फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका वन्दे वन्दारुमन्दारमिन्दु भूषण नन्दनम् । अमन्दानन्दसन्दोह बन्धुरं सिन्धुराननम् ॥ परब्रह्म परमेश्वर की असीम अनुकम्पा से फलित ज्योतिष का यह अनुपम ग्रंथ, हिन्दी भाषा भाषी संसार के दृष्टि पथ में प्रथम बार अवतरित हो रहा है। पहिले यह ग्रन्थ दक्षिण भारतीय लिपि 'ग्रंथ' में ही उपलब्ध था। प्रायः ४० वर्ष पूर्व कलकत्ते से मूल संस्कृत देव- नागरी में प्रकाशित हुआ और यद्यपि तमिल, तेलगू, कन्नड, मलयालम, गुजराती अंगरेजी आदि भाषाओं में इसकी टीका उपलब्ध हुई, किन्तु हिन्दी में इसका अभाव था। यह व्याख्या संस्कृत के भाव और अर्थ को प्रकाशित करती है; जन्म कुंडली के द्वादश भावों का अर्थ निरूपण करती है । इसके अतिरिक्त हिन्दी व्याख्या में श्री रामानुज प्रणीत भावार्थ रत्नाकर नामक फलित ग्रंथ के प्रायः ४५० योग भी हमने दे दिये हैं—इस कारण इसका नाम भावार्थबोधिनी फलदीपिका सार्थक है। श्री मन्त्रेश्वर का नाम युवावस्था में मार्कण्डेय भट्टाद्रि था। इनका जन्म दक्षिण भारत के नम्बूदरी ब्राह्मण कुल में हुआ। एक मत से इनका जन्म तमिल प्रान्त के शालवीटी स्थान में हुआ। दूसरा मत है कि इनकी जन्म भूमि केरल थी। यह सुकुन्तलाम्बा देवी के भक्त थे। इनके जन्म-काल में भी मतभेद है। कुछ विद्वान् तेरहवीं शताब्दी और कुछ सोलहवीं शताब्दी मानते हैं। यह अखिल विद्योपार्जन के लिये सुदूर बदरिकाश्रम, हिमालय प्रदेश तथा विद्वज्जलनलामभूता मिथिला में बहुत काल तक रहे। न्याय वेदान्त आदि षट् दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान् थे और निरन्तर व्रतोपवास-