प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५
| तानेवमुपगतानह स किल ऋषिरुवाच भूयः पुनरेव यद्यपि यूयं पूर्वं तपस्विन एव तपसेन्द्रियसंयमेन तथापीह विशेषतो ब्रह्मचर्येण श्रद्धया चास्तिक्यबुद्ध्यादरवन्तः संवत्सरं कालं संवत्स्यथ सम्यग्गुरुशुश्रूषापराः सन्तो वत्स्यथ । ततो यथाकामं यो यस्य कामस्तमनतिक्रम्य यथाकामं यद्विषये यस्य जिज्ञासा तद्विषयान्प्रश्नान्पृच्छत । यदि तद्युष्मत्पृष्टं विज्ञास्यामः-अनुद्धतत्वप्रदर्शनार्थो यदि शब्दो नाज्ञानसंशयार्थः प्रश्ननिर्णयादवसीयते- सर्वं ह वो वः पृष्टं वक्ष्याम इति ॥ २ ॥ | इस प्रकार अपने समीप आये हुए उन लोगोंसे पिप्पलाद ऋषिने कहा—'यद्यपि तुमलोग पहलेसे ही तपस्वी हो तो भी तप—इन्द्रियसंयम, विशेषतः ब्रह्मचर्यसे तथा श्रद्धा यानी आस्तिक्यबुद्धिसे आदरयुक्त होकर गुरुशुश्रूषामें तत्पर रह एक वर्ष और भी निवास करो। फिर अपनी इच्छानुसार अर्थात् जिसकी जैसी इच्छा हो उसका अतिक्रमण न करते हुए—जिसकी जिस विषयमें जिज्ञासा हो उसी विषयमें प्रश्न करना। यदि मैं तुम्हारे पूछे हुए विषयको जानता होऊँगा तो तुम्हें तुम्हारी पूछी हुई सब बात बतला दूँगा। यहाँ 'यदि' शब्द अपनी नम्रता प्रकट करनेके लिये है अज्ञान या संशय प्रदर्शित करनेके लिये नहीं, जैसा कि आगे प्रश्नका निर्णय करनेसे स्पष्ट हो जाता है ॥ २ ॥ |
कबन्धीका प्रश्न—प्रजा किससे उत्पन्न होती है ?
अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥
तदनन्तर (एक वर्ष गुरुकुलवास करनेके पश्चात्) कात्यायन कबन्धीने गुरुजीके पास जाकर पूछा—'भगवन् ! यह सारी प्रजा किससे उत्पन्न होती है ?' ॥ ३ ॥