भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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सप्तम अध्याय

रामकथा का प्रारम्भिक विकास

बुल्के लिखित रामकथा में १२९ वें अनु० में कहा गया है "वैदिक साहित्य में आख्यान, इतिहास तथा पुराण मिलते हैं। ये ब्राह्मणों के अर्थवाद के एक आवश्यक अङ्ग समझे जाते थे। प्राचीन काल से धार्मिक संस्कारों तथा यज्ञों के अवसर पर ऐतिहासिक तथा पौराणिक इन्हें सुनाते थे। (शत० ब्रा० १३।४।३ ) तथा अर्वाचीन वैदिक साहित्य (शा० गृ० सू० १।२२।११ ) में ये पाँचवें वेद कहे जाते हैं— 'अथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमम् ।" (छा० उ० ७।१।२ ) आख्यानों के गद्य के साथ जो पद्य दिया जाता था, उसे गाथा कहा गया है। प्रारम्भ से ही दानस्तुति- स्वरूप 'नाराशंसी' गाथाओं का उल्लेख मिलता है (ऋ० सं० १०।८५।६ ) और इनके विषय में कहा जाता है कि ये सब झूठी हैं 'गाथानृतं नाराशंसी' (का० सं० १४।५) । इस नाराशंसी गाथासाहित्य के रचयिता तथा रक्षक राजदरबारों में रहनेवाले सूत थे। इनके अतिरिक्त कुशीलव जनसाधारण में इन गीतों का प्रचार करते थे।"¹

वेद और वेदान्त के रहस्य के अनभिज्ञ प्राञ्चात्यों की उक्त कल्पना अशुद्ध एवं निराधार है। वैदिक साहित्य के आख्यान तथा इतिहासपुराण अपौरुषेय वेदरूप ही हैं। ऋक्, साम, यजुः तथा अथर्व के मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं उपनिषदों में आनेवाले आख्यान या पुराण-इतिहास सब अनादि अपौरुषेय ही हैं। वे ब्राह्मणों के नहीं किन्तु विधियों के अर्थवादरूप होते हैं; विधि-अर्थवाद स्वयं भी ब्राह्मण के अन्तर्गत हैं; इन वैदिक आख्यानों को वैदिक ही सुनाते थे, पौराणिक या ऐतिहासिक नहीं। मन्त्रों तथा ब्राह्मणों में आनेवाले आख्यान तथा इतिहास-पुराण तो वेद ही हैं, पञ्चम वेद नहीं। पञ्चम वेद तो पौरुषेय महाभारत, रामायण, इतिहास तथा पद्मपुराण, नारदीयपुराण आदि आर्ष इतिहास-पुराण ही हैं।

आख्यानों के गद्य के साथ जो पद्य दिया जाता है; उसे गाथा बौद्धों के यहाँ ही कहा जाता है। वेदों तथा पुराणों में तो पद्यों के साथ भी पद्यरूप गाथाएँ मिलती हैं। नाराशंसी गाथा वेदरूप ही हैं। मनुष्यों के स्तुतिवाले मन्त्र ही नाराशंसी कहे जाते हैं। मनुष्यों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूप मन्त्र नाराशंसी होते हैं। नरों की आशंसा (प्रशंसा) ही नाराशंसी है। ये सब सुखावबोधार्थ कल्पित आख्यायिका रूप होते हैं। इसी लिए स्वार्थ में अनृत कहे जाते हैं अर्थात् वस्तुतः किसी नर के वर्णन में उनका तात्पर्य नहीं होता है। सम्पूर्ण वेदों का धर्म या ब्रह्म ही मुख्य अर्थ है। परमार्थ वस्तु ब्रह्म ही सब वेदों का अर्थ है— "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।" "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ॥" इत्यादि श्रुति और स्मृति इसमें प्रमाण हैं जब कि बुल्के के कथन में कुछ भी प्रमाण नहीं है। गाथा नाराशंसी भी मन्त्र, ब्राह्मणादिरूप होते हैं। वे भी अपौरुषेय होते हैं। उनका रचयिता कोई नहीं होता। राजदरबारों के सूत आदि को तो इनके पठन का भी अधिकार नहीं है। मुख्य पुराणप्रवक्ता उग्रश्रवा सूत तथा उनके पुत्र सौति भी आर्ष इतिहास-पुराण के ही प्रवचन में अधिकृत थे। इसी लिए श्रीमद्भागवत में कहा है—


१. एम्. विंटरनित्सः हि० इं० लि० भाग १, पृष्ठ ३१४।