संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 260, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४९ हारार्पितवरां दिव्यां कण्ठे त्रिवलिसंयुताम्। | उस दिव्य भगवत्प्रतिमाके कण्ठमें सुन्दर हार पहनाया सुस्तनीं चारुहृदयां सुजठरां समां शुभाम् ॥ १६ | गया हो, गलेमें त्रिवली-चिह्न हो, स्तनभाग सुन्दर, वक्षःस्थल रुचिर और उदर मनोहर होना चाहिये। कटिलग्नवामकरां पद्मलग्नां च दक्षिणाम्। | सम्पूर्ण अङ्ग बराबर और सुन्दर हों। वह प्रतिमा अपना केयूरबाहुकां दिव्यां सुनाभिवलिभङ्गिकाम् ॥ १७ | बायाँ हाथ कमरपर रखे हो और दाहिनेमें कमल धारण किये हो। बाहुओंमें भुजबन्ध पहने हो और सुन्दर नाभि सुकटीं च सुजङ्घोरूं वस्त्रमेखलभूषिताम्। | तथा त्रिवलीसे सुशोभित एवं दिव्य जान पड़ती हो। एवं तां कारयित्वा तु प्रतिमां राजसत्तम ॥ १८ | उसका कटिभाग (नितम्ब), जाँघें और पिंडलियाँ मनोहर हों, वह कमरमें मेखला और पीतवस्त्रसे विभूषित हो। सुवर्णवस्त्रदानेन तत्कर्तृन् पूज्य सत्तम। | नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवत्प्रतिमाका निर्माण कराकर पूर्वपक्षे शुभे काले प्रतिमां स्थापयेद्बुधः ॥ १९ | उसके बनानेवाले शिल्पियोंको सुवर्ण-दान एवं वस्त्र-दानके द्वारा सम्मानित करके विद्वान् पुरुष पूर्व पक्षमें शुभ समयपर उस प्रतिमाकी स्थापना करे ॥ १६–१९ ॥ प्रासादस्याग्रतः कृत्वा यागमण्डपमुत्तमम्। | चतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु चतुर्भिस्तोरणैर्युतम् ॥ २० | मन्दिरके सामने एक उत्तम यज्ञमण्डप बनवाये। समधान्याङ्कुरैर्युक्तं शङ्खभेरीनिनादितम्। | उसमें चारों ओर एक-एकके क्रमसे चार दरवाजे हों और सारा मण्डप चार तोरणों (बड़े-बड़े फाटकों)- प्रतिमां क्षाल्य विद्वद्भिः षट्त्रिंशद्भिर्घटोदकैः ॥ २१ | से घिरा हो। उसमें सप्तधान्यके अङ्कुर उगे हों तथा शंख और भेरी आदि बाजे बजते हों। विद्वानोंके द्वारा छत्तीस प्रविश्य मण्डपे तस्मिन् ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । | घड़े जलसे उस प्रतिमाका अभिषेक कराकर उसके तत्रापि स्नापयेत्पश्चात् पञ्चगव्यैः पृथक् पृथक् ॥ २२ | साथ वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको साथमें लिये उक्त मण्डपमें प्रवेश करे और फिर पञ्चगव्योंसे पृथक्-पृथक् तथोष्णवारिणा स्नाप्य पुनः शीतोदकेन च। | स्नान कराये। इसी प्रकार गर्म जलसे नहलाकर फिर ठंडे हरिद्राकुङ्कुमाद्यैस्तु चन्दनैश्चोपलेपयेत् ॥ २३ | जलसे स्नान कराये। तत्पश्चात्, हल्दी और कुङ्कुम आदिका तथा चन्दनोंका उसपर लेप करे, फिर फूलोंकी मालाओंसे पुष्पमाल्यैरलङ्कृत्य वस्त्रैराच्छाद्य तां पुनः। | विभूषितकर उसे वस्त्र धारण करा दे और पुण्याहवाचन पुण्याहं तत्र कृत्वा तु ऋग्भिस्तां प्रोक्ष्य वारिभिः ॥ २४ | करके वैदिक ऋचाओंसे उच्चारणपूर्वक जलसे प्रोक्षित कर भक्त ब्राह्मणोंद्वारा उस भगवद्विग्रहको नहलाये। स्नात्वा तां ब्राह्मणैर्भक्तैः शंखभेरीस्वनैर्युतम्। | तत्पश्चात् शंख, भेरी आदि बाजे बजाते हुए उसे नदीके वासयेत्सप्तरात्रं तु त्रिरात्रं वा नदीजले ॥ २५ | जलमें रखकर सात या तीन दिनोंतक उसे वहाँ रहने दे। ह्रदे तु विमले शुद्धे तडागे वापि रक्षयेत् । | अथवा किसी निर्मल जलाशय या शुद्ध सरोवरमें ही अधिवास्य जले देवमेवं पार्थिवपुङ्गव ॥ २६ | रखकर उसकी रक्षा करे। नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान्का जलाधिवास कराके ब्राह्मणोंद्वारा उनको उठवाये और तत उत्थाप्य विप्रैस्तु स्थाप्या्वलङ्कृत्य पूर्ववत्। | पालकी आदिमें चढ़ाकर पूर्ववत् उन्हें माला आदिसे ततो भेरीनिनादैस्तु वेदघोषैश्च केशवम् ॥ २७ | विभूषित करे। तदनन्तर नगारोंकी ध्वनि और वेदमन्त्रोंके गम्भीर घोषके साथ भगवान्को वहाँसे ले आये और आनीय मण्डपे शुद्धे पद्माकारविनिर्मिते । | कमलाकार बने हुए शुद्ध मण्डपमें रखे। वहाँ पुनः स्नान कृत्वा पुनस्ततः स्नाप्य विष्णुभक्तैरलङ्क्रियात् ॥ २८ | कराके विष्णुभक्तोंद्वारा उसका शृङ्गार कराये ॥ २०-२८॥