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प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५


[ सुषुप्तिकालमें ] इस शरीररूप पुरमें प्राणाग्नि ही जागते हैं । यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन है तथा जो गार्हपत्यसे ले जाया जाता है वह प्राण ही प्रणयन ( ले जाये जाने ) के कारण आहवनीय अग्नि है ॥ ३ ॥

सुप्तवत्सु श्रोत्रादिषु करणेषु एतस्मिन्पुरे नवद्वारे देहे प्राणाग्नयः प्राणा एव पञ्च वायवोऽग्नय इवाग्नयो जाग्रति । अग्निसामान्यं हि आह—गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानः । कथमित्याह—यस्माद्गार्हपत्यादग्नेरग्निहोत्रकाल इतरोऽग्निः आहवनीयः प्रणीयते प्रणयनात् प्रणीयतेऽस्मादिति प्रणयनो गार्हपत्योऽग्निः । तथा सुप्तस्यापानवृत्तेः प्रणीयत इव प्राणो मुखनासिकाभ्यां संचरत्यत आहवनीयस्थानीयः प्राणः। व्यानस्तु हृदयाद्दक्षिणसुषिरद्वारेण निर्गमाद्दक्षिणदिक्सम्बन्धादन्वाहार्यपचनो दक्षिणाग्निः ॥ ३ ॥इस पुर यानी नौ द्वारवाले देहमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंके सो जानेपर प्राणाग्नि—प्राणादि पाँच वायु ही अग्निके समान अग्नि हैं, वे ही जागते हैं । अब अग्निके साथ उनकी समानता बतलाते हैं—यह अपान ही गार्हपत्य अग्नि है । किस प्रकार है, सो बतलाते हैं—क्योंकि अग्निहोत्रके समय गार्हपत्य अग्निसे ही आहवनीय नामक दूसरा अग्नि [जिसमें कि हवन किया जाता है] सम्पन्न किया जाता है; अतः प्रणयन किये जानेके कारण 'प्रणीयतेऽस्मात्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वह गार्हपत्याग्नि 'प्रणयन' है । इसी प्रकार प्राण भी सोये हुए पुरुषकी अपानवृत्तिसे प्रणीत हुआ-सा ही मुख और नासिकाद्वारा सञ्चार करता है; अतः वह आहवनीयस्थानीय है । तथा व्यान हृदयके दक्षिण छिद्रद्वारा निकलनेके कारण दक्षिण-दिशाके सम्बन्धसे अन्वाहार्यपचन यानी दक्षिणाग्नि है ॥ ३ ॥
५६प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ४.
अत्र च होताऽग्निहोत्रस्य—यहाँ [अगले वाक्यसे] अग्निहोत्रके होता (ऋत्विक्) का वर्णन किया जाता है—

प्राणाग्निके ऋत्विक्

यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनो ह वाव यजमानः । इष्टफलमेवोदानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४ ॥

क्योंकि उच्छ्वास और निःश्वास ये मानो अग्निहोत्रकी आहुतियाँ हैं, उन्हें जो [शरीरकी स्थितिके लिये] समभावसे विभक्त करता है वह समान [ऋत्विक् है]; मन ही निश्चय यजमान है, और इष्टफल ही उदान है; वह उदान इस मनरूप यजमानको नित्यप्रति ब्रह्मके पास पहुँचा देता है ॥ ४ ॥

यद्यस्मादुच्छ्वासनिश्वासौ अग्निहोत्राहुती इव नित्यं द्वित्वसामान्यादेव त्वेतावाहुती समं साम्येन शरीरस्थितिभावाय नयति यो वायुरग्निस्थानीयोऽपि होता चाहुत्योर्नेतृत्वात् । कोऽसौ स समानः । अतश्च विदुषः स्वापोऽप्यग्निहोत्रहवनमेव । तस्माद्विद्वान्नाकर्मीत्येवं मन्तव्य इत्यभिप्रायः । सर्वदा सर्वाणिक्योंकि उच्छ्वास और निःश्वास अग्निहोत्रकी आहुतियोंके समान हैं, अतः [इनमें और अग्निहोत्रकी आहुतियोंमें] समानरूपसे द्वित्व होनेके कारण जो वायु शरीरकी स्थितिके लिये इन दोनों आहुतियोंको साम्यभावसे सर्वदा चलाता है वह [पूर्वमन्त्रके अनुसार] अग्निस्थानीय होनेपर भी आहुतियोंका नेता होनेके कारण होता ही है। वह है कौन ? समान । अतः विद्वान्‌की निद्रा भी अग्निहोत्रका हवन ही है । इसलिये अभिप्राय यह है कि विद्वान्‌को अकर्मा नहीं मानना चाहिये । इसीसे

प्रश्न.४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७


भूतानि विचिन्वन्त्यपि स्वपत इति हि वाजसनेयके।वृहदारण्यकोपनिषद्में भी कहा है कि उस विद्वान्के सोनेपर भी सत्र भूत सर्वदा चयन (यागानुष्ठान) किया करते हैं।
अत्र हि जाग्रत्सु प्राणाग्निषूपसंहृत्य बाह्यकरणानि विषयांच्च अग्निहोत्रफलमिव स्वर्गं ब्रह्म जिगमिषुर्मनो ह वाव यजमानो जागर्ति यजमानवत्कार्यकरणेषु प्राधान्येन संव्यवहारात्स्वर्गमिव ब्रह्म प्रति प्रस्थितत्वाद्यजमानो मनः कल्प्यते ।इस अवस्थामें बाह्य इन्द्रियों और विषयोंको पञ्च प्राणरूप जागते हुए (प्रज्वलित) अग्निमें हवन कर मनरूप यजमान अग्निहोत्रके फल स्वर्गके समान ब्रह्मके प्रति जानेकी इच्छासे जागता रहता है। यजमानके समान भूत और इन्द्रियोंमें प्रधानतासे व्यवहार करने और स्वर्गके समान ब्रह्मके प्रति प्रस्थित होनेसे मन यजमानरूपसे कल्पना किया गया है।
इष्टफलं यागफलमेवोदानो वायुः । उदाननिमित्तत्वादिष्टफलप्राप्तेः । कथम् ? स उदानो मनआख्यं यजमानं स्वप्नवृत्तिरूपादपि प्रच्याव्याहरहः सुषुप्तिकाले स्वर्गमिव ब्रह्माक्षरं गमयति । अतो यागफलस्थानीय उदानः ॥ ४ ॥उदानवायु ही इष्टफल यानी यज्ञका फल है, क्योंकि इष्टफलकी प्राप्ति उदानवायुके निमित्तसे ही होती है। किस प्रकार? [सो बतलाते हैं—] वह उदान वायु इस मन नामक यजमानको स्वप्नवृत्तिसे भी गिराकर नित्यप्रति सुषुप्तिकालमें स्वर्गके समान अक्षर ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। अतः उदान यागफलस्थानीय है ॥ ४ ॥

एवं विदुषः श्रोत्राद्युपरमकालादारभ्य यावत्सुप्तोत्थितोइस प्रकार विद्वान्‌को श्रोत्रादि इन्द्रियोंके उपरत होनेके समयसे
५८प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ४
भवति तावत्सर्वयागफलानुभव एव नाविदुषामिवानर्थायेति विद्वत्ता स्तूयते। न हि विदुष एव श्रोत्रादीनि स्वपन्ते प्राणाग्नयो वा जाग्रति जाग्रत्स्वप्नयोर्मनः स्वातन्त्र्यमनुभवदहरहः सुषुप्तं वा प्रतिपद्यते। समानं हि सर्वप्राणिनां पर्यायेण जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिगमनमतो विद्वत्तास्तुतिरेव इयमुपपद्यते। यत्पृष्टं कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यतीति तदाह—लेकर जबतक वह सोनेसे उठता है तबतक सम्पूर्ण यज्ञोंका फल ही अनुभव होता है, अज्ञानियोंके समान [उसकी निद्रा] अनर्थकी हेतु नहीं होती—ऐसा कहकर विद्वत्ताकी ही स्तुति की गयी है, क्योंकि केवल विद्वान्की ही श्रोत्रादि इन्द्रियाँ सोती और प्राणाग्नियाँ जागती हैं तथा उसीका मन जाग्रत् और सुषुप्तिमें स्वतन्त्रताका अनुभव करता हुआ रोज-रोज सुषुप्तिको प्राप्त होता है—ऐसी बात नहीं है। क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिमें जाना तो सभी प्राणियोंके लिये समान है। अतः यह विद्वत्ताकी स्तुति ही हो सकती है। अब, पहले जो यह पूछा था कि कौन देव स्वप्नोंको देखता है ? सो बतलाते हैं—

स्वप्नदर्शनका विवरण

अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशादिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥

प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९


इस स्वप्नावस्थामें यह देव अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसने [जाग्रत्-अवस्थामें] जो देखा होता है उस देखे हुएको ही देखता है, सुनी-सुनी बातोंको ही सुनता है तथा दिशा-विदिशाओंमें अनुभव किये हुएको ही पुनः-पुनः अनुभव करता है। [अधिक क्या] यह देखे, बिना देखे, सुने, बिना सुने, अनुभव किये, बिना अनुभव किये तथा सत् और असत् सभी प्रकारके पदार्थोंको देखता है और स्वयं भी सर्वरूप होकर देखता है॥ ५॥


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अत्रोपरतेषु श्रोत्रादिषु देहरक्षायै जाग्रत्सु प्राणादिवायुषु प्राक्सुषुप्तिप्रतिपत्तेः एतस्मिन् अन्तराल एष देवोऽर्करश्मिवत् स्वात्मनि संहृतश्रोत्रादिकरणः स्वप्ने महिमानं विभूतिं विषयविषयीलक्षणमनेकात्मभावगमनम् अनुभवति प्रतिपद्यते।इस अवस्थामें यानी श्रोत्रादि इन्द्रियोंके उपरत हो जानेपर और प्राणादि वायुओंके जागते रहनेपर सुषुप्तिकी प्राप्तिसे पूर्व इस [जाग्रत्-सुषुप्तिके] मध्यकी अवस्थामें यह देव, जिसने सूर्यकी किरणोंके समान श्रोत्रादि इन्द्रियोंको अपनेमें लीन कर लिया है, स्वप्नावस्थामें अपनी महिमा यानी विभूतिको अनुभव करता है अर्थात् विषय-विषयीरूप अनेकात्मत्वको प्राप्त हो जाता है।
[मनःस्वातन्त्र्य-विचारः]<br>ननु महिमानुभवे करणं मनोऽनुभवितुस्तत्कथं स्वातन्त्र्येणानुभवति इत्युच्यते स्वतन्त्रो हि क्षेत्रज्ञः।**पूर्व०—**मन तो विभूतिका अनुभव करनेमें अनुभव करनेवाले पुरुषका करण है; फिर यह कैसे कहा जाता है कि वह स्वतन्त्रतासे अनुभव करता है, क्योंकि स्वतन्त्र तो क्षेत्रज्ञ ही है।
नैष दोषः; क्षेत्रज्ञस्य स्वातन्त्र्यस्य मनउपाधिकृतत्वान्न हि**सिद्धान्ती—**इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि क्षेत्रज्ञकी स्वतन्त्रता मनरूप उपाधिके कारण है,
६०प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ४
क्षेत्रज्ञः परमार्थतः स्वतः स्वपिति जागर्ति वा। मनउपाधिकृतमेव तस्य जागरणं स्वप्नश्चेत्युक्तं वाजसनेयके "सधीः स्वप्नो भूत्वा ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ०उ० ४।३।७)*इत्यादि। तस्मान्मनसो विभूत्यनुभवे स्वातन्त्र्यवचनं न्याय्यमेव।वास्तवमें क्षेत्रज्ञ तो स्वयं न सोता है और न जागता ही है। उसका जागना और सोना तो मनरूप उपाधिके ही कारण है—ऐसा बृहदारण्यक श्रुतिमें कहा है—"वह बुद्धिसे तादात्म्य प्राप्त कर स्वप्नरूप होता है और मानो ध्यान करता तथा चेष्टा करता है" इत्यादि। अतः विभूतिके अनुभवमें मनकी स्वतन्त्रता बतलाना न्याययुक्त ही है।
पुरुषस्य स्वयंज्योतिष्ट्व-स्थापनम् — मनउपाधिसहितत्वे स्वप्नकाले क्षेत्रज्ञस्य स्वयंज्योतिष्ट्वं बाध्यतेति केचित्। तन्न, श्रुत्यर्थापरिज्ञानकृता भ्रान्तिस्तेषाम्। यस्मात्स्वयंज्योतिष्ट्वादिव्यवहारोऽप्यामोक्षान्तः सर्वोऽविद्याविषय एव मनआद्युपाधिजनितः। "यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" (बृ० उ० ४।३।३१) "मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति"। "यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्"किन्हीं-किन्हींका कथन है कि स्वप्नकालमें मनरूप उपाधिके सहित माननेमें क्षेत्रज्ञकी स्वयंप्रकाशतामें बाधा आवेगी सो ऐसी बात नहीं है। उनकी यह भ्रान्ति श्रुत्यर्थको न जाननेके ही कारण है, क्योंकि मन आदि उपाधिसे प्राप्त हुआ स्वयंप्रकाशत्व आदि व्यवहार भी मोक्षपर्यन्त सब-का-सब अविद्याके कारण ही है। जैसा कि "जहाँ कोई अन्य-सा हो वहीं अन्यको अन्य देख सकता है" "इस आत्माको विषयका संसर्ग ही नहीं होता" "जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया वहाँ किसे किसके द्वारा

* बृहदारण्यकोपनिषद्में इस श्रुतिका पाठ इस प्रकार है—'ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वा'।

प्रश्न ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ६१

( बृ० उ० २ । ४ । १४ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अतो मन्द-ब्रह्मविदामेवेयमाशङ्का न तु एकात्मविदाम् ।देखे ?" इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । अतः यह शङ्का मन्द ब्रह्मज्ञानियोंकी ही है, एकात्मवेत्ताओंकी नहीं ।
नन्वेवं सति "अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः" ( बृ० उ० ४ । ३ । १४ ) इति विशेषणमनर्थकं भवति ।पूर्व०—ऐसा माननेपर तो "इस स्वप्नावस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति है" इस वाक्यसे बतलाया हुआ आत्माका [स्वयंज्योति] विशेषण व्यर्थ हो जायगा ।
अत्रोच्यते; अत्यल्पमिदम् उच्यते "य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते" ( बृ० उ० २ । १ । १७ ) इत्यन्तर्हृदय-परिच्छेदे सुतरां स्वयंज्योतिष्ट्वं बाध्येत ।सिद्धान्ती—इसपर हमें यह कहना है कि आपका यह कथन तो बहुत थोड़ा है । "यह जो हृदयके भीतरका आकाश है उसमें वह (आत्मा) शयन करता है" इस वाक्यसे आत्माका अन्तर्हृदयरूप-परिच्छेद सिद्ध होनेसे तो उसका स्वयंप्रकाशत्व और भी बाधित हो जाता है ।
सत्यमेवमयं दोषो यद्यपि स्यात्स्वप्ने केवलतया स्वयंज्योतिष्ट्वेनार्धं तावदपनीतं भारस्येति चेत् ।पूर्व०—यद्यपि यह दोष तो ठीक ही है; तथापि स्वप्नमें केवलतां (मनका अभाव हो जाने) के कारण आत्माके स्वयंप्रकाशत्वसे उसका आधा भार¹ तो हल्का हो ही जाता है ।

