संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९ इति ब्रुवाणं तं सीता भाविकर्मबलाद्धृतम्। यों कहते हुए लक्ष्मणसे उस समय विदेहकुमारी सीताने लक्ष्मणं प्राह वैदेही विरुद्धवचनं तदा॥ ७९ कुछ विरुद्ध वचन कहा, जो भवितव्यताकी प्रेरणासे उनके मुखसे सहसा निकल पड़ा था। वे बोलीं—'मैं मृते रामे तु मामिच्छन्न्रतस्त्वं न गमिष्यसि। जानती हूँ, तुम श्रीरामके मर जानेपर मुझे अपनी बनाना इत्युक्तः स विनीतात्मा असहन्नप्रियं वचः॥ ८० चाहते हो; इसीसे इस समय वहाँ नहीं जा रहे हो।' सीताके यों कहनेपर विनयशील राजकुमार लक्ष्मण जगाम राममन्वेष्टुं तदा पार्थिवनन्दनः। उस अप्रिय वचनको न सह सके और तत्काल ही संन्यासवेषमास्थाय रावणोऽपि दुरात्मवान्॥ ८१ श्रीरामचन्द्रजीकी खोजमें चल पड़े॥ ७८—८०१/२॥ इसी समय दुरात्मा रावण भी संन्यासीका वेष बनाकर स सीतापाश्र्वमासाद्य वचनं चेदमुक्तवान्। सीताके पास आया और यों बोला—'देवि! अयोध्यासे आगतो भरतः श्रीमानयोध्याया महामतिः॥ ८२ महाबुद्धिमान् भरतजी आये हैं। वे श्रीरामचन्द्रजीके साथ बातचीत करके वहीं काननमें ठहरे हुए हैं। श्रीरामचन्द्रजीने रामेण सह सम्भाष्य स्थितवांस्तत्र कानने। मुझे तुम्हें बुलानेके लिये यहाँ भेजा है। तुम इस विमानपर मां च प्रेषितवान् रामो विमानमिदमारुह॥ ८३ चढ़ चलो। भरतजीने मनाकर श्रीरामको अयोध्या चलनेके लिये राजी कर लिया है, अतः वे अयोध्या जा रहे हैं। अयोध्यां याति रामस्तु भरतेन प्रसादितः। वैदेहि! तुम्हारी क्रीडा—विनोदके लिये उन्होंने उस मृग- मृगबालं तु वैदेहि क्रीडार्थं ते गृहीतवान्॥ ८४ शावकको भी पकड़ लिया है। अहो! तुमने इस विशाल वनमें बहुत दिनोंतक ऐसा महान् कष्ट उठाया है। अब क्लेशितासि महारण्ये बहुकालं त्वमीदृशम्। तुम्हारे स्वामी सुन्दर मुखवाले श्रीरामचन्द्रजी तथा उनके सम्प्राप्तराज्यस्ते भर्ता रामः स रुचिराननः॥ ८५ विनयशील भाई लक्ष्मण भी राज्यग्रहण कर चुके हैं। अतः तुम उनके पास चलनेके लिये इस विमानपर चढ़ लक्ष्मणश्च विनीतात्मा विमानमिदमारुह। जाओ'॥ ८१—८५१/२॥ इत्युक्ता सा तथा गत्वा नीता तेन महात्मना॥ ८६ उसके यों कहनेपर उसकी कपटपूर्ण बातोंसे प्रेरित हो सती सीता वह सब सत्य मानकर उस तथाकथित आरुरोह विमानं तु छद्मना प्रेरिता सती। महात्माके साथ विमानके निकट गयीं और उसपर आरूढ तज्जगाम ततः शीघ्रं विमानं दक्षिणां दिशम्॥ ८७ हो गयीं। तब वह विमान शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर चल पड़ा। यह देख सीता अत्यन्त शोकसे पीड़ित ततः सीता सुदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता। हो, अत्यन्त दुःखसे विलाप करने लगीं। यद्यपि सीता विमाने खेऽपि रोदन्त्याश्चक्रे स्पर्शं न राक्षसः॥ ८८ आकाशमें उसके अपने ही विमानपर बैठी थीं, तथापि रावणने वहाँ रोती हुई सीताका स्पर्श नहीं किया। अब रावणः स्वेन रूपेण बभूवाथ महातनुः। रावण अपने असली रूपमें आ गया। उसका शरीर बहुत दशग्रीवं महाकायं दृष्ट्वा सीता सुदुःखिता॥ ८९ बड़ा हो गया। दस मस्तकवाले उस विशालकाय राक्षसपर दृष्टि पड़ते ही सीता अत्यन्त दुःखमें डूब गयीं और हा राम वञ्चिताद्याहं केनापिच्छद्मरूपिणा। विलाप करने लगीं—'हाय राम! किसी कपटवेषधारी रक्षसा घोररूपेण त्रायस्वेति भयार्दिता॥ ९० भयानक राक्षसने आज मुझे धोखा दिया है, मैं भयसे पीड़ित हो रही हूँ; मुझे बचाओ। हे महाबाहु लक्ष्मण! हे लक्ष्मण महाबाहो मां हि दुष्टेन रक्षसा। मुझे दुष्ट राक्षस हरकर लिये जा रहा है। मैं भयसे व्याकुल द्रुतमागत्य रक्षस्व नीयमानामथाकुलाम्॥ ९१ हूँ तुम जल्दी आकर मुझ असहायाकी रक्षा करो'॥ ८६—९१॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth