भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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५१० रघुवंशमहाकाव्ये

भाषार्थ— प्रजापालक राम ने जब उसके शोक की बात सुनी, तब उन्हें बड़ी लज्जा आई, क्योंकि इक्ष्वाकुवंशी राजाओं के राज्य में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती थी। अर्थात् पिता के सामने पुत्र की या वृद्ध के सामने युवक की मृत्यु नहीं होती थी ॥ ४४ ॥

स मुहूर्तं क्षमस्वेति द्विजमाश्वास्य दुःखितम् ।
यानं सस्मार कौबेरं वैवस्वतजिगीषया ॥ ४५ ॥

अन्वयः— स दुःखितं द्विजं मुहूर्तं क्षमस्व इति आश्वास्य वैवस्वतजिगीषया कौबेरं यानं सस्मार।

स इति। स रामो दुःखितं द्विजं मुहूर्तं क्षमस्वेत्याश्वास्य वैवस्वतस्यान्त-कस्यापि जिगोषया जेतुमिच्छया कौबेरं यानं पुष्पकं सस्मार ।

भाषार्थ— राम ने उस दुःखी ब्राह्मण को यह कह कर आश्वासन दिया कि आप क्षमा करें और थोड़ी देर तक ठहरिये। मैं अभी आपके शोक को दूर करता हूँ। यह कह कर यमराज को जीतने की इच्छा से उन्होंने पुष्पक विमान को स्मरण किया ॥ ४५ ॥

आत्तशस्त्रस्तदध्यास्य प्रस्थितः स रघूद्वहः ।
उच्चचार पुरस्तस्य गूढरूपा सरस्वती ॥ ४६ ॥

अन्वयः— स रघूद्वहः आत्तशस्त्रः तत् अध्यास्य प्रस्थितः । तस्य पुरः गूढरूपा सरस्वती उच्चचार ।

आत्तेति। स रघूद्वहो राम आत्तशास्त्रः सन् तत्पुष्पकमध्यास्य प्रस्थितः । अथ अस्य पुरो गूढरूपा सरस्वत्यशरीरा वागुच्चचारोद्बभूव ।

भाषार्थ— जब राम अस्त्र-शस्त्र लेकर पुष्पक विमान पर बैठकर चलने लगे तब उनके सामने आकाश वाणी हुई ॥ ४६ ॥

राजन् प्रजासु ते कश्चिदपचारः प्रवर्तते ।
तमन्विष्य प्रशमयेर्भवितासि ततः कृती ॥ ४७ ॥

अन्वयः— हे राजन् ! ते प्रजासु कश्चित् अपचारः प्रवर्तते तं अन्विष्य प्रशमयेः ततः कृतीः भवितासि ।

राजेति। हे राजन् ! ते प्रजासु कश्चिदपचारो वर्णधर्मव्यतिकरः प्रवर्तते । तमपचारमन्विष्य प्रशमयेः । ततः कृती कृतकृत्यो भवितासि भविष्यसि ।

भाषार्थ— हे राजन् ! आपकी प्रजाओं में कुछ वर्णाश्रमधर्म के प्रतिकूल