¹ १. यहाँ भार हल्का होनेका अभिप्राय है स्वयंप्रकाशताके प्रतिबन्धकका दूर होना ।

६२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४


न; तत्रापि “पुरीतति शेते” (बृ० उ० २।१।१९) इति श्रुतेः पुरीतन्नाडीसम्बन्धादत्रापि पुरुषस्य स्वयंज्योतिष्ट्वेनार्ध-भारापनयाभिप्रायो मृषैव । **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; उस अवस्थामें भी “पुरीतत् नाडीमें शयन करता है” इस श्रुतिके अनुसार जीवका पुरीतत् नाडीसे सम्बन्ध रहनेके कारण यह अभिप्राय मिथ्या ही है कि उसका आधा भार निवृत्त हो जाता है ।
कथं तर्हि “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः” (बृ० उ० ४।३।१४) इति । **पूर्व०—**तो फिर यह कैसे कहा गया है कि ‘इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है’ ?
अन्यशाखात्पादनपेक्षा सा श्रुतिरिति चेत् । **मध्यस्थ—**यदि ऐसा मानें कि अन्य शाखाकी श्रुति * होनेके कारण यहाँ उसकी कोई अपेक्षा नहीं है, तो ?
न; अर्थैकत्वस्येष्टत्वादेको ह्यात्मा सर्ववेदान्तानामर्थो विविज्ञापयिषितो बुभुत्सितश्च । तस्माद्युक्ता स्वप्न आत्मनः स्वयं-ज्योतिष्ट्वोपपत्तिर्वक्तुम् । श्रुते-र्यथार्थतत्त्वप्रकाशकत्वात् । **पूर्व०—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि हमें सब श्रुतियोंके अर्थकी एकता ही इष्ट है । सम्पूर्ण वेदान्तोंका तात्पर्य एक आत्मा ही है; वही उन्हें बतलाना इष्ट है और वही जिज्ञासुओंको ज्ञातव्य है । इसलिये स्वप्नमें आत्माकी स्वयंप्रकाशताकी उपपत्ति बतलाना उचित है, क्योंकि श्रुति यथार्थ तत्त्वको ही प्रकाशित करनेवाली है ।
एवं तर्हि शृणु श्रुत्यर्थं हित्वा सर्वमभिमानं न त्वभिमानेन **सिद्धान्ती—**अच्छा तो अब सब प्रकारका अभिमान त्यागकर श्रुतिका

* क्योंकि यह उपनिषद् अथर्ववेदीय है और ‘अत्रायं पुरुषः’ आदि श्रुति यजुर्वेदीय काण्व-शाखाकी है ।

प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६३


वर्षशतेनापि श्रुत्यर्थो ज्ञातुं शक्यते सर्वैः पण्डितम्मन्यैः । यथा-हृदयाकाशे पुरीतति नाडीषु च स्वपतस्तत्संबन्धाभावात्ततो विविच्य दर्शयितुं शक्यत इत्यात्मनः स्वयंज्योतिष्ट्वं न बाध्यते । एवं मनस्यविद्याकामकर्मनिमित्तोद्भूतवासनावति कर्मनिमित्ता वासनाविद्ययान्यद्वस्त्वन्तरमिव पश्यतः सर्वकार्यकरणेभ्यः प्रविविक्तस्य द्रष्टुर्वासनाभ्यो दृश्यरूपाभ्योऽन्यत्वेन स्वयंज्योतिष्ट्वं सुदर्पितेनापि तार्किकेण न वारयितुं शक्यते । तस्मात् साधूक्तं मनसि प्रलीनेषु करणेषु अप्रलीने च मनसि मनोमयः स्वप्नान्पश्यतीति ।अर्थ श्रवण कर, क्योंकि अपनेको पण्डित माननेवाले सभी पुरुषोंको सौ वर्षमें भी श्रुतिका अर्थ समझमें नहीं आ सकता । जिस प्रकार [स्वप्नावस्थामें ] हृदयाकाशमें और पुरीतत् नाडीमें शयन करनेवाले आत्माका स्वयंप्रकाशत्व बाधित नहीं हो सकता, क्योंकि वह उससे सम्बन्ध न रहनेके कारण उससे पृथक् करके दिखलाया जा सकता है उसी प्रकार अविद्या, कामना और कर्म आदिके कारण उद्भूत हुई वासनाओंसे युक्त होनेपर भी मनमें अविद्यावश प्राप्त हुई कर्म-निमित्तक वासनाको अन्य वस्तुके समान देखनेवाले तथा सम्पूर्ण कार्य-करणोंसे पृथग्भूत द्रष्टा आत्माका स्वयंप्रकाशत्व बड़े गर्वीले तार्किकोंद्वारा भी निवृत्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह दृश्यरूप वासनाओंसे भिन्नरूपसे स्थित है । इसलिये यह कहना बहुत ठीक है कि ‘इन्द्रियोंके मनमें लीन हो जानेपर तथा मनके लीन न होनेपर आत्मा मनरूप होकर स्वप्न देखा करता है’ ।

६४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४


(विभूत्यनुभवप्रकारः) कथं महिमानमनुभवतीत्युच्यते; यन्मित्रं पुत्रादि वा पूर्वं दृष्टं तद्वासनावासितः पुत्रमित्रादिवासनासमुद्भूतं पुत्रं मित्रमिव वाविद्यया पश्यतीत्येवं मन्यते । तथा श्रुतमर्थं तद्वासनयानुशृणोतीव । देशदिगन्तरैश्च देशान्तरैर्दिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनस्तत्प्रत्यनुभवतीवाविद्यया । तथा दृष्टं चास्मिञ्जन्मन्यदृष्टं च जन्मान्तरदृष्टमित्यर्थः; अत्यन्तादृष्टे वासनानुपपत्तेः; एवं श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चास्मिञ्जन्मनि केवलैन मनसा अननुभूतं च मनसैव जन्मान्तरेऽनुभूतमित्यर्थः । सच्च परमार्थोदकादि, असच्च मरीच्युदकादि । किं बहुनोक्तानुक्तं सर्वं पश्यतिवह अपनी विभूतिका किस प्रकार अनुभव करता है ? सो अब बतलाते हैं—जिस मित्र या पुत्रादिको उसने पहले देखा होता है उसीकी वासनासे युक्त हो वह पुत्र-मित्रादिकी वासनासे प्रकट हुए पुत्र या मित्रको मानो अविद्यासे देखता है—ऐसा समझता है । इसी प्रकार सुने हुए विषयको मानो उसीकी वासनासे सुनता है तथा दिग्देशान्तरोंमें यानी भिन्न-भिन्न दिशा और देशोंमें अनुभव किये हुए पदार्थोंको अविद्यासे पुनः-पुनः अनुभव-सा करता है । इसी प्रकार दृष्ट—इसी जन्ममें देखे हुए एवं अदृष्ट अर्थात् जन्मान्तरमें देखे हुए, क्योंकि अत्यन्त अदृष्ट पदार्थोंमें वासनाका होना सम्भव नहीं है, तथा श्रुत-अश्रुत, अनुभूत—जिसका इसी जन्ममें केवल मनसे अनुभव किया हो, अननुभूत—जिसका मनसे ही जन्मान्तरमें अनुभव किया हो, सत्—जल आदि वास्तविक पदार्थ और असत्—मृगजलादि, अधिक क्या कहा जाय—ऊपर कहे हुए अथवा नहीं कहे हुए सभी पदार्थोंको

प्रश्न ४] 'शाङ्करभाष्यार्थ ६५


| सर्वः पश्यति सर्वमनोवासनो- | वह सर्वरूपसे मनोवासनारूप | | पाधिः सन्नेवं सर्वकरणात्मा | उपाधिवाला होकर देखता है। इस | | मनोदेवः स्वप्नान्पश्यति ॥ ५ ॥ | प्रकार यह सर्वेन्द्रियरूप मनोदेव | | | स्वप्नोंको देखा करता है ॥ ५ ॥ |


सुषुप्तिनिरूपण

स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥

जिस समय यह मन तेज (पित्त) से आक्रान्त होता है उस समय यह आत्मदेव स्वप्न नहीं देखता। उस समय इस शरीरमें यह सुख (ब्रह्मानन्द) होता है ॥ ६ ॥

| स यदा मनोरूपो देवो यस्मिन्काले सौरेण पित्ताख्येन तेजसा नाडीशयेन सर्वतोऽभिभूतो भवति तिरस्कृतवासनाद्वारो भवति तदा सह करणैः मनसो रश्मयो हृद्युपसंहृता भवन्ति। यदा मनो दार्वग्निवदविशेषविज्ञानरूपेण कृत्स्नं शरीरं व्याप्यावतिष्ठते तदा सुषुप्तो भवति। अत्रैतस्मिन्काल एष मनआक्यो देवः स्वप्नान्न पश्यति दर्शनद्वारस्य निरुद्धत्वात् | जिस समय वह मनरूप देव नाडीमें रहनेवाले पित्त नामक सौर तेजसे सब ओरसे अभिभूत अर्थात् जिसकी वासनाओंकी अभिव्यक्तिका द्वार लुप्त हो गया है—ऐसा हो जाता है उस समय इन्द्रियोंके सहित मनकी किरणोंका हृदयमें उपसंहार हो जाता है। जिस समय मन काष्ठमें व्याप्त अग्निके समान निर्विशेष विज्ञानरूपसे सम्पूर्ण शरीरको व्याप्त करके स्थित होता है उस समय वह सुषुप्ति-अवस्थामें पहुँच जाता है। यहाँ अर्थात् इस समय यह मन नामवाला देव स्वप्नोंको नहीं देखता, क्योंकि |

६६प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ४
तेजसा । अथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति यद्विज्ञानं निराबाधमविशेषेण शरीरव्यापकं प्रसन्नं भवतीत्यर्थः ॥ ६ ॥उन्हें देखनेका द्वार तेजसे रुक जाता है । तदनन्तर इस शरीरमें यह सुख होता है; तात्पर्य यह कि जो निराबाध और सामान्यरूपसे सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त विज्ञान है वही स्फुट हो जाता है ॥ ६ ॥

एतस्मिन्कालेऽविद्याकामकर्मनिबन्धनानि कार्यकारणानि शान्तानि भवन्ति । तेषु शान्तेषु आत्मस्वरूपमुपाधिभिरन्यथा विभाव्यमानमद्वयमेकं शिवं शान्तं भवतीत्येतामेवावस्थां पृथिव्याद्यविद्याकृतमात्रानुप्रवेशेन दर्शयितुं दृष्टान्तमाह—इस समय अविद्या, काम और कर्मजनित शरीर एवं इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं। उनके शान्त हो जानेपर, उपाधियोंके कारण अन्यरूपसे भासित होनेवाला आत्मस्वरूप अद्वितीय, एक, शिव और शान्त हो जाता है । अतः पृथिवी आदि अविद्याकृत मात्राओं (विषयों) के अनुप्रवेशद्वारा इसी अवस्थाको दिखलानेके लिये दृष्टान्त दिया जाता है—

स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ७ ॥

हे सोम्य ! जिस प्रकार पक्षी अपने वसेरेके वृक्षपर जाकर बैठ जाते हैं उसी प्रकार वह सब (कार्यकरणसंघात) सबसे उत्कृष्ट आत्मामें जाकर स्थित हो जाता है ॥ ७ ॥

स दृष्टान्तो यथा येन प्रकारेण सोम्य प्रियदर्शन वयांसिवह दृष्टान्त इस प्रकार है— हे सोम्य—हे प्रियदर्शन ! जिस

प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७


पक्षिणो वासार्थं वृक्षं वासोवृक्षं प्रति संप्रतिष्ठन्ते गच्छन्ति । एवं यथा दृष्टान्तो ह वै तद्वक्ष्यमाणं सर्वं पर आत्मन्यक्षरे संप्रतिष्ठते ॥ ७ ॥प्रकार पक्षी अपने वासोवृक्ष—बसेरेके वृक्षकी ओर प्रस्थान करते यानी जाते हैं, यह जैसा दृष्टान्त है उसी प्रकार आगे कहा जानेवाला वह सब सर्वातीत आत्मा—अक्षरमें जाकर स्थित हो जाता है ॥ ७ ॥

किं तत्सर्वम्—वह सब क्या है ?

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ८ ॥

पृथिवी और पृथिवीमात्रा (गन्धतन्मात्रा), जल और रसतन्मात्रा, तेज और रूपतन्मात्रा, वायु और स्पर्शतन्मात्रा, आकाश और शब्दतन्मात्रा, नेत्र और द्रष्टव्य (रूप), श्रोत्र और श्रोतव्य (शब्द), घ्राण और घ्रातव्य (गन्ध) रसना और रसयितव्य (रस), त्वचा और स्पर्शयोग्य पदार्थ, हाथ और ग्रहण करनेयोग्य वस्तु, उपस्थ और आनन्दयितव्य, पायु और विसर्जनीय, पाद और गन्तव्य स्थान, मन और मनन करनेयोग्य, बुद्धि और बोद्धव्य, अहङ्कार और अहङ्कारका

६८प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ४

विषय, चित्त और चेतनीय, तेज और प्रकाश्य पदार्थ तथा प्राण और धारण करनेयोग्य वस्तु [ये सभी आत्मामें लीन हो जाते हैं] ॥ ८ ॥

पृथिवी च स्थूला पञ्चगुणा तत्कारणा च पृथिवीमात्रा च गन्धतन्मात्रा, तथापश्चापोमात्रा च, तेजश्च तेजोमात्रा च, वायुश्च वायुमात्रा च, आकाशश्चाकाशमात्रा च, स्थूलानि च सूक्ष्माणि च भूतानीत्यर्थः । तथा चक्षुश्चेन्द्रियं रूपं च द्रष्टव्यं च, श्रोत्रं च श्रोतव्यं च, घ्राणं च घ्रातव्यं च, रसश्च रसयितव्यं च, त्वक्च स्पर्शयितव्यं च, वाक्च वक्तव्यं च, हस्तौ चादातव्यं च, उपस्थश्चानन्दयितव्यं च, पायुश्च विसर्जायितव्यं च, पादौ च गन्तव्यं च, बुद्धीन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि तथा चोक्तानि, मनश्च पूर्वोक्तम्, मन्तव्यं च तद्विषयः, बुद्धिश्च निश्चयात्मिका, बोद्धव्यं च तद्विषयः, अहङ्कारश्चाभिमानलक्षणमन्तःकरणमहङ्कर्तव्यं च तद्विषयः, चित्तं च चेतनावदन्तःकरणम्, चेतयितव्यं चशब्दादि पाँच गुणोंसे युक्त स्थूल पृथिवी और उसकी कारणभूत पृथिवीतन्मात्रा यानी गन्धतन्मात्रा, तथा जल और रसतन्मात्रा, तेज और रूपतन्मात्रा, वायु और स्पर्शतन्मात्रा एवं आकाश और शब्दतन्मात्रा; अर्थात् सम्पूर्ण स्थूल और सूक्ष्मभूत; इसी प्रकार चक्षु-इन्द्रिय और उससे द्रष्टव्य रूप, श्रोत्र और श्रवणीय (शब्द), घ्राण और घ्रातव्य (गन्ध), रस और रसयितव्य, त्वक् और स्पर्शयितव्य, वाक्-इन्द्रिय और वक्तव्य (वचन), हाथ और उनसे ग्रहण करनेयोग्य पदार्थ, उपस्थ और आनन्दयितव्य, पायु और विसर्जनीय (मल), पाद और गन्तव्य स्थान; इस प्रकार वर्णन की हुई ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियाँ तथा पूर्वोक्त मन और उसका मन्तव्य विषय, निश्चयात्मिका बुद्धि और उसका बोद्धव्य विषय; अहङ्कार—अभिमानात्मक अन्तःकरण और उसका विषय अहङ्कर्तव्य; चित्त—चेतनायुक्त अन्तःकरण और उसका चेतयितव्य विषय;

प्रश्न ४ ] 'शाङ्करभाष्यार्थ ६९


तद्विषयः, तेजश्च त्वगिन्द्रियव्यतिरेकेण प्रकाशविशिष्टा या त्वक्तया निर्भास्यो विषयो विद्योतयितव्यम्, प्राणश्च सूत्रं यदाचक्षते तेन विधारयितव्यं संग्रथनीयं सर्वं हि कार्यकारणजातं पारार्थ्येन संहतं नामरूपात्मकमेतावदेव ॥८॥तेज यानी त्वगिन्द्रियसे भिन्न प्रकाशविशिष्ट त्वचा और विद्योतयितव्य—उससे प्रकाशित होनेवाला विषय [ चर्म ] तथा प्राण जिसे सूत्रात्मक कहते हैं और उससे धारणं किये जानेयोग्य अर्थात् ग्रथित होनेयोग्य [ यह सब सुषुप्तिके समय आत्मामें जाकर स्थित हो जाता है, क्योंकि ] पर—आत्माके लिये संहत हुआ नामरूपात्मक सम्पूर्ण कार्य-कारण-जात इतना ही है ॥ ८ ॥

अतः परं यदात्मरूपं जलसूर्यकादिवद्भोक्तृत्वकर्तृत्वेन इह अनुप्रविष्टम्—इससे परे जो आत्मस्वरूप जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान इस शरीरमें कर्ता-भोक्तारूपसे अनुप्रविष्ट है—

सुषुप्तिमें जीवकी परमात्मप्राप्ति

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९ ॥

यही द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता, मन्ता (मनन करनेवाला), बोद्धा और कर्ता विज्ञानात्मा पुरुष है। वह पर अक्षर आत्मामें सम्यक्प्रकारसे स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोतायही देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला,
घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धाचखनेवाला, मनन करनेवाला, जानने-
७०प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न ४:

| कर्ता विज्ञानात्मा विज्ञानं विज्ञायतेऽनेनेति करणभूतं बुद्ध्यादीदं तु विजानातीति विज्ञानं कर्तृकारकरूपं तदात्मा तत्स्वभावो विज्ञातृस्वभाव इत्यर्थः । पुरुषः कार्यकरणसंघातोक्तोपाधिपूर्णत्वात्पुरुषः । स च जलसूर्यकादिप्रतिबिम्बस्य सूर्यादिप्रवेशवज्जगदाधारशेषे परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठ ॥ ९ ॥ | वाला, कर्ता, विज्ञानात्मा—जिनसे जाना जाता है वह बुद्धि आदि ज्ञानके साधनस्वरूप हैं; किन्तु यह आत्मा तो उन्हें जानता है इसलिये यह कर्ता कारकरूप विज्ञान है । यह तद्रूप—वैसे स्वभाववाला अर्थात् विज्ञातृस्वभाव है । तथा कार्यकरणसंघातरूप उपाधिमें पूर्ण होनेके कारण यह पुरुष है । जलमें दिखायी देनेवाला सूर्यका प्रतिबिम्ब जिस प्रकार जलरूप उपाधिके नष्ट हो जानेपर सूर्यमें प्रविष्ट हो जाता है उसी प्रकार यह द्रष्टा, श्रोता आदिरूपसे बतलाया गया पुरुष जगत्के आधारभूत पर अक्षर आत्मामें सम्यक्रूपसे स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥ | | तदेकत्वविदः फलमाह— | [ अक्षरब्रह्मके साथ ] उस विज्ञानात्माका एकत्व जाननेवालेको जो फल मिलता है, वह बतलाते हैं— |

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

हे सोम्य ! इस छायाहीन, अशरीरी, अलोहित, शुभ्र अक्षरको जो पुरुष जानता है वह पर अक्षरको ही प्राप्त हो जाता है । वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है । इस सम्बन्धमें यह श्लोक (मन्त्र) है ॥ १० ॥

प्रश्न ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ७९
परमेवाक्षरं वक्ष्यमाणविशेषणं प्रतिपद्यत इत्येतदुच्यते । स यो ह वै तत्सर्वैषणाविनिर्मुक्तोऽच्छायं तमोवर्जितम्, अशरीरं नामरूपसर्वोपाधिशरीरवर्जितम्, अलोहितं लोहितादिसर्वगुणवर्जितम्, यत एवमतः शुभ्रं शुद्धम् , सर्वविशेषणरहितत्वादक्षरम् , सत्यं पुरुषाख्यम्, अप्राणम् अमनोगोचरम्, शिवं शान्तं सबाह्याभ्यन्तरमजं वेदयते विजानाति यस्तु सर्वत्यागी सोम्य स सर्वज्ञो न तेनाविदितं किंचित् सम्भवति । पूर्वमविद्ययाऽसर्वज्ञ आसीत्पुनर्विद्ययाविद्यापनये सर्वो भवति तदा । तत्तस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रो भवति उक्तार्थसंग्राहकः ॥ १० ॥उसके विषयमें ऐसा कहते हैं कि वह आगे बतलाये जानेवाले विशेषणोंसे युक्त पर अक्षरको ही प्राप्त हो जाता है । सम्पूर्ण एषणाओंसे छूटा हुआ जो अधिकारी उस अच्छाय—तमोहीन, अशरीर—नामरूपमय सम्पूर्ण औपाधिक शरीरोंसे रहित, अलोहित—लोहितादि सब प्रकारके गुणोंसे हीन, और ऐसा होनेके कारण ही जो शुभ्र—शुद्ध, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित होनेके कारण अक्षर, पुरुषसंज्ञक सत्य, अप्राण, मनका अविषय, शिव, शान्त और सबाह्याभ्यन्तर अज परब्रह्मको जानता है, तथा जो सबका त्याग करनेवाला है, हे सोम्य ! वह सर्वज्ञ हो जाता है—उससे कुछ भी अज्ञात नहीं रह सकता । वह अविद्यावश पहले असर्वज्ञ था, फिर विद्याद्वारा अविद्याके नष्ट हो जानेपर वही [ सर्वज्ञ और ] सर्वरूप हो जाता है । इस विषयमें उपर्युक्त अर्थका संग्रह करनेवाला यह श्लोक यानी मन्त्र है ॥ १० ॥

अक्षरब्रह्मके ज्ञानका फल

$\begin{aligned} विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः \ प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । \end{aligned}$

७२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ४


तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य

स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥

हे सोम्य ! जिस अक्षरमें समस्त देवोंके सहित विज्ञानात्मा प्राण और भूत सम्यक् प्रकारसे स्थित होते हैं उसे जो जानता है वह सर्वज्ञ सभीमें प्रवेश कर जाता है ॥ ११ ॥

| विज्ञानात्मा सह देवैश्चाग्न्या- | जिस अक्षरमें अग्नि आदि | | दिभिः प्राणाश्चक्षुरादयो भूतानि | देवोंके सहित विज्ञानात्मा तथा | | पृथिव्यादीनि संप्रतिष्ठन्ति | चक्षु आदि प्राण और पृथिवी आदि | | प्रविशन्ति यत्र यस्मिन्नक्षरे | भूत प्रतिष्ठित होते अर्थात् प्रवेश | | तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य | करते हैं, हे सोम्य—हे प्रियदर्शन ! | | प्रियदर्शन स सर्वज्ञः सर्वमेव | उस अक्षरको जो जानता है वह सर्वज्ञ | | आविवेशाविशतीत्यर्थः ॥ ११ ॥ | सभीमें आविष्ट अर्थात् प्रविष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
चतुर्थः प्रश्नः ॥ ४ ॥

पञ्चम प्रश्न (त्रिमात्र ओङ्कारोपासना व फल)

पञ्चम प्रश्न

सत्यकामका प्रश्न—ओङ्कारोपासकको किस लोककी प्राप्ति होती है?

अथ हैनँ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥

तदनन्तर उन पिप्पलाद मुनिसे शिविपुत्र सत्यकामने पूछा—'भगवन् ! मनुष्योंमें जो पुरुष प्राणप्रयाणपर्यन्त इस ओंकारका चिन्तन करे, वह उस (ओंकारोपासना) से किस लोकको जीत लेता है ? ॥ १ ॥

अथ हैनँ शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ; अथेदानों परापरब्रह्म-प्राप्तिसाधनत्वेनोङ्कारस्योपासन-विधित्सया प्रश्न आरभ्यते-तदनन्तर उन आचार्य पिप्पलादसे शिविके पुत्र सत्यकामने पूछा; अब इससे आगे पर और अपर ब्रह्मकी प्राप्तिके साधन-स्वरूप ओंकारोपासनाका विधान करनेकी इच्छासे आगेका प्रश्न प्रारम्भ किया जाता है ।
स यः कश्चिद् वै भगवन् मनुष्येषु मनुष्याणां मध्ये तद् अद्भुतमिव प्रायणान्तं मरणान्तम्, यावज्जीवमित्येतत्, ओङ्कारमभिध्यायीताभिमुख्येन चिन्तयेत्,हे भगवन् ! मनुष्योंमें—मनुष्यजातिके बीच जो कोई आश्चर्यसदृश विरल पुरुष मरण-पर्यन्त--यावज्जीवन ओंकारका अभिध्यान अर्थात् मुख्यरूपसे चिन्तन करे

७४ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ५ ]


बाह्यविषयेभ्य उपसंहृतकरणः समाहितचित्तो भक्त्यावेशित-ब्रह्मभाव ओंकारे, आत्मप्रत्यय-सन्तानाविच्छेदो भिन्नजातीय-प्रत्ययान्तराखिलीकृतो निर्वात-स्थदीपशिखासमोऽभिध्यानश-ब्दार्थः। सत्यब्रह्मचर्याहिंसापरि-ग्रहत्यागसंन्यासशौचसन्तोषा-मायावित्वाद्यनेकयमनियमानु-गृहीतः स एवं यावज्जीवव्रत-धारणः कतमं वाव, अनेके हि ज्ञानकर्मनिर्वर्त्या लोकास्तिष्ठन्ति तेषु तेनोङ्काराभिध्यानेन कतमं स लोकं जयति ॥ १ ॥लेता है?] इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर और चित्तको एकाग्र कर उसे भक्तिके द्वारा जिसमें ब्रह्मभाव-की प्रतिष्ठा की गयी है उस ओंकारमें इस प्रकार लगा देना कि आत्मप्रत्ययसन्ततिका विच्छेद न हो—भिन्न जातीय प्रतीतियोंसे उसमें बाधा न आवे तथा वह वायुहीन स्थानमें रक्खे हुए दीपक-की शिखाके समान स्थित हो जाय—ऐसा ध्यान ही ‘अभिध्यान’ शब्दका अर्थ है। सत्य, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग, संन्यास, शौच, सन्तोष, निष्कपटता आदि अनेक यम-नियमोंसे सम्पन्न होकर यावज्जीवन ऐसा व्रत धारण करने-वालेको भला कौन-सा लोक प्राप्त होगा ? क्योंकि ज्ञान और कर्मसे प्राप्त होनेयोग्य तो बहुत-से लोक हैं; उनमें उस ओंकारचिन्तनद्वारा वह किस लोकको जीत लेता है ? ॥ १ ॥

ओंकारोपासनासे प्राप्तव्य पर अथवा अपर ब्रह्म

तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः। तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ २ ॥

उससे उस पिप्पलादने कहा—हे सत्यकाम! यह जो ओंकार है वही निश्चय पर और अपर ब्रह्म है। अतः विद्वान् इसीके आश्रयसे उनमेंसे किसी एक [ब्रह्म] को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