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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

भूमिका वन्दे वन्दारुमन्दारमिन्दु भूषण नन्दनम् । अमन्दानन्दसन्दोह बन्धुरं सिन्धुराननम् ॥ परब्रह्म परमेश्वर की असीम अनुकम्पा से फलित ज्योतिष का यह अनुपम ग्रंथ, हिन्दी भाषा भाषी संसार के दृष्टि पथ में प्रथम बार अवतरित हो रहा है। पहिले यह ग्रन्थ दक्षिण भारतीय लिपि 'ग्रंथ' में ही उपलब्ध था। प्रायः ४० वर्ष पूर्व कलकत्ते से मूल संस्कृत देव- नागरी में प्रकाशित हुआ और यद्यपि तमिल, तेलगू, कन्नड, मलयालम, गुजराती अंगरेजी आदि भाषाओं में इसकी टीका उपलब्ध हुई, किन्तु हिन्दी में इसका अभाव था। यह व्याख्या संस्कृत के भाव और अर्थ को प्रकाशित करती है; जन्म कुंडली के द्वादश भावों का अर्थ निरूपण करती है । इसके अतिरिक्त हिन्दी व्याख्या में श्री रामानुज प्रणीत भावार्थ रत्नाकर नामक फलित ग्रंथ के प्रायः ४५० योग भी हमने दे दिये हैं—इस कारण इसका नाम भावार्थबोधिनी फलदीपिका सार्थक है। श्री मन्त्रेश्वर का नाम युवावस्था में मार्कण्डेय भट्टाद्रि था। इनका जन्म दक्षिण भारत के नम्बूदरी ब्राह्मण कुल में हुआ। एक मत से इनका जन्म तमिल प्रान्त के शालवीटी स्थान में हुआ। दूसरा मत है कि इनकी जन्म भूमि केरल थी। यह सुकुन्तलाम्बा देवी के भक्त थे। इनके जन्म-काल में भी मतभेद है। कुछ विद्वान् तेरहवीं शताब्दी और कुछ सोलहवीं शताब्दी मानते हैं। यह अखिल विद्योपार्जन के लिये सुदूर बदरिकाश्रम, हिमालय प्रदेश तथा विद्वज्जलनलामभूता मिथिला में बहुत काल तक रहे। न्याय वेदान्त आदि षट् दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान् थे और निरन्तर व्रतोपवास-

( ४ ) नियमपूर्वक तपस्या कर देवताराधन में सफल हुए । तब इनका नाम मंत्रेश्वर हुआ । १५० वर्ष की आयु में योगक्रिया द्वारा इस ऐहिक शरीर का त्याग किया । अखिल विद्याओं का अध्ययन और तपस्या के कारण इनका ज्योतिष का भी अगाध ज्ञान था और इस फलदीपिका में बहुत-से ज्योतिष के फलादेश प्रकार इतने अपूर्व और गंभीर हैं कि पाठक मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते । फलदीपिका ग्रंथ फलित ज्योतिष की प्रौढ़ रचना है । हिन्दी व्याख्या के साथ-साथ मूल श्लोक भी दे दिये गये हैं जिससे सहृदय संस्कृत प्रणयी मूल का रसास्वाद कर, मंत्रेश्वर की सुललित पदावली से प्रकर्ष हर्ष का अनुभव कर सकें । ग्रंथ की महत्ता, उपादेयता या बहुविषयकता की व्याख्या करना व्यर्थ है, क्योंकि पुस्तक पाठकों के सम्मुख है । आशा है अधिकारी वर्ग, ज्योतिष की विविध परीक्षाओं के लिये जो पाठ्य पुस्तकें निर्धारित की जाती हैं, उनमें इस फलित विषयक अमूल्य ग्रंथ का भी सन्निवेश करेंगे, जिससे विद्यार्थी अपने भावी जीवन में विशेष सफल ज्योतिषी हो सकें । विद्वानों से निवेदन है कि इस पुस्तक के अग्रिम संस्करण के लिये यदि कोई परामर्श देना चाहें तो निम्नलिखित पते से पत्र-व्यवहार करें । सारावली में लिखा है : यदुपचित मन्य जन्मनि शुभाशुभं कर्मणः पक्तिम् । व्यञ्जयति शास्त्र मेतत्तमसि द्रव्याणि दीप इव ॥ अर्थात् पूर्वजन्म में जो शुभ या अशुभ कर्म जातक ने किये हैं उनका फल, अंधकार में रक्खी हुई वस्तुओं को दीपक की भांति ज्योतिष शास्त्र दिखाता है । ज्योतिष कल्पद्रुम के तीन स्कन्ध हैं 'हिता, सिद्धान्त तथा होरा । होरा के अन्तर्गत जन्म या प्रश्न कुण्डली का फलादेश आता है । उन्हीं फलों को दिखाने के लिये यह रचना फल-दीपिका है । विजय दशमी गोपेशकुमार ओझा विक्रम संवत् २००० ९३ दरियागंज, दिल्ली-६ टेलिफोन २७१७२८

विषयानुक्रमणिका १. प्रथम अध्याय : राशि भेद । मंगलाचरण-जन्म समय का ठीक ज्ञान-काल पुरुष के अंगों का राशिचक्र से समन्वय-राशियों के स्थान तथा स्वामी-ग्रहों की उच्च राशियाँ, परमोच्च अंश, नीच राशि तथा परम नीच अंश-मनुष्य, चतुष्पद,कीट, जलचर संज्ञा-पृष्ठोदय, शीर्षोदय उभयोदय-दिवाबली रात्रिबली-राशियों की नर आदि संज्ञा-द्वार, बाह्य-धातु-क्रूर, सौम्य आदि विवरण तथा दिशाएँ- किस भाव से क्या विचारना । पृ० १७-२९ २. दूसरा अध्याय : ग्रह भेद । सूर्य, चंद्र, मंगल बुध बृहस्पति, शुक्र, शनि किन-किन के कारक होते हैं-इनसे क्या-क्या विचार करना-ग्रहों के स्वरूप, गुण, प्रकृति- ग्रहों की दिशा-उनके धातु, स्थान, पक्षी, वृक्ष-ग्रहों के नैसर्गिक तथा तात्कालिक मित्र, शत्रु आदि-उनके काल, जाति गुण, ऋतु, अन्न, देश, रत्न-पापत्व और शुभत्व । पृ० ३०-५३ ३. तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग । दशवर्ग-राशि, होरा, द्रेष्काण, पंचमांश, सप्तमांश, नवांश, दशमांश- द्वादशांश, षोडशाँश-षष्टिअंश-दशवर्ग चक्र-किस वर्ग से क्या विचार करना

६ किस वर्ग का क्या महत्व है-उत्तमांश पारिजातांश आदि विचार । ग्रहों की प्रदीप्त, सुखित, मुदित आदि संज्ञा- । पृ०—५४-७२ ४. चौथा अध्याय : ग्रह बल । स्थान बल-कालबल-दिक्बल-अयन बल, युद्धबल चेष्टाबल-नैसर्गिक बल-दृग्बल-भावबल-भावदिक्बल चन्द्र क्रियादि—चन्द्र क्रिया फल-चन्द्र अवस्था फल । पृ ७३-१०० ५. पाँचवाँ अध्याय : कर्माजीव प्रकरण सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति-शुक्र-शनि-प्रत्येक ग्रह के अनुसार जातक के कार्य और आजीविका, किस प्रकार तथा किस कार्य से होगी-इसका विचार । पृ० १०१-१०८ ६. छठा अध्याय : योग पंच महापुरुष योग-रुचक-भद्र-हंस-मालव्य-शश-चन्द्रमा के योग सुनफा, अनफा, दुरुधरा-केमद्रुम-सूर्य के योग-वेशि वाशि-उभयचरी-अन्य योग-शुभकर्तरी-पापकर्तरी-सुशुभ-केसरी-अधम-सम-वरिष्ठ-महाभाग्य- शकट-वसुमत्-अमला-पुष्कल-शुभमाला-अशुभमाला-लक्ष्मी-गौरी-सरस्वती- श्रीकंठ-श्रीनाथ-विरंचि-द्वादश भाव स्वामियों के परस्पर स्थान विनिमय से दैन्य, खल, महायोग । पर्वत-काहल-राजयोग-शंख-संख्या योग-वल्लकी या वीणा-दाम-पाश-केदार-शूल-युग-गोल । अधियोग चामर-धेनु-शौर्य-जलधि-शस्त्र-काम-असुर-भाग्य-ख्याति-सुपारिजात-मूसल- अवयोग-निःस्वयोग-मृति-कुहू-पामर--हर्ष-दुष्कृति-सरल- निर्भाग्य-दुर्योंग- दरिद्र-विमलयोंग । दुर्योग (दूसरे प्रकार का)—इन सब योगों के लक्षण और फल । पृ० १०९-१६२

७. सातवाँ अध्याय : राजयोग । स्वराशि तथा उच्च राशिस्थित ग्रहों का फल-सुस्थान स्थित वक्रीग्रह-दिग्बली ग्रहों से राजयोग-वर्गोत्तम लग्न और चन्द्र-लग्नेश से राजयोग-उच्च चन्द्रमा-अश्विनी में शुक्र-मंगल के सुस्थान से योग-धनु के पूर्वार्द्ध में सूर्य, चन्द्र-सूर्य नवांश में चन्द्र-स्वनवांश स्थिति से राजयोग- वर्गोत्तम चन्द्र-नवम स्थान स्थित ग्रहों से राजयोग-उच्चराशि स्थित शुक्र, शनि-नीच तथा शत्रु राशिस्थ ग्रह—तृतीय, षष्ठ एकादश में-पूर्ण चन्द्र वर्गोत्तम नवांश में—गुरुचन्द्र केन्द्र में-जल चर राशि नवांश में चन्द्र-शुक्र पर गुरु की दृष्टि-बृहस्पति दृष्ट बुध-मित्र दृष्ट उच्च ग्रह- निज नवांश में सूर्य-मीन राशि में चन्द्र-वृष में चन्द्र-चन्द्र पर गुरु, शुक्र की दृष्टि-लाभेश, धर्मेश, धनेश से राजयोग-नीचभंग राजयोग । पृ० १६३-१७९ ८. अठवाँ अध्याय : भावश्रय फल । सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, तथा केतु का लग्न, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम, एकादश तथा द्वादश भाव में स्थित होने का पृथक्-पृथक् फल । पृ० १८०-२०५ ९. नवाँ अध्याय : राशिफल । मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक धनु, मकर, कुंभ या मीन लग्न में हो या जिस राशि में चन्द्रमा हो उसका फल । उच्चराशि स्थित, स्वगृही, मित्रक्षेत्री, शत्रुक्षेत्री, नीच राशि स्थित- अस्त-समराशि स्थित ग्रहों का फल-वक्री तथा वर्गोत्तम नवांश स्थित ग्रह का फल । पृ० २०६-२१६

८ १०. दसवाँ अध्याय : कलत्रभाव । चन्द्र या लग्न से पांचवाँ और सांतवां स्थान-शुक्र से चतुर्थ, अष्टम द्वादश में क्रूर ग्रह-सप्तमेश तथा सप्तम स्थान गत ग्रहों का फल-वृश्चिक में शुक्र-मकर राशि में गुरु-मीन में शनि, कर्क में मंगल, शनि-मंगल या शनि के वर्ग में शुक्र-चन्द्र शुक्र यदि मंगल शनि से सप्तम हों-पत्नी संख्या-पत्नी नाश के योग-चन्द्र-शनि योग-सप्तम में शत्रुक्षेत्री या नीच ग्रह-सम विषम राशि से फल में तारतम्य-द्वितीयेश, सप्तमेश और व्ययेश-विवाह की दिशा-किस दशा या अन्तर्दशा में विवाह-किस दशा, अन्तर्दशा में पत्नी मरण । पृ० २१७-२२३ ११. ग्यारहवाँ अध्याय : स्त्रीजातक । स्त्रियों की जन्म कुंडली में मांगल्य (सधवा स्थिति) अष्टमभाव से-पुत्र नवम से-पति विचार सप्तम से-सतीत्व चतुर्थ से-सम, विषम राशियों में लग्न और चन्द्र-उत्तम या निकृष्ट पति प्राप्ति के योग- अल्पसुत योग--शुभ योग-लग्न तथा चन्द्र का त्रिंशांश के अनुसार फल- नक्षत्र विशेष में जन्म का फल-सास, ससुर, देवर आदि के लिये शुभा- शुभ फल-वन्ध्या योग-विधवा योग-सन्तति नाश योग-गर्भाधान का शुभ समय । पृ २२४-२३० १२. बारहवाँ अध्याय : पुत्र भावफल । लग्न तथा चन्द्र से पंचम भाव तथा पंचमेश-इनके शुभाशुभ योग- पापीग्रह यदि स्वराशि का पंचम में हो-यदि अन्य पाप ग्रह पंचम में हो-यदि पंचम भाव में सिंह, कन्या या वृश्चिक हो-बिलम्ब से पुत्रोत्पत्ति योग-दूसरी पत्नी से पुत्रयोग-अधिक संतति योग-अधिक कन्या योग-

९ वंश आगे न चलने के योग-दत्तक पुत्र योग-पुत्रनाश योग-बहु पुत्र योग- गर्भ रहने का समय-संतान संख्या योग-संतान होगी या नहीं इसके योग तिथि, करण आदि दोषों के कारण सन्तति न होने से उपाय-पुत्र प्राप्ति समय-दशा, अन्तर्दशा तथा गोचर विचार । पृ० २३१-२४९ १३. तेरहवाँ अध्याय : आयुर्दाय । जन्म का समय कौन सा लिया जावे इसमें मत भेद-१२ वर्ष की वय तक बालारिष्ट तथा माता-पिताओं के ग्रह का विशेष प्रभाव- योगारिष्ट-अल्पायु-मध्यायु-दीर्घायु-दिन मृत्यु-दिन रुक्-विषघटी-बालमृत्यु के योग-लग्न-चन्द्र द्रेष्काण-लग्नेश चन्द्रेश नवांश-लग्नेश चन्द्रेश द्वादशांश अल्प-मध्य-दीर्घायु के योग-केन्द्रादि स्थिति से आयु विचार, रंध्राधीश का विशेष विचार-लग्नेश, लग्नेश नवांश स्वामी-चन्द्रराशीश-चन्द्र नवांश स्वामी के बलाबल से आयु निर्णय-अल्पायु-मध्यायु-दीर्घायु में नाश का समय-अन्य योग । पृ० २५०-२६४ १४. चौदहवाँ अध्याय : रोगनिर्णय । रोग विचार-सूर्य, चन्द्र-मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु प्रत्येक ग्रह के पीड़ाकारक होने से कौन-कौन से रोग होंगे-किस रोग से मृत्यु होगी-प्रत्येक ग्रह जनित रोग जिससे मृत्यु हो-अष्टम भाव में जो राशि हो, उसके रोग जो मृत्यु करें-शस्त्र, विष आदि से मृत्यु-क्लेश पूर्वक मरण-सुख से मृत्यु-जीवन के बाद जातक की परलोक गति-शीर्षोदय, पृष्ठोदय राशि वश विचार-पूर्व जन्म का वृत्त-पिछले जीवन में मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष लता आदि में जन्म-भविष्य जन्म किस योनि में होगा- स्वदेश या परदेश में, भविष्य में जन्म । पृ० २६५-२८४

२० १५. पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता । भाव फल उत्तम कब होता है-बली या निर्बल भाव के लक्षण- भावनाश-भाव हानि का काल-सौम्य हो या क्रूर लग्नेश जिस भाव में बैठता है उसकी वृद्धि करता है-ग्रह यदि दो भावों का स्वामी हो तो पहिले किस का फल करेगा-भाव सन्धि स्थित ग्रह-सूर्य आदि ग्रह किन-किन विषयों के कारक हैं-लग्न आदि द्वादश भावों के कारक ग्रह- षष्ठाष्टम द्वादश में विशेष फल-प्रत्येक भाव से द्वादश भाव गणना- कारक से विचार-कारक से द्वादश भाव गणना और उन भावों का विचार-यदि कारक उस भाव में बैठा हो जिस का वह कारक है । दो भावों का स्वामी ग्रह यदि अपनी सुस्थान स्थित राशि में हो तो दुःस्थानाधिप होने का दोष नहीं-पाँच प्रकार का सम्बन्ध । पृ० २८५-३०५ १६. सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल। लग्न भाव का शुभाशुभ फल-लग्नेश के शुभ सम्बन्ध का फल- सुस्थान या दुःस्थान स्थित लग्नेश-धन भाव फल- धनेश का विविध ग्रहों से सम्बन्ध-तृतीयेश भाव फल-तृतीयेश लग्नेश युति का प्रभाव-बलवान् तृतीयेश-चतुर्थ भाव-सुखेश स्थिति वश शुभाशुभ-माता, पिता, पुत्र आदि का विचार-चतुर्थ भाव के लिये शुक्र का विचार-पंचम भाव, भावाधीश से फलादेश-षष्ठ भावेश तथा लग्नेश के बलाबल वश शत्रु, रोग, स्वास्थ्य विचार-सप्तम भाव फल-अष्टमेश स्थिति वश शुभाशुभ- नवम भाव फल-पिता सुख-क्या जातक गोद जावेगा-दशम भाव विचार जातक के उच्च पद प्राप्ति योग-लाभ भाव फल-व्यय भाव फल-भाव सिद्धि काल-गोचरवश फलादेश-लग्नेश की तथा अन्य भावेशों की गोचर स्थिति । पृ० ३०६-३२१

१२ १७. सत्रहवाँ अध्याय : निर्याण प्रकरण । किसी भाव का नाश काल-शनि, गुरु, चन्द्र गोचर वश निर्याण काल-लग्नेश, यमकण्टक, चन्द्र, शनि की राशि, अंश, कला से मृत्यु का समय-सूर्य और यम कण्टक स्फुट से मृत्यु काल-लग्न स्पष्ट, सूर्य स्पष्ट तथा मान्दि स्पष्ट से निर्याण काल-अन्य योग-मान्दि और शनि से मृत्यु काल निर्णय-सूर्य गोचर-गृह स्पष्ट, राहु स्पष्ट से फल-जन्म कालीन शनि, शुक्र, अष्टमेश, व्ययेश तथा षष्ठेश से मृत्यु सम्बन्धी फलादेश । पृ० ३२२-३३४ १८. अठारहवाँ अध्याय : द्विग्रहयोग । सूर्य की चन्द्र, मंगल, बुध, गुह, शुक्र या शनि से युति का फल- चन्द्र यदि मगल, बुध, गुरु, शुक्र या शनि के साथ हो-मंगल का यदि बुध, गुरु, शुक्र या शनि से योग हो- बुध की यदि गुरु, शुक्र या शनि से युति हो- गुरु, शुक्र योग-गुरु शनि योग-शुक्र शनि युति । विविध राशि स्थित चन्द्रमा पर अन्य ग्रहों की दृष्टि का फल। चन्द्रमा की भिन्न-भिन्न नवांश स्थिति और उस पर अन्य ग्रहों की दृष्टि का फल-सूर्य नवांश स्थिति, लग्न नवांश स्थिति-द्वादशांश फल । पृ० ३३५-३४५ १९. उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल विंशोत्तरी महादशा निकालने का प्रकार-सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा केतुका, नैसर्गिक गुण, प्रकृति के अनुसार महादशा फल-सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र- विंशोत्तरी दशाक्रम के अनुसार विशेष फल । भावार्थ रत्नाकर के विविध लग्नों के लिये विशेष योग-मेष लग्न में लिये २२ योग-वृष लग्न के १४-मिथुन के ८-कर्क के १३-सिंह लग्न के ८-कन्या के ६-

१२ तुला लग्न के १५-वृश्चिक के ५-धनु के ४-मकर लग्न के लिये ९ कुंभ के ८ और मीन लग्न सम्बन्धी १० योग । पृ० ३८४-३८५ २०. बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल महादशा में अन्तर्दशाओं का फल-लग्न, लग्नेश, धनस्थान धनेश आदि बारहौं भाव और उनके स्वामियों के बल के अनुसार फल- स्वोच्च, स्वगृही तथा वक्रीग्रह का फल-नीच, शत्रु राशिगत तथा अस्तग्रह का फल-यदि किसी भाव का स्वामी बिगड़ा हो तो उसका फल-वर्गोत्तम ग्रह-तीसरे, पाँचवें तथा सप्तम नक्षत्र स्वामी की दशा- मंगल, गुरु, शुक्र, शनि, राहु की अन्तर्दशा का विशेष विचार-यदि अन्तर्दशा नाथ महादशानाथ या लग्नेश का शत्रु हो-शनि, मान्दि, राहु २२वें द्रेष्काण के स्वामी या उनके नवांशों के स्वामी-महादशा या अन्तर्दशानाथ के गोचरवश विचार-दशानाथ तथा अन्तर्दशानाथ की पारस्परिक स्थिति-दशा या अन्तर्दशानाथ अपने पाक के समय उच्च या स्वगृही अथवा नीच या शत्रु राशि में गोचरवश जा रहा हो- राहु युत ग्रह-उडुदाय प्रदीपानुसार कारक, मारक, पापी, राजयोग- योगकारकवश विचार, आरोही, अवरोही विचार-नवांश के अनुसार तारतम्य-भावार्थ रत्नाकर के अनुसार योग-धनयोग ९-निर्धन योग ४- विद्यायोग १५-वाणी योग ६-तृतीय भाव के योग १२-चतुर्थ भाव योग १७-पुत्र विचार २ योग-शत्रु तथा रोग सम्बन्धी १२ योग-पत्नी विचार १४ योग-आयु-आरोग्य के १६ योग-भाग्य योग २३-राजयोग २५-महादशा योग २४-ग्रह सामान्य योग १६-ग्रह मालिका योग ७- मारक योग २१ । पृ० ३८६-४५० २१. इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशा फल अन्तर्दशा प्रत्यन्तर्दशा निकालने का प्रकार-सूर्य महादशा में नवों अन्तर्दशा-प्रत्येक अन्तर्दशा में प्रत्यन्तर-सूर्य महादशा में अन्तर और

१३ प्रत्यन्तर-चन्द्र महादशा में अन्तर और अन्तरों में प्रत्यन्तर-मंगल महादशा में नौ अन्तर्दशाएँ और उनमें प्रत्यन्तर-राहु महादशा में अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर-गुरु महादशा में अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर-बुध महादशान्तर्गत अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर-केतु में अन्तर और प्रत्यन्तर तथा शुक्र महादशा में नवों अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा । पृ० ४५१-४८५ २२. बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा कालचक्र महादशा, अन्तर्दशा-महादशा काल-भुक्त भोग्य निकालने का प्रकार-प्रत्येक नक्षत्र चरण में जन्म होने से विविध राशियों का दशाक्रम-प्रत्येक राशि का दशा काल-प्रत्येक दशा में अन्तर्दशा काल-राशि स्वामीवश फल में तारतम्य-गोचरवश प्रभाव-विविध गतियाँ-इन सबकी पूर्ण व्याख्या उदाहरण सहित-जन्म नक्षत्र से पाँचवें तथा आठवें नक्षत्र से उत्पन्न, आधान तथा महादशा-निसर्ग दशा-अंश दशा-सत्याचार्य का मत-पिण्डायुर्दाशा-जीवशर्मा मणित्थ, चाणक्य, मय आदि का मत । पृ० ४८६-५३५ २३. तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग । अष्टकवर्ग से गोचर विचार का सिद्धान्त-सूर्य-चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि के अष्टक वर्ग बनाने की प्रक्रिया-उपचय, मित्र राशि, स्वोच्च में या अनुपचय, शत्रुराशि या नीच ग्रह से फलादेश में तारतम्य-एक या अधिक बिन्दुओं का अशुभ या शुभ फल-ग्रह को लग्न मान शुभाशुभ निर्देश-प्रत्येक राशि की ८ कक्ष्या-कक्ष्यावश शुभाशुभ काल निर्णय-सर्वाष्टकवर्ग-उदाहरण सहित । पृ० ५३६-५६१ । २४. चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग फल पिता, माता, भ्राता आदि तथा स्वयं का शुभाशुभ काल निर्णय- अष्टकवर्ग से शुभाशुभ वर्ष निकालने का प्रकार-किस राशि या दिशा,

