भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 318 में से

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पृष्ठ 267

२५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८ ब्रह्मचर्यमधःशय्या तथा वह्नेरुपासनम्। उदकुम्भं गुरोर्दद्यात्तथा चेन्धनमाहरेत् ॥ १८ कुर्यादध्ययनं पूर्वं ब्रह्मचारी यथाविधि। विधिं हित्वा प्रकुर्वाणो न स्वाध्यायफलं लभेत् ॥ १९ यत्किंचित् कुरुते कर्म विधिं हित्वा निरात्मकः। न तत्फलमवाप्नोति कुर्वाणो विधिविच्युतः ॥ २० तस्मादेवं व्रतानीह चरेत् स्वाध्यायसिद्धये । शौचाचारमशेषं तु शिक्षयेद्गुरुसंनिधौ ॥ २१ अजिनं दण्डकाष्ठं च मेखलां चोपवीतकम्। धारयेदप्रमत्तस्तु ब्रह्मचारी समाहितः ॥ २२ सायं प्रातश्चरेद्भैक्षं भोजनं संयतेन्द्रियः। गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु ॥ २३ अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वपूर्वं च वर्जयेत्। आचम्य प्रयतो नित्यमश्नीयाद्गुर्वनुज्ञया ॥ २४ शयनात् पूर्वमुत्थाय दर्भमृद्दन्तशोधनम्। वस्त्रादिकमथान्यच्च गुरवे प्रतिपादयेत् ॥ २५ स्नाने कृते गुरौ पश्चात् स्नानं कुर्वीत यत्नवान्। ब्रह्मचारी व्रती नित्यं न कुर्याद्दन्तशोधनम् ॥ २६ छत्रोपानहमभ्यङ्गं गन्धमाल्यानि वर्जयेत्। नृत्यगीतकथालापं मैथुनं च विशेषतः ॥ २७ वर्जयेन्मधु मांसं च रसास्वादं तथा स्त्रियः । कामं क्रोधं च लोभं च परिवादं तथा नृणाम् ॥ २८ स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपघातं परस्य च। एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत् क्वचित् ॥ २९ स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः । स्नात्वार्कमर्चयित्वाग्निं पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥ ३० --- [हिन्दी अनुवाद] --- करे। वह ब्रह्मचर्यका पालन, भूमिपर शयन और अग्निकी उपासना करे। गुरुके लिये जलका घड़ा भरकर लाये और हवनके निमित्त समिधा ले आये। इस प्रकार सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहकर विधिपूर्वक अध्ययन करना चाहिये। जो विधिको त्याग करके अध्ययन करता है, उसे उस अध्ययनका फल नहीं प्राप्त होता (उसकी विद्या सफल नहीं होती)। विधिकी अवहेलना करके वह जो कुछ भी कर्म करता है, विधिभ्रष्ट एवं नास्तिक होनेके कारण उसे उसका फल नहीं मिलता। इसलिये गुरुकुलमें रहकर अपने अध्ययनकी सफलताके लिये उपर्युक्त व्रतोंका आचरण करना चाहिये और गुरुके निकट समस्त शौचाचारोंको सीखना चाहिये। ब्रह्मचारी सावधान और एकाग्रचित्त रहकर मृगचर्म, पलाशदण्ड, मेखला और उपवीत (जनेऊ) धारण करे। अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर सायंकाल और प्रातःकाल भिक्षासे मिला हुआ अन्न भोजन करे। गुरुके कुलमें और उनके कुटुम्बी बन्धु-बान्धवोंके घरमें भिक्षा न माँगे। दूसरेके घर न मिले तो पूर्वोक्त घरोंमेंसे भी भिक्षा ले सकता है; किंतु यथासाध्य पूर्व-पूर्व गृहोंका त्याग करे। अर्थात् पहले कहे हुए गुरुगृह या गुरुकुलका त्यागकर अन्यत्र भिक्षा ले। नित्य आचमन करके शुद्धचित्त होकर गुरुकी आज्ञासे भोजन करे। रात्रि बीतनेपर गुरुसे पहले ही अपने आसनसे उठ जाय और गुरुके लिये कुश, मिट्टी, दाँतुन और वस्त्र आदि अन्य सामान एकत्र करके उनको दे। गुरुजीके स्नान कर लेनेपर स्वयं यत्नपूर्वक स्नान करे। ब्रह्मचारी सदा व्रत रखे और काठ आदिसे दन्तधावन न करे॥ १७-२६॥ छाता, जूता, उबटन, गन्धयुक्त इत्र आदि और फूल-माला आदिको त्याग दे। विशेषतः नाच, गान और ग्राम्य कथा-वार्ता एवं मैथुनका सर्वथा त्याग करे। मधु, मांस और रसास्वाद (जिह्वाके स्वाद)-को त्याग दे। स्त्रियोंसे अलग रहे। काम, क्रोध, लोभ तथा दूसरे मनुष्योंके अपवाद (निन्दा)-का परित्याग करे। स्त्रियोंकी ओर देखने, उनका स्पर्श करने और दूसरे जीवोंकी हिंसा करने आदिसे बचकर रहे। सब जगह अकेले ही शयन करे, कभी कहीं भी वीर्यपात न करे। यदि कामभाव न होनेपर भी स्वप्नमें वीर्य-स्खलन हो जाय तो ब्रह्मचारी द्विजको चाहिये, वह स्नान करके सूर्य और अग्निकी आराधना करे तथा 'पुनर्मामेत्विन्द्रियम्' इस In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

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