नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
२० नीतिवाक्यामृतम् आभूषणों में नहीं प्रतिष्ठित किया जाता उसी प्रकार सुन्दर वंश में भी समु- त्पन्न राजकुमार को सत्पुरुष लोग शास्त्रज्ञान से संस्कृत हुए बिना प्रतिष्ठित नहीं करना चाहते । दुविनीत रोग के दोष— न दुर्विनीताद् राज्ञः प्रजानां विनाशादपरोऽस्त्युत्पातः ॥ ३७ ॥ दुर्विनीत राजा से प्रजा को विनाश से अधिक दूसरे किसी उत्पात का भय नहीं होता । दुष्ट राजा से प्रजा का क्षय अवश्यम्भावी है । दुर्विनीत का लक्षण— यो युक्तायुक्तयोरविवेकी विपर्य्यस्तमतिर्वा स दुर्विनीतः ॥ ३८ ॥ जो राजा योग्य-अयोग्य का निर्णय न कर सके अथवा जिसकी बुद्धि विप- रीत हो, बुरी बात को ही अच्छा समझे, वह दुर्विनीत है । 'द्रव्य' और 'अद्रव्य' प्रकृति के राजा— यत्र सद्गिराधीयमाना गुणाः संक्रामन्ति तद् द्रव्यम् ॥ ३९ ॥ सत् पुरुषों के द्वारा दिया उपदेश जिस व्यक्ति में स्थिर रह सके वह द्रव्य- प्रकृति का पुरुष है । द्रव्यं हि क्रियां [विनयति नाद्रव्यम् ॥ ४० ॥ जो द्रव्य प्रकृति का है वही राज्य भोग कर सकता है अद्रव्य प्रकृति का नहीं । यतो द्रव्याद्रव्यप्रकृतिरप्यस्ति कश्चित् पुरुषः संकीर्णगजवत् ॥ ४१ ॥ संकीर्ण जाति का गज जिस प्रकार गजराज नहीं हो सकता उसी प्रकार द्रव्य प्रकृति के पुरुषों में भी द्रव्याद्रव्य की सङ्कर प्रकृति का पुरुष राजपद के योग्य नहीं होता । बुद्धि के ८ गुण : उन गुणों का निरूपण— शुश्रूषा-श्रवण-ग्रहण-धारणा-विज्ञानोहापोहतत्त्वाभिनिवेशा बुद्धि- गुणाः ॥ ४२ ॥ बुद्धि के आठ गुण हैं, शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारणा, विज्ञान, ऊह, अपोह और तत्त्वाभिनिवेश । ( इनका स्पष्टीकरण अग्रिम सूत्रों में ग्रन्थकार ने स्वयं किया है ) श्रोतुमिच्छा शुश्रूषा ॥ ४३ ॥ शास्त्रश्रवण की इच्छा ही शुश्रूषा है । श्रवणमाकर्णनम् ॥ ४४ ॥ शास्त्रीय प्रसङ्गों का सुनना श्रवण है ।
विद्यावृद्धसमुद्देशः २१ ग्रहणं शास्त्रार्थोपादानम् ॥ ४५ ॥ शास्त्रीय प्रसङ्गों का संग्रह करना ग्रहण गुण है । धारणमविस्मरणम् ॥ ४६ ॥ शास्त्रीय बातों को जान कर न भूलना बुद्धि का धारण नाम का गुण है । मोहसन्देहविपर्यासव्युदासेन ज्ञानं विज्ञानम् ॥ ४७ ॥ अज्ञान, सन्देह और प्रतिकूल बातों का खण्डन कर ज्ञान प्राप्त करना विज्ञान नामक बुद्धि गुण है । विज्ञातमर्थमवलम्ब्यान्येषु व्याप्या तथाविधतर्कणमूहः ॥ ४८ ॥ ज्ञात विषय की अन्यत्र व्याप्ति पर विचार करना और उसी प्रकार की अन्य कल्पनाएँ करना 'ऊह' नामक बुद्धि गुण है । उक्तियुक्तिभ्यां विरुद्धादर्थात् प्रत्यवायसंभावनया व्यावर्तनम- पोहः ॥ ४९ ॥ ज्ञान के किसी निर्णीत सिद्धान्त का किसी विरोधी अर्थ द्वारा खण्डन कर दिये जाने की संभावना में उक्ति और युक्ति के द्वारा उस विरोधी अर्थ का निराकरण करना अपोहनाम का बुद्धि गुण है । अथवा ज्ञानसामान्यमूहो ज्ञानविशेषोऽपोहः ॥ ५२ ॥ अथवा सामान्यज्ञान ऊह है और विशेष ज्ञान अपोह । विज्ञानोहापोहानुगमविशुद्धमिदमित्थमेवेति निश्चयस्तत्त्वाभिनि- वेशः ॥ ५३ ॥ विज्ञान, ऊहापोह और अनुगम से परिष्कृत कर 'यह ऐसा ही है' इस प्रकार का निश्चय करना तत्त्वाभिनिवेश नाम का बुद्धिगुण है । विद्याएँ और उनके भेद— याः समधिगम्यात्मनो हितमवैत्यहितं चापोहति ता विद्याः ॥ ५४ ॥ जिनको जानकर व्यक्ति अपना हित पहचान सके और अहित का निवा- रण कर सके वे विद्याएँ हैं । आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिरिति चतस्रोराजविद्याः ॥ ५५ ॥ आन्वीक्षिकी अर्थात् अध्यात्म विद्या या तर्कशास्त्र त्रयी अर्थात् चारों वेद, षडङ्ग और चतुर्दश विद्याएँ, वार्ता अर्थात् कृषि पशुपालन और व्यापार तथा दोष के अनुकूल दण्ड का विधान रूप दण्डनीति, ये चार राजविद्याएँ हैं । अधीयानो आन्वीक्षिकीं कार्याणां बलाबलं हेतुभिर्विचारयति, व्यस- नेषु न विषीदति, नाभ्युदयेन विकार्यते, समधिगच्छति च प्रज्ञावाक्यवै- शारद्यम् ॥ ५६ ॥ आन्वीक्षिकी विद्या का अध्ययन करनेवाला व्यक्ति कार्य के बलाबल का
२२ नीतिवाक्यामृतम् विचार तर्क के द्वारा करता है, दुःख आ पड़ने पर दुःखी नहीं होता, अभ्युदय होने पर उन्मत्त नहीं होता और बुद्धिकौशल तथा वाक्चातुर्य प्राप्त करता है । त्रयीं पठन् वर्णाचारेष्वतीव प्रगल्भते , जानाति च समस्तामपि धर्मस्थितिम् ॥ ५७ ॥ त्रयी का अध्ययन करनेवाला व्यक्ति ब्राह्मणादि चारों वर्णों के आचार- व्यवहार में बहुत पटु हो जाता है और धर्म तथा अधर्म की स्थिति को जान जाता है । युक्तितः प्रवर्तयन् वार्ता सर्वमपि जीवलोकमभिनन्दयति, लभते च स्वयं सर्वानपि कामान् ॥ ५८ ॥ वार्ता विद्या का युक्ति-पूर्वक प्रयोग करनेवाला व्यक्ति समस्त जनवर्ग को आनन्दित करता है और स्वयं भी सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करता है । दण्डनीति की प्रशंसा— यम इवापराधिषु दण्डप्रणयनेन विद्यमाने राज्ञि न प्रजाः स्वमर्यादा- मतिक्रामन्ति, प्रसीदन्ति च त्रिवर्गफला विभूतयः ॥ ५६ ॥ अपराधियों के लिये यमराज के समान दण्ड का विधान करनेवाले राजा के वर्तमान रहने पर प्रजा अपनी मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं कर पाती और राजा को धर्म, अर्थ और काम इन तीनों का ऐश्वर्यभोग प्राप्त होता है । आन्वीक्षिकी आदि विद्याओं का उपयोग— आन्वीक्षिक्यध्यात्मविषये, त्रयी वेदयज्ञादिषु, वार्त्ता कृषिकर्मादिका, दण्डनीतिः साधुपालनं दुष्टनिग्रहः ॥ ६० ॥ अध्यात्म-विषय में आन्वीक्षिकी, वेद यज्ञ आदि के विषय में त्रयी विद्या और कृषि कर्म आदि के सम्बन्ध में वार्ता विद्या तथा साधुजनों का पालन और दुष्टों का दमन करने में दण्डनीति काम आती है । विद्या के लाभ— चेतयते च विद्या वृद्धसेवायाम् ॥ ६१ ॥ विद्या वृद्धसेवा में प्रवृत्त करती है । अजातविद्यावृद्धसंयोगो हि राजा निरङ्कुशो गज इव सद्यो विनश्यति ॥ ६२ ॥ विद्या और वृद्धसंयोग से वञ्चित राजा निरंकुश हाथी के समान शीघ्र ही विनष्ट हो जाता है । अनधीयानोऽपि विशिष्टजनसंसर्गात्परां व्युत्पत्तिमवाप्नोति ॥ ६३ ॥ विद्याओं का अध्ययन न करता हुआ भी राजा विशिष्ट व्यक्तियों के संसर्ग से उत्कृष्ट कोटि का ज्ञान प्राप्त कर लेता है ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri विद्यावृद्धसमुद्देशः २३ राजा के लिये वृद्धों की संगति से लाभ— अन्येव काचित्खलु छायोपजलतरूणाम् ॥ ६४ ॥ इस प्रकार विशिष्ट-व्यक्तियों के संसर्ग से प्राप्त ज्ञान की शोभा जलसमीप- वर्त्ती वृक्षों की छाया के समान कुछ अपूर्व ढंग की होती है । राजाओं के गुरु कैसे हों— वंशवृत्तविद्याऽभिजनविशुद्धा हि राज्ञामुपाध्यायाः ॥ ६५ ॥ राजाओं के गुरु वे होते हैं जिनका वंश विमल हो चरित्र निर्दोष हो, ज्ञान निर्मल हो और कुलीनता में किसी प्रकार का लाञ्छन न हो । शिष्टों का समादर राजा का कर्तव्य है— शिष्टेषु नीचैराचरन्नरपतिरिहलोके स्वर्गे च महीयते ॥ ६६ ॥ शिष्ट पुरुषों के प्रति विनम्र आचरण करनेवाला राजा इस लोक और परलोक में भी महत्त्व को प्राप्त करता है । राजा के द्वारा वन्दनीय व्यक्ति — राजा हि परमं दैवतं नासौ कस्मैचित्प्रणमत्यन्यत्रगुरुजनेभ्यः ॥६७॥ राजा महान् देवतास्वरूप होता है वह अपने माता-पिता आदि गुरुजनों के अतिरिक्त अन्य किसी को प्रणाम नहीं करता । अशिष्टों की सेवा कर विद्या-प्राप्ति अनुचित है— वरमज्ञानं नाशिष्टजनसेवया विद्या ॥ ६८ ॥ मूर्ख रह जाना अच्छा है किन्तु अशिष्ट पुरुषों की सेवा करके विद्या प्राप्त करना अच्छा नहीं है । अलं तेनामृतेन यत्रास्ति विषसंसर्गः ॥ ६६ ॥ विष-मिश्रित अमृत से क्या लाभ ? गुरु और शिष्य के आचार-विचार में समानता— गुरुजनशीलमनुसरन्ति प्रायेण शिष्याः ॥ ७० ॥ शिष्यवृन्द प्रायः गुरुओं के ही शील-सदाचार के अनुगामी होते हैं । प्रारम्भ के संस्कार अमिट होते हैं— नवेषु मृद्भाजनेषु लग्नः संस्कारो ब्रह्मणाप्यन्यथा कर्तुं न शक्यते ॥ ७१ ॥ मिट्टी के नये बर्तन में रखी गई सुगन्ध अथवा दुर्गन्धयुक्त वस्तु का संस्कार जिस प्रकार किसी तरह से भी नहीं दूर होता उसी प्रकार नवीन पात्र- रूपी शिष्य में गुरु के द्वारा प्रारम्भावस्था में डाला गया संस्कार ( शील- सदाचार और ज्ञान ) ब्रह्मा के भी मिटाये नहीं मिटता । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
२४ नीतिवाक्यामृतम् अभिमानी नृप निन्दनीय है— अन्ध इव वरं परप्रणेयो राजा न ज्ञानलवदुविदग्धः ॥ ७२ ॥ अन्धे के समान सदा मन्त्रियों आदि दूसरों के सहारे चलनेवाला राजा अच्छा है किन्तु ज्ञान के लेशमात्र से अपने को महापण्डित माननेवाला अभि- मानी राजा नहीं अच्छा होता । नीलीरक्ते वस्त्र इव को नाम दुर्विदग्धे राज्ञि रागान्तरम् आधत्ते ॥७३॥ नील के रंग में रंगे हुए वस्त्र पर जिस प्रकार कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ता उसी प्रकार 'ज्ञान-लव-दुर्विदग्ध' ( अल्पज्ञ ) राजा के भी विचारों को बदला नहीं जा सकता । राजा गुणग्राही हों और विद्वान् यथार्थवादी— यथार्थवादो विदुषां श्रेयस्करो यदि न राजा गुणद्वेषी ॥ ७४ ॥ यदि राजा गुणों से द्वेष न करनेवाला अर्थात् गुणग्राही हो तो विद्वानों को कठोर और अप्रिय होने पर भी यथार्थ तत्त्व का निवेदन करना श्रेयस्कर है । स्वामी को अहितकर उपदेश नहीं देना चाहिए— वरमात्मनो मरणं नाहितोपदेशः स्वामिषु ॥ ७५ ॥ साधु-पुरुष का स्वयं मर जाना अच्छा है, किन्तु राजा को अहित उपदेश देना अच्छा नहीं है । [ इति विद्यावृद्धसमुद्देशः ] ६. आन्वीक्षिकीसमुद्देशः अध्यात्मयोग का लक्षण— आत्ममनोमरुत्तत्त्वसमतायोगलक्षणो ह्यध्यात्मयोगः ॥ १ ॥ चिद् रूप व्यापक आत्मा, संकल्प-विकल्प प्रवृत्ति वाला मन और शरीरस्थ प्राणवायु इन पर समान रूप से अधिकार रखना 'अध्यात्मयोग' हैं । अध्यात्म के लाभ— अध्यात्मज्ञो हि राजा सहजशारीरमानसागन्तुभिर्दोषैर्न बाध्यते ॥२॥ अध्यात्मशक्ति संपन्न राजा भीरुता, अकर्मण्यता आदि स्वाभाविक दोष, ज्वरादि शारीरिक दोष तथा कुत्सित संकल्प करना आदि मानसिक दोषों से एवम् आकस्मिक दुर्घटना आदि आगन्तुक दोषों से पीड़ित नहीं होता । आत्माराम का लक्षण— मन इन्द्रियाणि विषयाः ज्ञातं भोगायतनमित्यात्मारामः ॥ ४ ॥