१४ में विवाह करने से विवाह फलप्रद होगा-त्रिकोण शोधन उत्तर भारतीय पराशर के और दक्षिण भारतीय होरा रत्नकार बलभद्र के मत में विभिन्नता-मंत्रेश्वर का मत-प्रश्न मार्ग का मत-त्रिकोण शोधन व्याख्या तथा उदाहरण सहित-एकाधिपत्य शोधन-राशि, ग्रह, गुणा कार-इन सबसे विविध फलादेश पृ० ५६२-५९९ २५. पच्चीसवाँ अध्याय : गुलिकादि उपग्रह । गुलिक या मान्दि स्पष्ट करने का गणित प्रकार-यम,-कण्टक, अर्द्ध प्रहर, काल, धूम, व्यतीपात, परिवेष या परिधि-इन्द्र चाप तथा केतु स्पष्ट करने की प्रक्रिया-इन सबका विविध भावगत फल । पृ० ६००-६१६ २६. छब्बीसवाँ अध्याय : गोचर फल । चन्द्र लग्न की प्रधानता, चन्द्र लग्न से सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि तथा राहु केतु के गोचर वश शुभ और अशुभ स्थान- वेध फल-प्रत्येक ग्रह का चन्द्र लग्न से विविध भावगत शुभाशुभ फल- नक्षत्र गोचर-सप्तशलाका-जन्म, आधान तथा कर्म एवं वैनाशिक वश विचार-जन्म-अनुजन्म, त्रिजन्म नक्षत्र-ग्रह युद्ध-उल्कानिपात-जन्म नक्षत्र से गिनने पर प्रत्येक नक्षत्र में विविध ग्रहों के संचार वश फल-लत्ता फल । सर्वतोभद्र चक्र निर्माण प्रकार-गोचर वश फल-पूर्ण व्याख्या सहित । पृ० ६१७-६६७ २७. सत्ताईसवाँ अध्याय : प्रव्रज्या योग । चतुर्ग्रह योग-राशि के अन्तिम भाग के उदय का फल-बलीग्रह की प्रव्रज्या-चन्द्रद्रेष्काण वश फल-जन्माधिप यदि शनि से दृष्ट हो-सूर्य, चन्द्र आदि जो ग्रह बलवान् हो उससे प्रव्रज्या प्रकार-तपस्वी योग-यदि

१५ राज योग और प्रव्रज्या दोनों प्रकार के योग जन्म कुंडली में हों— सन्याससिद्धि । पृ० ६६८-६७१ २८. अट्ठाईसवाँ अध्याय : उपसंहार । अट्ठाईस अध्यायों में से-प्रत्येक में किस विषय का फलादेश बताया है इसका विवरण-ग्रंथकार का परिचय । पृ० ६७२-६७३ २९. परिशिष्ट—विंशोत्तरी महादशा में अन्तर्दशा चक्र-कालचक्र दशा में अन्तर्दशा चक्र-चन्द्र स्पष्ट से भुक्त-भोग्य काल चक्र महादशा निकालने की सारिणी नं० १, २, ३, ४ पृ० ६७४-६७९

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॥ ॐ ॥ फलदीपिका प्रथम अध्याय राशि भेद शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ सन्दर्शनं वितनुते पितृदेवनॄणां मासाब्दवासरदलैरथ ऊर्ध्वगं यत् । सव्यं क्वचित्क्वचिदुपैत्यपसव्यमेकं ज्योतिः परं दिशतु वस्त्वमितां श्रियं नः ॥ १ ॥ वाग्देवीं कुलदेवतां मम गुरून् कालत्रयज्ञानदान् सूर्यादींश्च नवग्रहान् गणपतिं भक्त्या प्रणम्येश्वरम् । संक्षिप्यात्रपराशरादिकथितान् मन्त्रेश्वरो दैवविद् वक्ष्येऽहं फलदीपिकां सुविमलां ज्योतिर्विदां प्रीतये ॥२॥ मंगलाचरण--शुक्ल (श्वेत या उज्ज्वल) अम्बर (वस्त्र या आकाश) धारण करने वाले, चन्द्रमा के वर्ण (कान्ति) वाले, प्रसन्न वदन चतुर्भुज देव (श्री भगवान्) का सब विघ्नों की शान्ति के लिये ध्यान करें। वह परम ज्योति (भगवान् सूर्यनारायण) जो ऊपर आकाश में देवताओं को आधे वर्ष (छः मास) तक, पितरों को आधे मास (एक पखवाड़े) तक और मनुष्यों को आधे दिन रात (१२ घंटे) तक एक साथ दर्शन देते हैं, जो कभी बायीं ओर चलते हैं (अर्थात् जिनकी गति कभी उत्तरायण होती है) और जो कभी दाहिनी ओर चलते हैं (अर्थात् जिनकी 7718

१८ फलदीपिका गति कभी दक्षिणायन होती है, हमको अपरिमित (जिसकी सीमा नहीं) श्री (धन, वैभव, सौभाग्य, सौन्दर्य आदि) प्रदान करें । ध्रुव लोक में देवताओं का वास माना गया है—वहां छः महीने का दिन, छः महीने की रात्रि होती है । पितरों का वास चन्द्रलोक में माना गया है—चन्द्रमा पर सूर्य का प्रकाश आधे मास तक (शुक्ल पक्ष में) रहता है, कृष्ण पक्ष पितरों का माना गया है । मनुष्यों की निवास भूमि— पृथ्वी में, दिन रात के आधे समय (१२ घंटे) सूर्य का प्रकाश रहता है—यह तीनों बातें ऊपर की स्तुति में प्रदर्शित की गई हैं । ॥ १ ॥ वाग्देवी (वाणी की अधिष्ठात्री सरस्वती), कुल देवता तथा तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) का ज्ञान प्रदान करने वाले मेरे गुरुओं को, तथा सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु इन नवग्रहों को, श्री गणेशजी तथा ईश्वर (भगवान् शंकर) को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके महर्षि अत्रि, महर्षि पराशर आदि कथित शास्त्र (फलित ज्योतिष) को संक्षिप्त करके मैं म

प्रथम अध्याय : राशि भेद १९ ज्ञात कर, भाव स्पष्ट करके और ग्रहों तथा भावों के बल निकालकर फल कहे। ॥ ३ *॥ शिरोवक्त्रोरोहृज्जठरकटिवस्तिप्रजनन- स्थलान्यूरूबान्वोर्युगलमिति जंघे पदयुगम् । विलग्नात्कालाङ्गान्यलिक्षषकूलीरान्तिममिदं भसन्धिविख्याता सकलभवनान्तानपि परे ॥ ४ ॥ समस्त जन्मकुंडली को 'कालपुरुष, का स्वरूप मानकर प्रथम भाव¹ से सिर का, दूसरे भाव से चेहरे का, तीसरे से छाती का, चौथे से हृदय का, पांचवें से पेट का, छठे से कमर का, सातवें से वस्ति² का, आठवें से गुप्त इन्द्रियों का, नवें से जांघों का, दसवें से दोनो घुटनों का, ग्यारहवें से पिंडलियों का, बारहवें से दोनों पैरों का विचार करना चाहिये। जिस भाव में शुभ ग्रह हों, जिस भाव को शुभ ग्रह देखते हों, जिस भाव का स्वामी बलवान् हो—उस भाव से सम्बन्धित शरीर का भाग पुष्ट और सुन्दर होता है। भावेश निर्बल होने से या भाव के क्रूर दृष्ट, क्रूर युत होने से, उस भाव से सम्बन्धित शरीर का भाग कृश या रोगयुक्त होता है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियों के अन्तिम भाग (अंश) को राशि- संधि कहते हैं। अन्य मत से किसी भी राशि का अंतिम भाग—जहां अग्रिम राशि शुरू होती हो—राशिसन्धि कहलाता है ॥ ४ ॥ अरण्ये केदारे शयनभवने श्वभ्रसलिले गिरौ पाथः सस्यान्वितभुवि विशां धाम्नि सुषिरे । १. भाव, स्थान, घर सब का एक ही अर्थ है। २. नाभि से लिंग मूल तक एक रेखा खींची जावे और उसे दो भागों में विभाजित किया जावे तो नीचे का आधा हिस्सा वस्ति कहलाता है।

२० फलदीपिका जनाधीशस्थाने सजलविपिने धाम्नि विचरत् कुलाले कीलाले वसतिरुदिता मेषभवनात् ॥ ५ ॥ मेष आदि १२ राशियों के रहने के स्थान क्रमशः बताते हैं (१) जंगल, (२) जलपूर्ण खेत, (३) शयन (सोने) का कमरा, (४) जलपूर्ण दरार, (५) पर्वत, (६) जल और अन्न से पूर्ण भूमि, (७) वैश्य का घर, (८) छिद्र, (९) जनाधीश (राजा या अधिकारी का स्थान, (१०) जलपूर्ण जंगल, (११) कुम्हारों की जगह, (१२) जल । जन्मकुंडली या प्रश्न में जिस राशि से निर्णय किया जावे—उस राशि के उपर्युक्त वर्णित स्थान से फलादेश में सहायता लेनी चाहिये ॥ ५ ॥ भौमः शुक्रबुधेन्दुसूर्यशशिजाः शुक्रारजीवार्कजाः मन्दौ देवगुरुः क्रमेण कथिता मेषादिराशीश्वराः । सूर्यादुच्चगृहाः क्रियो वृषमृगस्त्रीकर्कमोनास्तुला दिक्त्र्यंशैर्मनुयुक्तितिथीषुभनखांशैस्तेऽस्तनीचाः क्रमात् ॥६॥ मेष और वृश्चिक इन दो राशियों का स्वामी मंगल होता है, वृष और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्या का बुध, धनु और मीन का वृहस्पति, मकर और कुंभ राशियों का शनि । सिंह का सूर्य तथा कर्क का चन्द्रमा स्वामी है । अब नीचे के चक्र में किस ग्रह की कौन-सी उच्च राशि है और उस समस्त उच्च राशि में भी, किस अंश पर परम उच्च होता है यह बताया जाता है । इसी प्रकार ग्रहों की नीच राशि तथा उस नीच राशि में भी परम नीच अंश बताया जाता है । | ग्रह | उच्च राशि | परमोच्च अंश | नीच राशि | परम नीच अंश | | सूर्य | मेष | १० | तुला | १० | | चन्द्र | वृष | ३ | वृश्चिक | ३ | | मंगल | मकर | २८ | कर्क | २८ |

प्रथम अध्याय : राशि भेद २१ ग्रह उच्चराशि परमोच्चअंश नीच राशि परम नीच अंश बुध कन्या १५' मीन १५ बृहस्पति कर्क ५ मकर ५ शुक्र मीन २७ कन्या २७ शनि तुला २० मेष २० उदाहरण के लिये बृहस्पति कर्क राशि के ५वें अंश पर परमोच्च कहलाता है और ऊपर से ऊपर के शिखर पर पहुंचकर नीचे चलना शुरू करता है; जब मकर के ५ अंश पर रहता है तो परम नीच (नीचा) हो जाता है। फिर ऊंचा जाना शुरू करता है ॥ ६ ॥ सिंहोक्षाजवधूहयाङ्गवणिनः कुंभस्त्रिकोणा रवेः ज्ञेन्दोस्तूच्चलवान्खषोड्वनशरैर्दिग्भूतकृत्यंशकैः । चापाद्यर्धवधूनृयुग्घटतुला मत्स्याश्च कीटोऽलिभं त्वाप्याः कर्किमृगापरार्द्धशफराः शेषाश्चतुष्पादकाः ॥७॥ कुछ ग्रहों की जो स्वराशि या उच्च राशि बताई गई हैं वे उनकी मूल त्रिकोण राशि भी होती है। फिर यह कैसे मालूम पड़े कि उस राशि में स्वराशि या अपनी राशि कितने अंशों तक है और मूल त्रिकोण कहां से कहां तक ? या उच्च राशि कौन-सा भाग है ? मूल त्रिकोण कौन-सा भाग ? यह नीचे चक्र में स्पष्ट किया जाता है। ग्रह राशि मूल त्रिकोण अपनी राशि सूर्य सिंह ०°—२०° शेष स्वराशि चन्द्रमा वृष ३°—३०° प्रथम ३ अंश-उच्च मंगल मेष ०°—१२° शेष स्वराशि 'टिप्पणी—कन्या में ०° से १५° तक बुध का उच्च भाग १६°–२०° तक मूल त्रिकोण और २०°—३०° तक स्वराशि होती है।

२२ फलदापका ग्रह राशि मूलत्रिकोण अपनीराशि बुध कन्या १५°-२०° २०°-३०° स्वराशि वृहस्पति धनु ०-१०° शेष स्वराशि शुक्र तुला ०-५° शेष स्वराशि शनि कुंभ ०°-२०° शेष स्वराशि अब राशियों को मनुष्य, कीट (कीड़ा) जल, तथा चतुष्पाद इन चार भागों में विभाजित करते हैं । मनुष्य चतुष्पाद कीट जलचर मिथुन मेष वृश्चिक कर्क कन्या वृष मकर (उत्तरार्द्ध) तुला मीन धनु (पूर्वार्ध) सिंह धनु (उत्तरार्द्ध) कुंभ मकर (पूर्वार्द्ध) गोकर्क्यश्व्यजनक्रभान्यथ नृयुङ्मीनौ परे राशय- स्ते पृष्ठोभयकोदयाः समिथुनः पृष्ठोदयाश्चैन्दवाः । सौराः शेषगृहाः क्रमेण कथिता रात्रिद्युसंज्ञाः क्रमा- दूर्ध्वाधःसमवक्रभानि तु पुनस्तीक्ष्णांशुमुक्ताद् गृहात् ॥८॥ अब कौन-सी राशि अपने आगे की ओर से उदय होती है, कौन-सी पीछे की ओर से और कौन-सी दोनों ओर से यह बताते हैं । मेष पृष्ठोदय कर्क पृष्ठोदय वृष पृष्ठोदय सिंह शीर्षोदय *मिथुन उभयोदय कन्या शीर्षोदय शीर्षोदय—सिर या आगे की ओर से उदय होने वाली । *१. बृहज्जातक के मतानुसार मिथुन शीर्षोदय है ।