भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 220 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 162

१४६ नीतिवाक्यामृतम् आयानुरूपो व्ययः कार्यः ॥ ४४ ॥ आय के अनुसार ही व्यय करना चाहिये । ऐश्वर्यानुरूपः प्रसादो विधेयः ॥ ४५ ॥ अपनी सम्पत्ति के अनुरूप ही दूसरों को भेंट और पुरस्कार आदि देना चाहिए । स पुमान् सुखी यस्यास्ति सन्तोषः ॥ ४६ ॥ वही पुरुष वास्तविक सुखी है जिसको सन्तोष है । रजस्वलाभिगामी चाण्डालादप्यधमः ॥ ४७ ॥ रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाला व्यक्ति चांडाल से भी अधिक नीच है । सलज्जं निर्लज्जं न कुर्यात् ॥ ४८ ॥ सलज्ज व्यक्ति को निर्लज्ज न बना दें अर्थात् विनम्र भाव से रहने वाले व्यक्ति को मुंहलगा बना कर ढीठ कर देना उचित नहीं होता । स पुमान् सवस्त्रोऽपि नग्न एव यस्य नास्ति सच्चरित्रम् आवर- णम् ॥ ४६ ॥ जिस पुरुष के पास सच्चरित्र रूपी आवरण नहीं है वह वस्त्र पहने हुए भी नंगा ही है । स नग्नोऽप्यनग्न एव यो भूषितः सच्चरित्रेण ॥ ५० ॥ जो सच्चरित्र से विभूषित है वह नंगा होने पर भी वस्त्रयुक्त है । सर्वत्र संशायानेषु नास्ति कार्यसिद्धिः ॥ ५१ ॥ सर्वत्र संशयभरी दृष्टि रखने वाले को कार्यों में सिद्धि नहीं प्राप्त होती । न क्षीरघृताभ्यां परं भोजनमस्ति ॥ ५२ ॥ दूध और घी से बढ़कर दूसरा भोजन नहीं है । परोपघातेन वृत्तिरभव्यानाम् ॥ ५३ ॥ दूसरों को पीड़ित कर अपना जीवन निर्वाह करना दुष्टों का काम है । वरमुपवासो न पराधीनं भोजनम् ॥ ५४ ॥ उपवास कर लेना अच्छा है किन्तु दूसरों के अधीन रहकर भोजन करना श्रेष्ठ नहीं है । स देशोऽनुसर्त्तव्यो यत्र नास्ति वर्णसङ्करः ॥ ५५ ॥ उस देश में निवास करना चाहिए जहां वर्णसंकर अर्थात् क्षुद्र प्रकृति के मनुष्य न हों । स जात्यन्धो यः परलोकं न पश्यति ॥ ५६ ॥ जो अपना परलोक का हित न देखे वह स्वभावतः अन्धा है ।