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आन्वीक्षिकीसमुद्देशः २५ अपना मन, इन्द्र से भी दुर्जय इन्द्रियां, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि विषय और स्वप्रकाश रूप ज्ञान यही जिस के आत्मा के क्रीड़ा स्थान हों वह आत्मा राम है, आत्मन्येव रमते इत्यात्मारामः । आत्मा का स्वरूप— यत्राहमित्यनुपचरितः प्रत्ययः स आत्मा ॥ ४ ॥ जिस पदार्थ में मैं हूं ऐसी औपचारिक नहीं, किन्तु वास्तविक अनुभूति हो वह आत्मा है । आत्मा की अमरता न मानने से दोष— असत्यात्मनि प्रेत्यभावे विदुषां विफलं खलु सर्वमनुष्ठानम् ॥ ५ ॥ मृत्यु के उपरान्त आत्मा की सत्ता न स्वीकार करने पर बड़े-बड़े विद्वानों का अनेक शुभ कार्यों में प्रवृत्त होना ही व्यर्थ हो जायगा । विशेषार्थ—चैतन्य विशिष्ट देह ही आत्मा है इसलिये जब देह नष्ट हो गया अर्थात् प्राणी मर गया तो आत्मा भी नष्ट हो गया इस प्रकार का विचार रखने वाले चार्वाक आदि के प्रति यहां यह कहा गया है कि यह विचार उपयुक्त और ठीक नहीं है; क्योंकि संसार में मूर्ख नहीं अपितु बड़े-बड़े विद्वान् यज्ञ, दान, वेदाध्ययन आदि शुभ कर्मों में इसी विश्वास से लगे रहते हैं कि इनका उनको जन्मान्तर में इहलोक और परलोक में सुन्दर फल प्राप्त होगा । यदि शरीर के साथ 'आत्मा' भी नष्ट हो जाता तो विद्वान् ऐसे कार्यों को क्यों करते ? क्योंकि जब मूर्ख से भी मूर्ख मनुष्य बिना प्रयोजन के किसी काम में नहीं लगता तो फिर विद्वानों के विषय में तो कहना ही क्या है । अतः जन्मान्तर में सुख का भोक्ता, द्रष्टा, व्यापक शाश्वत आत्म पदार्थ है । मन का लक्षण -- यतः स्मृतिः प्रत्यवमर्षणम्, ऊहापोहनम्, शिक्षालापक्रियाग्रहणं च भवति तन्मनः ॥ ६ ॥ जिसके द्वारा हम किसी चीज को याद रख सकते हैं, चिन्तन कर सकते हैं, तर्क और कल्पना कर सकते हैं, खण्डन-मण्डन कर निश्चय कर सकते हैं, ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, किसी की बात-चीत को और चेष्टा को सुन-समझ सकते हैं वह मन है । इन्द्रिय लक्षण — आत्मनो विषयानुभवद्वाराणीन्द्रियाणि ॥ ७ ॥ आत्मा को शब्द-स्पर्श, रूप-रस और गन्ध का जिनके द्वारा अनुभव होता है वे इन्द्रियां हैं । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा हि विषयाः ॥ ८ ॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का नाम विषय है । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
२६ नीतिवाक्यामृतम् ज्ञान का लक्षण— समाधीन्द्रियद्वारेण विप्रकृष्टसन्निकृष्टावबोधो ज्ञानम् ॥ ९ ॥ समाधि अर्थात् ध्यान पूर्वक चिन्तन करने से तथा आंख, कान, नाक, मुंह हाथ आदि इन्द्रियों से देखने-सुनने आदि के द्वारा हम जो कुछ परोक्ष और प्रत्यक्ष वस्तु के विषय में जान पाते हैं, उसी का नाम ज्ञान है। सुख का स्वरूप— सुखं प्रीतिः ॥ १० ॥ मन और इन्द्रियां जिससे आनन्दित हों उसका नाम सुख है। तत्सुखमप्यसुखं यत्र नास्ति मनोनिवृत्तिः ॥ ११ ॥ वह सुख भी सुख नहीं है जिससे मन को पूर्ण आह्लाद न हो। सुख के कारण— अभ्यासाभिमानसंप्रत्ययविषयाः सुखस्य कारणानि ॥ १२ ॥ अभ्यास, अभिमान, सम्प्रत्यय और विषय ये सुख के कारण हैं। अभ्यास की परिभाषा— क्रियातिशयविपाकहेतुरभ्यासः ॥ १३ ॥ किसी परिणाम पर पहुँचने की दृष्टि से अथवा सिद्धि प्राप्त करने के निमित्त किसी क्रिया को बारम्बार करना अभ्यास है। जैसे शास्त्र और शस्त्र में कुशलता प्राप्त करने की दृष्टि से उनको बार बार दोहराते रहना अभ्यास है। अभिमान के लक्षण— प्रश्रयसत्कारादिलाभेनात्मन उत्कृष्टत्वसंभावनमभिमानः ॥ १४ ॥ महान् व्यक्ति अथवा समाज के द्वारा आश्रय अथवा सम्मान आदि मिलने पर व्यक्ति को अपने में जो उत्कर्ष की भावना होती है वही वस्तु- अभिमान है। सम्प्रत्यय का स्वरूप— अतद्गुणवस्तुनि तद्गुणत्वेनाभिनिवेशः सम्प्रत्ययः ॥ १५ ॥ वस्तुतः जिसका जो गुण नहीं है उसमें उसगुण का अभिनिवेश अर्थात् आग्रह करने का नाम सम्प्रत्यय है। विशेषार्थ—सम्प्रत्यय से सुख होता है। जैसे सौन्दर्य मांसपिण्ड का अथवा स्त्री-पुरुष का वास्तविक अथवा नित्य रहने वाला गुण नहीं है। सुन्दर से सुन्दर मनुष्य रोगी होकर कुरूप हो जाता है, किन्तु मनुष्य स्त्री अथवा पुरुष विशेष को सुन्दर मानकर उस पर आसक्त होता है और सुख का अनुभव करता है । इस प्रकार मानव के अभिनिवेश का नाम सम्प्रत्यय है !
