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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)

DevanagariHindipublished220 pages
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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri © The Chowkhamba Vidyabhawan Post Box No. 69 Chowk, Varanasi-1 ( India ) 1972 Phone : 63076 First Edition 1972 Price Rs. 10-00 Also can be had of THE CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE Publishers and Oriental Book-Sellers P. O. Chowkhamba, Post Box 8, Varanasi-1 ( India ) Phone : 63145 Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

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उपोद्घात

नयनं विजिगीषोस्त्रिवर्गेण संयोजनम् अथवा नीयते व्यवस्थाप्यते स्वेषु स्वेषु सदाचारेषु लोकः यया सा नीतिः । किसी दूसरे राष्ट्र पर विजय की अभिलाषा रखने वाले को जिस कार्य- पद्धति के द्वारा धर्म, अर्थ और काम की प्रतिकूलता नहीं होती अथवा जिसके द्वारा जनता अपने धर्म सम्प्रदाय अथवा जाति के आचार-विचारों से च्युत नहीं होती उसका नाम नीति है। नीति का सम्बन्ध न्याय से है। जो न्यायानुमोदित है वही नीति है। इस प्रकार नीतिशास्त्र धर्मशास्त्र के समीप आ जाता है अत एव एक दूसरे की उक्तियों में बहुधा साम्य पाया जाता है। केवल नीति शब्द का प्रयोग करने से स्वभावतः सत्पथ की ओर प्रवृत्त करने वाली पद्धति का बोध होता है। जो लोक-व्यवहार को मर्यादित रखने में सहायक होती है। ग्रन्थकार ने भी ‘नीतिर्यथावस्थितमर्थमुपलम्भयति’ इस सूत्र के द्वारा इसी आशय को व्यक्त किया है। सभ्यता के क्रमिक विकास के साथ व्यापक क्षेत्र में समान नीति के पालन से श्रेयस् की सिद्धि मानने वालों के द्वारा राजनीति, दण्डनीति, अर्थनीति, कूटनीति इत्यादि विशेषण युक्त नीति का वर्गीकरण होता रहा किन्तु नीति अपने स्थान पर सुदृढ रही और विशेषणों के आधार पर राजनीति और लोकनीति के द्वारा नीति का व्यापक रूप पृथक्-पृथक् खण्डों में प्रकाशित हुआ । शिशुपालवध के प्रणेता महाकवि माघ ने—‘आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती’ को लिखकर संक्षिप्त रूप से नीति के दो ही स्वरूप बताये हैं। जिससे स्व का उत्कर्ष हो और पर का ह्रास हो यही दो नीति हैं। महा- भारतकार ने शान्ति पर्व में लिखा है— “मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायां, सर्वे धर्माः प्रक्षयेयुर्विबृद्धाः । सर्वे धर्माश्चाश्रमाणां हताः स्युः, क्षात्रे त्यक्ते राजधर्मे पुराणे ॥” राजा की दण्डनीति यदि सशक्त न हो तो वेदत्रयी अर्थात् ऋक्, यजुः, साम लुप्त हो जायं और संस्कृति और सदाचार के आधार समस्त धर्म विनष्ट हो जायं तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के धर्मों की भी मर्यादा ध्वस्त हो जाय । इस प्रकार प्राचीन परम्परा से सम्बद्ध ‘क्षात्र’ अर्थात् क्षत से रक्षा करने वाले राजधर्म अथवा राजनीति का विनाश होने पर समस्त लोक-

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( ६ ) व्यवस्था विलुप्त होने की संभावना होती है । नीतिशास्त्र की इस महत्ता को ध्यान में रखते हुए अतीत के अनुभवी महापुरुषों ने नीतिशास्त्र का निर्माण किया जिनमें कामन्दक, कौटिल्य, शुक्र और बृहस्पति तथा विदुर की नीति की विशेष ख्याति हुई । प्राचीन काल में महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का निर्माण सूत्रों और पद्यों के माध्यम से होता रहा है और यह स्वाभाविक भी था । उस समय न मुद्रण यन्त्र थे न सार्वजनिक विशाल पुस्तकालय । परिणामतः प्रत्येक विद्वान् को अपना विद्या- वैभव अपने मस्तिष्क के सूक्ष्म तन्तुओं में सदा सम्बद्ध रखना पड़ता था । सूत्र और पद्य इसके लिये सहायक थे । सूत्रप्रणाली तो भारतवर्ष की निजी विभूति है । विशद से विशद-तत्त्व सूत्ररूप में मनुष्य स्मरण रख सकता है । “अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद् विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥” थोड़े अक्षरों में संशयहीन सारवान् और व्यापक अर्थ वाली विरामशून्य निर्दोष रचना प्रणाली सूत्रप्रणाली है । अनेक गृह्य, कल्पादि सूत्रों के साथ पाणिनि के सूत्र कितने लोकप्रिय हुए और उसमें व्याकरण का समस्त तत्त्व किस प्रकार सन्निविष्ट हुआ यह किसी भी संस्कृतप्रेमी से अविदित नहीं है । व्यास के ब्रह्मसूत्र गौतम कणाद के न्यायवैशेषिक के सूत्र और जैमिनि के मीमांसासूत्र आदि ही तो समस्त संस्कृत वाङ्‌मय और समस्त भारतीय संस्कृति के मूलाधार हैं । इन सूत्रों पर भगवान् शङ्कराचार्य, रामानुजाचार्य, महर्षि पतञ्जलि जैसी विभूतियों ने भाष्य लिखे । इससे ही इन की महत्ता का मूल्यांकन किया जा सकता है । नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र पर भी सूत्र रचे गये, जिन में बृहस्पति सूत्र, संभवतः दुर्लभ और प्राचीनतम है । किन्तु चाणक्य के सूत्र अब भी सर्वसुलभ हैं । कौटिल्य अर्थशास्त्र भी सूत्रमय ही है । पर व्याकरण और न्याय आदि के सूत्रों से ये भिन्न हैं । इनमें प्रायः प्रत्येक सूत्र क्रियापद से संयुक्त होकर स्वयं में पूर्ण है, जब कि व्याकरण, न्यायादि के सूत्रों में ऐसा नहीं है । किन्तु यह तो रचनाक्रम के विकास के अनुकूल हुआ है । इससे इन सूत्रों की महत्ता में कोई अन्तर नहीं आता । इसी सूत्रप्रणाली का आलम्बन कर सोमदेव ने भी नीतिशास्त्र का सुन्दर प्रणयन किया । इनके समय तक सूत्रों का अच्छा प्रचार रहा । इन्होंने मनु के एक सूत्र का उद्धरण दिया है । स्यात् वह मूल सूत्र न हो, मनु के मत का उल्लेख हो—जो मनु ने इस विषय पर दिया है । जो भी हो सोमदेव विशिष्ट प्रतिभाशाली व्यक्ति थे । उन्होंने उस समय सुलभ समस्त शास्त्रों का सम्यक् अनुशीलन किया था और नीतिसम्बन्धी प्राप्य यावत् सामग्री का विशेषरूप से अध्ययन किया था । उनके विषय में वर्तमान युग के प्रसिद्ध

