥६॥ |
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अक्षरब्रह्मका विश्वकारणत्व
| भूतयोन्यक्षरमित्युक्तम् । तत्कथं भूतयोनित्वमित्युच्यते प्रसिद्धदृष्टान्तैः— | पहले कहा जा चुका है कि अक्षरब्रह्म भूतोंकी योनि है। उसका वह भूतयोनित्व किस प्रकार है, सो प्रसिद्ध दृष्टान्तोंद्वारा बतलाया जाता है— |
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यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥
जिस प्रकार मकड़ी जालेको बनाती और उसे निगल जाती है, जैसे पृथिवीमें ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे सजीव पुरुषसे केश एवं लोम उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार उस अक्षरसे यह विश्व प्रकट होता है।
| यथा लोके प्रसिद्धम्, ऊर्णनाभिर्लूताकीटः किञ्चित्कारणान्तरमनपेक्ष्य स्वयमेव सृजते स्वशरीराव्यतिरिक्तानेव तन्तून्बहिः प्रसारयति पुनस्तानेव गृह्णते च गृह्णाति स्वात्मभावमेवापादयति । | जिस प्रकार लोकमें प्रसिद्ध है कि ऊर्णनाभि—मकड़ी किसी अन्य उपकरणकी अपेक्षा न कर स्वयं ही अपने शरीरसे अभिन्न तन्तुओंको रचती अर्थात् उन्हें बाहर फैलाती है और फिर उन्हींको ग्रहण भी कर लेती है, यानी अपने शरीरसे |
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