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आन्वीक्षिकीसमुद्देशः २७ विषय का लक्षण— इन्द्रियमनस्तर्पणो भावो विषयः ॥ १६ ॥ जिस भाव अथवा पदार्थ से इन्द्रिय और मन को तृप्ति अथवा सन्तोष हो उसका नाम विषय है। दुःख का स्वरूप— दुःखमप्रीतिः ॥ १७ ॥ अप्रीति ही दुःख है। विशेषार्थ—शीतल, मन्द, सुगंध, समीर, सुंदर प्राकृतिक दृश्य सम्मुख होते हुए भी यदि मन आनन्दित नहीं है तो ये सुखकर पदार्थ भी दुःखकर हैं। बहुत से आभूषणों और वस्त्रों का बोझ शरीर पर लादे रहना वस्तुतः सुखकारक तो नहीं होता, किन्तु उस सज्जा से मन को प्रसन्नता होती है अतः वह सुख माना जाता है। इन्हीं बातों को दृष्टिगत कर आगे का सूत्र है। तद्दुःखमपि न दुःखं यत्र न संक्लिश्यते मनः ॥ १८ ॥ वह दुःख भी दुःख नहीं है जिसमें मन को क्लेश न हो। दुःख के चार भेद— दुःखं चतुर्विधं सहजं दोषजमागन्तुकमन्तरङ्गञ्चेति ॥ १९ ॥ दुःख चार प्रकार के हैं सहज, दोषज, आगन्तुक और अन्तरङ्ग। सहजं क्षुत्तर्षपीडा मनोद्भवं चेति ॥ २० ॥ भूख, प्यास और मनरूपी पृथ्वी पर उत्पन्न होनेवाले क्रोध ईर्ष्या आदि सहज दुःख हैं। दोषजं वातपित्तकफवैषम्यसंभूतम् ॥ २१ ॥ वात, पित्त और कफ के विकृत होने से उत्पन्न होनेवाले दुःख दोषज दुःख हैं। आगन्तुकं वर्षातपादिजनितम् ॥ २२ ॥ वर्षा और धूप आदि से उत्पन्न दुःख आगन्तुक दुःख है। न्यक्कारावज्ञेच्छाविघातादिसमुत्थमन्तरङ्गजम् ॥ २३ ॥ धिक्कार, अपमान, और इच्छाओं के पूर्ण न होने से उत्पन्न दुःख अन्त- रङ्गज दुःख हैं। सदा खिन्न रहने से दोष— न तस्यैहिकमामुष्मिकं च फलमस्ति यः क्लेशायासाभ्यां भवति विप्लवप्रकृतिः ॥ २४ ॥ निरन्तर क्लेश और अधिक परिश्रम से जिनकी प्रकृति सदा खिन्न Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
२८ नीतिवाक्यामृतम् रहती है उनको ऐहलौकिक और पारलौकिक कोई भी सुख नहीं प्राप्त होते । कुत्सित पुरुष का लक्षण— स किंपुरुषो यस्य महाभियोगे सुवंश धनुष इव नाधिकं जायते बलम् ॥ २५ ॥ अच्छी किस्म के बांस से बनाये गये धनुष पर बाण चढ़ाते समय जिस प्रकार अधिक दृढ़ता प्रतीत होती है उसी प्रकार महान् आपत्ति आने पर जिस पुरुष में दृढ़ता न उत्पन्न हो, स्थिरता और गम्भीरता न हो वह पुरुष कुत्सित पुरुष है । इच्छा का लक्षण— आगामिक्रियाहेतुरभिलाषो वेच्छा ॥ २६ ॥ भविष्य में होने वाली क्रिया का जो कारण है वही अभिलाष अथवा इच्छा है । आत्मनो प्रत्यवायेभ्यः प्रत्यावर्त्तनहेतुर्द्वेषोऽनभिलाषो वा ॥ २७ ॥ दोषों से बचने के उपाय— अपने को प्रत्यवाय अर्थात् दोषों से बचाये रखने के लिये दो उपाय हैं । प्रथम उन दोषों और बुराइयों से घृणा करना दूसरा उन दोषों को करने की इच्छा ही न करना । उत्साह का लक्षण— हिताहितप्राप्तिपरिहारहेतुरुत्साहः ॥ २८ ॥ जिस भाव के कारण मनुष्य की भलाई हो और बुराई दूर हो उसका नाम उत्साह है । प्रयत्न की परिभाषा— प्रयत्नपरिनिमित्तको भावः ॥ २९ ॥ मनुष्य के हृदय में कार्य करने के निमित्त जो भाव उत्पन्न होता है उसी का नाम प्रयत्न है । संस्कार की दो परिभाषाएं— सातिशयलाभः संस्कारः ॥ ३० ॥ राजा अथवा जनता से अतिशय आदर आदि की प्राप्ति संस्कार हैं । अनेकजन्मकर्माभ्यासवासनावशात् सद्योजातादीनां स्तन्यपिपासा- दिकं येन क्रियते इति संस्कारः । अनेक जन्म में किये गये कर्मों के अभ्यास की वासना के वश होकर तुरन्त उत्पन्न हुए प्राणी के मन में जो दूध पीने आदि की प्रवृत्ति होती है— वह संस्कार है ।
आन्वीक्षिकीसमुद्देशः २६ शरीर का स्वरूप— भोगायतनं शरीरम् ॥ ३१ ॥ भले-बुरे भोगों का घर ही शरीर है। लोकायतिक का लक्षण— ऐहिकव्यवहारप्रसाधनपरं लोकायतिकम् ॥ ३२ ॥ यह लोक ही सब कुछ है, ऐसा मानकर समस्त व्यवहारों में प्रवृत्त कराने वाला दर्शन लोकायतिक अथवा नास्तिक दर्शन है। राजा को लोकायत जानना श्रेयस्कर है— लोकायतज्ञो हि राजा राष्ट्रकण्टकानुच्छेदयति ॥ ३३ ॥ लोकायत अर्थात् नास्तिक दर्शन को जाननेवाला राजा राष्ट्र की बुराइयों को नष्ट कर देता है। कोई क्रिया सर्वथा निर्दोष नहीं है— न खल्वेकान्ततो यतीनामप्यनवद्यास्ति क्रिया ॥ ३४ ॥ सन्न्यासियों के भी कर्म-सत्य अहिंसा आदि सर्वथा निर्दोष नहीं होते। अत्यन्त दयालुता के दोष— एकान्तेन कारुण्यपरः करतलगतमप्यर्थं रक्षितुं न क्षमः ॥ ३५ ॥ केवल करुणा में तत्पर मनुष्य अर्थात् अत्यन्त दयालु हथेली में भी रखे हुए अर्थ की रक्षा नहीं कर सकता। प्रशमैकचित्तं को नाम न परिभवति ॥ ३६ ॥ सर्वथा शान्त चित्त रहने वाले मनुष्य का कौन नहीं अनादर करता। अपराधी को दण्ड देना राजा का कर्त्तव्य है— अपराधकारिषु प्रशमो यतीनां भूषणं न महीपतीनाम् ॥ ३७ ॥ अपराध करने वाले को दण्डित न करना सन्न्यासियों को ही शोभा दे सकता है राजा को नहीं। परिणाम शून्य क्रोध और कृपा व्यर्थ है— धिक् तं पुरुषं यस्यात्मशक्त्या नस्तः कोपप्रसादौ ॥ ३८ ॥ जो पुरुष अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध और प्रसन्नता न प्रदर्शित कर सके वह धिक्कार के योग्य है। विशेषार्थ—जिसके क्रोध से न कोई डर हो और प्रसन्नता से न कोई लाभ ही हो वह पुरुष निन्दनीय है। जीवित मृत का लक्षण— स जीवन्नपि मृत एव यो न विक्रामति प्रतिकूलेषु ॥ ३९ ॥ वह पुरुष जीते हुए भी मरा है जो अपने विरुद्ध आचरण करने वालों पर किसी प्रकार के पराक्रम का प्रदर्शन न कर सके।
