भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 628

४० पंचदशी नाम के बीज का अनुभव सुषुप्ति में सभी को होता है। बीज में पेड़ की तरह सारा जगत् उस सुषुप्ति में लीन रहता है। उस माया में सारे जगत् की वासनायें रहती हैं। उन वासनाओं में जो चैतन्य है वह स्पष्ट नहीं होता। इसी से अपनी वासनाओं का पता किसी को नहीं होता कि वे कैसी कैसी हैं। चेतन के आभास से युक्त वह माया ( अज्ञान ) जब बुद्धिरूप में प्रकट होती है तब उसमें का वह चिदाभास स्पष्ट मालूम होने लगता है। जब वासनाओं की बुद्धिवृत्तियें बन जाती हैं तब मालूम होता है कि ऐसी वासना भी इसमें थी। माया के अधीन जो चिदा- भास है वही तो वेदों का 'महेश्वर' है, वही 'अन्तर्यामी' है, वही 'सर्वज्ञ' है, वही 'जगत् का कारण' भी कहाता है। यह जिस मानस या बाह्य जगत् को बना लेता है, उसे बदल देने का सामर्थ्य किसी में नहीं है, यही तो इस की सर्वेश्वरता है। इसी कारण से जिस पर जो धुन सवार हो जाती है वह किसी के समझाने से हटती नहीं है। इस सुषुप्ति के अज्ञान में ही सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों की वे सब वासनायें रहती हैं जिन्होंने इस सब जगत् को घेर रक्खा है। सारा जगत् इन्हीं सूक्ष्म वासनाओं के अधीन होकर अपने अपने कार्यों में संलग्न हो रहा है। इसी से उसे 'सर्वज्ञ' कहा है। इसकी सर्वज्ञता का ज्ञान हमें क्यों नहीं होता, इसका कारण तो यह है कि वासनाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान हमें किसी को भी नहीं होता है। जो जो विषय सामने आते जाते हैं उन-उन विषयों की वासनायें प्रकट होती जाती हैं। यों एक काल में न सही किन्तु कालान्तर में सर्वविषयानुभावी होने से उसकी सर्वज्ञता सिद्ध होती है। यों एक समय में उसकी सर्वज्ञता की प्रतीति न होने से उसके सर्वज्ञपन का प्रत्यक्ष नहीं होता। उसको

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 628, कुल 726 में से · BharatKosha