भारतकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५


[ सुषुप्तिकालमें ] इस शरीररूप पुरमें प्राणाग्नि ही जागते हैं । यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन है तथा जो गार्हपत्यसे ले जाया जाता है वह प्राण ही प्रणयन ( ले जाये जाने ) के कारण आहवनीय अग्नि है ॥ ३ ॥

सुप्तवत्सु श्रोत्रादिषु करणेषु एतस्मिन्पुरे नवद्वारे देहे प्राणाग्नयः प्राणा एव पञ्च वायवोऽग्नय इवाग्नयो जाग्रति । अग्निसामान्यं हि आह—गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानः । कथमित्याह—यस्माद्गार्हपत्यादग्नेरग्निहोत्रकाल इतरोऽग्निः आहवनीयः प्रणीयते प्रणयनात् प्रणीयतेऽस्मादिति प्रणयनो गार्हपत्योऽग्निः । तथा सुप्तस्यापानवृत्तेः प्रणीयत इव प्राणो मुखनासिकाभ्यां संचरत्यत आहवनीयस्थानीयः प्राणः। व्यानस्तु हृदयाद्दक्षिणसुषिरद्वारेण निर्गमाद्दक्षिणदिक्सम्बन्धादन्वाहार्यपचनो दक्षिणाग्निः ॥ ३ ॥इस पुर यानी नौ द्वारवाले देहमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंके सो जानेपर प्राणाग्नि—प्राणादि पाँच वायु ही अग्निके समान अग्नि हैं, वे ही जागते हैं । अब अग्निके साथ उनकी समानता बतलाते हैं—यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है । किस प्रकार है, सो बतलाते हैं—क्योंकि अग्निहोत्रके समय गार्हपत्य अग्निसे ही आहवनीय नामक दूसरा अग्नि [जिसमें कि हवन किया जाता है] सम्पन्न किया जाता है; अतः प्रणयन किये जानेके कारण 'प्रणीयतेऽस्मात्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वह गार्हपत्याग्नि 'प्रणयन' है । इसी प्रकार प्राण भी सोये हुए पुरुषकी अपानवृत्तिसे प्रणीत हुआ-सा ही मुख और नासिकाद्वारा सञ्चार करता है; अतः वह आहवनीयस्थानीय है । तथा व्यान हृदयके दक्षिण छिद्रद्वारा निकलनेके कारण दक्षिण-दिशाके सम्बन्धसे अन्वाहार्यपचन यानी दक्षिणाग्नि है ॥ ३ ॥