पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० पराशरस्मृतिः [ द्वादशो- सर्वं गङ्गासमं तोयं राहुग्रस्ते दिवाकरे । सोमग्रस्ते तथैवोक्तं स्नान-दानादि कर्मसु ॥२७॥ सूर्य या चन्द्रग्रहण के समय दानादि के रूप में मिलनेवाला पदार्थ गङ्गाजल के समान फलदायी होता है ॥२७॥ कुशैः पूतं भवेत् स्नानं कुशेनोपस्पृशेद् द्विजः । कुशेन चोद्धृतं तोयं सोमपानसमं भवेत् ॥२८॥ कुश के द्वारा किया जानेवाला स्नान पवित्र होता है। ब्राह्मण को कुश लेकर ही आचमन करना चाहिए। कुश के साथ जो जल उठाया जाता है, वह जल सोमपान के सदृश अत्यन्त पुनीत होता है ॥२८॥ अग्निकार्यात् परिभ्रष्टाः सन्ध्योपासनवर्जिताः । वेदं चौवाऽनधीयानाः सर्वे ते वृषलाः स्मृताः ॥२९॥ अग्निहोत्र से च्युत, सन्ध्या-वन्दन से रहित और वेदपाठ से विमुख होनेवाला ब्राह्मण शूद्र के समान कहा गया है ॥२९॥ तस्माद् वृषलभीतेन ब्राह्मणेन विशेषतः । अध्येतव्योऽप्येकदेशो यदि सर्वं न शक्यते ॥३०॥ इसलिए ब्राह्मण को चाहिए कि यदि वेद का सम्पूर्ण भाग न पढ़ सके तो उसके एक भाग का ही पाठ कर ले ॥३०॥ शूद्रान्न-रस-पुष्टस्याऽप्यधीयानस्य^१ नित्यशः । जपतो जुह्वतो वाऽपि गतिरूर्ध्वा न विद्यते ॥३१॥ शूद्र के अन्न और रस से पलनेवाले वेदाध्ययन, जप और हवन के द्वारा भी सद्गति प्राप्त नहीं कर सकते ॥३१॥ शूद्रान्नं शूद्रसम्पर्कः शूद्रेण तु सहासनम् । शूद्राज्ज्ञानाऽऽगमश्चैव^२ ज्वलन्तमपि पातयेत् ॥३२॥ अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मण भी शूद्र का अन्न ग्रहण करते, १. 'धीयमानस्य' इति । २. '-श्चापि' इति ।