भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 318 में से

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पृष्ठ 262

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २५१ हुत्वा जपेच्च विधिवद्यदस्येति च स्विष्टकृत् । मन्त्रका जप करे और घीसे 'स्विष्टकृत्' संज्ञक होम ततः स दक्षिणां दद्यादृृत्विग्भ्यश्च यथार्हतः ॥ ४० करे। तदनन्तर ऋत्विजोंको उनके सम्मानके अनुकूल सादर दक्षिणा दे। इसके बाद यजमान आचार्यको दो वस्त्रे द्वे कुण्डले चैव गुरवे चाङ्गुलीयकम्। वस्त्र, दो सुवर्णमय कुण्डल और सोनेकी अंगूठी दे यजमानस्ततो दद्याद्विभवे सति काञ्चनम् ॥ ४१ तथा यदि सामर्थ्य हो तो इसके अतिरिक्त भी सुवर्णदान करे ॥ ३६-४१ ॥ कलशाष्टसहस्रेण कलशाष्टशतेन वा। फिर विद्वान् पुरुष यथासम्भव एक हजार आठ या एकविंशतिना वापि स्नपनं कारयेद् बुधः ॥ ४२ एक सौ आठ अथवा इक्कीस घड़े जलसे भगवान्‌को स्नान कराये। उस समय शंख और दुन्दुभि आदि बाजे शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्वेदघोषैश्च मङ्गलैः। बजते रहें, वेदमन्त्रोंका घोष और मङ्गलपाठ होता रहे। यवव्रीहियुतैः पात्रैरूद्धतैरूच्छिताङ्कुरैः ॥ ४३ अपनी शक्तिके अनुसार जिनपर जौ आदिके अङ्कुर निकले हों, ऐसे जौ और व्रीहि (चावल)-से भरे पात्रोंद्वारा तथा दीपयष्टिपताकाभिश्च्छत्रचामरतोरणैः । दीप, यष्टि (छड़ी), पताका, छत्र, चँवर, तोरण आदि स्नपनं कारयित्वा तु यथाविभवविस्तरम् ॥ ४४ सामग्रियोंके साथ स्नान-विधि पूर्ण कराके वहाँ भी ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। राजन्! इस प्रकार जो तत्रापि दद्याद्विप्रेभ्यो यथाशक्त्या तु दक्षिणाम्। भगवान् विष्णुकी प्रतिष्ठा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त एवं यः कुरुते राजन् प्रतिष्ठां देवचक्रिणः ॥ ४५ हो जाता है और मृत्युके पश्चात् अपनेसहित इक्कीस सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः । पीढ़ीके पितरोंको साथ ले, सब प्रकारके आभूषणोंसे विमानेन विचित्रेण त्रिःसप्तकुलजैर्वृतः ॥ ४६ भूषित एवं विचित्र विमानपर आरूढ हो, क्रमशः इन्द्रादि लोकोंमें विशेष सम्मान प्राप्त करता है तथा अपने बन्धुजनोंको पूजां सम्प्राप्य महतीमिन्द्रलोकादिषु क्रमात्। उन लोकोंमें रखकर स्वयं विष्णुलोकमें जाकर प्रतिष्ठित बान्धवांस्तेषु संस्थाप्य विष्णुलोके महीयते ॥ ४७ होता है। फिर वहाँ ही भगवत्तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर वह तत्रैव ज्ञानमासाद्य वैष्णवं पदमाप्नुयात्। विष्णुस्वरूपमें लीन हो जाता है ॥ ४२-४७ १/२ ॥ प्रतिष्ठाविधिरयं विष्णोर्मयैवं ते प्रकीर्तितः ॥ ४८ राजन्! इस प्रकार तुमसे मैंने यह प्रतिष्ठा-विधि पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनः ॥ ४९ बतायी। इसका पाठ और श्रवण करनेवाले लोगोंके सब पाप दूर हो जाते हैं। नरनाथ! जब मनुष्य इस पूर्वोक्त यदा नृसिंहं नरनाथ भूमौ विधिसे पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहकी स्थापना कर लेता संस्थाप्य विष्णुं विधिना ह्यनेन । है, तब मृत्युके बाद वह भगवान् विष्णुके उस नित्यधामको तदा ह्यसौ याति हरेः पदं तु प्राप्त होता है, जहाँ रहकर वह पुनः संसारमें नहीं यत्र स्थितोऽयं न निवर्तते पुनः ॥ ५० लौटता ॥ ४८-५० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे प्रतिष्ठाविधिर्नाम षट्पञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'प्रतिष्ठाविधि' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth