भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( १९१ ) यत्नादपि कः पश्येच्छिखिनामाहारनिःसरणमार्गम् । यदि जलदध्वनिमुदितास्त एव मूढा न नृत्येयुः ॥ ४४२ ॥ यत्नसेभी मोरोंके भोजनके ( घीट ) निकलनेके मार्गको कौन देख सक्ता है यदि मेघकी ध्वनिसे प्रसन्नहुए वेही मूढ न नृत्य करें ॥ ४४२ ॥ यदि त्वं स्वामिनं एनां दशां नयसि तदस्मद्विधस्य का गणना । तस्मात् मम आसन्नेन भवता न भाव्यम् । उक्तञ्च- जो तू स्वामीको इस दशामें प्राप्त करता है सो फिर हम सरीकोंकी क्या गणना है ! इस कारण मेरे समीपमें तुमको रहना उचित नहीं है । कहा है- तुलां लोहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषिकाः । राजँस्तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः ॥ ४४३ ॥” जहा सहस्रलोहकी तुलाको चूहे खाजाते हैं हे राजन् ! वहीं बालकको श्येन लेजाता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ४४३ ॥ ” दमनक आह,-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत- दमनक बोला,-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला- कथा २१. अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिक्पुत्रः । स च विभवक्षयात् देशान्तरगमनमना व्यचिन्तयत् । किसी स्थानमें एक जीर्णधन नामवाला वणिक्पुत्र रहताथा वह धनके क्षयसे देशान्तरमें जानेकी इच्छासे विचारने लगा । कि, “यत्र देशेऽथवा स्थाने भोगान्भुक्त्वा स्ववीर्यतः । तस्मिन्विभवहीनो यो वसेत्स पुरुषाधमः ॥ ४४४ ॥ जिस देश वा जिस स्थानमें अनेक भोगोंको अपने पराक्रमसे भोगे उस स्थानमें जो ऐश्वर्यहीन होकर वसे वह पुरुष नीच है ॥ ४४४ ॥ तथाच- तैसेही- येनाहङ्कारयुक्तेन चिरं विलसितं पुरा । दीनं वदति तत्रैव यः परेषां स निन्दितः ॥ ४४५ ॥”