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( ७ ) इतिहासकार दिवङ्गत काशीप्रसाद जायसवाल ने अपने हिन्दूराज्यतन्त्र में लिखा है,१ …"इसी प्रकार ईसवी दसवीं शताब्दी के सोमदेव का रचा हुआ नीति- वाक्यामृत भी सूत्रों में ही है। इसमें प्राचीन आचार्यों की अनेक उत्तम बातों का संग्रह है। ये सूत्र साधारणतः उद्धरण मात्र हैं, जिन्हें इस जैन ग्रन्थकार ने "राजनीतिक सिद्धान्तों का अमृत' बतलाया है; और उनका यह कथन बहुत कुछ ठीक भी है"। इस उद्धरण से दो ऐतिहासिक तथ्य अवगत होते हैं। प्रथम यह कि सोमदेव दसवीं शताब्दी के प्राचीन लेखक हैं और दूसरा यह कि इन्होंने पूर्ववर्ती नीति- शास्त्र के आचार्यों के ग्रन्थों का भलीभांति अध्ययन और मनन करने के अनन्तर 'नीतिवाक्यामृतम्' की रचना की। इस प्रकार तुलसीदास की रामायण में हम को जो नानापुराण-निगमागम-सम्मत सामग्री मिलती है, नीतिशास्त्र के विषय में वैसी ही सामग्री हम को सोमदेव के 'नीतिवाक्यामृतम्' में सहजरूप से सुलभ होती है। इन्होंने स्वरचित यशस्तिलकचम्पू के तृतीय आश्वास में लिखा है, "मम गुरु-शुक्र-विशालाक्ष-परीक्षित्-पाराशर-भीम-भीष्म-भारद्वाजादि-प्रणीत-नीति- शास्त्र-श्रवणसनाथं-श्रुतिपथमभजन्त।" इसमें परिगणित आठ आचार्यों के साथ आदि पद का प्रयोग अनेक अन्य नीतिशास्त्राचार्यों की ओर स्पष्ट संकेत करता है। इस व्यापक अध्ययन के अनन्तर नीतिवाक्यामृतम् की रचना से स्वयं ही उसका महत्त्व अधिक हो जाता है। नीतिवाक्यामृतम् की एक संस्कृत टीका से अवगत होता है कि कान्य- कुब्जेश्वर महाराज श्री महेन्द्रदेव ने अन्यान्य नीतिशास्त्रों को दुर्बोध देखकर श्री सोमदेव को सरल नीतिशास्त्र की रचना के लिये प्रेरणा प्रदान की और तदनुसार इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना हुई। सोमदेवसूरि वाद-विवाद में निपुण और अनेक विषयों के महापण्डित थे। यशस्तिलक चम्पू का गद्य-पद्य इनके प्रौढ पाण्डित्य का परिचायक है। द्वितीय आश्वास में वर्णित एक प्रसंग से इनके ज्योतिषशास्त्र के पांडित्य का ज्ञान होता है। इनके ज्येष्ठ भ्राता भी उत्तम कोटि के विद्वान् थे और इनके गुरु थे श्रीनेमिदेव जिनकी चरणाराधना बड़े-बड़े तार्किकशिरोमणि किया करते थे। तत्कालीन व्यवस्था के अनुसार इनको सभा-समितियों और विद्वन्मण्डल तथा राज-मण्डल से स्याद्वादाचल सिंह, तार्किक-चक्रवर्त्ती, वादीभपञ्चानन, वाक्कल्लोल १. हिन्दू पालि टीका रामचन्द्रवर्मा कृत अनुवाद प्रथम खण्ड।

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( ८ ) पयोनिधि, कविकुलराज आदि उपाधियां प्राप्त हुई थीं और इन्होंने षण्णवति- प्रकरण, युक्तिचिन्तामणि सूत्र, महेन्द्रमातलिसंजल्प, यशोधरमहाराजचरित इन ग्रन्थों के लिखने के अनन्तर नीतिवाक्यामृत लिखा था । पण्डितराज जगन्नाथ की तरह यह भी एक स्वाभिमानी मनीषी थे किन्तु इसके साथ ही शिष्टाचार की भी इनमें कमी न थी । यह छोटे-मोटे पण्डितों के साथ शास्त्रार्थ आदि में नहीं प्रवृत्त होते थे । इस प्रसंग के श्लोक जो नीतिवाक्यामृतम् की प्रशस्ति में लिखे गये हैं निम्नाङ्कित हैं— “अल्पेऽनुग्रहधीः समे सुजनता, मान्ये महानादरः सिद्धान्तोऽयमुदात्तचित्रचरिते श्रीसोमदेवे मयि । यः स्पर्धेत तथापि दर्पदृढता प्रौढिप्रगाढाग्रह- स्तस्याखर्वितगर्वपर्वतपविर्मेद्वाक् कृतान्तायते ॥ सकलसमयतर्के नाकलङ्कोऽसि वादी न भवसि समयोक्तौ हंससिद्धान्तदेवः । न च वचनविलासे पूज्यपादोऽसि तत् त्वं वदसि कथमिदानीं सोमदेवेन सार्धम् ॥ दर्पान्धबोधबुधसिन्धुरसिंहनादे वादिद्विपोलनदुर्धरवाग् विवादे । श्री सोमदेवमुनिपे वचनारसाले वागीश्वरोऽपि पुरतोऽस्ति न वादकाले ॥” इन श्लोकों से इनकी निज की प्रकृति का परिचय प्राप्त होता है जिससे यह उदात्तचरित्र के आत्माभिमानी और वाद-विवाद में अपराजेय प्रतिभावाले व्यक्ति सिद्ध होते हैं । इसी प्रकार यशस्तिलकचम्पू में भी इन्होंने अनेक पद्य अपने परिचय के विषय में लिखे हैं । उदाहरणार्थ एक श्लोक निम्नाङ्कित है— “मया वागर्थसम्भारे भुक्ते सारस्वते रसे । कवयोऽन्ये भविष्यन्ति नूनमुच्छिष्टभोजनाः ॥” इनकी प्रौढ विद्वत्ता की पुष्टि के लिये यशस्तिलकचम्पू पर्याप्त है । उसके गद्य और पद्यों की भाषा कादम्बरी के जोड़ की है और सूक्तियाँ सरस तथा नीतिपूर्ण होने के कारण बड़ी ही मनोहारिणी हैं। इनके पद्यों में प्रसाद गुण के साथ प्रौढ़ तर्क और दृष्टान्त भी हैं जिनके कारण वे हृदय में अपना स्थान सद्यः बना लेते हैं। यशस्तिलक से उद्धृत निम्न सूक्ति कितनी मार्मिक है—

