संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 211, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१ राममाह जनस्थाने भ्रात्रा सह महाबलम्। ज्ञात्वा ते राघवं क्रुद्धाः प्रेषयामासूरूर्जितान्॥ ५१ चतुर्दशसहस्राणि राक्षसानां बलीयसाम्। अग्रे निजग्मुस्तेनैव रक्षसां नायकास्त्रयः॥ ५२ रावणेन नियुक्तास्ते पुरैव तु महाबलाः। महाबलपरीवारा जनस्थानमुपागताः॥ ५३ क्रोधेन महताऽऽविष्टा दृष्ट्वा तां छिन्ननासिकाम्। रुदतीमश्रुदिग्धाङ्गीं भगिनीं रावणस्य तु॥ ५४ रामोऽपि तद्वलं दृष्ट्वा राक्षसानां बलीयसाम्। संस्थाप्य लक्ष्मणं तत्र सीताया रक्षणं प्रति॥ ५५ गत्वा तु प्रहितैस्तत्र राक्षसैर्बलदर्पितैः। चतुर्दशसहस्रं तु राक्षसानां महाबलम्॥ ५६ क्षणेन निहतं तेन शरैरग्निशिखोपमैः। खरश्च निहतस्तेन दूषणश्च महाबलः॥ ५७ त्रिशिराश्च महारोषाद् रणे रामेण पातितः। हत्वा तान् राक्षसान् दुष्टान् रामश्चाश्रममाविशत्॥ ५८ शूर्पणखा च रुदती रावणान्तिकमागता। छिन्ननासां च तां दृष्ट्वा रावणो भगिनीं तदा॥ ५९ मारीचं प्राह दुर्बुद्धिः सीताहरणकर्मणि। पुष्पकेण विमानेन गत्वाहं त्वं च मातुल॥ ६० जनस्थानसमीपे तु स्थित्वा तत्र ममाज्ञया। सौवर्णमृगरूपं त्वमास्थाय तु शनैः शनैः॥ ६१ गच्छ त्वं तत्र कार्यार्थं यत्र सीता व्यवस्थिता। दृष्ट्वा सा मृगपोतं त्वां सौवर्णं त्वयि मातुल॥ ६२ स्पृहां करिष्यते रामं प्रेषयिष्यति बन्धने। तद्वाक्यात्तत्र गच्छन्तं धावस्व गहने वने॥ ६३ लक्ष्मणस्यापकर्षार्थं वक्तव्यं वागुदीरणम्। ततः पुष्पकमारुह्य मायारूपेण चाप्यहम्॥ ६४ तां सीतामहरानेष्ये तस्यामासक्तमानसः। त्वमपि स्वेच्छया पश्चादागमिष्यसि शोभन॥ ६५ 'महाबली श्रीराम इस समय जनस्थानमें अपने भाई लक्ष्मणके साथ रहते हैं।' श्रीरामका पता पाकर वे तीनों बहुत ही कुपित हुए और उनके साथ युद्धके लिये उन्होंने चौदह हजार प्रतापी एवं बलवान् राक्षसोंको भेजा तथा वे तीनों निशाचर-नायक स्वयं भी उस सेनाके साथ आगे-आगे चले। उन महाबलवान् राक्षसोंको रावणने वहाँ पहलेसे ही नियुक्त कर रखा था। वे बहुत बड़ी सेनाके साथ जनस्थानमें आये। रावणकी बहिन शूर्पणखा नाक कट जानेसे बहुत रो रही थी। उसके सारे अङ्ग आँसुओंसे भीग गये थे। उसकी वह दुर्दशा देख वे खर-दूषण आदि राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे थे॥ ५०-५४॥ श्रीरामने भी बलवान् राक्षसोंकी उस सेनाको देख लक्ष्मणको सीताकी रक्षामें उसी स्थानमें रोक दिया और अपने साथ युद्धके लिये वहाँ भेजे गये उन बलाभिमानी राक्षसोंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। अग्निकी ज्वालाके समान दीप्तिमान् बाणोंद्वारा उन्होंने चौदह हजार राक्षसोंकी प्रबल सेनाको क्षणभरमें मार गिराया। साथ ही खर और महाबली दूषणका भी वध किया। इसी प्रकार त्रिशिराको भी श्रीरामने अत्यन्त रोषपूर्वक रणक्षेत्रमें मार गिराया। इस तरह उन सभी दुष्ट राक्षसोंका वध करके श्रीरामचन्द्रजी अपने आश्रममें लौट आये॥ ५५-५८॥ तब शूर्पणखा रोती हुई रावणके पास आयी। दुर्बुद्धि रावणने अपनी बहिनकी नाक कटी देख सीताको हर लानेके उद्देश्यसे मारीचसे कहा—'मामा! हम और तुम पुष्पकविमानसे चलकर जनस्थानके पास ठहरें। वहाँसे तुम मेरी आज्ञाके अनुसार सोनेके मृगका वेष धारणकर धीरे-धीरे मेरा कार्य सिद्ध करनेके लिये उस स्थानपर जाना, जहाँ सीता रहती है। मामा! वह जब तुम्हें सुवर्णमय मृगशावकके रूपमें देखेगी, तब तुम्हें लेनेकी इच्छा करेगी और श्रीरामको तुम्हें बाँध लानेके लिये भेजेगी। जब सीताकी बात मानकर वे तुम्हें बाँधने चलें, तब तुम उनके सामनेसे गहन वनमें भाग जाना। फिर लक्ष्मणको भी उधर ही खींचनेके लिये उच्चस्वरसे [हा भाई लक्ष्मण! इस प्रकार] कातर वचन बोलना। तत्पश्चात् मैं भी मायामय वेष बनाकर, पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो, उस असहाया सीताको हर लाऊँगा; क्योंकि मेरा मन उसमें आसक्त हो गया है। फिर भद्र! तुम भी स्वेच्छानुसार चले आना'॥ ५९-६५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth