भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 297

२२० रामायणमीमांसा षष्ठ इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते। निष्ठां नयत तावत्तु ततो मा द्रष्टुमर्हति ॥ जितवन्तं कृतार्थं हि तदाहमचिरादिमम्। कर्म ह्यानेन कर्तव्यं महदन्यैः सुदुष्करम् ॥ ( वा० रा० ३।५।२१-२३ ) उपर्युक्त श्लोकों का शुद्ध अर्थ है : शरभङ्ग मुनि के आश्रम में आते हुए रामको देखकर इन्द्र ने शरभङ्ग से जाने की अनुमति लेकर देवताओं से कहा कि राम इधर आ रहे हैं। वे मुझसे भाषण करें उसके पूर्व ही हम लोग अदृश्य हो जायें, क्योंकि विपद्मयी अवस्था में होने के कारण राम का मुझे देखना योग्य नहीं है। नागेशभट्ट कहते हैं कि—"विपदीव स्थितेन वैभवस्थदर्शनम् अनुचितम्” विपद्ग्रस्त के लिए वैभव में स्थित का दर्शन उचित नहीं है। इससे यह नहीं सिद्ध होता कि राम में इन्द्र के दर्शन की योग्यता नहीं है। उनमें कुछ कमी है। हाँ यह प्रश्न हो सकता है कि राम इन्द्र के दर्शन के योग्य क्यों नहीं हैं ? इन्द्र जिन शरभङ्ग को लेने के लिए उनके आश्रम में गये थे वे शरभङ्ग राम से कहते हैं—राम, शचीपति इन्द्र मुझे अकृतात्माओं के दुष्प्राप्य उग्र तप से विजित ब्रह्मलोक ले जाना चाहते हैं, परन्तु नर-व्याघ्र तुम्हें समीप में आया जानकर बिना प्रिय अतिथि तुमको देखे मैं ब्रह्मलोक नहीं जाऊँगा— “अहं ज्ञात्वा नरव्याघ्र वर्तमानमदूरतः । ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम् ।।” ( वा० रा० ३।५।२९ ) इसके अतिरिक्त यदि राम इन्द्र के द्वारा देखे जाने योग्य नहीं थे तो रावण-वध के बाद वह योग्यता कैसे आ जाती ? बुल्के इस प्रश्न का क्या उत्तर देंगे ? इन्द्र स्वयं ही कह रहे हैं कि इनको अति दुष्कर कर्म करना है, अतः विजयी तथा कृतकार्य होने पर ही मैं इनका दर्शन करूँगा। सम्बद्ध श्लोक में “जितवन्तं कृतार्थं" अधूरा वाक्य है, अतः 'द्रक्ष्यामि' क्रिया का अध्याहार करना होगा । तथाच इस इन्द्रवाक्य का निष्कर्ष यह है कि अभी वनवास-दशा में नहीं किन्तु रावण पर विजय प्राप्त करने के अनन्तर पूर्ण वैभव दशा में मैं इनका दर्शन करूँगा । “सर्वथापि राम मुझे देखने योग्य नहीं हैं” बुल्के का यह अर्थ अशुद्ध है। “स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थितुमर्हसि ।” ( वा० रा० २।३०।१० ) जनकनन्दिनी सीता कह रही हैं, "मुझको बिना लिए आपको वन जाना उचित नहीं है।” उक्त वचन का यह तात्पर्य कदापि नहीं लिया जा सकता कि सीता को लिये बिना राम में वन जाने की योग्यता नहीं है। ऐसे स्थानों में औचित्यबोध ही 'अर्ह' धातु का अर्थ है; गन्तुं नार्हसि, वक्तुं नार्हसि, भोक्तुं नार्हसि इत्यादि प्रयोगों द्वारा किसी में गमन, वचन एवं भोजन की अयोग्यता का प्रतिपादन नहीं होता। 'अर्हति' क्रिया के आधार पर बुल्के ने राम में इन्द्र के दर्शन की योग्यता नहीं है, ऐसा अर्थ लगा कर अपनी ही कलुषित भावनाओं का परिचय दिया है, साथ ही साहित्य ज्ञान शून्यता का भी । शब्दकल्पद्रुम कोष के अनुसार “अर्हति योग्यो भवति, उपयुक्तो भवति, उचितो भवति ।” अर्थात् 'अर्हति' पद का प्रयोग योग्य, उपयुक्त और उचित, तीनों ही अर्थों में किया जाता है। 'उचित' अर्थ में प्रयुक्त 'अर्हति' शब्द का उदाहरण श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है— “तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।” ( भ० गी० १।३७ ) अपने बान्धव धार्तराष्ट्रों का हनन करना हम लोगों के लिए उचित नहीं है। यहाँ भी ऐसा अर्थ नहीं किया जाता कि हम लोगों में उन लोगों को मारने की योग्यता नहीं है । साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यदि इन्द्र राम से मिलते तो वे उनकी वैसी ही स्तुति करते जैसे युद्धकाण्ड में मिलने पर उन्होंने देवताओं के साथ स्तुति की थी। इस स्थिति में राम की विष्णुरूपता स्पष्ट हो जाने से रावण के वध में उसके द्वारा प्राप्त वरदान के कारण ही बाधा पड़ती, क्योंकि उसका वध नर से ही होना