भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 318 में से

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पृष्ठ 61

५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२ यम उवाच स्वयम्भुवापि निन्द्येत लोकवृत्तं जुगुप्सितम्। प्रधानपुरुषाचीर्णं लोकोऽयमनुवर्तते॥ २२ तस्मादनिन्दितं धर्मं प्रधानपुरुषश्चरेत्। निन्दितं वर्जयेद्यत्नादेतद्धर्मस्य लक्षणम्॥ २३ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ २४ अतिपापमहं मन्ये सुभगे वचनं तव। विरुद्धं सर्वधर्मेषु लोकेषु च विशेषतः॥ २५ मत्तोऽन्यो यो भवेद्यो वै विशिष्टो रूपशीलतः। तेन सार्धं प्रमोदस्व न ते भर्ता भवाम्यहम्॥ २६ नाहं स्पृशामि तन्वा ते तनुं भद्रे दृढव्रतः। मुनयः पापमाहुस्तं यः स्वसारं निगृह्णति॥ २७ यम बोले— बहिन! कुत्सित लोकव्यवहारकी निन्दा ब्रह्माजीने भी की है। इस संसारके लोग श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा आचरित धर्मका ही अनुसरण करते हैं। इसलिये श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि वह उत्तम धर्मका ही आचरण करे और निन्दित कर्मको यत्नपूर्वक त्याग दे—यही धर्मका लक्षण है। श्रेष्ठ पुरुष जिस-जिस कर्मका आचरण करता है, उसीको अन्य लोग भी आचरणमें लाते हैं और वह जिसे प्रमाणित कर देता है, लोग उसीका अनुसरण करते हैं। सुभगे! मैं तो तुम्हारे इस वचनको अत्यन्त पापपूर्ण समझता हूँ। इतना ही नहीं, मैं इसे सब धर्मों और विशेषतः समस्त लोकोंके विपरीत मानता हूँ। मुझसे अन्य जो कोई भी रूप और शीलमें विशिष्ट हो, उसके साथ तुम आनन्दपूर्वक रहो; मैं तुम्हारा पति नहीं हो सकता। भद्रे! मैं दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला हूँ, अतः अपने शरीरसे तुम्हारे शरीरका स्पर्श नहीं करूँगा। जो बहिनको ग्रहण करता है, उसे मुनियोंने 'पापी' कहा है॥ २२—२७॥ यम्युवाच दुर्लभं चैव पश्यामि लोके रूपमिहेदृशम्। यत्र रूपं वयश्चैव पृथिव्यां क्व प्रतिष्ठितम्॥ २८ न विजानामि ते चित्तं कुत एतत् प्रतिष्ठितम्। आत्मरूपगुणोपेतां न कामयसि मोहिताम्॥ २९ लतेव पादपे लग्ना कामं त्वच्चरणं गता। बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य निवसामि शुचिस्मिता॥ ३० यमी बोली— मैं देखती हूँ, इस संसारमें ऐसा (तुम्हारे समान) रूप दुर्लभ है। भला, पृथ्वीपर ऐसा स्थान कहाँ है, जहाँ रूप और समान अवस्था—दोनों एकत्र वर्तमान हों। मैं नहीं समझती, तुम्हारा यह चित्त इतना स्थिर कैसे है, जिसके कारण तुम अपने समान रूप और गुणसे युक्त होनेपर भी मुझ मोहिता स्त्रीकी इच्छा नहीं करते हो। वृक्षमें संलग्न हुई लताके समान मैं स्वेच्छानुसार तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। मेरे मुखपर पवित्र मुसकान शोभा पाती है। अब मैं अपनी दोनों भुजाओंसे तुम्हारा आलिङ्गन करके ही रहूँगी॥ २८—३०॥ यम उवाच अन्यं श्रयस्व सुश्रोणि देवं देव्यसितेक्षणे। यस्तु ते काममोहेन चेतसा विभ्रमं गतः। तस्य देवस्य देवी त्वं भवेथा वरवर्णिनि॥ ३१ ईप्सितां सर्वभूतानां वर्यां शंसन्ति मानवाः। सुभद्रां चारुसर्वाङ्गीं संस्कृतां परिचक्षते॥ ३२ तत्कृतेऽपि सुविद्वांसो न करिष्यन्ति दूषणम्। परितापं महाप्राज्ञे न करिष्ये दृढव्रतः॥ ३३ चित्तं मे निर्मलं भद्रे विष्णौ रुद्रे च संस्थितम्। अतः पापं नु नेच्छामि धर्मचित्तो दृढव्रतः॥ ३४ यम बोले— श्यामलोचने! सुश्रोणि! मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करनेमें असमर्थ हूँ। तुम किसी दूसरे देवताका आश्रय लो। वरवर्णिनि! तुम्हें देखकर काममोहसे जिसका चित्त विभ्रान्त हो उठे, उसी देवताकी तुम देवी हो जाओ। जिसे समस्त प्राणी चाहते हैं, मानवगण जिसे वरणीय बतलाते हैं, कल्याणमयी, सर्वाङ्गसुन्दरी और सुसंस्कृता कहते हैं, उसके लिये भी विद्वान् पुरुष कभी दूषित कर्म नहीं करेंगे। महाप्राज्ञे! मेरा व्रत अटल है। मैं यह पश्चात्तापजनक पाप कदापि नहीं करूँगा। भद्रे! मेरा चित्त निर्मल है, भगवान् विष्णु और शिवके चिन्तनमें लगा हुआ है। इसलिये मैं दृढ़संकल्प एवं धर्मात्मा होकर निश्चय ही यह पापकर्म नहीं करना चाहता॥ ३१—३४॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth