संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४७ शुक्र उवाच शुक्राचार्यजी बोले—देवदेव! मैंने पहले (बलिके देवदेव मया पूर्वमपराधो महान् कृतः। यज्ञमें) आपका बहुत बड़ा अपराध किया है; उसी तद्दोषस्यापनुत्त्यर्थं स्तुतवानस्मि साम्प्रतम्॥ १५ दोषको दूर करनेके लिये इस समय आपका स्तवन किया है॥ १५॥ श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान् बोले- मुने! मेरे प्रति किये गये ममापराधान्नयनं नष्टमेकं तवाधुना। अपराधसे ही तुम्हारा एक नेत्र नष्ट हो गया था। शुक्र ! संतुष्टोऽस्मि ततः शुक्र स्तोत्रेणानेन ते मुने॥ १६ इस समय तुम्हारे इस स्तवनसे मैं तुमपर संतुष्ट हूँ ॥ १६ ॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तं मुनिं प्रहसन्निव । यह कहकर देवदेवेश्वर जनार्दनने हँसते हुए-से अपने पाञ्चजन्येन तच्चक्षुः पस्पर्श च जनार्दनः ॥ १७ पाञ्चजन्य शङ्खसे शुक्राचार्यके फूटे हुए नेत्रका स्पर्श किया। नृपश्रेष्ठ ! शार्ङ्गधन्वा देवदेव विष्णुके द्वारा शङ्खका स्पर्श स्पृष्टमात्रे तु शङ्खेन देवदेवेन शार्ङ्गिणा । कराये जाते ही शुक्राचार्यका वह नेत्र पहलेकी भाँति ही बभूव निर्मलं चक्षुः पूर्ववन्नृपसत्तम ॥ १८ निर्मल हो गया। इस प्रकार शुक्राचार्यको नेत्र देकर और एवं दत्त्वा मुनेश्चक्षुः पूजितस्तेन माधवः । उनसे पूजित होकर भगवान् लक्ष्मीपति तुरंत अन्तर्धान हो जगामादर्शनं सद्यः शुक्रोऽपि स्वाश्रमं ययौ ॥ १९ गये और शुक्राचार्य भी अपने आश्रमको चले गये। राजन् ! इस प्रकार पूर्वकालमें मुनिवर महात्मा शुक्राचार्यने देवेश्वर इत्येतदुक्तं मुनिना महात्मना भगवान् विष्णुकी कृपासे अपना नेत्र प्राप्त कर लिया- प्राप्तं पुरा देववरप्रसादात्। यह प्रसङ्ग तुम्हारे प्रश्नानुसार मैंने सुना दिया। अब तुम्हें शुक्रेण किं ते कथयामि राजन् मैं और क्या सुनाऊँ? तुम्हारे मनमें और भी यदि कुछ पुनश्च मां पृच्छ मनोरथान्तः ॥ २० पूछनेकी इच्छा हो तो मुझसे प्रश्न करो ॥ १७-२० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे शुक्रवरप्रदानो नाम पञ्चपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शुक्राचार्यको वरप्रदान' नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥ छप्पनवाँ अध्याय विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि राजोवाच राजा बोले- ब्रह्मन् ! अब मैं शार्ङ्गधनुषधारी देवदेव साम्प्रतं देवदेवस्य नरसिंहस्य शार्ङ्गिणः । नरसिंहके स्थापनकी समस्त उत्तम विधिको सुनना श्रोतुमिच्छामि सकलं प्रतिष्ठायाः परं विधिम् ॥ १ चाहता हूँ ॥ १ ॥ श्रीमार्कण्डेय उवाच श्रीमार्कण्डेयजी बोले- भूपाल ! देवदेवेश्वर प्रतिष्ठाया विधिं विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः । चक्रपाणि भगवान् विष्णुके स्थापनकी पुण्यदायिनी प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रं शृणु भूपाल पुण्यदम् ॥ २ विधि सुनो; मैं शास्त्रके अनुसार उसका वर्णन कर कर्तुं प्रतिष्ठां यश्चात्र विष्णोरिच्छति पार्थिव । रहा हूँ। पृथिवीपते ! जो भी इस लोकमें भगवान् स पूर्वं स्थिरनक्षत्रे भूमिशोधनमारभेत् ॥ ३ विष्णुकी स्थापना करना चाहे, उसको चाहिये कि वह पहले स्थिर-संज्ञक * नक्षत्रोंमें भूमिशोधनका कार्य प्रारम्भ
- तीनों उत्तरा और रोहिणी - वे 'स्थिर' नक्षत्र कहलाते हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth