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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 109

१०८ पद्मावत । रोम रोम बान वे फूटी। सूतहिं सूत रुधिर मुख छूटी ॥ नयनन्हि चली रक्तकी धारा। कन्था भीज भयो रतनारौ ॥ सूरूज बूड उठा परभाताँ। औ मंजीठ टेसू वनराँता ॥ भयो बसन्त राती बनपती। औ जितने सब योगी यती ॥ भूमि० जो भीज भयो सब गेरू। औ राती तहँ पङ्खपखेरू ॥ राती सती अगिन सबकार्याँ। गगन मेघ राती तहँ छाया ॥ इंगुरभा पहाड़ जो भीजा। पै तुम्हार नहिं रोम पसीजा ॥ दो० तहां चकोर औ कोकिला, मर्यो हिये तेहि पैठ। नयनन रक्तै भरायहि, तुम फिर कीन्ह न डीठ ॥ ऐसो बसन्त तुम्हीं पै खेलहु। रक्त पराये सेंदुर मेलहु ॥ तुम तो खेल मन्दिर कहँ आई। वह का मर्म१६ जसजान गुसांई१७॥ कहेसि मरै को वारहि बारा। एकहि वार होहुँ जरछारौ ॥ सैर रच चहा आग जो लाई। महादेव गौरी सुधि पाई ॥ आय बुझाय दीन्ह पँथ तहां। मरनखेलकर आगमें जहां ॥ उलटा पंथ प्रेमकी वारों। चढ़ै स्वर्ग जो परै पतारा ॥ अब धसलीन्ह चही तेहिआशा। पावै श्वास कि मरै निराशा ॥ दो० पाती लिख सो पठाई, लिखा सबै दुख रोय। धौं जिवरहै कि निसरै, कहा रजायसुँ होय ॥ कहिके सुआ छोड़ दइ पाती। जानहु दब्वै छूट तसताँती ॥ गेउं२७ जो बांधा कञ्चनै तागा। राती श्याम कण्ठ जर लागा ॥ सूराख १ खून २-१५ आँख ३ गुदड़ी ४ लाल ५-८ भोर ६ लाख ७ जंगल की बूटी ६ ज़मीन १० परिन्द जानवर ११ चदन १२ आसमान १३ मेहरवानी १४ भेद १६ ईश्वर १७ राख १८ चिंता १६ राह २० पहिले २१ दरवाज़ा २२ आसमान २३ हुक्म २४ निहाई २५ गर्म २६ गरदन २७ सोना २८ लाल वा काला २६ ॥