३० नीतिवाक्यामृतम् भस्मनीव निस्तेजसि को नाम निःशङ्कः पदं न कुर्यात् ॥ ४० ॥ बिना आग की भस्म पर कौन नहीं निडर होकर पैर रखेगा । पाप के लिये अपवाद— तत्पापमपि न पापं यत्र महान् धर्मानुबन्धः ॥ ४१ ॥ वह पाप पाप नहीं है जिसके करने से महान् धर्म होता है । विशेषार्थ—किसी एक दुष्ट का वध कर देने से हजारों-लाखों की यदि सुरक्षा होती हो तो उसका वध पाप कर्म नहीं होगा । अन्यथा पुनर्नरकाय राज्यम् ॥ ४२ ॥ अन्यथा अर्थात् उपर्युक्त रीति-नीति से दुष्ट दमन न करने पर राजा का राज्य उसके लिये नरक के समान ही दुःखकारक हो जाता है । अधिकार प्राप्ति से दोष— बन्धनान्तो नियोगः ॥ ४३ ॥ अधिकार बन्धन है । विशेषार्थ—मनुष्य को अधिकार मिलने पर अनेक प्रकार के कर्त्तव्यों के बन्धन में बंध जाना पड़ता है । दुष्टों की मित्रता का परिणाम— विपदन्ता खलमैत्री ॥ ४४ ॥ दुष्टों की मित्रता का अन्त विपत्ति में होता है । स्त्रियों पर विश्वास करने का फल— मरणान्तः स्त्रीषु विश्वासः ॥ ४५ ॥ स्त्रियों पर विश्वास करना अन्त में मृत्यु का कारण होता है । इत्यान्वीक्षिकी समुद्देशः । ७. त्रयीसमुद्देशः त्रयी का अर्थ— चत्वारो वेदाः, शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति षडङ्गानीतिहास-पुराण मीमांसा-न्याय-धर्मशास्त्रमिति चतुर्दश विद्यास्था- नानि त्रयी ॥ १ ॥ चार वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त छन्द, ज्योतिष, ये षडङ्ग और इतिहास-पुराण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र इन चौदह विद्या स्थानों को त्रयी कहते हैं ।
त्रयीसमुद्देशः ३१ त्रयी विद्या से लाभ— त्रयीतः खलु वर्णाश्रमाणां धर्माधर्मव्यवस्था ॥ २ ॥ इस त्रयी विद्या के आधार से चारों वर्ण और चारों आश्रम के लोगों की धर्म और अधर्म की व्यवस्था होती है। स्वपक्षानुरागप्रवृत्त्या सर्वे समवायिनो लोकव्यवहारेष्वधिक्रि- यन्ते ॥ ३ ॥ इस त्रयी विद्या के द्वारा समस्त सम्प्रदाय के मनुष्य अपने-अपने मतों में सानुराग प्रवृत्त होकर लौकिक व्यवहार के अधिकारी बनते हैं। धर्मशास्त्र और वेद की समानता— धर्मशास्त्राणि स्मृतयो वेदार्थसंग्रहाद् वेदा एव ॥ ४ ॥ धर्मशास्त्र और स्मृति ग्रन्थों में वेदों में प्रतिपादित अर्थ का ही संग्रह हुआ है, अतः ये वेद ही हैं। अर्थात् इनके वचन वेद के तुल्य मान्य है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समानधर्म — अध्ययनं यजनं दानञ्च विप्रक्षत्रियवैश्यानां समानो धर्मः ॥ ५ ॥ अध्ययन, यज्ञ और दान ये तीन ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य के लिये समानरूप से पालन करने योग्य धर्म हैं। द्विजाति का अर्थ— त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ ६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णों की द्विजाति संज्ञा है। ब्राह्मणों के नियत कर्म— अध्यापनयाजनं प्रतिग्रहश्च ब्राह्मणानामेव ॥ ७ ॥ पढ़ाना, यज्ञ आदि कराना और दान लेना यह ब्राह्मणों का ही कर्म है। क्षत्रियों के नियत कर्म— भूतसंरक्षणं शस्त्राजीवनं सत्पुरुषोपकारो दीनोद्धरणं रणेऽपलायनं चेति क्षत्रियाणाम् ॥ ८ ॥ जीवों की रक्षा, शस्त्र विद्या द्वारा जीविका चलाना, सत्पुरुषों का उप- कार करना, दीनों का दुख से उद्धार करना और संग्राम से विमुख न होना, क्षत्रियों के कर्म हैं। वैश्यों के नियत कर्म— वार्त्ताजीवनमावेशिकपूजनं सत्रप्रपापुण्यारामदयादानादिनिर्माणं च विशाम् ॥ ६ ॥ वार्त्ता अर्थात् कृषि, पशु रक्षा और वाणिज्य, अतिथिसेवा, अन्नसत्र, प्याऊ, पुण्यार्थ गृह धर्मशाला तथा उद्यान आदि की स्थापना एवं निर्माण दया और दान आदि कर्मों में प्रवृत्त रहना वैश्यों के कर्तव्य हैं।