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( ६ ) “येषां बाहुबलं नास्ति येषां नास्ति मनोबलम् । तेषां चन्द्रबलं देव किं कुर्यादम्बरे स्थितम्॥” इनके वर्णन अपनी स्वाभाविकता के कारण भी मनोरम हैं। द्वितीय आश्वास में इन्होंने शिशु-क्रीड़ा के प्रसङ्ग में पाँच पद्य लिखे हैं जो किसी भी सहृदय के हृदय को आवर्जित किये बिना नहीं रह सकते। यहां एक श्लोक उद्धृत है— “स्वल्पं रिङ्गति जानुहस्तचरणः किञ्चित्कृतालम्बनः स्तोकं मुक्तकराङ्गुलिः परिपतन् धात्र्या नितम्बे धृतः। स्कन्धारोहणजातधीः पुनरयं तस्याः कचाकर्षणे क्रूरालोकनकोपकल्मषमनास्तद्वक्त्रमाहन्ति च ॥” यशस्तिलक का तृतीय आश्वास अधिकांश राजनीति के उपदेशों से पूर्ण है और किन्हीं स्थलों पर तो 'नीतिवाक्यामृतम्' से उसके वर्णन एकरस और समरस हैं। इस प्रकार अब तक इनकी जो रचनाएं सर्वसाधारण को सुलभ हो सकी हैं उनसे इनके व्यापक और प्रौढ पाण्डित्य की पुष्टि होती है। नीतिवाक्यामृतम् अपनी विशिष्ट सूत्रशैली, अर्थगाम्भीर्य और अनुभवपूर्ण उक्तियों के कारण बहुत ही उपादेय ग्रन्थ है। अनेक स्थलों पर इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ में पाठ भेद पाये जाते हैं, जिनका निर्णय करने के लिये अनुसन्धान आवश्यक है। इस ग्रन्थ का अध्ययन कर मनुष्य सहज ही सांसारिक व्यवहार में कुशलता प्राप्त कर सुख पूर्वक अपनी संसार-यात्रा का निर्वाह कर सकता है। वह सहसा भ्रम और वञ्चना का लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। शास्ता और शासित विनेता और विनयी, अर्थ, धर्म और काम तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ सबके लिये यह सुन्दर और सारवान् चिन्तन सामग्री प्रस्तुत करता है। अतः इस ग्रन्थ का सर्वसाधारण में प्रचार आवश्यक है। नीतिवाक्यामृत की एक हिन्दी टीका हो चुकी है जो बहुत विस्तृत और बहुमूल्य है। वह इस समय प्राप्य नहीं है। मैंने आज से ३-४ वर्ष पूर्व इस ग्रन्थ को देखा था और तभी से मेरे मन में यह उत्कण्ठा थी कि इसे सर्व साधारण के लिये सुलभ किया जाना राष्ट्र के अभ्युत्थान की दृष्टि से श्रेयस्कर होगा। किन्तु मैं अपने अलस स्वभाव के कारण व्यावहारिक रूप से कुछ कर सकने में असमर्थ रहा। एक दिन जब मैं अपने मित्र श्रीममृतलालजी जैन, जैनदर्शनाध्यापक, वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से सोमदेव की प्रशंसा करते हुए इस ग्रन्थ की चर्चा कर रहा था तब उन्होंने मुझे इसका हिन्दी अनुवाद करने के लिये प्रोत्साहित ही नहीं किया प्रत्युत इस

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( १० ) कार्य को शीघ्र से शीघ्र पूरा कर देने के लिये प्रेरित करते हुए साहित्यिक साधन भी उपलब्ध किये, किन्तु मुझे खेद है कि मैं अपने मित्र के अभिलाष के अनुकूल आचरण न कर सका और विलम्ब करता रहा । मैं इन सौजन्यमूर्त्ति का आभारी हूँ कि इन्होंने अपनी उदारवृत्ति के कारण कभी भी खीझ का अनुभव नहीं किया और मुझे बराबर प्रेरित ही करते रहे । मैंने इसका गम्भीर अध्ययन नहीं किया है और यावद्बुद्धि इसका हिन्दी अनुवाद अन्य कार्यों की व्यस्तता के साथ सम्पन्न किया है। कहीं अर्थ का अनर्थ भी हुआ होगा । पर मेरी इच्छा है कि इसके पाठान्तरों का कई प्रतियों से मिलान कर तथा ग्रन्थकार के समय आदि के विषय में सम्यग् अध्ययन कर मैं इसका प्रामाणिक संस्करण प्रस्तुत करूं अतः तब तक विद्वज्जन मुझे इसकी त्रुटियों के विषय में सूचित करते रहें और मुझे मेरी भूलों के लिये क्षमा करें । अनुवाद करते समय वर्त्तमान किन्तु सम्प्रति दिवङ्गता मेरी साध्वी धर्मपत्नी ने जो सुख सुविधा तत्काल प्रदान की थी तदर्थ उसकी सौम्य मूर्त्ति संगमरमर की शुभ्रशिला पर कुशल शिल्पी द्वारा उत्कीर्ण जीवन्त प्रतिमा के समान मूर्त्तिमती हो उठी है और उसके लिये मैं उसको इस समय सप्रेम स्मरण करता हूँ । इस ग्रन्थ के प्रकाशन में चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस तथा चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी के अध्यक्ष महोदय ने जो तत्परता और उदारता बरती है वह उनकी शालीनता, संस्कृत भाषा के प्रसार के प्रति सजीव निष्ठा और सदाशयता के अनुरूप ही है अतः उनसे उपकृत अनेकानेक विद्वज्जनों की भाँति मैं भी उनके प्रति अपना हार्दिक हर्षभार प्रकट करता हूँ । दीपावली | —रामचन्द्र मालवीय सं० २०२९ |

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विषय-क्रम पृ० | पृ० १ धर्म समुद्देश १ | १७ स्वामि समुद्देश ८४ २ अर्थ समुद्देश १० | १८ अमात्य समुद्देश ९३ ३ काम समुद्देश १२ | १९ जनपद समुद्देश १०२ ४ अरिषड्वर्ग समुद्देश १४ | २० दुर्ग समुद्देश १०७ ५ विद्यावृद्ध समुद्देश १५ | २१ कोश समुद्देश १०८ ६ आन्वीक्षिकी समुद्देश २४ | २२ बल समुद्देश ११० ७ त्रयी समुद्देश ३० | २३ मित्र समुद्देश ११४ ८ वार्ता समुद्देश ३६ | २४ राजरक्षा समुद्देश ११७ ९ दण्डनीति समुद्देश ३९ | २५ दिवसानुष्ठान समुद्देश १३० १० मन्त्रि समुद्देश ४० | २६ सदाचार समुद्देश १४१ ११ पुरोहित समुद्देश ६३ | २७ व्यवहार समुद्देश १४८ १२ सेनापति समुद्देश ६९ | २८ विवाद समुद्देश १५४ १३ दूत समुद्देश ७१ | २९ षाड्गुण्य समुद्देश १६१ १४ चार समुद्देश ७४ | ३० युद्ध समुद्देश १७३ १५ विचार समुद्देश ७८ | ३१ विवाह समुद्देश १८४ १६ व्यसन समुद्देश ८० | ३२ प्रकीर्ण समुद्देश १८९

१. समुद्देश १-१०: धर्म, अर्थ, काम, फल, विद्यावृद्ध, आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता व दण्डनीति

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [विषय-सूची] (अत्यन्त क्षीण / अस्पष्ट पाठ — पृष्ठ प्रायः अपाठ्य है) Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

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॥ श्रीः ॥ नीतिवाक्यामृतम् —— मङ्गलाचरणम् सोमं सोमसमाकारं सोमाभं सोमसंभवम् । सोमदेवं मुनिं नत्वा नीतिवाक्यामृतं ब्रुवे ॥ १ ॥ कीर्त्तिमान् , कुबेर के समान आकृतिवाले, चन्द्रतुल्य कान्तिवाले तथा सोमवंश में अथवा सोम नामक व्यक्तिविशेष से समुत्पन्न सोमदेव मुनि को नमस्कार कर मैं अमृतमय नीतिवाक्यों को कहता हूँ । विशेषार्थ—उमा शब्द कीर्त्ति का वाचक है उससे संयुक्त जो हो वह सोम अतः सोमं का अर्थ कीर्त्तिमान् है । ग्रन्थकर्त्ता से पूर्ववर्त्ती शुक्र और वृहस्पति ने अपने नीतिग्रन्थ के प्रारम्भ में राज्य की और आंगिरस मुनि की बन्दना की है अतः उसी परम्परा का अनुसरण करते हुए ग्रन्थकर्त्ता ने अपने इस नीतिग्रन्थ में प्रथमतः सोमदेव मुनि की वन्दना की है । श्लेष से इसमें ग्रन्थकर्त्ता के नाम सोमदेव का भी संकेत है । नीतिवाक्यामृत के एक टीकाकार ने इस श्लोक से ब्रह्मा, विष्णु और शिव की वन्दना का अर्थ किया है जो संस्कृत टीका में शब्दों की विभिन्न व्युत्पत्ति के अनुसार संगत है । हिन्दी में वैसा अर्थ करना संगत न होगा । १. धर्मसमुद्देशः राज्यवन्दना— अथ धर्मार्थकामफलाय राज्याय नमः ॥ १ ॥ धर्म-अर्थ और काम की सिद्धि करनेवाले राज्य को नमस्कार है । विशेषार्थ—अथ शब्द मंगलात्मक और ग्रन्थारम्भ का सूचक है । शुक्राचार्य ने अपने नीतिशास्त्र के प्रारम्भ में इसी प्रकार राज्य की वन्दना की है । उन्होंने राज्य को सुन्दर वृक्ष कहा है जिसकी—सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय रूप षड्गुण शाखाएँ हैं, साम, दाम, दण्ड और भेद मनोहर पुष्प हैं और धर्म, अर्थ और काम फल हैं ।

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२ नीतिवाक्यामृतम् नमोऽस्तु राज्यवृक्षाय षाड्गुण्याय प्रशाखिने । सामादिचारुपुष्पाय त्रिवर्गफलदायिने ॥ नीति-ग्रन्थ के प्रारम्भ में राज्य की वन्दना बड़ी उपयुक्त और सुन्दर कल्पना है । धर्म का लक्षण — यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ॥ २ ॥ जिससे मानव का अभ्युदय और कल्याण हो वह धर्म है । विशेषार्थ—महर्षि कणाद के मत से अभ्युदय का अर्थ तत्त्वज्ञान और निःश्रेयस का दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति है । इस प्रकार तत्त्वज्ञान के द्वारा दुःख की अत्यन्त निवृत्ति धर्म है, महर्षि गौतम के अनुसार अभ्युदय अर्थात् स्वर्ग और निःश्रेयस् अर्थात् मोक्ष जिससे प्राप्त हो वह धर्म है । मीमांसकों के चोदनालक्षणोऽर्थोधर्मः' इस सूत्र के अनुसार वेदों के द्वारा प्रतिपादित कर्म ही धर्म है । किन्तु वेदों के द्वारा उपदिष्ट क्या सभी कर्म अविचारणीय और आवश्यक रूप से कर्त्तव्य हैं ऐसा कहकर इस मत का खण्डन भी किया जाता है । अधर्म का लक्षण— अधर्मः पुनरेतद् विपरीतफलः ॥ ३ ॥ जिस कार्य का फल अभ्युदय और निःश्रेयस् से विपरीत हो वह अधर्म है । धर्मप्राप्ति के उपाय — आत्मवत् परत्र कुशलचिन्तनं शक्तितस्त्यागतपसी च धर्माधिगमो- पायाः ॥ ४ ॥ अपने ही समान दूसरे के कुशल और कल्याण का चिन्तन तथा शक्ति के अनुसार त्याग, तपस्या करना धर्म की प्राप्ति के साधन हैं । श्रेष्ठ आचरण— सर्वसत्वेषु हि समता सर्वाचरणानां परमाचरणम् ॥ ५ ॥ जीव-मात्र पर समता अर्थात् निर्वैरता का भाव समस्त शुभ आचरणों में श्रेष्ठ आचरण है । जीवद्रोहियों की दशा का वर्णन — न खलु भूतद्रुहां कापि क्रिया प्रसूते श्रेयांसि ॥ ६ ॥ जीवों से द्रोह करनेवाले व्यक्ति की कोई भी क्रिया कल्याण-कारिणी नहीं होती । विशेषार्थ—जीव चार प्रकार के हैं—स्वेदज, अण्डज, उद्भिज और

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धर्मसमुद्देशः ३ जरायुज—इन पर जो दयाभाव न रखकर द्रोह अथवा हिंसा का भाव रखता है उसके स्नान-दान-जप आदि समस्त शुभाचरण व्यर्थ होते हैं। अहिंसक होने का फल— परत्राजिघांसुमनसां व्रतरिक्तमपि चित्तं स्वर्गाय जायते ॥ ७ ॥ दूसरों पर अहिंसा का भाव रखनेवाले व्यक्ति का व्रत-हीन भी जीवन स्वर्गदायक होता है। असत् त्याग का लक्षण— स खलु त्यागो देशत्यागाय यस्मिन् कृते भवत्यात्मनो दौः- स्थित्यम् ॥ ८ ॥ जिस त्याग-कार्य से अपनी दुर्दशा हो जाय वह त्याग का कार्य देश-त्याग करा देता है। विशेषार्थ—इस सूत्र का स्पष्टीकरण शुक्रनीति के निम्न-श्लोक में देखिए, आगतेरधिकं त्यागं यः कुर्यात् तत्सुतादयः । दुःस्थिताः स्युः ऋणग्रस्ताः सोऽपि देशान्तरं व्रजेत् ॥ अविवेकी याचक की निन्दा— स खल्वर्थी परिपन्थी यः परस्य दौःस्थित्यं जानन्नप्यभिलष- त्यर्थम् ॥ ९ ॥ वह याचक निश्चय ही शत्रु है जो दूसरे की दरिद्रावस्था को जानते हुए भी उससे धन की याचना करता है। व्रत-ग्रहण से पूर्व विचार की आवश्यकता— तद् व्रतमाचरितव्यं यत्र न संशयतुलामारोहतः शरीरमनसी ॥१०॥ उस व्रत-नियम आदि का पालन करना चाहिए जिससे शरीर और मन को क्लेश न हो। विशेषार्थ—यही आशय 'चारायण' के निम्न श्लोक में भी अभिव्यक्त हुआ है। अशक्त्या यः शरीरस्य व्रतं नियममेव वा। करोत्यार्त्तो भवेत् पश्चात् पश्चात्तापात् फलच्युतिः ॥ वास्तविक त्याग का लक्षण— ऐहिकामुष्मिकफलार्थमर्थव्ययस्त्यागः ॥ ११ ॥ जिस अर्थ-व्यय अथवा त्याग से इहलोक, परलोक दोनों के ही फल का लाभ हो वही वास्तविक त्याग है।

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४ नीतिवाक्यममृतम् अपात्र में दान की निन्दा— भस्मनि हुतमिवापात्रेष्वर्थव्ययः ॥ १२ ॥ अपात्र अथवा कुपात्र के निमित्त अर्थ का व्यय करना राख के ढेर में आहुति देने के समान है । पात्रभेद— पात्रञ्च त्रिविधं धर्मपात्रं कार्यपात्रं कामपात्रञ्चेति ॥ १३ ॥ पात्र तीन प्रकार के हैं धर्म पात्र कार्य पात्र और कामपात्र । विशेषार्थ—जिनकी शिक्षा दीक्षा और सदाचार से हम सत्पथ पर आरूढ हों वह धर्मपात्र हैं । जिनसे सांसारिक कार्य सिद्ध हो वह कार्यपात्र हैं और अपनी गृहिणी काम पात्र है क्योंकि उसके द्वारा इहलोक-परलोक दोनों बनता है । कीर्ति कैसी हो ?— किं तया कीर्त्या या आश्रितान्न विभर्त्ति प्रतिरुणद्धि वा धर्मम् । भागीरथी-श्री-पर्वतवद् भावानामन्यदेव प्रसिद्धेः कारणं न पुनस्त्यागः । यतो न खलु गृहीतारो व्यापिनः सनातनाश्च ॥ १४ ॥ जिससे आश्रितों का भरण-पोषण न हो सके और जो धर्म के प्रतिकूल हो उस कीर्ति से क्या लाभ है । गंगा, लक्ष्मी और विन्ध्य हिमालय आदि पर्वत विशेष के समान प्रसिद्धि का कारण कुछ दूसरा ही होता है, त्याग नहीं । क्योंकि लाभान्वित होनेवाले व्यक्ति व्यापक और सनातन नहीं होते । विशेषार्थ—अर्थात् धूर्त्त खुशामदी शराबी और दुराचारिणी स्त्रियां आदि यदि हम से द्रव्य पाकर हमारी प्रशंसा करते फिरें और हमारे कुटुम्बी भूखों मरें तो हमारी वह कीर्ति व्यर्थ है । दुष्टों का उत्कर्ष करने वाली यह कीर्ति धर्म विरोधिनी भी स्पष्ट है । धन की सार्थकता के विषय में— स खलु कस्यापि माभूदर्थो यत्रासंविभागः शरणागतानाम् ॥ १५ ॥ जिस धनमें से शरणागतों को विभाग न किया जाय ऐसा धन किसी को न हो । एकान्त लोभी की निन्दा— अर्थिषु संविभागः स्वयमुपभोगश्चार्थस्य हि द्वे फले, नास्त्यौचित्य- मेकान्तलुब्धस्य ॥ १६ ॥ याचकों को दान देना और स्वयम् उपभोग करना, अर्थ के ये ही दो प्रयोजन हैं । एकान्त लोभी व्यक्ति के धन का कोई "औचित्य" नहीं है ।

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धर्मसमुद्देशः ५ , औचित्य की परिभाषा— दानप्रियवचनाभ्यामन्यस्य हि सन्तोषोत्पादनमौचित्यम् ॥ १७ ॥ दान और प्रिय वचनों से दूसरे को सन्तुष्ट करने को औचित्य कहते हैं। लोभी कौन है— स खलु लुब्धो यः सत्सु विनियोगादात्मना सह जन्मान्तरेषु नय- त्यर्थम् ॥ १८ ॥ सच्चा लोभी तो वह है जो सत्पात्र को दान देने के कारण अपनी धन- राशि को जन्मान्तर में भी अपने साथ ले जाता है। विशेषार्थ—व्यंग्यान्तर से वह सत्पात्र में अर्थ के उपयोग की प्रशंसा है। भारतीय चिन्तन के अनुसार सत्पात्र में दिया दान अक्षय होकर जन्मान्तर में मिलता है। दान न देकर मीठी बातों से याचक को रोक रखने की निन्दा— अदातुः प्रियालापोऽन्यस्य लाभस्यान्तरायः ॥ १६ ॥ याचक को दान न देने वाला व्यक्ति यदि उसे अपने प्रिय वचनों से रोक रखता है तो उस याचक को अन्य स्थान से मिल सकने वाले दान की हानि करता है। दरिद्र असहाय होता है— सदैव दुःस्थितानां को नाम बन्धुः ॥ २६ ॥ सदा दुर्दशा में पड़े हुए का सहायक कोई नहीं होता। याचक के दोष— नित्यमर्थयतां को नाम नोद्विजते ॥ २१ ॥ सदा माँगनेवालों से कौन नहीं घबड़ाता। विशेषार्थ—बहुत देर तक दूध पीते रहने वाले बछड़े को गाय भी सींग मार कर हटाती है, "अपि वत्समतिपिबन्तं विषाणैरधिक्षिपति धेनुः” ॥ तप क्या है— इन्द्रियमनसोर्नियमानुष्ठानं तपः ॥ २२ ॥ नियमों के अनुष्ठान से इन्द्रियों और मन को वश में करना ही तप है। नियम क्या है— विहिताचरणं निषिद्धपरिवर्जनं च नियमः ॥ २३ ॥ शास्त्रों में विहित आचार का परिपालन और निषिद्ध आचार का परि- त्याग ही नियम है।

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६ नीतिवाक्यामृतम् कर्त्तव्याकर्त्तव्य में शास्त्र की प्रामाणिकता— विधि-निषेधावैतिह्यायत्तौ ॥ २४ ॥ विधि और निषेध ऐतिह्य ( आगमों ) के अधीन हैं । अर्थात् कौन सा कार्य करना चाहिए कौन नहीं करना चाहिए इसका ज्ञान शास्त्रों से प्राप्त करे । विशेषार्थ—साङ्ख्य शास्त्र में प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द ये तीन प्रमाण माने गये हैं। नैयायिक इन तीनों के साथ उपमान को भी प्रमाण मानते हैं। वेदान्ती और मीमांसक इन चारों के साथ अर्थापत्ति और अनुपलब्धि को भी प्रमाण मानते हैं । पौराणिक इनके अतिरिक्त 'ऐतिह्य' को भी प्रमाण मानते हैं । जो बात परम्परा से कही सुनी जाती हो और उसका कोई निश्चित वक्ता न कहा जा सके वही ऐतिह्य है। जैसे इस पेड़ पर भूत रहता है । इस मन्दिर के देवता रात को गाँव के चारों ओर घूमते हैं यह लोकापवाद "ऐतिह्य" है । नीतिवाक्यामृत के इस ऐतिह्य का अर्थ जनश्रुति ही है । इसीलिए इसके अग्रिम सूत्र में कहा जा रहा है— किस तरह के शास्त्र प्रमाण मानने चाहिए— तत्तखलु सद्भिः श्रद्धेयम् ऐतिह्यम्, यत्र न प्रमाणबाधा पूर्वापर- विरोधो वा ॥ २५ ॥ सत्पुरुषों को उसी ऐतिह्य पर श्रद्धा करनी चाहिए जो प्रमाणों के प्रति- कूल न हो और जिसमें पूर्वापर विरोध न होता हो । चंचल मनवाले के नियमाचार की व्यर्थता— हस्तिस्नानमिव सर्वानुष्ठानम्, अनियमितेन्द्रियमनोवृत्तीनाम् ॥२६॥ जिस पुरुष की इन्द्रियां और मन के व्यापार नियमित नहीं हैं उस की समस्त सत् क्रिया हाथी के स्नान की तरह है । विशेषार्थ—हाथी नहाने के बाद पुनः अपनी सूंड से अपने ऊपर धूल डालकर गन्दा हो जाता है। इसी प्रकार चंचल मन और इन्द्रिय वाले व्यक्ति शुभानुष्ठान के साथ असदनुष्ठान कर अपना शुभ अनुष्ठान व्यर्थ कर देते हैं। ज्ञान के अनुकूल स्वयं आचरण न करने की निन्दा— दुर्भागाभरणमिव देहखेदावहमेव ज्ञानं स्वयम् अनाचरतः ॥ २६ ॥ ज्ञान प्राप्त कर स्वयम् उसके अनुकूल आचरण न करने वाले व्यक्ति का ज्ञान पति का प्रेम और आदर न प्राप्त कर सकने वाली अभागिनी स्त्री के आभूषण धारण के समान व्यर्थ देह-क्लेश-कारक ही होता है । ( प्रियेपु सौभाग्यफला हि चारुता-कालिदास )

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धर्मसमुद्देशः ७ परोपदेश की सहजता— सुलभः खलु कथक इव परस्य धर्मोपदेशो लोकः ॥ २८ ॥ देवालयों में कथा बांचने वाले की तरह दूसरों को धर्मोपदेश करने वाले व्यक्ति सर्वत्र सुलभ होते हैं । प्रतिदिन के दान और तप की महिमा— प्रत्यहं किमपि नियमेन प्रयच्छतस्तपस्यतो वा भवन्त्यवशयं मही- यांसः परे लोकाः ॥ २६ ॥ प्रतिदिन नियम पूर्वक कुछ न कुछ दान और तपस्या करनेवाले व्यक्ति को निश्चय ही महान् परलोक प्राप्त होते हैं । प्रतिदिन का स्वल्प संचय भी विशेष फलवान् होता है— कालेन संचीयमानः परमाणुरपि जायते मेरुः ॥ ३० ॥ नित्य संचय करते रहने पर छोटी से छोटी वस्तु भी समय पाकर सुमेरु बन जाती है । धर्म, ज्ञान और धन का प्रतिदिन सङ्ग्रह करना चाहिए— धर्मश्रुतधनानां प्रतिदिनं लवोऽपि सङ्गृह्यमाणो भवति समुद्रा- दप्यधिकः ॥ ३१ ॥ धर्म, ज्ञान और धन का प्रतिदिन लेशमात्र भी सङ्ग्रह करते रहने पर समुद्र से भी अधिक हो जाता है । नित्य धर्माचरण न करने के दोष— धर्माय नित्यमनाश्रयमाणानामात्मवञ्चनं भवति ॥ ३२ ॥ . धर्म के निमित्त नित्य कुछ न करना आत्मवञ्चना है । पुण्य प्राप्ति के लिये नित्य प्रयत्न करना चाहिए— कस्य नाम एकदैव संपद्यते पुण्यराशिः ॥ ३३ ॥ एक बार ही किस को पुण्यराशि प्राप्त हो जाती है ? अर्थात् अनायास ही किसी को पुण्य-पुंज नहीं प्राप्त हो सकता; धीरे-धीरे क्रमशः पुण्य करते रहने पर ही पुण्य-पुञ्ज एकत्र होता है । अनुद्योगी के मनोरथों की निन्दा— अनाचरतो मनोरथाः स्वप्नराज्यसमाः ॥ ३४ ॥ उद्यम न करने वाले व्यक्ति के मनोरथ स्वप्न में प्राप्त राज्य के समान क्षणिक होते हैं । धर्म के लाभ जानते हुए भी अधर्माचार की निन्दा— धर्मफलमनुभवतोऽप्यधर्माऽनुष्ठानमनात्मज्ञस्य ॥ ३५ ॥ जो धर्म के फल का उपभोग करता हुआ भी अधर्म करता है वह मूर्ख है ।

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८ नीतिवाक्यामृतम् बुद्धिमान् व्यक्ति धर्माचार में स्वयं ही प्रवृत्त होता है— कःसुधी भेषजमिवात्महितं धर्मं परोपरोधादनुतिष्ठति ॥ ३६ ॥ कौन बुद्धिमान् औषध के समान आत्महितकारी धर्म को दूसरे के अनुरोध से करता है ? अर्थात् बुद्धिमान् व्यक्ति स्वयं ही धर्माचरण में प्रवृत्त होते हैं। धर्माचरण की कठिनाइयां— धर्मानुष्ठाने भवत्यप्रार्थितमपि प्रतिलोभ्यं लोकस्य ॥ ३७ ॥ धर्म का अनुष्ठान करते समय विघ्न बिना बुलाये ही उपस्थित हो जाते हैं । पापकर्म में मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति— अधर्मकर्मणि को नाम नोपाध्यायः पुरस्कारी वा ? ॥ ३८ ॥ अधर्म के काम में कौन नहीं स्वयम् उपाध्याय और अग्रसर होता । अधर्म करने के लिये किसी उपदेशक और मुखिया की आवश्यकता नहीं होती मनुष्य स्वयम् ही उस ओर प्रवृत्त होता है । चतुर व्यक्ति का कर्त्तव्य— कण्ठगतैरपि प्राणैर्नाशुभं कर्म समाचरणीयं कुशलमतिभिः ॥ ३६ ॥ प्राण कण्ठ को भी आ जाय तब भी बुद्धिमान् पुरुष को निन्दित कर्म नहीं करना चाहिए । धूर्तों का धनिकों को पाप कर्म में प्रवृत्त करना— व्यसनतर्पणाय धूर्त्तैर्दुरीहितवृत्तयः क्रियन्ते श्रीमन्तः ॥ ४० ॥ अपने दुर्व्यसनों की पूर्ति के लिये धूर्त्त लोग धनिकों को पापमार्ग पर प्रवृत्त करते हैं । दुष्ट की संगति त्याज्य है— खलसंगमेन किं नाम न भवत्यनिष्टम् ? ॥ ४१ ॥ दुष्ट की संगति से कौन सा अनिष्ट नहीं होता है । दुर्जन निन्दा— अग्निरिव स्वाश्रयमेव दहन्ति दुर्जनाः ॥ ४२ ॥ जिस प्रकार अग्नि अपने आधार काष्ठ को जलाकर नष्ट कर देती है उसी प्रकार दुष्ट पुरुष भी अपने आश्रयदाता का नाश कर डालते हैं । क्षणिक सुख के लोभ की निन्दा— वनगज इव तदात्वसुखलुब्धः को नाम न भवत्यास्पद्माप- दाम् ? ॥ ४३ ॥ जंगली हाथी के समान तात्कालिक सुख के लोभ में पड़कर कौन व्यक्ति आपत्तिग्रस्त नहीं होता ?

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धर्मसमुद्देशः ६ विशेषार्थ—हाथी पकड़ने वाले व्यक्ति एक शिक्षित हथिनी को जंगल में छोड़ देते हैं वनैला हाथी उसके स्पर्श सुखका अनुभव करता हुआ बन्धन में पड़ जाता है इसी प्रकार पराई स्त्री के स्पर्शादि के क्षणिक सुख के लोभ में पड़ा व्यक्ति भी दुर्गति को प्राप्त होता है । धर्माचरण से विमुख होने के दोष— धर्मातिक्रमाद् धनं परेऽनुभवन्ति स्वयं तु परं पापस्य भाजनं सिंह इव सिन्धुरवधात् ॥ ४४ ॥ सिंह हाथी का वध करके छोड़ देता है और उसे सियार आदि खाते हैं इसी प्रकार धर्म का उल्लङ्घन कर मनुष्य चोरी आदि दुष्कर्मों से धन प्राप्त करता है और उस धन का उपभोग उसके पुत्र पौत्रादि करते हैं परन्तु पाप का भागी वह मनुष्य होता है । धर्महीन व्यक्ति का भविष्य— बीजभोजिनः कुटुम्बिन इव नास्त्यधार्मिकस्यायत्यां किमपि शुभम् ॥ ४५ ॥ बीज के लिये सुरक्षित अन्न को खाकर जिस प्रकार कुटुम्ब-परिवार वाला व्यक्ति परिणाम में दुःख पाता है उसी प्रकार धर्म-हीन व्यक्ति को भी परिणाम में कोई सुख नहीं प्राप्त होता । अर्थ और काम से रहित केवल धर्मोपासना का अनौचित्य— यः कामार्थावुपहत्य धर्ममेवोपास्ते स पक्व-क्षेत्रं परित्यज्यारण्यं कृषति ॥ ४६ ॥ जो पुरुष काम और अर्थ की उपेक्षा कर केवल धर्माचरण में तत्पर होता है वह मानों अपने पके हुए खेत को छोड़कर जंगल को जोतने जाता है । विशेषार्थ—सुखार्थी को काम और अर्थ के साथ धर्म का सेवन करना चाहिए, इस समान आशय का रैभ्य का श्लोक है, कामार्थसहितो धर्मो न क्लेशाय प्रजायते । तस्मात्ताभ्यां समेतस्तु कार्य एव सुखार्थिभिः ॥ सच्चा सुबुद्धि कौन है— स खलु सुधीर्योऽमुत्र सुखाविरोधेन सुखमनुभवति ॥ ४७ ॥ विद्वान् वही है जो परलोक में प्राप्त होने वाले सुख की हानि न हो इस बात का ध्यान रखते हुए इस लोक के सुख का अनुभव करता है । अन्यायपूर्वक सुख भोग करने का फल— इदमीह परमाश्चर्यं यदन्यायसुखलवादिहामुत्र चानवधिदुःखानु- बन्धः ॥ ४८ ॥

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१० नीतिवाक्यामृतम् यहां यह अत्यन्त आश्चर्य का विषय है कि चोरी आदि अन्याय-कर्म के द्वारा उपार्जित धनादि से सुख का लेश मात्र भी उपभोग इस लोक और परलोक में भी निरवधि दुःखदायक होता है । यहां राजदण्ड वहां धर्मराज का । धर्मी और अधर्मी की पहचान— सुखदुःखादिभिः प्राणिनामुत्कर्षापकर्षौ धर्माधर्मयोर्लिङ्गम् ॥ ४६ ॥ इस जन्म में जीवों के सुख और दुःख का उत्कर्ष तथा अपकर्ष देखकर उसके द्वारा पूर्वजन्म में किये गये धर्म-अधर्म की पहचान होती है । अदृष्ट ( दैव ) की व्यापक प्रभुता— किमपि हि तद्वस्तु नास्ति यत्र नैश्वर्यमदृष्टाधिष्ठातुः ॥ ५६ ॥ संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जहाँ अदृष्ट की प्रभुता न हो । विशेषार्थ—अदृष्ट—मनुष्य के नित्य के भोजन-पान से उसके शरीर में अलक्ष्य शक्ति संचित होती है उसी के अनुसार वह सांसारिक कार्य करता है विद्युद् गृह में जल प्रपात आदि से भी इसी प्रकार अलक्ष्य विद्युत् शक्ति उत्पन्न होती है जिससे महान् यन्त्र आदि परिचालित होते हैं और प्रकाश मिलता है । इसी प्रकार मनुष्य के द्वारा नित्य प्रति किये जाने वाले शुभाशुभ कर्म अथवा धर्माधर्म से एक अनिर्वचनीय “अदृष्ट” उत्पन्न होता है जो संचित होता जाता है और उसके अनुसार ही मनुष्य को जन्म-जन्मान्तर में सुख तथा दुःख मिलते रहते हैं । इति धर्मसमुद्देशः २. अर्थसमुद्देशः अर्थ का लक्षण— यतः सर्वप्रयोजनसिद्धिः सोऽर्थः ॥ १ ॥ जिससे समस्त कार्य अथवा योजनाएं सिद्ध हों वह अर्थ ( धन ) है । धनी कौन होता है— सोऽर्थस्य भाजनं योऽर्थानुबन्धेनार्थमनुभवति ॥ २ ॥ धनी वह होता है जो अर्थानुबन्ध से अर्थ का उपभोग करता है । अर्थानुबन्ध का लक्षण— अलब्धलाभो, लब्धपरिरक्षणं रक्षितपरिवर्द्धनं चार्थानुबन्धः ॥ ३ ॥ अप्राप्त धन को प्राप्त करना, प्राप्त धन की रक्षा करना और सुरक्षित धन की वृद्धि करना अर्थानुबन्ध है ।

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अर्थसमुद्देशः ११ अर्थनाश का कारण— तीर्थमर्थेनासंभावयन् मधुच्छत्रमिव सर्वात्मना विनश्यति ॥ ४ ॥ धन के द्वारा जो तीर्थ का सत्कार नहीं करता उसका मधुमक्खी के छत्ते के समान सर्वनाश हो जाता है । विशेषार्थ—तीर्थ का अर्थ अग्रिम सूत्र में है । मधुमक्खी के छाते में जब मधु अधिक इकट्ठा हो जाता है तो मक्खियाँ उसे स्वयं पी जाती हैं यदि उन्हें न पीने दिया जाय तो भी छत्ते का मधु अपने आप नष्ट हो जाता है या मोम बन जाता है । इसी तरह दान-मान द्वारा तीर्थ की पूजा न की गई तो धनी का धन भी नष्ट हो जाता है । तीर्थ का लक्षण— धर्मसमवायिनः कार्यसमवायिनश्च पुरुषास्तीर्थम् ॥ ५ ॥ धार्मिक कृत्यों में सहयोग देने वाले और सब कामों में हाथ बटाने वाले पुरुषों को तीर्थ कहते हैं । किन का धन नष्ट हो जाता है— तादात्विक-मूलहर-कदर्येषु नासुलभः प्रत्यवायः ॥ ६ ॥ तादात्विक, मूलहर और कदर्य धनिकों का धन सदा नष्ट हो जाता है । तादात्विक का लक्षण— यः किमप्यसंन्चिन्त्योत्पन्नमर्थं व्ययति स तादात्विकः ॥ ७ ॥ उपार्जित धन को जो बिना विवेक के खर्च करता है उसे 'तादात्विक' कहते हैं । मूलहर का लक्षण— यः पितृपैतामहमर्थमन्यायेन भक्षयति स मूलहरः ॥ ८ ॥ पिता और पितामह से प्राप्त सम्पत्ति को जो अन्यायपूर्वक अर्थात् जुआ, शराब, वेश्यावृत्ति आदि में उड़ाता है वह 'मूलहर' कहा जाता है । कदर्य का लक्षण— यो भृत्यात्मपीडाभ्यामर्थं संचिनोति स कदर्यः ॥ ९ ॥ सेवकों को और स्वयम् को भी कष्ट में रख कर जो धन का संग्रह करता है उसे 'कदर्य' कहते हैं । तादात्विक और मूलहर का भविष्य— तादात्विकमूलहरयोरायत्यां नास्ति कल्याणम् ॥ १० ॥ तादात्विक और मूलहर का परिणामावस्था में कल्याण नहीं होता । कदर्य के धनसंग्रह का परिणाम— कदर्यस्यार्थसंग्रहो राजदायादतस्कराणामन्यतमस्य निधिः ॥ ११ ॥