पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १९६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
राज्ञो वक्षःस्थलोपरि मक्षिका उपविष्टा । व्यजनेन मुहुर्मुहु- र्निषिध्यमानापि पुनः पुनस्तत्रैव उपविशति । तत- स्तेन स्वभावचपलेन मूर्खेन वानरेण क्रुद्धेन सता तीक्ष्णं खड्गमादाय तस्या उपरि प्रहारो विहितः । ततो मक्षिका उड्डीय गता तेन शितधारेण असिना राज्ञो वक्षो द्विधा जातं राजा मृतश्च । तस्मात् चिरायुरिच्छता नृपेण मूर्खोऽ- नुचरो न रक्षणीयः । अपरमेकस्मिन्नगरे कोऽपि विप्रो महा- विद्वान् परं पूर्वजन्मयोगेन चौरो वर्त्तते । स तस्मिन् पुरेऽन्य- देशादागतान् चतुरो विप्रान् बहूनि वस्तूनि विक्रीणतो दृष्ट्वा चिन्तितवान्, "अहो ! केन उपायेन एषां धनं लभे" ! । इति विचिन्त्य तेषां पुरोऽनेकानि शास्त्रोक्तानि सुभाषि- तानि च अतिप्रियाणि मधुराणि वचनानि जल्पता तेषां मनसि विश्वासमुत्पाद्य सेवा कर्तुमारब्धा । अथ वा साधु चेदमुच्यते-
किसी एक राजाका नित्य अत्यन्त भक्त एक वानर अंगरक्षक अन्तःपुर- मेंभी अनिवारित प्रवेशवाला अति विश्वासपात्र था, एक समय निद्रित हुए राजाके वानरके पंखा लेकर हवा करनेमें राजाकी छातीपर मक्खी बैठ गई पंखेसे वारंवार निषेध की हुईभी वहीं बैठती । तब उस स्वभावसे चपल मूर्ख वानरने क्रोध कर तीक्ष्ण खड्ग ले उसपर प्रहार दिया । तब मक्खी तो उड़गई उस तीक्ष्ण धारवाली तल्वारसे राजाकी छाती दो खण्ड हुई जिससे वह मरगया, इससे चिरायुकी रक्षा करनेवाले राजाको मूर्ख अनुचर करना उचित नहीं । दूसरी बात यह कि, एक नगरमें कोई ब्राह्मण महाविद्वान् था, परन्तु पूर्वजन्मके योगसे चोर होगया, वह उस पुरमें और देशोंसे आये हुए चार ब्राह्मणोंको बहुतसी चीजे बेचता देखकर विचारने लगा, "अहो किस उपायसे इनका धन लूं"। ऐसा विचार कर उनके सम्मुख अनेक शास्त्रोक्त सुभाषित अतिप्रिय मधुर वचनोंको कहकर उनके मनमें विश्वास उत्पन्न कर सेवा करनी प्रारम्भ की। अथवा यह अच्छा कहा है-