३२ नीतिवाक्यामृतम् शूद्रों के नियत कर्म— त्रिवर्णोपजीवनं कारुकुशीलवकर्म शकटोपवाहनं च शूद्राणाम् ॥१०॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा, शिल्पकार्य, कथक अथवा चारण कार्य और गाड़ी ढोना यह सब शूद्र के कर्त्तव्य हैं । सच्छूद्र के लक्षण— सकृत्परिणयनव्यवहाराः सच्छूद्राः ॥ ११ ॥ कन्याओं का एक बार ही विवाह करने की मर्यादा का पालन करनेवाले शूद्रों को सत् शूद्र कहते हैं । शूद्र भी देवपूजा आदि के अधिकारी होते हैं— आचारानवद्यत्वं शुचिरुपस्कारः शारीरी च विशुद्धिः करोति शूद्रमपि देवद्विजतपस्विपरिकर्मसु योग्यम् ॥ १२ ॥ अनिन्द्य, आचार-व्यवहार घर के सामानों को साफ सुथरा रखना, तथा शरीर की शुद्धि स्नानादि के द्वारा करने से शूद्र भी देवता, ब्राह्मण और तप- स्वियों की पूजा-परिचर्या के योग्य होते हैं । सर्वसाधारण के द्वारा पालन योग्य धर्म— आनृशंस्यममृषाभाषित्त्वं, परस्वनिवृत्तिः, इच्छा नियमः प्रति- लोमाविवाहो निषिद्धासु च स्त्रीषु ब्रह्मचर्यमिति सर्वेषां समानो धर्मः ॥ १३ ॥ मृदुता, असत्य भाषण न करना, पराये धन को न लेने की प्रवृत्ति, इच्छाओं पर नियन्त्रण स्वजाति में ही शास्त्रानुमोदित विवाह करना, निषिद्ध स्त्रियों के साथ समागम न करना, सब वर्ण और आश्रम वालों के लिये समानरूप से पालन करने योग्य धर्म हैं । साधारण धर्म की विशेषता— आदित्यालोकनवत् धर्मः खलु सर्व साधारणो विशेषानुष्ठाने तु नियमः ॥ १४ ॥ जिस प्रकार सूर्य का दर्शन करने का ब्राह्मण और चाण्डाल को समान अधिकार प्राप्त है उसी प्रकार मृदुता सत्यभाषिता आदि उपर्युक्त धर्म सबके लिये समान हैं । विशेष प्रकार के धर्मानुष्ठान के लिये ही विशेष नियम हैं । यतियों का स्वधर्म— निजागमोक्तमनुष्ठानं यतीनां स्वोधर्मः ॥ १५ ॥ अपने सम्प्रदाय के अनुकूल शास्त्रों में वर्णित आचार-विचार का परिपालन यतियों का स्वधर्म है ।
त्रयीसमुद्देशः ३३ स्वधर्म का पालन न करने का प्रायश्चित्त— स्वधर्मव्यतिक्रमेण यतीनां स्वागमोक्तं प्रायश्चित्तम् ॥ १६ ॥ यदि यति या सन्यासी स्वधर्म पालन से च्युत हो जाय तो उनको अपने आगम में वर्णित प्रायश्चित्त करने चाहिएं। श्रद्धा के अनुरूप उपासना करनी चाहिए— यो यस्य देवस्य भवेच्छ्रद्धावान् स तं देवं प्रतिष्ठापयेत् ॥ १७ ॥ जो जिस देवता विशेष के प्रति श्रद्धालु हो वह उसी की उपासना या प्रतिष्ठा करें। भक्तिहीन पूजन से दोष— अभक्त्या पूजोपचारः सद्यः शापाय ॥ १८ ॥ बिना भक्ति की पूजा तत्काल शापदायक होती है। आचार से च्युत होने पर शुद्धि का उपाय— वर्णाश्रमाणां स्वाचारप्रच्यवने त्रयीतो विशुद्धिः ॥ १९ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी, ये जब अपने आचार से च्युत हों तो उनकी शुद्धि 'त्रयी' अर्थात् पूर्वोक्त चतुर्दश विद्या स्थानों में वर्णित विधानों के अनुसार होती है। राजा के लिये त्रिवर्ग प्राप्ति का उपाय— स्वधर्मासङ्करः प्रजानां राजानं त्रिवर्गेणोपसंघत्ते ॥ २० ॥ प्रजा में यदि राजा की शासन कुशलता से धर्म-सांकर्य, वर्ण-संकरता आदि दोष नहीं उत्पन्न हो पाते तो राजा को धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति होती है, अर्थात् राजा सुखी रहता है। प्रजा की रक्षा राजा का प्रमुख कर्त्तव्य— स किंराजा यो न रक्षति प्रजाः ॥ २१ ॥ वह राजा राजा नहीं है अर्थात् निन्दनीय है जो अपनी प्रजा की रक्षा नहीं करता। राजा की आवश्यकता— स्वधर्ममतिक्रामतां सर्वेषां पार्थिवो गुरुः ॥ २२ ॥ अपने धर्म का उल्लङ्घन करने वाले समस्त व्यक्तियों का अनुशासक राजा ही है। प्रजापालक राजा को प्रजा के धर्मपालन का छठा भाग प्राप्त होना— परिपालको हि राजा सर्वेषा धर्मषष्ठांशमवाप्नोति ॥ २३ ॥ लोग अपने अपने धर्म का परिपालन करते रहें, इस प्रकार का रक्षक ३ नी०
३४ नीतिवाक्यामृतम् राजा समस्त वर्ण और आश्रम वालों द्वारा किये गये धर्मानुष्ठान के छठे अंश का भागी होता है । तपस्वियों द्वारा भी राजा का सम्मान— उञ्छषड्भागप्रदानेन तपस्विनोऽपि राजानं संभावयन्ति ॥ २४ ॥ कण-कण बटोर कर अन्न इकट्ठा कर जीवन निर्वाह करना उञ्छवृत्ति है । उञ्छ का छठा हिस्सा देकर तपस्वी भी राजा का समादर करते हैं । तस्यैतद् भूयाद् योऽस्मान् रक्षति ॥ २५ ॥ तपस्वी कहते हैं यह षष्ठांश उस राजा को प्राप्त हो जो हमारी रक्षा करता है । मङ्गल और अमङ्गल की मान्यता— तदमङ्गलमपि नामङ्गलँ यत्रास्यात्मनो भक्तिः ॥ २६ ॥ जिस पर अपनी श्रद्धा-भक्ति हो वह वस्तु या व्यक्ति अमंगलकारक होने पर भी अमंगलकारक नहीं होता । पुरुष के कर्त्तव्य— संन्यस्ताग्निपरिग्रहानुपासीत ॥ २७ ॥ संन्यासी और याज्ञिकों की उपासना करनी चाहिए । स्नान के अनन्तर आवश्यक कर्त्तव्य— स्नात्वा प्राग्देवोपासनान्न कंचन स्पृशेत् ॥ २८ ॥ स्नान के अनन्तर जब तक देवोपासना न कर ले तब तक किसी का स्पर्श न करे । देवमन्दिर में जाने पर गृहस्थ का कर्त्तव्य— देवागारे गतः सर्वान् यतीन् आत्मसंबन्धिनीर्जरतीः पश्येत् ॥ २९ ॥ देवालय में पहुँच कर समस्त यतियों और कुलवृद्धाओं से शिष्टाचार करे । राजा और साधु का सत्कार आवश्यक है— देवाकारोपेतः पाषाणोऽपि नावमन्येत तत्किं पुनर्मनुष्यः । राजशास- नस्य मृत्तिकायामिव लिंगिषु को नाम विचारो यतः स्वयं मलिनो खलः प्रवर्धयत्येव क्षीरं धेनूनाम् । न खलु परेषामाचारः स्वस्य पुण्यमारभते किन्तु मनोविशुद्धिः ॥ ३० ॥ देवाकार को प्राप्त पाषाण का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिये मनुष्य तो दूर रहा । राज्यशासन की मुहर मिट्टी पर भी महत्त्वपूर्ण होती है । रूप या वेषधारी वस्तु का विचार नहीं किया जाता । क्योंकि स्वयं मलिन भी खली, गायों का दूध ही बढ़ाती है । दूसरों के आचार से अपना पुण्य नहीं बढ़ता, वह तो मन की निर्मलता पर निर्भर है ।
