पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् १६७ उस माया ने, कूटस्थ असङ्ग आत्मा को बिगाड़ कर, उस का जगत् बना दिया है। उसी ने चिदाभास स्वरूप से जीव और ईश्वर का भी निर्माण किया है। [यही उस का अन्यथा- करण कहाता है।] कूटस्थ मनुपद्रुत्य करोति जगदादिकम्। दुर्घटैकविधायिन्यां मायायां का चमत्कृतिः ॥१३४॥ इस माया की होशियारी तो देखो कि—यह माया कूटस्थ में किसी प्रकार का उपद्रव भी नहीं करती है [उसको जैसे का तैसा भी रहने देती है] और उसी से जगदादि को भी बना डालती है। दुर्घट कामों को करने का वीड़ा उठाने वाली इस माया में यह कोई चमत्कार की बात नहीं है [कि कूटस्थता को भी बना रहने दे और उसको जगदादिस्वरूप भी कर डाले। ऐसा न करे तो उसे माया ही कौन कहे?] द्रवत्वमुदके वह्नावौष्ण्यं काठिन्यमश्मनि। मायाया दुर्घटत्वं च स्वतः सिद्ध्यति नान्यतः ॥१३५॥ पानी में द्रवत्व, वह्नि में उष्णता, पत्थर में कठोरता, और माया में दुर्घटपना स्वभाव से ही सिद्ध हो रहा है। [उसमें यह दुर्घटता कहीं अन्यत्र से नहीं आयी है।] न वेत्ति लोको यावत् तां साक्षात् तावच्चमत्कृतिम् । धत्ते मनसि, पश्चात्तु मायैषेत्युपशाम्यति ॥१३६॥ यह लोक जब तक उस माया का साक्षात्कार नहीं कर लेता, तभी तक मन में आश्चर्य किया करता है। साक्षात् कर लेने के पीछे तो 'यह माया है' ऐसा समझ कर शान्त हो जाता है।