भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् १६१ तीनों गुण नित्य हैं । ] इनके अतिरिक्त जीव और ईश्वर के विलक्षण होने का और कोई कारण नहीं है । इन गुणों की नित्यता के विषय में श्रुति ने स्वयं कहा है कि वह् सत्य काम है सत्य संकल्प है । नित्यज्ञानादिमत्त्वेऽस्य सृष्टिरैव सदा भवेत् । हिरण्यगर्भ ईशोऽतो लिङ्गदेहेन संयुतः ॥१११॥ ईश्वर को यदि नित्यज्ञानादिवाला मानें तो वह सदा सृष्टि ही बनाता रहे । इस कारण लिङ्गदेह से युक्त हिरण्यगर्भ को ही ईश्वर मानना चाहिये । [ समष्टि लिङ्ग शरीर के अभि- मानी परमात्मा को हिरण्यगर्भ कहते हैं । उसके लिंगदेह अर्थात् मन में जब इच्छा होगी तभी वह सृष्टि बनायेगा, यों सदा सृष्टि नहीं रहेगी । कभी कभी होगी । ] उद्गीथब्राह्मणे तस्य माहात्म्यमतिविस्तृतम् । लिङ्गसत्त्वेऽपि जीवत्वं नास्य कर्माद्यभावतः ॥११२॥ इस हिरण्यगर्भ की महत्ता उद्गीथ ब्राह्मण में विस्तारपूर्वक वर्णित है । लिङ्ग शरीर होने पर भी इसमें जीवभाव तो इस लिये नहीं आता कि इसके अविद्या, काम तथा कर्म नहीं होते हैं । स्थूलदेहं विना लिङ्गदेहो न क्वापि दृश्यते । वैराजो देह ईशोऽतः सर्वतो मस्तकादिमान् ॥११३॥ स्थूल देह के बिना तो केवल लिङ्गदेह कहीं भी दीखता नहीं है, इस कारण स्थूल शरीरों की समष्टि का अभिमानी जो 'विराट्' है वही ईश्वर है । सहस्रशीर्षेत्येवं च विश्वतश्चक्षुरित्यपि । श्रुतमित्याहुरनिशं विश्वरूपस्य चिन्तकाः ॥११४॥