त्रयीसमुद्देशः ३५ ब्राह्मण आदि के स्वाभाविक धर्मों का वर्णन — दीना प्रकृतिः प्रायेण ब्राह्मणानाम् ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणों का स्वभाव प्रायः दीन-अर्थात् विनम्र होता है। बलात्कारस्वभावः क्षत्रियाणाम् ॥ ३२ ॥ क्षत्रियों का स्वभाव बलात्कार-बल प्रदर्शन होता है। निसर्गतः शाठ्यं किरातानाम् ॥ ३३ ॥ कोल, भील आदि स्वभावतः शठ होते हैं। ऋजुवक्रशीलता सहजा कृषीवलानाम् ॥ ३४ ॥ किसानों में स्वाभाविक नम्रता और स्वाभाविक कठोरता भी होती है। दानावसानः कोपो ब्राह्मणानाम् ॥ ३५ ॥ ब्राह्मणों के क्रोध का अन्त दान में होता है अर्थात् दान पाने से ब्राह्मण सन्तुष्ट हो जाता है। प्रणामावसानः कोपो गुरूणाम् ॥ ३६ ॥ गुरुओं के क्रोध का अन्त प्रणाम करने से होता है। प्राणावसानः कोपः क्षत्रियाणाम् ॥ ३७ ॥ क्षत्रियों के क्रोध का अन्त प्राण लेकर ही होता है। प्रियवचनावसानः कोपो वणिग् जनानाम् ॥ ३८ ॥ वैश्यों के क्रोध की शान्ति मीठे वचनों से होती है। वैश्यानां समुद्धारप्रदानेन कोपोपशमः ॥ ३६ ॥ वैश्यों के क्रोध की शान्ति उनका कर्ज चुका देने से हो जाती है। निश्चितैः परिचितैश्च सह व्यवहारो वणिजां निधिः ॥ ४० ॥ जो स्थायी रूप से एक जगह रहते हों और भली भांति परिचित हों उन के संग लेन-देन का व्यवहार करना वैश्यों के लिये 'निधि' रूप है। क्योंकि इनको दिये गये ऋण के न वसूल हो सकने का भय नहीं रहता और वैश्यों की ऐश्वर्य-वृद्धि होती हैं। दण्डभयोपधिभिर्वशीकरणं नीचजात्यानाम् ॥ ४१ ॥ दण्ड-भय और छल-छद्म पूर्ण व्यवहार नीच जाति के लोगों को वश में करने का उपाय है। इति त्रयी समुद्देशः ॥
३६ नीतिवाक्यामृतम् ८. वार्त्तासमुद्देशः वैश्यों की आजीविका का वर्णन— कृषिः पशुपालनं वणिज्या च वार्त्ता वैश्यानाम् ॥ १ ॥ खेती, पशुपालन और व्यापार ये वैश्यों की आजीविकायें हैं । 'वार्त्ता' की समृद्धि से राजा की समृद्धि— वार्त्तासमृद्धौ सर्वाः समृद्धयो राज्ञः ॥ २ ॥ राज्य में वार्त्ता की समृद्धि से राजा की सब प्रकार की समृद्धि होती है । कृषि, पशुपालन और व्यापार का सङ्क्षिप्त नाम 'वार्त्ता' है । सांसारिक दृष्टि से कौन सुखी है— तस्य खलु संसारसुखं यस्य कृषिर्धेनवः शाकवाटः सद्मन्युद- पानं च ॥ ३ ॥ उसको संसार का समस्त सुख भोग प्राप्त है जिस को खेती हो, गाय-बैल हों, शाक आदि के लिये बाड़ी या बगीचे हों और घर में ही पेय जल का प्रबन्ध हो । अपव्ययी राजा की हानि का वर्णन -- विसाध्यराज्ञास्तन्त्रपोषणे नियोगिनामुत्सवो महान् कोशक्षयश्च ॥४॥ तंत्र-पोषण में व्यर्थ विशेष व्यय करने वाले राजा के अधिकारियों के यहाँ तो उत्सव मचता है पर राजा के कोष की महती क्षति होती है । नित्यं हिरण्यव्ययेन मेरुरपि क्षीयते ॥ ५ ॥ सदा स्वर्ण-व्यय करने से सुमेरु जैसी विशाल धन-राशि भी विनष्ट हो जाती है ! तत्र सदैव दुर्भिक्षं यत्र राजा विसाधयति ॥ ६ ॥ जहां राजा फिजूलखर्ची होता है वहां सदा ही दुर्भिक्ष की स्थिति बनी रहती है । समुद्रस्य पिपासायां कुतो जगति जलानि ॥ ७ ॥ समुद्र ही यदि प्यासा हो जाय तो उस अनन्त जल-राशि को पूर्ण करने के लिये संसार में और कहां जल मिलेगा । स्वयं जीवधनमपश्यतो महती हानिर्मनस्तापश्च क्षुत्-पिपासाऽप्रति- कारात् पापं च ॥ ८ ॥ पशुधन की स्वयं देखभाल न करने से बड़ी हानि होती है मन को संताप भी होता है तथा मूक पशुओं के भूखे-प्यासे बंधे रहने पर पाप भी होता है ।
वार्तासमुद्देशः ३७ राजा के लिये बन्धुओं की भांति पोष्यवर्ग— वृद्धबालव्याधितक्षीणाम् पशून् बान्धवानिव पोषयेत् ॥ ९ ॥ बूढ़े, बच्चे, रोगी और जर्जर पशुओं का पोषण अपने बान्धवों की तरह करे। पशुओं की अकाल मृत्यु का कारण— अतिभारो महान् मार्गश्च पशूनामकाले मरणकारणम् ॥ १० ॥ बहुत अधिक बोझ ढोना, बहुत मार्ग चलना पशुओं की अकाल मृत्यु का कारण होता है। राज्य में बाहरी माल न आने के कारण— शुल्कवृद्धिर्बलात् पण्यग्रहणञ्च देशान्तरभाण्डानाम्प्रवेशे हेतुः ॥११॥ कर वृद्धि और विक्रय योग्य वस्तुओं का अधिकारियों आदि के द्वारा बलात् ले लिये जानेसे देशान्तर से बिक्री की चीजें आना बंद हो जाता है। बेईमानी सदा नहीं सफल हो सकती— काष्ठपात्र्यामेकदैव पदार्थो रध्यते ॥ १२ ॥ काठ की हांड़ी में एक ही बार भोजन पकाया जा सकता है। अर्थात् बेईमानी एक ही बार चल सकती है। मापों की शुद्धता की आवश्यकता— तुलामानयोरव्यवस्था व्यवहारं दूषयति ॥ १३ ॥ तराजू और बांट की गड़बड़ी से व्यापार बिगड़ता है। कृत्रिम मंहगाई के दुष्परिणाम— वणिग्जनकॢप्तोऽर्घः स्थितानागन्तुकांश्च पीडयति ॥ १४ ॥ जब वनिये वस्तुओं का मूल्य अपने मन से बढ़ा देते हैं तो उस से वहां के रहने वालों को और बाहर से आने वालों को कष्ट होता है। वस्तुओं का मूल्य निश्चित करने में आवश्यक विचार— देशकालभाण्डापेक्षया वा सर्वार्घो भवेत् ॥ १५ ॥ समय देश और विक्रय की वस्तुओं का विचार कर के वस्तुओं का मूल्य स्थिर करना चाहिए। बाजार के विषयमें राजा को स्वयं सतर्क रहना चाहिए— पण्यतुलामानवृद्धौ राजा स्वयं जागृयात् ॥ १६ ॥ बाजार की चीजें नकली और मिलावट की न हों तराजू की तोल में घट बढ़ न हो और बटखरे कम ज्यादा नाप के न हों इन बातों की जांच पड़ताल राजा को स्वयं करते रहना चाहिए।
३८ नीतिवाक्यामृतम् वणिक्-स्वभाव का वर्णन— न वणिग्भ्यः सन्ति परे पश्यतोहराः ॥ १७ ॥ बनियों से बढ़कर दूसरा कोई पश्यतोहर (प्रत्यक्ष चोर) नहीं है। कृत्रिम मूल्यवृद्धि के विषय में राजा का कर्तव्य— स्पर्द्धया मूल्यवृद्धिर्भाण्डेषुराज्ञो, यथोचितं मूल्यं विक्रेतुः ॥ १८ ॥ आपस की लागडांट करके चीजों का मूल्य व्यापारी बढ़ा दें तो बढ़ा हुआ मूल्य राजा लेले और यथोचित मूल्य मात्र बेंचने वाले को दे । बहुमूल्य वस्तु को अल्पमूल्य में खरीदने वाले के प्रति राजा का कर्तव्य— अल्पद्रव्येण महाभाण्डं गृह्णतो मूल्याविनाशेन तद्भाण्डं राज्ञः ॥१९॥ थोड़ा ही पैसा देकर बहुमूल्य वस्तु खरीदने वाले बनिये को मूल्य मात्र देकर बिक्री की बहुमूल्य चीज राजा ले ले । अन्याय की उपेक्षा से राजा को हानि— अन्यायोपेक्षा सर्वं विनाशयति ॥ २० ॥ अन्याय की उपेक्षा सब कुछ नाश कर देती है । राष्ट्र के लिये दण्ड के तुल्य व्यक्ति— चौरचरचाटभटराजवल्लभाटविकतलाराक्षशालिकनियोगिग्रामकूट- वार्धुषिका हि राष्ट्रस्य कण्टकाः ॥ २१ ॥ चोर गुप्तदूत चारण और भाट आदि, राजा के प्रेमपात्र, जंगलात विभाग के कर्मचारीगण तलार अर्थात् छोटे छोटे स्थानों की रक्षा के निमित्त नियुक्त अधिकारी व्यक्ति जैसे ग्राम चौकीदार-हल्का जमादार आदि अक्षशालिक अर्थात् जुआ खिलाकर अपनी जीविका चलाने वाले व्यक्ति, नियोगी अर्थात् अधिकारी गण, ग्रामकूट अर्थात् पटव री और वार्धुषिक ब्याजखोर ये ग्यारह राष्ट्रके लिये कण्टक स्वरूप हैं । प्रतापवति राज्ञि निष्ठुरे सति न भवन्ति राष्ट्रकण्टकाः ॥ २२ ॥ राजा प्रतापशाली हो और शासन में कठोर हो तो ये राष्ट्र कण्टक विघ्न नहीं कर सकते । ब्याज से जीवन निर्वाह करने वालों से राष्ट्र की क्षति और उसके सुझाव— अन्यायवृद्धितोवार्धुषिकास्तन्त्रं देशं च नाशयन्ति ॥ २३ ॥ अन्याय की वृद्धि करके वार्धुषिक राष्ट्र और देश का विनाश करते हैं ! कार्याकार्ययोर्नास्ति दाक्षिण्यं वार्धुषिकानाम् ॥ २४ ॥ वार्धुषिकोंको कर्तव्य अकर्तव्य का विवेक नहीं होता । अप्रियमप्यौषधं पीयते ॥ २५ ॥ शरीर को स्वस्थ रखने के लिये औषध कड़वी हो तब भी पी जाती हैं ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri दण्डनीतिसमुद्देशः ३६ विशेषार्थ—प्रासङ्गिक अर्थ यह होगा कि इन राष्ट्रकण्टकों को नष्ट करने के लिये अप्रिय भी दमन-नीति अपनानी चाहिए। अहिदष्टा स्वाङ्गुलिरपि छिद्यते ॥ २६ ॥ सर्पं से डसी गई अपनी अङ्गुलि भी समस्त शरीर की रक्षा की दृष्टि से काट डाली जाती है। [ इति वार्त्ता समुद्देशः ] ९. दण्डनीतिसमुद्देशः दण्ड की आवश्यकता— चिकित्सागम इव दोषविशुद्धिहेतुर्दण्डः ॥ १ ॥ शारीरिक वात-पित्त-कफ आदि के दोषों को दूर करने के लिये जिस प्रकार चिकित्सा शास्त्र है उसी प्रकार राष्ट्र के दोषों को दूर करने के लिये दण्डनीति है । दण्डनीति का स्वरूप— यथादोषं दण्डप्रणयनं दण्डनीतिः ॥ २० ॥ दोष की न्यूनाधिकता के अनुसार ही दण्डविधान करना दण्डनीति है । प्रजापालन दण्डविधान का उद्देश्य— प्रजापालनाय राज्ञा दण्डः प्रणीयते न धनार्थम् ॥ ३ ॥ प्रजापालन के लिये राजा दण्ड का विधान करता है अर्थसंग्रह के लिये नहीं । धनसंग्रहार्थं दण्ड-विधान की निन्दा— स किं राजा वैद्यो वा यः स्वजीवनाय प्रजासु दोषमन्वेषयति ॥ ४ ॥ अपने जीवन निर्वाह के लिये लोगों को झूठ-मूठ रोगो बताने वाला वैद्य जैसे बुरा है उसी प्रकार वह राजा भी कुत्सित राजा है जो अपने निमित्त धन संग्रह के लिये प्रजा में दोषों को निकाल कर अर्थदण्ड करता है । राजा द्वारा स्वयं अनुपभोग्य धन— दण्डद्युताहवमृतविस्मृतचौरपारदारिकप्रजाविप्लवजानि द्रव्याणि न राजा स्वयमुपयुञ्जीत ॥ ५ ॥ जुर्माना करने से प्राप्त धन, जुए से प्राप्त, संग्राम में किसी के मर जाने से प्राप्त, किसी का भूला हुआ धन, चोरों का धन परस्त्रीगमन आदि से संबंध रखने वाला धन, प्रजा में विप्लव हो जाने पर लूट-पाट से आया हुआ धन इतने प्रकार के धनों को राजा स्वयम् उपयोग में न लावे । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu